अखंडता के लिए ख़तरा बना 'सशस्त्र सेना अधिकार अधिनियम'
सेना के जवानों के द्वारा बेकसूर लोगों को फ़र्जी मुठभेड़ में मार गिराने की घटनाएं देश के उन भागों में आए दिन की बात हो गई हैं जहां पर ‘सशस्त्र सेना विशेष अधिकार अधिनियम’ जैसे क्रूर कानून लागू हैं। ऐसी घटनाएं केवल तभी प्रकाश में आती हैं जब सशस्त्र सेना का कोई व्यक्ति सामने आकर सचाई बयान करने की हिम्मत करता है। अभी हाल ही में बारामुल्ला में कार्यरत सशस्त्र सीमाबल की 161 बटालियन के एक जवान, अब्बास हुसैन शाह ने, जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के माछिल सैक्टर में स्थित नियंत्रण रेखा पर 30 अप्रैल को तीन नौजवानों की हत्या किये जाने की पुष्टि की।
घटना से तीन दिन पहले ही 27 अप्रैल को एक भूतपूर्व विशेष पुलिस अधिकारी द्वारा एक अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर इन तीनों नौजवानों को सेना के साथ कुछ काम दिलाने का झांसा देकर उनके गांव से ले जाया गया और फिर उन्हें सेना के एक मेजर ओपिंदर के हाथों में पहले से बनी हुई योजना के अनुसार फ़र्जी मुठभेड़ में मारगिराने के लिए सौंप दिया गया। जब इस फ़र्जी मुठभेड़ की पोल खुली तो एक कर्नल के अधिकार वापस ले लिए गये तथा मेजर ओपिंदर को निलंबित कर दिया गया। सेना ने यह दावा किया था कि वह तीनों नौजवान पाकिस्तानी आतंकवादी थे और देश में घुसपैठ करते समय मुठभेड़ में मारे गये। बाद में जांच के दौरान यह पता चला कि वे बारामुल्ला जिले के नदिहाल गांव के निवासी थे। सेना ने उनसे हमला करने वाली रायफलें और गोला-बारूद बरामद होने का दावा भी किया था। निश्चित है कि वह सब सामान सेना द्वारा ही अपनी झूठी कहानी को सच साबित करने के लिये रख दिया गया था।
पिछले महीने भी इसी प्रकार की एक घटना में सेना ने हंडवारा क्षेत्र के रैनावाड़ी वनक्षेत्र में एक 70 वर्षीय आतंकी को गोलीबारी में मार गिराने का दावा किया था। बाद में मृतक की पहचान एक भिखारी के रूप में की गई। उस मामले में भी पुलिस ने बाद में भारतीय सेना के विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज किया था। एक अन्य घटना में घाटी के दो नौजवानों को कीलों वाले जूते और जैकेट पहनाकर एक स्थानीय एस.पी.ओ. की मदद से नियंत्रण रेखा पर ले जाया गया ताकि उन्हें फ़र्जी मुठभेड़ में मार डाला जाए। परंतु इस षडयंत्र का स्थानीय पुलिस को पता चल गया और वह तुरंत हरकत में आ गई जिससे उन नौजवानों का निश्चित हत्या से और उनके परिवारों का बदनामी और छीछालेदर से बचाव हो गया। कश्मीर में सेना द्वारा पैसे, इनाम और तरक्की के लालच में बेगुनाह लोगों की फ़र्जी मुठभेड़ों में योजनाबद्ध तरीके से हत्या की घटनाएं आए-दिन होने के दावे आम हो गये हैं।कुछ अनुमानों के अनुसार 1989 से अब तक के 21 वर्षों में कश्मीर में सुरक्षा बलों द्वारा मारे गये लोगों की संख्या 1,00,000 तथा बलात्कार की घटनाएं 20,000 से कम नहीं है। मानवाधिकार एवं न्याय के अंतर्राष्ट्रीय लोक-ट्राइब्यूनल के अनुसार विद्रोह के इन वषों में आठ हज़ार से अधिक लोगों के गायब होने के मामले दर्ज किये गए हैं और बहुत सीमा तक इसका श्रेय ‘सशस्त्र सेना विशेष अधिकार अधिनियम’ में सेना को दिये गए दण्डमुक्ति के प्रावधान को दिया जा सकता है। इस अधिनियम का मणिपुर में भी खुलकर दुरुपयोग किया गया है जिसके कारण वहां से भी आए-दिन इस प्रकार की घटनाओं की सूचनाएं आती रहती हैं।
‘सशस्त्र सेना विशेष अधिकार अधिनियम’, जो देश के विभिन्न भागों में 1958 से पिछले 52 वर्षों से लागू है, संविधान की मूल भावना की खुली अवहेलना करता है और इसी के कारण देश के उत्तरपूर्वी राज्यों में अघोषित आपातकाल एवं मार्शल लॉ की स्थिति बनी हुई है। ‘सशस्त्र सेना विशेष अधिकार अधिनियम’ ही नागालैंड, मणिपुर और असम में लोगों के अकथनीय कष्टों, यातनाओं, हत्याओं और बलात्कार तथा उन्हें उनके नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों से वंचित रखने के लिये जिम्मेदार है। इस अधिनियम के कश्मीर में लागू होने बाद इस राज्य में भी उसी प्रकार के वातावरण का पदार्पण हो गया है। गैरकानूनी हत्याएं आए दिन की बात हो गई हैं और लोगों को उनके नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों से वंचित रखा जाता है क्योंकि अशांत क्षेत्र घोषित होने के बाद वहां पर पांच या उनसे अधिक लोगों के एकत्र होने पर पाबंदी है और सेना को असीमित अधिकार प्राप्त हैं। नागरिक पूरी तरह एक वारंट अफसर या गैर कमीशंड अधिकारी द्वारा उसकी व्यक्तिगत मर्जी या सनक के आधार पर ‘शांति-व्यवस्था’ को परिभाषित करने तथा उसे कायम करने के लिये उठाए जाने वाले कदमों का निर्णय करने के अधिकार पर निर्भर होते हैं। अधिनियम की धारा 4(क) के अनुसार यदि संबंधित अधिकारी यह समझता है कि शांति व्यवस्था कायम करने के लिये ऐसा करना आवश्यक है तो जो भी चेतावनी देना वह आवश्यक समझे, वह चेतावनी देने के बाद ‘गोली चलाने और जितनी भी ताकत इस्तेमाल करना वह ठीक समझे उसका प्रयोग करने के लिये वह स्वतंत्र है, चाहे उसके कारण किसी की मृत्यु हो जाए,’ तथा उसकी उपधारा (ग) के अंतर्गत वह किसी भी ऐसे व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ़्तार कर सकता है जिसके द्वारा कोई संज्ञेय अपराध किये जाने की संभावना हो, तथा उपधारा (घ) के अंतर्गत ऐसी गिरफ़्तारी करने के लिये वह बिना वारंट के किसी भी स्थान की तलाशी कर सकता है। इस अधिनियम की सबसे ख़तरनाक बात यह है कि ऐसा करने के लिये उस अधिकारी को अपने से ऊपर के किसी अधिकारी से अनुमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है और न ही वह उस कार्यवाही के लिये किसी के प्रति जवाबदेह है।
सी.आर.पी.सी. की धारा 197 के अनुसार कोई भी न्यायालय बिना केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के ऐसे किसी अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता जिसे किसी सरकारी अधिकारी अथवा सशस्त्र सेना के किसी कर्मचारी द्वारा कथित रूप से अपने सरकारी कर्तव्य के पालन करने की प्रक्रिया या उद्देश्य की पूर्ति करने के दौरान किया गया हो, जबकि ‘सशस्त्र सेना विशेष अधिकार अधिनियम’ की धारा 7 के अनुसार सशस्त्र सेना के किसी अधिकारी पर मुकदमा चलाने के लिये केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है जिसका वास्तविक अर्थ यह है कि किसी भी नागरिक को ऐसे किसी सैन्य अधिकारी द्वारा किये गए अत्याचारों के लिये उसके विरुद्ध मुकद्दमा चलाने के लिये न्यायालय का दरवाज़ा खटकाने का कोई अधिकार नहीं है और वे पूरी तरह ऐसे अधिकारियों के रहमोकरम पर निर्भर हैं। सरकार द्वारा गठित किये गए विभिन्न जांच आयोगों ने सुरक्षा बलों को मानवाधिकारों के घोर उल्लंघ का दोषी पाया है परंतु अधिकतर मामलों में उनके द्वारा किये गये अपराधों के लिये उन पर मुकदमा नहीं चलाया गया। जब सशस्त्र बलों के कर्मचारी ‘सशस्त्र सेना विशेष अधिकार अधिनियम’ में उन्हें प्रदत्त अधिकारों से भी आगे जाकर गैरकानूनी हत्याएं करते हैं, तब हालत की गम्भीरता और प्रभावित लोगों की बेबसी का सही अनुमान लगाया जा सकता है। दुर्भाग्य से यह सब देश की एकता और अखंडता की रक्षा करने के नाम पर होता है।
इस बात में शक की कोई गुंजाइश नहीं है कि ‘सशस्त्र सेना विशेष अधिकार अधिनियम’ कश्मीर सहित देश के जिन-जिन भागों पर थोपा गया है वहां-वहां इसके परिणामस्वरूप मानवाधिकार उल्लंघन के मामले बढ़े हैं, अधिकतर लोगों के मन में असंतोष और अलगाव के भाव को पैदा हुआ है और निराश हो गये नौजवानों को हथियार उठाने और विद्राहियों में जा मिलने के लिए मजबूर होना पड़ा है - ताकि वह अपनी रक्षा कर सकें, असमय मौतों, बलात्कारों और यातनाओं से उन्हें मुक्ति मिल सके और वह एक ऐसे राजनैतिक और सामाजिक वातावरण का निर्माण कर सकें जो उन्हें देश के बराबर के नागरिक के रूप में गरिमामय जीवन जीने का अधिकार दे। उनके द्वारा गैरकानूनी रूप से हिरासत और फ़र्जी मुठभेड़ों में होने वाली मौतों के विरुद्ध किये जाने वाले क्रुद्ध प्रदर्शनों को, जो अक्सर हिंसक हो जाते हैं, इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में ही देखना और समझना चाहिये। उनको दोयम दर्जे का नागरिक समझकर उनके साथ वैसा ही व्यवहार करते रहने का परिणाम यह होगा कि उनके मन में अलगाव का भाव और अधिक मज़्ाबूत होगा और भारत से अलग होकर स्वतंत्रता प्राप्त करने की उनकी मांग को और अधिक बल मिलेगा।
यदि ‘सशस्त्र सेना विशेष अधिकार अधिनियम’ (और यू.ए.पी.ए. जो देश के विभिन्न भागों में लागू है), जैसे क्रूर कानूनों को जम्मू कश्मीर और देश के अन्य भागों से वापिस नहीं लिया जाता है तो लोगों के मन से डर को समाप्त करके उनके मन में सुरक्षा की भावना पैदा नहीं की जा सकती। उनके मन में सुरक्षा की भावना जागृत करने के लिये सुरक्षा बलों की उपस्थिति को सीमा पर और मजबूत करना चाहिये जो युद्धकाल में और जब सीमापार से ख़तरे की संभावना हो तब उनका सही स्थान है। शांतिकाल में बैरकें ही उनका सही निवास स्थान हैं। उनके शस्त्र भी दुश्मनों के विरुद्ध इस्तेमाल के लिये होते हैं, अपने ही देशवासियों के विरुद्ध इस्तेमाल के लिये नहीं जिनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उनके ऊपर होती है। शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध में उनके बहादुरीभरे कारनामों और बलिदानों की सभी प्रसंशा और आदर करते हैं। हमें उनकी इस छवि को उन क्षेत्रों में तैनात करके कलंकित करने का अवसर नहीं देना चाहिये जहां वह अपने ही लोगों पर ज़ुल्म ढाते हैं।
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और ये शान्तिकाल आयेगा कब? कैसे? और कौन तय करेगा कि यह शान्तिकाल ही है? "अपने देशवासी" किसे मानेंगे? बहुत से प्रश्न अधूरे छोड़कर जा रहे हो भाई…
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