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कश्मीर की विरासत है आजादी

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कश्मीर में एक बार परिस्थितियां इतनी बिगड़ी कि केन्द्रीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ गयी. घाटी के मुहाने पर एक बार फिर सेना को बैठाना पड़ा. हालांकि अब घाटी में फौरी तौर पर शांति है लेकिन क्या कश्मीर में समस्या का समाधान सिर्फ केन्द्र सरकार का हस्तक्षेप है. शेष नारायण सिंह मानते हैं कि कश्मीर में अशांति के कारण गहरे हैं. कश्मीर पर पाकिस्तान का बेजा दावा और भारत का 'अनावश्यक' हस्तक्षेप समस्या का मूल कारण बन गया है. इसका निदान किये बिना कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है.

जम्मू-कश्मीर की मौजूदा सरकार बनने के पहले विधानसभा के लिए जो चुनाव हुए थे, वे कई मायनों में मील का पत्थर थे. आतंकवादियों और अलगाववादियों की धमकियों की परवाह न करके आम कश्मीरी ने चुनाव में हिस्सा लिया था और भारत के साथ बने रहने के अपने निश्चय को एक बार फिर दोहराया था. सरकार बनी और उम्मीद की जा रही थी नौजवान मुख्य मंत्री राज्य की तरक्की के लिए सब कुछ दांव पर लगा देगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. आज डेढ़ साल बाद लगता है कि कश्मीर फिर एक बार असंतोष और अशांति की आग में जलने के लिए मजबूर हो गया है. कांग्रेस की मदद से मुख्यमंत्री बने उमर अब्दुल्ला को सत्ता में बनाए रखने का कांग्रेस का मंसूबा भी कमज़ोर नहीं है लेकिन बात बनती नज़र नहीं आ रही है. घाटी में बिगड़ गए हालात को दुरुस्त करने की कोशिश कर रहे मुख्य मंत्री ने जो सर्व दलीय बैठक बुलाई उसमें पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती शामिल नहीं हुईं पीडीपी जम्मू-कश्मीर की मुख्य विपक्षी पार्टी है. आरोप यह भी है कि उसके अलगाववादियों से सम्बन्ध मधुर हैं. अगर महबूबा ही शामिल नहीं हो रही हैं तो सर्वदलीय बैठक का कोई मतलब नहीं है क्योंकि घाटी के बाकी दो दल तो सरकार में शामिल ही हैं. कश्मीर में बन्दूक के ऊपर राज नीति को हावी करने की गरज से सभी राजनीतिक जमातों का जनहित और राष्ट्रहित के मामलों में साथ खड़े रहना ज़रूरी है. शायद इसीलिये प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भी सर्वदलीय बैठक में महबूबा मुफ्ती के शामिल न होने के फैसले को बदलवाने की कोशिश की. उन्होंने महबूबा को फोन करके कहा कि वे बैठक में शामिल हों. दिन भर की ऊहापोह के बाद महबूबा ने मीडिया के ज़रिये कह दिया कि वे उमर अब्दुल्ला की तरफ से बुलाई गयी बैठक में शामिल नहीं होंगीं. बैठक में शामिल न होने के जो उन्होंने कारण दिए वे बहुत ही डरावने हैं. उन्होंने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है उससे साफ़ लगता है कि वे उमर अब्दुल्ला की सरकार को बर्खास्त करवा कर एक नयी राजनीतिक व्यवस्था के सपने देख रही हैं. यह कश्मीर के हित में नहीं है.

जब भी केंद्रीय हस्तक्षेप से श्रीं नगर में राजनीतिक सत्ता बदली गयी है नतीजे भयानक हुए हैं. शेख अब्दुल्ला की १९५३ की सरकार हो या फारूक अब्दुल्ला को हटाकर गुल शाह को मुख्यमंत्री बनाने की बेवकूफी, केंद्र की गैर ज़रूरी दखलंदाजी के बाद कश्मीर में हालात खराब होते हैं. सर्वदलीय बैठक में न शामिल होने के लिए महबूबा मुफ्ती ने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है उसका भावार्थ सीधे तौर पर केंद्रीय हस्तक्षेप की मांग करता नज़र आता है. उन्होंने कहा है कि हालात बहुत खराब हैं और हमें मुकामी स्तर पर तनाव को ख़त्म करना है. उसके लिए ऐसी पहल की ज़रुरत है जो सर्वोच्च स्तर से आये और लोग उसे गंभीरता से लें. महबूबा ने कहा कि सर्वदलीय बैठक से कुछ नहीं निकलने वाला है. राज्य सरकार की विश्वसनीयता ख़त्म हो चुकी है और अब उसके पास कोई विकल्प नहीं है. उन्होंने प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की और कहा कि उनके पास हस्तक्षेप करने का नैतिक अधिकार है और उनकी पहल को जनता गंभीरता से लेगी. उन्होंने कहा कि हमें एक ऐसी पहल की ज़रुरत है जिसका कश्मीर के आम आदमी पर असर पड़े. अब हमें अंतर राष्ट्रीय मंचों पर असर की परवाह नहीं करनी चाहिए. उनके इस रुख से यह बात बिलकुल साफ़ हो जाती है कि महबूबा अब किसी भी हाल में उमर अब्दुल्ला को चैन से नहीं बैठने देगीं.

हालांकि इसमें दो राय नहीं है कि उमर अब्दुल्ला ने पिछले डेढ़ साल में अपना और कश्मीरी राजनीति का जितना नुकसान किया है, वह बहुत वक़्त में ठीक किया जा सकेगा लेकिन केंद्र के दबाव से निर्वाचित सरकार को हटाना वैसे भी ठीक नहीं है और कश्मीर की संवेदनशील जनता के लिए तो वह और भी बुरा होगा. कश्मीर में केन्द्रीय दखल के नतीजों के इतिहास पर नज़र डालने से तस्वीर और साफ़ हो जायेगी. सच्ची बात यह है कि जम्मू-कश्मीर की जनता हमेशा से ही बाहरी दखल को अपनी आज़ादी में गैर ज़रूरी मानती रही है. इसी रोशनी में यह भी समझने की कोशिश की जायेगी कि जिस कश्मीरी अवाम ने कभी पाकिस्तान और उसके नेता मुहम्मद अली जिन्नाह को धता बता दी थी और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राजा की पाकिस्तान के साथ मिलने की कोशिशों को फटकार दिया था, और भारत के साथ विलय के लिए चल रही शेख अब्दुल्ला की कोशिश को अहमियत दी थी, आज वह भारतीय नेताओं से इतना नाराज़ क्यों है. कश्मीर में पिछले २० साल से चल रहे आतंक के खेल में लोग भूलने लगे हैं कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुमत वाली जनता ने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय नेताओं, महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण को अपना माना था.

देश के बँटवारे के वक़्त अंग्रेजों ने देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान के साथ मिलने की आज़ादी दी थी. बहुत ही पेचीदा मामला था . ज़्यादातर देशी राजा तो भारत के साथ मिल गए लेकिन जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर का मामला विवादों के घेरे में बना रहा . कश्मीर में ज़्यादातर लोग तो आज़ादी के पक्ष में थे. कुछ लोग चाहते थे कि पाकिस्तान के साथ मिल जाएँ लेकिन अपनी स्वायत्तता को सुरक्षित रखें. इस बीच महाराजा हरि सिंह के प्रधान मंत्री ने पाकिस्तान की सरकार के सामने एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केंद्रीय विभाग पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करेगें. १५ अगस्त को पाकिस्तान की सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा के स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसके बाद पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे. भारत सरकार को इस से चिंता हुई और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी चिंता का इज़हार इन शब्दों में किया."पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की." नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फरेन्स और शेख अब्दुल्ला से मदद मागेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा.अगर ऐसा हो गया गया तो पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इस लिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पडेगा.अगर राजा ने इस सलाह को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता. इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगें भड़क उठे थे. बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गयी और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढाने के लिए लाहौर से आने वाली कपडे, पेट्रोल और राशन की सप्प्लाई रोक दी. संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गयी थी. उसमें भी भारी अड़चन डाली गयी. हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे और लगने लगा था कि अक्टूबर १९४६ में की गयी महात्मा गाँधी की भविष्यवाणी सच हो जायेगी. महात्मा ने कहा था कि अगर राजा अपनी ढुलमुल नीति से बाज़ नहीं आते तो कश्मीर का एक यूनिट के रूप में बचे रहना संदिग्ध हो जाएगा.

कश्मीर के यह खासियत जिसे कश्मीरियत भी कहा जाता है, पिछले पांच हज़ार वर्षों की सांस्कृतिक प्रगति का नतीजा है. कश्मीर हमेशा से ही बहुत सारी संस्कृतियों का मिलन स्थल रहा है. इसीलिये कश्मीरियत में महात्मा बुद्ध की शख्सियत , वेदान्त की शिक्षा और इस्लाम का सूफी मत समाहित है. बाकी दुनिया से जो भी आता रहा वह इसी कश्मीरियत में शामिल होता रहा. कश्मीर मामलों के बड़े इतिहासकार मुहम्मद दीन फौक का कहना है कि अरब, इरान, अफगानिस्तान और तुर्किस्तान से जो लोग छ: सात सौ साल पहले आये थे, वे सब कश्मीरी मुस्लिम बन चुके हैं. उनकी एक ही पहचान है और वह है कश्मीरी. इसी तरह से कश्मीरी भाषा भी बिलकुल अलग है . और कश्मीरी अवाम किसी भी बाहरी शासन को बर्दाश्त नहीं करता.ऐसे हालत में राजा ने पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश शुरू कर दी. नतीजा यह हुआ कि उनके प्रधानमंत्री मेहर चंद महाजन को कराची बुलाया गया. जहां जाकर उन्होंने अपने ख्याली पुलाव पकाए. महाजन ने कहा कि उनकी इच्छा है कि कश्मीर पूरब का स्विटज़रलैंड बन जाए, स्वतंत्र देश हो और भारत और पाकिस्तान दोनों से ही बहुत ही दोस्ताना सम्बन्ध रहे. लेकिन पाकिस्तान को कल्पना की इस उड़ान में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उसने कहा कि पाकिस्तान में विलय के कागजात पर दस्तखत करो फिर देखा जाएगा. इधर २१ अक्टूबर १९४७ के दिन राजा ने अगली चाल चल दी. उन्होंने रिटायर्ड जज बख्शी टेक चंद को नियुक्त कर दिया कि वे कश्मीर का नया संविधान बनाने का काम शुरू कर दें. पाकिस्तान को यह स्वतंत्र देश बनाए रखने का महाराजा का आइडिया पसंद नहीं आया और पाकिस्तान सरकार ने कबायली हमले की शुरुआत कर दी. राजा मुगालते में था और पाकिस्तान की फौज़ कबायलियों को आगे करके श्रीनगर की तरफ बढ़ रही थी. लेकिन बात चीत का सिलसिला भी जारी था. पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव मेजर ,ए एस बी शाह श्रीनगर में थे और प्रधान मंत्री समेत बाकी अधिकारियों से मिल जुल रहे थे. जिनाह की उस बात को सच करने की तैयारी थी कि जब उन्होंने फरमाया था कि " कश्मीर मेरी जेब में है." कश्मीर को उस अक्टूबर में गुलाम होने से बचाया इसलिए जा सका कि घाटी के नेताओं ने फ़ौरन रियासत के विलय के बारे में फैसला ले लिया. कश्मीरी नेताओं के एक राय से लिए गए फैसले के पीछे कुछ बात है जो कश्मीर को एक ख़ास इलाका बनाती है जो बाकी राज्यों से भिन्न है.

कश्मीर को मुग़ल सम्राट अकबर ने १५८६ में अपने राज्य में मिला लिया था. उसी दिन से कश्मीरी अपने को गुलाम मानता था. और जब ३६१ साल बाद कश्मीर का भारत में अक्टूबर १९४७ में विलय हुआ तो मुसलमान और हिन्दू कश्मीरियों ने अपने आपको आज़ाद माना. इस बीच मुसलमानों, सिखों और हिन्दू राजाओं का कश्मीर में शासन रहा लेकिन कश्मीरी उन सबको विदेशी शासक मानता रहा. अंतिम हिन्दू राजा, हरी सिंह के खिलाफ आज़ादी की जो लड़ाई शुरू हुई उसके नेता, शेख अब्दुल्ला थे. शेख ने आज़ादी के पहले कश्मीर छोडो का नारा दिया.इस आन्दोलन को जिनाह ने गुंडों का आन्दोलन कहा था क्योंकि वे राजा के बड़े खैर ख्वाह थे जबकि जवाहर लाल नेहरू कश्मीर छोडो आन्दोलन में शामिल हुए और शेख अब्दुल्ला के कंधे से कंधे मिला कर खड़े हुए. इसलिए कश्मीर में हिन्दू या मुस्लिम का सवाल कभी नहीं था .वहां तो गैर कश्मीरी और कश्मीरी शासक का सवाल था और उस दौर में शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के इकलौते नेता थे. लेकिन राजा भी कम जिद्दी नहीं थे. उन्होंने शेख अब्दुल्ला के ऊपर राजद्रोह का मुक़दमा चलाया और शेख के वकील थे इलाहाबाद के बैरिस्टर जवाहर लाल नेहरू. १ अगस्त १९४७ को महात्मा गांधी कश्मीर गए और उन्होंने घोषणा कर दी कि जिस अमृतसर समझौते को आधार बनाकर हरि सिंह कश्मीर पर राज कर रहे हैं वह वास्तव में एक बैनामा है और अंग्रेजों के चले जाने के बाद उस गैर कानूनी बैनामे का कोई महत्व नहीं है. गाँधी जी ने एक और बात कहीं जो सबको बहुत अच्छी लगी. उन्होंने कहा कि सता का असली हक़दार कश्मीरी अवाम हैं जबकि जिन्नाह कहते रहते थे कि देशी राजाओं की सत्ता को उनसे छीना नहीं जा सकता .राजा के खिलाफ संघर्ष कर रहे कश्मीरी अवाम को यह बात बहुत अच्छी लगी. जबकि राजा सब कुछ लुट जाने के बाद भी अपने आप को सर्वोच्च्च मानते रहे. इसीलिये देशद्रोह के मुक़दमे में फंसाए गए शेख अब्दुल्ला को रिहा करने में देरी हुई क्योंकि राजा उनसे लिखवा लेना चाहता था कि वे आगे से उसके प्रति वफादार रहेगें.

कश्मीर का मसला बाद में संयुक्त राष्ट्र में ले जाया गया और उसके बाद बहुत सारे ऐसे काम हुए कि अक्टूबर १९४७ वाली बात नहीं रही. संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पास हुआ कि कश्मीरी जनता से पूछ कर तय किया जाय कि वे किधर जाना चाहते हैं. भारत ने इस प्रस्ताव का खुले दिल से समर्थन किया लेकिन पाकिस्तान वाले भागते रहे , शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के हीरो थे और वे जिधर चाहते उधर ही कश्मीर जाता . लेकिन १९५३ के बाद यह हालात भी बदल गए. . बाद में पाकिस्तान जनमत संग्रह के पक्ष में हो गया और भारत उस से पीछा छुडाने लगा. इन हालात के पैदा होने में बहुत सारे कारण हैं. बात यहाँ तक बिगड़ गयी कि शेख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त की गयी, और शेख अब्दुल्ला को ९ अगस्त १९५३ के दिन गिरफ्तार कर लिया गया.उसके बाद तो फिर वह बात कभी नहीं रही. बीच में राजा के वफादार नेताओं की टोली जिसे प्रजा परिषद् के नाम से जाना जाता था, ने हालात को बहुत बिगाड़ा. अपने अंतिम दिनों में जवाहर लाल ने शेख अब्दुल्ला से बात करके स्थिति को दुरुस्त करने की कोशिश फिर से शुरू कर दिया था. ६ अप्रैल १९६४ को शेख अब्दुल्ला को जम्मू जेल से रिहा किया गया और नेहरू से उनकी मुलाक़ात हुई. शेख अब्दुल्ला ने एक बयान दिया जिसे लिखा , कश्मीरी मामलों के जानकार बलराज पुरी ने था. शेख ने कहा कि उनके नेतृत्व में ही जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हुआ था. वे हर उस बात को अपनी बात मानते हैं जो उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के पहले ८ अगस्त १९५३ तक कहा था. नेहरू भी पाकिस्तान से बात करना चाहते थे इसी सिलसिले में शेख अब्दुल्ला को पाकिस्तान जाकर संभावना तलाशने का काम सौंपा. शेख गए और २७ मई १९६४ के दिन जब पाक अधिकृत कश्मीर के मुज़फ्फराबाद में उनके लिए दोपहर के भोजन के लिए की गयी व्यवस्था में उनके पुराने दोस्त मौजूद थे, जवाहरलाल नेहरू की मौत की खबर आई. बताते हैं कि खबर सुन कर शेख अब्दुल्ला फूट फूट कर रोये थे. नेहरू के मरने के बाद वहां संविधान की धारा ३५६ और ३५७ लागू कर दी गयी. इसके बाद शेख अब्दुल्ला को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया. इस बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर पर हमला करके उसे कब्जाने की कोशिश की लेकिन पाकिस्तानी फौज ने मुंह की खाई और ताशकंद में जाकर रूसी दखल से सुलह हुई.

कश्मीर की समस्या में इंदिरा गाँधी ने एक बार फिर हस्तक्षेप किया शेख साहेब को रिहा किया और उन्हें सत्ता दी. उसके बाद जब १९७७ का चुनाव हुआ तो शेख अब्दुला फिर मुख्य मंत्री बने. उनकी मौत के बाद उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन अब तक इंदिरा गाँधी बहुत कमज़ोर हो गयी थीं, एक बेटा खो चुकी थीं और उनके फैसलों को प्रभावित किया जा सकता था. अपने परिवार के करीबी अरुण नेहरू पर वे बहुत भरोसा करने लगी थीं, अरुण नेहरू ने जितना नुकसान कश्मीर मसले का किया शायद ही किसी ने नहीं किया हो. उन्होंने डॉ फारूक अब्दुल्ला से निजी खुन्नस में उनकी सरकार गिराकर उनके बहनोई गुल शाह को मुख्यमंत्री बनवा दिया. यह कश्मीर में केंद्रीय दखल का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है. इतना ही नहीं, कांग्रेस ने घोषित मुस्लिम दुश्मन, जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेज दिया. उसके बाद तो हालात बिगड़ते ही गए. उधर पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक लगे हुए थे. उन्होंने बड़ी संख्या में आतंकवादी कश्मीर घाटी में भेज दिया. बची खुची बात उस वक़्त बिगड़ गयी जब १९९० में तत्कालीन गृहमंत्री, मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी का पाकिस्तानी आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया यही दौर है जब कश्मीर में खून बहना शुरू हुआ और आज हालात जहां तक पंहुच गए हैं किसी के समझ में नहीं आ रहा है कि वहां से वापसी कब होगी.

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RAJ SINH on 19 July, 2010 14:38;11
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शेष जी का यह आलेख पत्रकारिता की सुन्दरतम मिसाल है. जानकारी नयी पीढी ( राजनेताओं को छोड़ , वे तो सिर्फ समस्या के तवे पर रोटी ही सेकेंगे ) को सच्चाई से अवगत ही नहीं करायेगी बल्कि सोचने पर भी मजबूर करेगी .

लेकिन मुफ्ती एंड कंपनी सीधे सीधे अलगाव वादियों और आतंक वादियों सहित पाकिस्तान की जेब में लगती है और यह सिलसिला उदधृत अपहरण के नाटक से ही जारी है जब महबूबा के बाप वी पी सिंह के गृह मंत्री थे.उनको हाशिये पर डाले बिना और उनके विष दंतों को तोड़े बिना कश्मीर की आग बरक़रार रहेगी .

लेकिन निदान सरल भी नहीं है .और हिजड़ों की सरकार और उसके कायरतम सरदार के लिए / द्वारा संभव ही नहीं है क्यों की वह स्वयं ही जनद्रोही वंशवाद के सिर्फ चाकर मात्र हैं .

देश तो वैसे ही भगवान भरोसे चल रहा है .अब जो करना है वही कर सकता है .
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Sanjeet Tripathi on 20 July, 2010 00:52;07
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bahut hi jankari bharaa aalekh, shukriya sheshh ji, kaafi kuchh jan ne mila aapke is lekh se.
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Je-Baat on 20 July, 2010 02:18;20
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राज सिंह साहेब री वात एकदम खरी है. सौ टका चोखी वात.
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anup anand on 20 July, 2010 23:26;15
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शेष नारायण सिंह जैसे मुस्लिम परस्त लेखक कभी सच नहीं लिख सकते। कश्मीर समस्या को समझाने के लिए इतना लम्बा चौड़ा लेख लिखने की जरूरत नहीं है। मैं शेष नारायण सिंह से पूछता हूं कि सिर्फ कश्मीर घाटी की ही विरासत आजादी क्यों हैं? आखिर जम्मू-कश्मीर राज्य के तीन प्रमुख हिस्से हैं-जम्मू, कश्मीर और लद्दाख। जम्मू और लद्दाख के लोग अमन चैन से रह रहे हैं , उन्हें आजादी नहीं चाहिए किंतु कश्मीर घाटी के लोग आसमान सिर पर क्यों उठाए हैं? जवाब सीधा है। जम्मू में हिंदू और लद्दाख में बौद्ध बहुमत में हैं। जबकि कश्मीर घाटी में मुसलमानों का आधिपत्य है। मुसलमान जहां भी बहुमत में होते हैं अन्य धर्मों के लोगों को नहीं रहने देते। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं व सिखों की दशा किसी से छिपी नहीं हैं। भारत के एक ही प्रांत के एक हिस्से (कश्मीर) में मुसलमानों का निर्णायक बहुमत था और यहां से करीब-करीब सारे हिंदुओं को खदेड़ दिया गया और उनकी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया गया। एक बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने पर आजीवन रोते रहने वाले शेष नारायण सिंह कश्मीर में सैकड़ों मंदिरों के तोड़े जाने की चर्चा भी पसंद नहीं करते होंगे। जिस दिन भारत के अन्य हिस्सों में मुसलमान बहुमत में हो जाएंगे वहां भी उनकी विरासत आजादी हो जाएगी।
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on 20 July, 2010 23:50;36
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anup anand की बात बिलकुल सही है आजकल मुस्लिम परस्ती और प्रगतिशील बनाने के चक्कर में लोग अपनी माँ को भी (भारत माता ) गाली दे सकते है छपास रोग के मारे हुए शेष जी भी उन्ही में से एक हैं
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Samar Singh on 21 July, 2010 01:03;25
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अनूप आनंद ने बिलकुल सटीक लिखा है. उन्होंने कश्मीर की हकीकत को बेनकाब कर दिया है, साथ ही मुस्लिम्परस्त सेकुलरो को भी.
राजसिंह जी बात भी एकदम सच है. जब तक रीढविहीन कोंग्रेस का राज रहेगा, कश्मीर का मुसलमान नासूर बनाकर भारत को पीड़ा देता रहेगा.
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image शेष जी शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
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हिंदू धर्म और हिंदुत्व में फर्क
हिंदू धर्म भारत का प्राचीन धर्म है। इसमें बहुत सारे संप्रदाय हैं। संप्रदायों को मानने वाला व्यक्ति अपने आपको हिंदू कहता है लेकिन हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है जिसका प्रतिपादन 1924 में वीडी सावरकर ने अपनी किताब 'हिंदुत्व में किया था। सावरकर इटली के उदार राष्ट्रवादी चिंतक माजिनी से बहुत प्रभावित हुए थे। उनके विचारों से प्रभावित होकर ही उन्होंने हिंदुत्व का राजनीतिक अभियान का मंच बनाने की कोशिश की थी।...
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जरूरी है जाति की जनगणना
जाति आधारित जनगणना आखिरी बार 1931 में हुई थी। 1941 में सरकार का पूरा ध्यान दूसरे विश्व युद्ध पर था जिसके चलते जनगणना नहीं हो पाई। आजादी के बाद जब 1951 में पहली जनगणना शुरू हुई तो जाति का मसला उठाया गया। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा कि जाति आधारित जनगणना से सामाजिक ताना-बाना बिखर जाएगा। उन्होंने इसे राष्ट्रभंजक मांग बताते हुए अस्वीकार कर दिया था।...
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सारे जहां में धूम हमारे ज़बां की है
कभी उर्दू की धूम सारे जहां में हुआ करती थी, दक्षिण एशिया का बेहतरीन साहित्य इसी भाषा में लिखा जाता था और उर्दू जानना पढ़े लिखे होने का सबूत माना जाता था। अब वह बात नही है। राजनीति के थपेड़ों को बरदाश्त करती भारत की यह भाषा आजकल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वह उर्दू जो आज़ादी की ख्वाहिश के इज़हार का ज़रिया बनी आज एक धर्म विशेष के लोगों की जबान बताई जा रही है।...
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लालू की करनी पर नीतीश की भरनी
हाल में ही बिहार की विधानसभा में जो कुछ हुआ उसने लोकतन्त्र को शर्मिन्दा तो किया ही है, लेकिन लोकतन्त्र भी अब ऐसी शर्मिन्दगी बार-बार झेलने को अभिशप्त है, और हम सब इसके आदी हो चुके हैं। बिहार विधानसभा में लालूप्रसाद और कांग्रेस ने जो हंगामा और तोड़फ़ोड़ की उसके पीछे कारण यह दिया गया कि महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि सन् 2002 से 2007 के बीच शासकीय कोषालय से करोड़ों रुपये निकाले गये और उनका बिल प्रस्तुत नहीं किया गया।...
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पूर्वोत्तर की आत्मघाती उपेक्षा
देश के पूरबी छोर पर स्थित प्रदेश मणिपुर को देश के अन्य हिस्सों से जोडने वाले राजमार्गो पर करीब दो महीने तक चली नाकेबंदियों की वजह से आवाजाही बंद रही। पूरे प्रदेश में खाने-पीने की चीजों, जीवनरक्षक दवाओं और पेट्रोलियम पदार्थों की घोर किल्लत उत्पन्न हो गई। सेना के विमानों की सहायता से अत्यावश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने की व्यवस्था हुई, पर ऐसी व्यवस्थाओं की अपनी सीमाएं होती है और इनसे जनजीवन को सामान्य तरीके से संचालित नहीं किया जा सकता। हालत आज भी कोई सुधरे नहीं है क्योंकि समस्या की जड़ें उसी तरह मजबूती से गड़ी हुई हैं....
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कश्मीर की विरासत है आजादी
कश्मीर में एक बार परिस्थितियां इतनी बिगड़ी कि केन्द्रीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ गयी. घाटी के मुहाने पर एक बार फिर सेना को बैठाना पड़ा. हालांकि अब घाटी में फौरी तौर पर शांति है लेकिन क्या कश्मीर में समस्या का समाधान सिर्फ केन्द्र सरकार का हस्तक्षेप है. शेष नारायण सिंह मानते हैं कि कश्मीर में अशांति के कारण गहरे हैं. कश्मीर पर पाकिस्तान का बेजा दावा और भारत का 'अनावश्यक' हस्तक्षेप समस्या का मूल कारण बन गया है. इसका निदान किये बिना कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है. ...
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कितना कामयाब होगा मुलायम का माफीनामा
जैसे तलाक देने के लिये तलाक को तीन बार बोला जाता है बिल्कुल इसी अंदाज मे सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह से अपने संबधो को लेकर माफी मांग कर मुसलमानो को रिझाने के लिये फिर से ट्रांपकार्ड फेंका है। अब देखना है कि मुलायम का यह ट्रांपकार्ड क्या हकीकत मे मुसलमानो को रिझाने मे कामयाब होगा।...
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शिवाजी के शौर्य को कलंकित करने का षण्यंत्र
छत्रपति शिवाजी के अपमान के मुद्दे पर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरम है. संभाजी ब्रिगेड जिसने पिछली बार भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बोरी) की तोड़-फोड़ की थी. इस बार महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल पर हमले का षण्यंत्र रचा था जिससे वे शनिवार को बाल बाल बच गये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जेम्स लेन की विवादास्पद पुस्तक "शिवाजी- द हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया" की बिक्री के लिए जिस अंदाज में छूट मिली है, उस पर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कई संगठन आंदोलनरत हैं. लेकिन हम पहले यह समझ लें कि यह जेम्स लेन महाशय हैं कौन और उन्होंने किताब आखिर किस इरादे से लिखी है?...
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बेमतलब हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस
हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है जो 1987 से हर साल 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विश्व की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं।...
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रमन सिंह की दमनकारी औद्योगिक नीति
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह नक्सली आंदोलन के खिलाफ चलनेवाले अभियान के अगुआ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन रमण सिंह इस आंदोनल को किसके इशारे पर कुचल रहे हैं? क्या वे आम आदमी और आदिवासियों के हित में नक्सली आंदोलन को कुचलने का दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं या फिर उनका एजेण्डा कुछ और है. हाल में ही छत्तीसगढ़ की नयी औद्योगिक नीति की समीक्षा करें तो साफ हो जाता है कि असल में यह संघर्ष वे किसके लिए कर रहे हैं. ...
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