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सारे जहां में धूम हमारे ज़बां की है

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कभी उर्दू की धूम सारे जहां में हुआ करती थी, दक्षिण एशिया का बेहतरीन साहित्य इसी भाषा में लिखा जाता था और उर्दू जानना पढ़े लिखे होने का सबूत माना जाता था। अब वह बात नही है। राजनीति के थपेड़ों को बरदाश्त करती भारत की यह भाषा आजकल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वह उर्दू जो आज़ादी की ख्वाहिश के इज़हार का ज़रिया बनी आज एक धर्म विशेष के लोगों की जबान बताई जा रही है।

इसी जबान में कई बार हमारा मुश्तरका तबाही के बाद गम और गुस्से का इज़हार भी किया गया था। आज जिस जबान को उर्दू कहते हैं वह विकास के कई पड़ावों से होकर गुजरी है। 12वीं सदी की शुरुआत में मध्य एशिया से आने वाले लोग भारत में बसने लगे थे। वे अपने साथ चर्खा और कागज भी लाए जिसके बाद जिंदगी, तहज़ीब और ज़बान ने एक नया रंग अख्तियार करना शुरू कर दिया। जो फौजी आते थे, वे साथ लाते थे अपनी जबान खाने पीने की आदतें और संगीत।

वे यहां के लोगों से अपने इलाके की जबान में बात करते थे जो यहां की पंजाबी, हरियाणवी और खड़ी बोली से मिल जाती थी और बन जाती थी फौजी लश्करी जबान जिसमें पश्तों, फारसी, खड़ी बोली और हरियाणवी के शब्द और वाक्य मिलते जाते थे। 13 वीं सदी में सिंधी, पंजाबी, फारसी, तुर्की और खड़ी बोली के मिश्रण से लश्करी की अगली पीढ़ी आई और उसे सरायकी ज़बान कहा गया। इसी दौर में यहां सूफी ख्यालात की लहर भी फैल रही थी। सूफियों के दरवाज़ों पर बादशाह आते और अमीर आते, सिपहसालार आते और गरीब आते और सब अपनी अपनी जबान में कुछ कहते। इस बातचीत से जो जबान पैदा हो रही थी वही जम्हूरी जबान आने वाली सदियों में इस देश की सबसे महत्वपूर्ण जबान बनने वाली थी। इस तरह की संस्कृति का सबसे बड़ा केंद्र महरौली में कुतुब साहब की खानकाह थी। सूफियों की खानकाहों में जो संगीत पैदा हुआ वह आज 800 साल बाद भी न केवल जिंदा है बल्कि अवाम की जिंदगी का हिस्सा है।

अजमेर शरीफ में चिश्तिया सिलसिले के सबसे बड़े बुजुर्ग ख़्वाजा गऱीब नवाज के दरबार में अमीर गरीब हिन्दू, मुसलमान सभी आते थे और आशीर्वाद की जो भाषा लेकर जाते थे, आने वाले वक्त में उसी का नाम उर्दू होने वाला था। सूफी संतों की खानकाहों पर एक नई ज़बान परवान चढ़ रही थी। मुकामी बोलियों में फारसी और अरबी के शब्द मिल रहे थे और हिंदुस्तान को एक सूत्र में पिरोने वाली ज़बान की बुनियाद पड़ रही थी। इस ज़बान को अब हिंदवी कहा जाने लगा था। बाबा फरीद गंजे शकर ने इसी ज़बान में अपनी बात कही। बाबा फरीद के कलाम को गुरूग्रंथ साहिब में भी शामिल किया गया। दिल्ली और पंजाब में विकसित हो रही इस भाषा को दक्षिण में पहुंचाने का काम ख्वाजा गेसूदराज ने किया। जब वे गुलबर्गा गए और वहीं उनका आस्ताना बना। इस बीच दिल्ली में हिंदवी के सबसे बड़े शायर हज़रत अमीर खुसरो अपने पीर हजरत निजामुद्दीन औलिया के चरणों में बैठकर हिंदवी जबान को छापा तिलक से विभूषित कर रहे थे। अमीर खुसरो साहब ने लाजवाब शायरी की जो अभी तक बेहतरीन अदब का हिस्सा है और आने वाली नस्लें उन पर फख्र करेंगी। हजरत अमीर खुसरों से महबूब-ए-इलाही ने ही फरमाया था कि हिंदवी में शायरी करो और इस महान जीनियस ने हिंदवी में वह सब लिखा जो जिंदगी को छूता है। हजरत निजामुद्दीन औलिया के आशीर्वाद से दिल्ली की यह जबान आम आदमी की जबान बनती जा रही थी।

उर्दू की तरक्की में दिल्ली के सुलतानों की विजय यात्राओं का भी योगदान है। 1297 में अलाउद्दीन खिलजी ने जब गुजरात पर हमला किया तो लश्कर के साथ वहां यह जबान भी गई। 1327 ई. में जब तुगलक ने दकन कूच किया तो देहली की भाषा, हिंदवी उनके साथ गई। अब इस ज़बान में मराठी, तेलुगू और गुजराती के शब्द मिल चुके थे। दकनी और गूजरी का जन्म हो चुका था।इस बीच दिल्ली पर कुछ हमले भी हुए। 14वीं सदी के अंत में तैमूर लंग ने दिल्ली पर हमला किया, जिंदगी मुश्किल हो गई। लोग भागने लगे। यह भागते हुए लोग जहां भी गए अपनी जबान ले गए जिसका नतीजा यह हुआ कि उर्दू की पूर्वज भाषा का दायरा पूरे भारत में फैल रहा था। दिल्ली से दूर अपनी जबान की धूम मचने का सिलसिला शुरू हो चुका था। बीजापुर में हिंदवी को बहुत इज्जत मिली। वहां का सुलतान आदिलशाह अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय था, उसे जगदगुरू कहा जाता था। सुलतान ने स्वयं हजरत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम), ख्वाजा गेसूदराज और बहुत सारे हिंदू देवी देवताओं की शान में शायरी लिखी। गोलकुंडा के कुली कुतुबशाह भी बड़े शायर थे। उन्होंने राधा और कृष्ण की जिंदगी के बारे में शायरी की। मसनवी कुली कुतुबशाह एक ऐतिहासिक किताब है। 1653 में उर्दू गद्य (नस्त्र) की पहली किताब लिखी गई। उर्दू के विकास के इस मुकाम पर गव्वासी का नाम लेना जरूरी हैं। गव्वासी ने बहुत काम किया है इनका नाम उर्दू के जानकारों में सम्मान से लिया जाता है। दकन में उर्दू को सबसे ज्यादा सम्मान वली दकनी की शायरी से मिला। आप गुजरात की बार-बार यात्रा करते थे। इन्हें वली गुजराती भी कहते हैं। 2002 में अहमदाबाद में हुए दंगों में इन्हीं के मजार पर बुलडोजर चलवा कर नरेंद्र मोदी ने उस पर सड़क बनवा दी थी। जब तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद शिफ्ट करने का फैसला लिया तो दिल्ली की जनता पर तो पहाड़ टूट पड़ा लेकिन जो लोग वहां गए वे अपने साथ संगीत, साहित्य, वास्तु और भाषा की जो परंपरा लेकर गए वह आज भी उस इलाके की थाती है।

1526 में जहीरुद्दीन बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराकर भारत में मुगुल साम्राज्य की बुनियाद डाली। 17 मुगल बादशाह हुए जिनमें मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर सबसे ज्यादा प्रभावशाली हुए। उनके दौर में एक मुकम्मल तहज़ीब विकसित हुई। अकबर ने इंसानी मुहब्बत और रवादारी को हुकूमत का बुनियादी सिद्घांत बनाया। दो तहजीबें इसी दौर में मिलना शुरू हुईं। और हिंदुस्तान की मुश्तरका तहजीब की बुनियाद पड़ी। अकबर की राजधानी आगरा में थी जो ब्रज भाषा का केंद्र था और अकबर के दरबार में उस दौर के सबसे बड़े विद्वान हुआ करते थे। वहां अबुलफजल भी थे, तो फैजी भी थे, अब्दुर्रहीम खानखाना थे तो बीरबल भी थे। इस दौर में ब्रजभाषा और अवधी भाषाओं का खूब विकास हुआ। यह दौर वह है जब सूफी संतों और भक्ति आंदोलन के संतों ने आम बोलचाल की भाषा में अपनी बात कही। सारी भाषाओं का आपस में मेलजोल बढ़ रहा था और उर्दू जबान की बुनियाद मजबूत हो रही थी। बाबर के समकालीन थे सिखों के गुरू नानक देव। उन्होंने नामदेव, बाबा फरीद और कबीर के कलाम को सम्मान दिया और अपने पवित्र ग्रंथ में शामिल किया। इसी दौर में मलिक मुहम्मद जायसी ने पदमावती की रचना की जो अवधी भाषा का महाकाव्य है लेकिन इसका रस्मुल खत फारसी है।शाहजहां के काल में मुगल साम्राज्य की राजधानी दिल्ली आ गई। इसी दौर में वली दकनी की शायरी दिल्ली पहुंची और दिल्ली के फारसी दानों को पता चला कि रेख्ता में भी बेहतरीन शायरी हो सकती थी और इसी सोच के कारण रेख्ता एक जम्हूरी जबान के रूप में अपनी पहचान बना सकी। दिल्ली में मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के बाद अवध ने दिल्ली से अपना नाता तोड़ लिया लेकिन जबान की तरक्की लगातार होती रही। दरअसल 18वीं सदी मीर, सौदा और दर्द के नाम से याद की जायेगी। मीर पहले अवामी शायर हैं। बचपन गरीबी में बीता और जब जवान हुए तो दिल्ली पर मुसीबत बनकर नादिर शाह टूट पड़ा।

उनकी शायरी की जो तल्खी है वह अपने जमाने के दर्द को बयान करती है। बाद में नज़ीर की शायरी में भी ज़ालिम हुक्मरानों का जिक्र, मीर तकी मीर की याद दिलाता है। मुगलिया ताकत के कमजोर होने के बाद रेख्ता के अन्य महत्वपूर्ण केंद्र हैं, हैदराबाद, रामपुर और लखनऊ। इसी जमाने में दिल्ली से इंशा लखनऊ गए। उनकी कहानी ''रानी केतकी की कहानी'' उर्दू की पहली कहानी है। इसके बाद मुसहफी, आतिश और नासिख का जिक्र होना जरूरी है। मीर हसन ने दकनी और देहलवी मसनवियां लिखी। उर्दू की इस विकास यात्रा में वाजिद अली शाह 'अख्तर' का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन जब 1857 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया तो अदब के केंद्र के रूप में लखनऊ की पहचान को एक धक्का लगा लेकिन दिल्ली में इस दौर में उर्दू ज़बान परवान चढ़ रही थी।

बख्त खां ने पहला संविधान उर्दू में लिखा। बहादुरशाह जफर खुद शायर थे और उनके समकालीन ग़ालिब और जौक उर्दू ही नहीं भारत की साहित्यिक परंपरा की शान हैं। इसी दौर में मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने उर्दू की बड़ी सेवा की उर्दू के सफरनामे का यह दौर गालिब, ज़ौक और मोमिन के नाम है। गालिब इस दौर के सबसे कद्दावर शायर हैं। उन्होंने आम ज़बानों में गद्य, चिट्ठयां और शायरी लिखी। इसके पहले अदालतों की भाषा फारसी के बजाय उर्दू को बना दिया गया।
1822 में उर्दू सहाफत की बुनियाद पड़ी जब मुंशी सदासुख लाल ने जाने जहांनुमा अखबार निकाला। दिल्ली से 'दिल्ली उर्दू अखबार' और 1856 में लखनऊ से 'तिलिस्मे लखनऊ' का प्रकाशन किया गया। लखनऊ में नवल किशोर प्रेस की स्थापना का उर्दू के विकास में प्रमुख योगदान है। सर सैय्यद अहमद खां, मौलाना शिबली नोमानी, अकबर इलाहाबादी, डा. इकबाल उर्दू के विकास के बहुत बड़े नाम हैं। इक़बाल की शायरी, लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी और सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा हमारी तहजीब और तारीख का हिस्सा हैं। इसके अलावा मौलवी नजीर अहमद, पं. रतनलाल शरशार और मिर्जा हादी रुस्वा ने नोवल लिखे। आग़ा हश्र कश्मीरी ने नाटक लिखे।

कांग्रेस के सम्मेलनों की भाषा भी उर्दू ही बन गई थी। 1916 में लखनऊ कांग्रेस में होम रूल का जो प्रस्ताव पास हुआ वह उर्दू में है। 1919 में जब जलियां वाला बाग में अंग्रेजों ने निहत्थे भारतीयों को गोलियों से भून दिया तो उस $गम और गुस्से का इज़हार पं. बृज नारायण चकबस्त और अकबर इलाहाबादी ने उर्दू में ही किया था। इस मौके पर लिखा गया मौलाना अबुल कलाम आजाद का लेख आने वाली कई पीढिय़ां याद रखेंगी। हसरत मोहानी ने 1921 के आंदोलन में इकलाब जिंदाबाद का नारा दिया था जो आज न्याय की लड़ाई का निशान बन गया है। आज़ादी के बाद सीमा के दोनों पार जो क़त्लो ग़ारद हुआ था उसको भी उर्दू जबान ने संभालने की पूरी को कोशिश की। हमारी मुश्तरका तबाही के खिलाफ अवाम को फिर से लामबंद करने में उर्दू का बहुत योगदान है। आज यह सियासत के घेर में है लेकिन दाग के शब्दों में....

उर्दू है जिसका नाम, हमीं जानते हैं दाग,
सारे जहां में धूम हमारी ज़बां की है।

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deepak dudeja on 06 August, 2010 21:59;21
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शेषनारायण जी, बहुत इज्ज़त करते हैं आपकी. पर आप जैसा विद्वान् तथाकथित शर्मनिरपेक्षवाद (माफ़ करना - धर्मनिरपेक्षवाद) का चस्मा पहन कर भारत के इतिहास को खंगारता है तो यही सब सामने आता है. आप बात कर रहे हैं उर्दू ज़बान की और वर्णन कर रहे हैं मुस्लिम शासकों की विजय का. तलवार के जोर पर जिस भी विचारधारा का फैलाव किया जाता है और कम समय ही टिक पाते हैं ... मेरे पूर्वज उर्दू जबान ही जानते थे. पर पिताजी के बाद हम सब हिंदी भासी हो गए. उर्दू भाषा शासन के भय से चली. शासन में इस्तेमाल होती थी. ये ठीक है की सूफी संतों ने उर्दू का प्रयोग किया मगर मात्र इस्लाम के ही लिए. जन साधारण तक आपनी बात पहुँचाना चाहते थे. अतः हिंदी को फारसी शब्दों का मिश्रण कर दिया. उर्दू कभी जन साधारण की भाषा नहीं थी.....
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anup anand on 06 August, 2010 23:03;25
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शेष नारायणजी पत्रकार होने के नाते थोड़ा दिमाग पर जोर डाल कर लिखा करिए। आपके लेख का शीर्षक ही मूखर्तापूर्ण है। 'सारे जहां में धूम हमारे ज़बां की है' से आप क्या कहना चाहते हैं? 'जहां' यानी विश्व में कितने प्रतिशत लोग उर्दू को जानते हैं? भारत और पाकिस्तान को छोड़ देें तो पूरी दुनिया में कोई इस बोली का नाम लेने वाला नहीं है। चूंकि मुस्लिम परस्त लेख लिखने से आपकी रोजी-रोटी चलती है, इसलिए आप जानबूझा कर ऐसे लेख लिखते हैं। जहां तक उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहने की बात है तो इसमें बुरा क्या है? यह तो कड़वा सच है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है। आपका लेख ही बताता है कि मुस्लिम हमलावरों की वजह से इस भाषा प्रचार-प्रसार हुआ। कुछ एक हिंदू शायरों द्वारा उर्दू में लिख देने से उर्दू गैर मुसलमानों की भाषा नहीं हो जाती। सच कहा जाए तो उर्दू कोई भाषा नहीं बल्कि बोली हैं क्योंकि हर भाषा का अपना व्याकरण होता है लेकिन उर्दू का कोई व्याकरण नहीं है। यह हिंदी के आधार पर खड़ी है और अरबी-फारसी के शब्द इसमें मुसलमानों ने ही डाले हैं। जिस इकबाल की शान में आप ने लिखा है, उसके बारे में यह नहीं बताया कि 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा...' लिखने वाले इस शायर ने ही सबसे पहले अलग पाकिस्तान की मांग की थी। उर्दू का इतिहास लिखते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी बोली ने देश को तोडऩे में अहम भूमिका निभाई। हकीकत में उर्दू एक मृत हो रही बोली है जिसका कोई भविष्य नहीं है। हां, भारत में कुछ समय तक मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते इसे जिंदा रखने के प्रयास किए जाएंगे लेकिन यह सफल नहीं होंगे।
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शेष नारायण सिंह on 07 August, 2010 09:34;25
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मैं इस तरह की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया तो नहीं देता लेकिन इन महोदय को यह पता होना चाहिए कि किसी भी लेख या खबर में जो हेडलाइन है वह डेस्क देती है. रिपोर्टर या स्तम्भकार केवल सुझाव दे सकता है. इस लिए कृपया किसी लेख के शीर्षक से ही सब कुछ जान लेने की प्रवृत्ति से बचें . उससे अपना ही नुकसान हो सकता है . इनकी बाकी टिप्पणी में ऐसा कुछ नहीं है जिस पर साहित्य और इतिहास का मामूली जानकार भी ध्यान देना चाहेगा. और इनको एक बात पता होनी चाहिए कि पढने लिखने का काम थोडा कठिन है . मुंह उठा कर पों पों कर देने से कोई विद्वान् नहीं हो जाता . जो नाम इन्होने लिखा है अगर वह उनका सही नाम है तो इनके जानने जानने वाले भी इनके ज्ञान की थाह लगा लेगें. वैसे मैं वेब पत्रकारिता का समर्थक हूँ और यह मानता हूँ कि इसके ज़रिये मीडिया का जनवादीकरण हो रहा है . इसलिए अपनी बात कहने का मौक़ा एक बड़ी आबादी को मिल रहा है . जनवादीकरण की इस प्रक्रिया में कुछ इन महानुभाव की तरह की मामूली स्तर की टिप्पणियों को भी झेलना पड़ सकता है , तो कृपया इन्हें बर्दाश्त करें. अगर इन लोगों के हाथ कुछ किताबें आ गयीं तो यह लोग भी आगे चल कर ठीकठाक लिखने लगेगें.
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अब्दुल हमीद on 07 August, 2010 13:06;52
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शेष नारायण जी ने जवाब नहीं दिया, पर पूरा लेक्चर लिख मारा. और यहां पर शेष जी की भाषा से ही पता चल जाता है कि कौन सी भाषा स्वाभाविक है और कौन सी अस्वाभाविक. जब रोज़ी रोटी की बात थी तो उन्होंने अपने लेख में प्रयत्नपूर्वक, दिमाग लगा लगा कर,शब्द खोज खोज कर "उर्दू" भाषा लिखी. लेकिन जब प्रतिक्रिया देने की बारी आई, तो स्वाभाविक रूप से उनका दिल बोला और दिल से निकली हुई स्वाभाविक भाषा कौन सी है, यह शेष जी अपनी ही प्रतिक्रिया को एक बार फ़िर से पढकर जान सकते हैं. वंदे मातरं :-)
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पुष्कर वीर सिंह on 07 August, 2010 21:12;59
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श्रीमान आपने लिखा है कि गुरु नानक जी ने बाबा फरीद की बाणी को पवित्र ग्रन्थ में शामिल किया
तो महोदय आपकी जानकारी के लिए बता दू कि गुरु ग्रन्थ साहब का लेखन कार्य पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी के कार्य काल में शुरू हुआ जो कि दशम पिता तक चलता रहा
रहा उर्दू का सवाल तो यह हमलावरों की भाषा थी जो कि जनता पर थोपी गयी थी
मुगलकाल में उर्दू का ज्ञान शान समझा जाता था तो ब्रिटिश काल में अंग्रेजी
अभी भी हुकुमरानो की भाषा अंग्रेजी है और गुलामो की हिंदी
तभी अंग्रेजी बोल/ लिख कर गर्व का अहसास होता है और हिंदी बोल/ लिख कर हीनता
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ghakki on 08 August, 2010 01:27;58
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शेष जी ने इस लेख में अपनी विद्वता झाड़ने का प्रयास किया है पर इतने ज्यादा कठिन शब्द भर दिए है की शायद ही आम आदमी (बकौल शेष जी "जनवादी" ) की समझ में आये | और हाँ अब्दुल हामिद का तर्क भी काबिले तारीफ है ""शेष नारायण जी ने जवाब नहीं दिया, पर पूरा लेक्चर लिख मारा. और यहां पर शेष जी की भाषा से ही पता चल जाता है कि कौन सी भाषा स्वाभाविक है और कौन सी अस्वाभाविक. जब रोज़ी रोटी की बात थी तो उन्होंने अपने लेख में प्रयत्नपूर्वक, दिमाग लगा लगा कर,शब्द खोज खोज कर "उर्दू" भाषा लिखी. लेकिन जब प्रतिक्रिया देने की बारी आई, तो स्वाभाविक रूप से उनका दिल बोला और दिल से निकली हुई स्वाभाविक भाषा कौन सी है, यह शेष जी अपनी ही प्रतिक्रिया को एक बार फ़िर से पढकर जान सकते हैं. वंदे मातरं :-) "" मगर शेष जी इसका जवाब नहीं देंगे क्यों की शेष जी के अनुसार """आमतौर पर मैं इस तरह की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया तो नहीं देता """" आप दे भी नहीं सकते |
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नाम में क्या रखा है... on 08 August, 2010 11:05;56
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गुरु नानक जी की भाषा 'उर्दू' नहीं 'गुरुमुखी' थी...
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vivek on 09 August, 2010 10:57;13
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ये शेष जैसे लोग ही तो हमारे देश धरम और भाषा के दुश्मन है. हिन्दू होते हुए हिन्दुतत्वका विरोध और धर्म निरपेक्षता के आड़ में मुस्लिम तुस्टीकरण का समर्थन, हिंदी का खाते (मतलब हिंदी पत्रकार होते हुए) हुए हिंदी का विरोध और उर्दू का महिमामंडन, भारत में रहते हुए पाकिस्तान के संस्थापको में से एक इकबाल की बड़ाई करना इन जैसे लोगो को तो देशद्रोह का "चस्का" लग गया है
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R K GUPTA on 09 August, 2010 16:14;23
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मुझे लगता है की ये महाशय धर्मं परिवर्तित है और इन्होने अपना नाम पुराना ही रखा हुआ जैसा की आजकल हो रहा है माधुरी गुप्ता, तीस्ता सीतलवाद, अंजू गुप्ता ( आई.पी.एस), रेड्डी फॅमिली, इत्यादि.
पता नहीं कहाँ कहाँ से क्या खोज कर लाते रहते है.
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ab inconvenienti on 11 August, 2010 15:45;19
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जब रोज़ी रोटी की बात थी तो उन्होंने अपने लेख में प्रयत्नपूर्वक, दिमाग लगा लगा कर,शब्द खोज खोज कर "उर्दू" भाषा लिखी. लेकिन जब प्रतिक्रिया देने की बारी आई, तो स्वाभाविक रूप से उनका दिल बोला और दिल से निकली हुई स्वाभाविक भाषा कौन सी है, यह शेष जी अपनी ही प्रतिक्रिया को एक बार फ़िर से पढकर जान सकते हैं.
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image शेष जी शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
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हिंदू धर्म और हिंदुत्व में फर्क
हिंदू धर्म भारत का प्राचीन धर्म है। इसमें बहुत सारे संप्रदाय हैं। संप्रदायों को मानने वाला व्यक्ति अपने आपको हिंदू कहता है लेकिन हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है जिसका प्रतिपादन 1924 में वीडी सावरकर ने अपनी किताब 'हिंदुत्व में किया था। सावरकर इटली के उदार राष्ट्रवादी चिंतक माजिनी से बहुत प्रभावित हुए थे। उनके विचारों से प्रभावित होकर ही उन्होंने हिंदुत्व का राजनीतिक अभियान का मंच बनाने की कोशिश की थी।...
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जरूरी है जाति की जनगणना
जाति आधारित जनगणना आखिरी बार 1931 में हुई थी। 1941 में सरकार का पूरा ध्यान दूसरे विश्व युद्ध पर था जिसके चलते जनगणना नहीं हो पाई। आजादी के बाद जब 1951 में पहली जनगणना शुरू हुई तो जाति का मसला उठाया गया। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा कि जाति आधारित जनगणना से सामाजिक ताना-बाना बिखर जाएगा। उन्होंने इसे राष्ट्रभंजक मांग बताते हुए अस्वीकार कर दिया था।...
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सारे जहां में धूम हमारे ज़बां की है
कभी उर्दू की धूम सारे जहां में हुआ करती थी, दक्षिण एशिया का बेहतरीन साहित्य इसी भाषा में लिखा जाता था और उर्दू जानना पढ़े लिखे होने का सबूत माना जाता था। अब वह बात नही है। राजनीति के थपेड़ों को बरदाश्त करती भारत की यह भाषा आजकल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वह उर्दू जो आज़ादी की ख्वाहिश के इज़हार का ज़रिया बनी आज एक धर्म विशेष के लोगों की जबान बताई जा रही है।...
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लालू की करनी पर नीतीश की भरनी
हाल में ही बिहार की विधानसभा में जो कुछ हुआ उसने लोकतन्त्र को शर्मिन्दा तो किया ही है, लेकिन लोकतन्त्र भी अब ऐसी शर्मिन्दगी बार-बार झेलने को अभिशप्त है, और हम सब इसके आदी हो चुके हैं। बिहार विधानसभा में लालूप्रसाद और कांग्रेस ने जो हंगामा और तोड़फ़ोड़ की उसके पीछे कारण यह दिया गया कि महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि सन् 2002 से 2007 के बीच शासकीय कोषालय से करोड़ों रुपये निकाले गये और उनका बिल प्रस्तुत नहीं किया गया।...
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पूर्वोत्तर की आत्मघाती उपेक्षा
देश के पूरबी छोर पर स्थित प्रदेश मणिपुर को देश के अन्य हिस्सों से जोडने वाले राजमार्गो पर करीब दो महीने तक चली नाकेबंदियों की वजह से आवाजाही बंद रही। पूरे प्रदेश में खाने-पीने की चीजों, जीवनरक्षक दवाओं और पेट्रोलियम पदार्थों की घोर किल्लत उत्पन्न हो गई। सेना के विमानों की सहायता से अत्यावश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने की व्यवस्था हुई, पर ऐसी व्यवस्थाओं की अपनी सीमाएं होती है और इनसे जनजीवन को सामान्य तरीके से संचालित नहीं किया जा सकता। हालत आज भी कोई सुधरे नहीं है क्योंकि समस्या की जड़ें उसी तरह मजबूती से गड़ी हुई हैं....
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कश्मीर की विरासत है आजादी
कश्मीर में एक बार परिस्थितियां इतनी बिगड़ी कि केन्द्रीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ गयी. घाटी के मुहाने पर एक बार फिर सेना को बैठाना पड़ा. हालांकि अब घाटी में फौरी तौर पर शांति है लेकिन क्या कश्मीर में समस्या का समाधान सिर्फ केन्द्र सरकार का हस्तक्षेप है. शेष नारायण सिंह मानते हैं कि कश्मीर में अशांति के कारण गहरे हैं. कश्मीर पर पाकिस्तान का बेजा दावा और भारत का 'अनावश्यक' हस्तक्षेप समस्या का मूल कारण बन गया है. इसका निदान किये बिना कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है. ...
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कितना कामयाब होगा मुलायम का माफीनामा
जैसे तलाक देने के लिये तलाक को तीन बार बोला जाता है बिल्कुल इसी अंदाज मे सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह से अपने संबधो को लेकर माफी मांग कर मुसलमानो को रिझाने के लिये फिर से ट्रांपकार्ड फेंका है। अब देखना है कि मुलायम का यह ट्रांपकार्ड क्या हकीकत मे मुसलमानो को रिझाने मे कामयाब होगा।...
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शिवाजी के शौर्य को कलंकित करने का षण्यंत्र
छत्रपति शिवाजी के अपमान के मुद्दे पर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरम है. संभाजी ब्रिगेड जिसने पिछली बार भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बोरी) की तोड़-फोड़ की थी. इस बार महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल पर हमले का षण्यंत्र रचा था जिससे वे शनिवार को बाल बाल बच गये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जेम्स लेन की विवादास्पद पुस्तक "शिवाजी- द हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया" की बिक्री के लिए जिस अंदाज में छूट मिली है, उस पर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कई संगठन आंदोलनरत हैं. लेकिन हम पहले यह समझ लें कि यह जेम्स लेन महाशय हैं कौन और उन्होंने किताब आखिर किस इरादे से लिखी है?...
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बेमतलब हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस
हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है जो 1987 से हर साल 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विश्व की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं।...
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रमन सिंह की दमनकारी औद्योगिक नीति
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह नक्सली आंदोलन के खिलाफ चलनेवाले अभियान के अगुआ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन रमण सिंह इस आंदोनल को किसके इशारे पर कुचल रहे हैं? क्या वे आम आदमी और आदिवासियों के हित में नक्सली आंदोलन को कुचलने का दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं या फिर उनका एजेण्डा कुछ और है. हाल में ही छत्तीसगढ़ की नयी औद्योगिक नीति की समीक्षा करें तो साफ हो जाता है कि असल में यह संघर्ष वे किसके लिए कर रहे हैं. ...
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