पूर्वोत्तर की आत्मघाती उपेक्षा
देश के पूरबी छोर पर स्थित प्रदेश मणिपुर को देश के अन्य हिस्सों से जोडने वाले राजमार्गो पर करीब दो महीने तक चली नाकेबंदियों की वजह से आवाजाही बंद रही। पूरे प्रदेश में खाने-पीने की चीजों, जीवनरक्षक दवाओं और पेट्रोलियम पदार्थों की घोर किल्लत उत्पन्न हो गई। सेना के विमानों की सहायता से अत्यावश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने की व्यवस्था हुई, पर ऐसी व्यवस्थाओं की अपनी सीमाएं होती है और इनसे जनजीवन को सामान्य तरीके से संचालित नहीं किया जा सकता। हालत आज भी कोई सुधरे नहीं है क्योंकि समस्या की जड़ें उसी तरह मजबूती से गड़ी हुई हैं.
माओवादी, नक्सलियों के खिलाफ सेना को उतारकर मध्य भारत के गरीब आदिवासियों का दमन करने का दम ठोकते गृहमंत्री पी चिदंबरम और गृहसचिव पिल्लई वहां कोई ठोस कदम नहीं उठा सके, जहां सैन्यबल विशेषाधिकार कानून के अंतर्गत संयुक्त कमान सक्रिय है। संयुक्त कमान होने के बावजूद कानून और व्यवस्था राज्य सरकार का मामला होता है, उसकी जिद, आग्रह, पूर्वाग्रह और संकीर्णताएं अधिक प्रभावी होते हैं। मणिपुर और नगालैंड के मामले में भी यही होता रहा है । संयुक्त कमान और सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को समाप्त करने के लिए आंदोलन होते हैं, पर यह कानून जारी रहता हैं। इरोम शर्मिला वर्षो से उपवास कर रही है, उन्हें गिरफ्तार कर कृत्रिम तरीके से जीवित रखने की कवायद का वर्षो से निर्वाह किया जा रहा है। पर कुल मिलाकर क्या हासिल होता है और मोथे की जड-सा यह उग्रवाद बार-बार क्यों भडक जाता है? इस पर सोचने की जरूरत इस देश का सरकारी और राजनीतिक-तंत्र नहीं समझता ।
मणिपुर की दो तिहाई आबादी एक तिहाई क्षेत्र में बसी मैती जाति की है और दो तिहाई क्षेत्र में विभिन्न आदिवासी कबीलों का निवास है। परंपरागत रूप से मैती समुदाय का राजनीतिक वर्चस्व कायम रहा है और पहाड़ी क्षेत्रों में बसी आदिवासी आबादी से उनका और आदिवासियों के विभिन्न कबीलों के बीच कबीलाई किस्म की वैमनस्यता पलती रही है। राजनीतिक नेत्तृत्व उसे दूर करने की बजाए हवा देकर अपनी रोटी सेंकने की आदत का शिकार रहा है। इन कबीलों में नगा समूह के तंगखुल और मिजो समूह के कूकी आदिवासियों के बीच नब्बे के दशक में भडकी खूनी जंग में हजारों आदिवासियों की मौत हूई थी जो केन्द्र सरकार के हस्तक्षेप पर नगा विद्रोहियों के सबसे खूंखार संगठन एनएससीएन: मुइवा गुटः के साथ 1995 में शांति-वार्ता आरंभ होने के बाद ही थम सकी।
इन पहाडी क्षेत्रों को संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत लाने की पुरानी मांग दोनों प्रमुख कबीलों की है जिससे इन इलाको में गैर-आदिवासियों का जमीन खरीदना और निवास करना प्रतिबंधित हो जाएगा । लेकिन देश की आजादी के समय से ही नगा कबीले जहां अपने आत्मनिर्णय के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्रता की मांग को लेकर भारतीय राष्ट्र के खिलाफ विद्रोही गतिििवधियों में संलग्न हो गए, वहीं प्रतिक्रिया स्वरूप कूकी कबीले केन्द सरकार से सहयोग करने की राह चल पड़ी। उधर आरक्षण की सुविधा से आधुनिक सुख-सुविधा उठा रहे इन दोनों आदिवासियों को छठी अनुसूचि के अंतर्गत लाने का विरोघ मैती समुदाय की ओर से होता है क्योंकि आबादी का घनत्व अधिक होने से उन्हें पहाडी क्षेत्रों में ख्ेातीबाडी करने और बसने की आवश्यकता दिखती है। हालांकि विभिन्न कबीलों के आपसी एकजुटता के अभाव में इसे लेकर कभी कारगर दबाव नहीं बन सका है। परन्तु पूर्वोत्तर के मेघालय, मिजोरम, असम और त्रिपुरा के कुछ हिस्से पहले से इस अनुसूची के अंतर्गत मौजूद हैं। ताजा समस्या की बुनियाद में भी यही परंपरागत जटिलता है ।
मणिपुर के पहाड़ी जिला स्वायत्त परिषदों के चुनावों के खिलाफ 11 अप्रैल को आल नगा स्टूडेंट यूनियन आफ मणिपुर ने प्रमुख राजमार्ग ( संख्या-39) की नाकेबंदी कर दी। नगा-संगठनों का आरोप है कि मणिपुर सरकार ने पहाडी जिला स्वायत्त परिषद अधिनियम में ऐसे संशोधन किए हैं जिससे आदिवासी हितों की अवहेलना होती है। जिला परिषदों को विकास कार्यो को संचालित करने के पूरे अधिकार भी नहीं दिए गए हैं। विरोध खासतौर से मणिपुर स्टेट हिल पिपुल्स एडमिनिस्टेशन रेगुलेशन 1947 में 11 सितंबर 2009 को हुए संशोधन का है। इससे पहाडी जिलों की जन-सांख्यिकी संरचना बदल जाने की आशंका है। बताते हैं कि 1947 की नियमावली में गांवों के नामों का स्पष्ट उल्लेख था और सभी ग्रामवासियों को मकान टैक्स जिला परिषद में जमा कराना होता था। मगर संशोधित परिसीमन अधिसूचना में ढेर सारे गांवों के नाम गायब हैं। इस परित्यक्त गांवों की संख्या आधा से अधिक है। अनेक गांवों के नाम गलत लिखे गए हैं। वैसे बीस वर्षों के लंबे अंतराल के बाद अचानक स्वायत्त जिला परिषदों के चुनाव कराने की सरकारी मंशा अपने आप में संदिग्ध है।
विरोध के तमाम मसलों पर राजनीतिक सहमति कायम करने के बजाए सरकार ने चुनाव संपन्न कराए जिसमें स्वाभाविक रूप से जन-भागीदारी नगण्य रही । छह पहाडी स्वायत्त जिला परिषदों के 140 चुनाव क्षेत्रों में 70 उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित करना पडा। सेनापति जिला स्वयत्त जिला परिषद के 24 चुनावक्षेत्रों में छह पर किसी उम्मीदवार ने नामांकन-पत्र दाखिल ही नहीं किया जबकि राज्य सरकार ने उम्मीदवारों की सूरक्षा के मद्देनजर प्रदेश मुख्यालय इंफाल के पश्चिमी जिला कलेक्टर के कार्यालय में नामांकन दाखिल करने की व्यवस्था की थी। अब जो 134 उम्मीदवार चुनावों में विजयी घोषित हुए हैं, उन्हें सुरक्षागत कारणों से एक खेल परिसर में रखा गया और शपथ -ग्रहण की व्यवस्था भी वहीं गई। एक तरह से इन स्वायत्त जिला परिषदों की कमान उन लोगों के हाथों में सौंप दिया गया है जो पहले से राजधानी इंफाल में निवास करते हैं और निर्वाचित होने के बाद भी अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाने की स्थिति में नहीं हैं। फिर कैसी स्वायत्तता और कैसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया ?
दरअसल, चुनाव कराने और उसे नहीं होने देने के लिए नगा इलाकों में राजमार्गो पर जारी नाकेबंदी के माहौल में नगा-विद्रोहियों के साथ जारी शांतिवार्ता का ताजा दौर पहली बार नगालैंड में आयोजित हुआ और उसमंे हिस्सा लेने आए टीएस मुइवा को अपने पैत्क गांव सोमडल जाने की अभिलाषा हुई जो मणिपुर के उखरुल जिले में है । केन्द्र सरकार से इजाजत मिलने के बावजूद मणिपुर सरकार राजी नहीं हुई। यात्रा की तैयारियों के सिलसिले में जा रहे नगा स्टूडेंट फेडरेशन के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके खिलाफ नगालैंड में भी मणिपुर जाने वाले राजमार्गो की नाकेबंदी कर दी गई । फिर भी विद्रोही नेता की आगवानी करने मणिपुर नगालैंड सीमा माओगेट पर दोनों प्रदेशों के नगाओं की बडी भीड एकत्र हो गई। उस भीड पर मणिपुर पुलिस ने गोलीबारी की। यह छह मई की घटना है, तब से नगालैंड से गुजरने वाले दूसरे राजमार्ग (संख्या-54) की नाकेबंदी भी कर दी गई ।
नगा-विद्रोहियों के साथ दशकों से जारी शांतिवार्ता के अंतर्गत जारी युध्दविराम की शतों को लागू करने में असफलताओं के किस्से राष्ट्रीय अखबारों में प्रमुखता नहीं पाते, इसलिए केन्द्रीय सरकार उन घटनाओं की ओर आंखे मूदे बैठी रहती है । इस नाकेबंदी को दूर करने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से पहल के नाम पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ नगा स्टूडेंटस फेडरेशन के प्रतिनिधि-मंडल की मुलाकात को याद किया जा सकता है। जिसके बाद एनएसएफ नाकेबंदी को स्थगित करने के लिए सहमत हो गया। परन्तु यह वर्तमान समस्या का सिर्फ एक और बहुत छोटा पहलू है ।
श्री मुइवा माओगेट के पास एक गांव में टिके रहे । उनकी यात्रा की इजाजत देने का अनुरोध करने नगालैंड प्रदेश कांग्रेस के नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल मणिपुर गया । लेकिन मणिपुर सरकार टस से मस नहीं हुई । वह गतिरोध जारी रहा । मुइवा नगालैंड में जमे हैं और मणिपुर सरकार सुरक्षा बलों के भरोसे राजमार्गो पर आवाजाही को कमोबेश जारी रखने में लगा है । हालांकि इन दो नाकेबंदियों के पहले से ही नगालैंड से गुजरने वाले प्रमुख राजमार्ग पर मालवाहक वाहनों की आवाजाही बंद है। नगा विद्रोहियों ने भारतीय खाद्य निगम से पचास लाख नाजायज टैक्स मांगी थी और भुगतान नहीं होने पर 31 मार्च को दीमापुर में भारतीय खाद्य निगम के गोदाम से अनाज लेकर मणिपुर जाने वाले टकों को रोक दिया था। फिर पुलिस की निष्क्रियता के खिलाफ टांसपोर्टरों और डाइवरो ंने हडताल कर दी। उनका आरोप है कि नगालैंड पुलिस, अफसरों और विद्रोही संगठनों द्वारा नाजायज टैक्सों की मनामनी मांगों को पूरा नहीं करने पर मारपीट और हत्या जैसी घटनाएं अक्सर होती रहती हैं, पर आजतक किसी एक अपराधी को भी गिरफतार नहीं किया जा सका है ।
नगा-संगठनों की ओर से नगा-कबीलों की समूची निवास भूमि को मिलाकर एक राजनीतिक इकाई का गठन करने की मांग का पडोसी राज्यों की ओर से जोरदार विरोध होता रहा है। हालांकि नगाओं की निवास भूमि में म्यानमार के कुछ इलाके भी हैं, जिसके बारे में भारत सरकार कुछ नहीं कर सकती । परन्तु मणिपुर भी इसके लिए कतई तैयार नहीं । जबकि उसके पहाडी जिलों में नगा कबीलों का वर्चस्व है। सन 2001 में एकबार केन्द्र सरकार ने युध्दविराम के दायरे में मणिपुर को लाने का प्रयास किया तो मणिपुर के समूचे मैदानी इलाके जिसमें मैती जाति के लोग बसे हैं और कूकी समूह के आदिवासियों के क्षेत्र में जबरदस्त विरोध हुआ। केन्द्र सरकार ने अपने पैर पीछे खींच लिए। हालांकि एनएससीएन के साथ बातचीत बंद नहीं हुई, पर जबरदस्त गतिरोध जरूर आ गया। बातचीत के समूचे ब्योरे तो कभी जगजाहिर नहंी हुए। परन्तु नगा आदिवासियों की समूची निवास भूमि को मिलाकर बृहत्तर नगालैंड अर्थात नागालिम का गठन करने की परिकल्पना में मणिपुर के पहाडी जिलों के अलावा अरुणाचल प्रदेश के दो जिले और असम के कुछ इलाके शामिल हैं । कोई प्रदेश अपने इलाके को छोड़ने के लिए राजी नहीं । लेकिन जिसतरह का टकराव मणिपुर में है, अन्य किसी राज्य में नहीं। अगर मणिपुर नगा-क्षेत्रों को अपने प्रदेश का अविभाज्य अंग बनाए रखना चाहता है तो उन लोगों के राजनीतिक अधिकारों की सुरक्षा करना उसका कर्तव्य बन जाता है। इसे संभवतः परांपरा से कायम राजनीतिक वर्चस्व को बरकरार रखने वाली मैती समुदाय की राजनीति करने वाले नेता भूल जाते हैं ।
इन सारी बातों के परिप्रेक्ष्य में वर्तमान समस्या पर विचार करें तो तीन प्रश्न उभरते हैं । मणिपुर सरकार ने बीस वर्षो बाद अचानक स्वायत्त जिला परिषदों के चुनाव कराने का अडियल रवैया क्यो अपनाया? पहली बार नगालैंड में आयोजित शांतिवार्ता में हिस्सा लेने आए मुइवा को दशकों बाद अचानक अपने पैतृक गांव जाने की प्रबल अभिलाषा क्यों हुई? और नगा-विद्रोहियों ने अचानक भारतीय खाद्य निगम से नाजायज टैक्स मांगने की हरकत क्यों की? इन प्रश्नों का जवाब महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण नगा और मैती समुदायों के बीच मेल-मिलाप की गंभीर कोशिश की आवश्यकता है जिसके बगैर नगा-शांति-वार्ता की सफलता संदिग्ध है। और जातियों का यह विवाद राज्यों के बीच विवाद में बदल सकता है । पूर्वोत्तर की विद्रोही गतिविधियों को समाप्त करने की दिशा में ठोस राजनीतिक पहल मुइवा को उनके पैतृक गांव ले जाकर हो सकती है।
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