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गांधी का स्वराज बनाम जिन्ना जवाहर का कुराज

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देश का ६४ वां स्वतन्त्रता दिवस बीत गया. कुछ सरकारी-अर्ध सरकारी, निजी, राजनीतिक समारोहों की औपचारिकता के अलावा अब १५ अगस्त का दिन एक सार्वजनिक अवकाश के सिवा शायद ही किसी अन्य महत्त्व का शेष रह गया हो. साल दर साल आजादी के गौरव के प्रति आम आदमी उसी तरह अनभिज्ञ होता जा रहा है जिस तरह राही मासूम रजा के उपन्यास की एक स्त्री पात्र पाकिस्तान को नजदीकी शहर में बनने वाली कोई मस्जिद समझ रही थी. ऐसा क्यों? क्योंकि ६३ साल पहले इस देश को आज़ादी के नाम पर एक सत्तान्तारण जरूर मिल गया था पर जिस स्वराज की परिकल्पना लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी कर रहे थे, वह स्वराज हिन्दुस्तान को आज दिन तक नसीब नहीं है.

लोकमान्य तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले तो अंग्रेजों से हिन्दुस्थानियों के सत्तांतर के बहुप्रचारित पर्व १५ अगस्त १९४७ के दशकों  पहले इस दुनिया से विदा हो लिए   थे. महात्मा गांधी उस तारीख को ज़िंदा जरूर थे लेकिन उन्हें पंडित जवाहर लाल नेहरू और लोर्ड माउन्ट बेटन ने अप्रासंगिक बना दिया था. जब देश आजाद हो रहा था तब वे सुदूर नोआखाली जो वर्तमान बंगलादेश में है, में हिन्दुओं के खिलाफ जारी उत्पीडन को रोकने के लिए प्रयासरत थे.उस समय जिस इलाके में महात्मा गाँधी थे वहाँ की स्थिति का वर्णन करते हुए एक यूरोपीय पत्रकार होरस अलेक्सांदर ने लिखा है"महात्मा गांधी एक मुस्लिम बहुल गाँव में प्रार्थना कर रहे थे तभी एक मुस्लिम युवक ने उनका गला पकड़ लिया. गांधीजी बूढ़े और कमजोर थे सो इस हमले से वे नीचे गिर गए,जमीन पर पड़े-पड़े भी गांधी कुरानशरीफ की आयत पढ़ रहे थे.कुरआन की आयतों  को सुनकर उस युवक कादिल बदल गया उसने महात्मा गंधे से क्षमा माँगते हुए कहा" बापू मुझे माफ़ कर दो,अब मैं खुद आपकी हिफाजत करूंगा .अब आप मुझे बताओ कि मैं क्या करूँ?" महात्मा गांधी का जवाब था " सिर्फ एक काम करो ,जब आप अपने घर जाना तो किसी से मत  बताना कि आपने मेरे साथ क्या करने का प्रयास किया वरना यह खबर फ़ैलाने से हिन्दू-मुस्लिम दंगे फ़ैल जायेंगे. मुझे भूल जाओ और खुद को माफ़ कर दो."महात्मा गांधी के अंतर्मन में यह करुना का भाव कहाँ से आया था? निश्चित तौर पर उनके मानस पर हजारों साल की सहिष्णु हिन्दू संस्कृति का असर था. आप कल्पना करें कि किसी हिन्दू ने अगर यही प्रयास मोहम्मद अली जिन्ना के साथ किया होता तो क्या होता? जिन्ना खुद सारे मुसलामानों से हिन्दुओं के खिलाफ हमला बोलने की अपील कर सकते थे. गांधी और जिन्ना के बीच का यही अंतर आज भी कमोबेश हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच के संबंधों में कायम है. गांधी और जिन्ना के बीच यह वैचारिक अंतर आता कहाँ से है?

गांधी की नीतियों पर भारतीय आध्यात्मिक शक्तियों का व्यापक असर था जबकि जिन्ना पूरी तरह इस्लामी विचारधारा को भी नहीं समझने में समर्थ थे. जिन्ना एक सेकुलर राजनीतिक मुसलमान थे जबकि गांधी हिन्दू धर्म की आत्मा को गहराई  से समझने के  साथ-साथ ईसाई,इस्लाम, यहूदी और बौद्ध धर्म को भी समझने की ईमानदार कोशिश करते थे. इसके चलते राजनीति गांधी का  आपद्धर्म था जबकि जिन्ना के लिए राजनीति सफल वकालत पेशे का एक बाय प्रोडक्ट थी. गांधी के लिए राजनीति सत्य की दिशा में उनकी अनवरत यात्रा का एक पड़ाव थीजबकि जिन्ना ने राजनीति को अपनी महत्वाकांक्षा की अभीष्ट सिद्धि का एक माध्यम बना लिया था. जिन्ना और गांधी दोनों ने अपनी उच्च शिक्षा इंग्लैंड में प्राप्त की थी. जिस समय दोनों इंग्लैंड में अध्ययन के लिए गए वह युग विक्टोरिया-युगीन संक्रमण काल का था. उस काल में इंग्लैंड में रस्किन, कार्लाईल, जॉन स्टुअर्ट मिल और इंग्लैंड में लो तोल्स्तोय जैसे सृजनधर्मी विचारक अपने -अपने ढंग से औद्योगिक क्रान्ति से जन्मी सामंती धरातल पर खड़ी पूंजीवादी समाज की नयी समस्यायों से जूझ रहे थे. जिन्ना कानून के विद्यार्थी के रूप में इंग्लैंड की संवैधानिक सांचे और ढाँचे से अभिभूत हो गए जबकि गाँधी ने अपने इंग्लैंड के प्रवास के बावजूद गीता का अनुशीलन जारी रखा. उन दिनों लन्दन में भी सब धर्मों में मौलिक एकता को रेखांकित करनेवाली थेओसोफी आन्दोलन शुरू था, गांधी लन्दन में ही इस आन्दोलन के संपर्क में आ गए थे. फ्रांसीसी क्रान्ति पर कार्लाईल ने 'हीरो एंड हिरोवर्शिप' नामक पुस्तक लिखी थी उसमे उन्होंने पैगम्बर मोहम्मद साहब पर एक निबंध शामिल किया था. इस निबंध ने महात्मा गांधी को खासा प्रभावित किया. रस्किन की रचना 'अन्टू दि लास्ट' का उन पर इतना गहरा असर पडा कि उन्होंने इसका गुजराती में अनुवाद कर 'सर्वोदय' नाम की पुस्तिका ही निकाल दी. तोल्स्तोय के साथ गाँधी लम्बे समय तक पत्र-व्यवहार करते रहे.अपने अफ्रीका प्रवास के दौरान उन्होंने जो आश्रम स्थापित किया उसका नाम भी उन्होंने तोल्स्तोय आश्रम ही रखा था. कुल मिला कर पश्चिमी विचारधारा की गहरी समझ के बावजूद गांधी ने पाया था कि हिन्दुस्तान की उन्नति भौतिक दृष्टि की बजाय आध्यामिक दृष्टि से ही होनी चाहिए. इसलिए उन्होंने हिन्दुस्तान के पूर्ण स्वराज्य के लिए 'हिंद स्वराज' की रचना की. जवाहर लाल नेहरू ने अंग्रेजों के प्रभाव में आकर गांधी के स्वराज की इस मूलभूत परिकलपना को नकार दिया. इसी के चलते आज दिन तक हम आज़ादी यानी ५ साल में एक बार वोट देने की आज़ादी तो पा गए हैं लेकिन स्वराज नहीं पा सके हैं. जिन्ना पश्चिमी संवैधानिक ढाँचे की समझ रखने वाले ऐसे संविधानविद थे जिसे सत्ता में बैठने की जल्दी थी और अंग्रेज किसी भी हाल में भारतीय उपमहाद्वीप के संसाधनों को छोड़ना नहीं चाहते थे इसीलिये अंग्रेजों ने जवाहर और जिन्ना को आगे कर गांधी के स्वराज को छीनने के लिए देश का विभाजन कर दिया. यदि इस देश को अंग्रेजों ने विभाजित ना किया होता और अफगानिस्तान से म्यांमार तक अखंड भारत रहता तो यह दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति होती. अंग्रेजों ने इस आर्थिक महाशक्ति का खासा विभाजन गांधी के जीवनकाल में ही कर दिया था. गांधी की भौतिक शरीर की हत्या बेशक नाथूराम गोडसे नामक एक सिरफिरे ने की लेकिन गांधी के सपनों के हत्यारे तो सही मायने में जवाहर, जिन्ना और अंग्रेज हैं.

गांधी इस देश में रामराज लाना चाहते थे. क्या था गांधी का रामराज? जिसमे हर हाथ के लिए काम होता और हर किसी के लिए रोटी, कपड़ा और मकान. हर किसी के लिए सुलभ न्याय और हर किसी को आध्यात्मिक शिक्षा. यह रामराज कोई पौराणिक संकल्पना नहीं बल्कि आर्थिक वास्तविकता रही है. आर्थिक इतिहासकार स्वीकार करते हैं कि पहली सदी से लेकर १५ वीं सदी तक हिन्दुस्थान दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति थी. ईसापूर्व २८०० से १८०० तक का ज्ञात इतिहास साबित करता है कि हिन्दुस्थान एक सुनियोजित अर्थतंत्र था.मौर्य काल के दौरान भारतीय अर्थशक्ति का सिक्का यूनान तक चलता था. जब तक इस देश में रामराज रहा तब तक यह देश दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में प्रतिस्थापित था,मुग़ल काल में भी यह दुनिया का दूसरे नंबर का आर्थिक सत्ता था. अकबर के कार्यकाल में हिन्दुस्तान का सकल राष्ट्रीय उत्पाद सकल वैश्विक उत्पाद का २४.५%था,जबकि चीन के मिंग साम्राज्य का सकल राष्ट्रीय उत्पाद इससे केवल आधा फ़ीसदी ज्यादा २५% था. औरंगजेब के कार्यकाल में मुग़ल भारत का विस्तार हो गया था.९० फीसदी दक्षिण एशिया पर उस समय औरंगजेब का शासन था. औरंगजेब के शासनकाल में हिन्दुस्तान का सकल राष्ट्रीय उत्पाद तत्कालीन  यूरोप के उत्पाद की तुलना में दोगुना हुआ करता था. चीन और पश्चिमी यूरोप हिन्दुस्थान के बाद क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर थे. १८ वीं सदी में उत्तर भारत में नवाबों,मध्य  भारत में मराठों और दक्षिण भारत में निजाम शाही का शसन स्थापित हुआ. इस काल में चीन दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति था,भारत दूसरे और फ्रांस तीसरे नंबर था. हिन्दुस्तान का सकल राष्ट्रीय उत्पाद चीन की तुलना में ८०%था. जब अंग्रेजों ने हिदुस्थान पर अपना आधिपत्य स्थापित किया उस समय वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिन्दुस्तान की हिस्सेदारी २४.४%थी जबकि तात्कालीन यूरोप का हिस्सा २३.३%था. यह अनुमान आर्थिक इतिहासकार अंगुस मेडिसन  का है. मेडिसन का कहना है कि जब अंग्रेज भारत छोड़ कर गए तो वे यहाँ की अर्थव्यवस्था का कितना कबाड़ा कर गए थे इसका अंदाज इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि १९५० में वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिन्दुस्तान की हिस्सेदारी केवल ३.५% शेष रह गयी थी. १८ वीं सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने जम कर हिन्दुस्थान के रजवाड़ों को लूटना प्रारम्भ किया और उसी लूट से ब्रिटेन नेपोलियन  से लड़ने और ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति को सफल करने में कामयाब हुआ. १७५० में हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था चीन की तुलना में ८० फीसदी थी ७५ वर्षों की लूट में १८२५ में यह चीन की तुलना में ५० फीसद रह गयी तब भी यह दुनिया की दूसरे क्रमांक की अर्थव्यवस्था थी.इस दौर तक ब्रिटेन का कपड़ा उद्योग भारत में केवल ३ फीसदी कब्जा कर पाया था. १८२५ से १८५० के बीच में अंगरेजी इस देश की संपर्क भाषा हो गयी. अंग्रजी कपडे ने भारतीय बाजार के ३० फीसदी हिस्से पर कब्जा जम्मा लिया. इस दौर में भी चीन दुनिया का सबसे बड़ा अर्थ तंत्र रहा. हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था चीन की तुलना में ४० फीसदी रह गयी. १८५० और १८७५ के बीच में भारतीय बाजार पर अंगरेजी कपडे ने ५५ फीसदी कब्जा जमा लिया.अब भी चीन दुनिया का सबसे बड़ा अर्थतंत्र था लेकिन अब दूसरे स्थान पर भारत की बजाय अमेरिका और तीसरे स्थान पर ब्रिटेन आ गया था.१८७५ से १९०० के बीच चीन से किंग साम्राज्य का पतन हुआ और चीन वश्विक अर्थ व्यवस्था के चोटी के पायदान से सरक गया.उसका स्थान अमेरिका ने ले लिया. इस समय भारत की अर्थ व्यवस्था अमेरिका की तुलना में २० फीसद की थी. हिन्दुस्तान की इस व्यवस्था को देख कर ही लोकमान्य तिलक, गोपालकृष्ण गोखले और महात्मा गाँधी जैसे नेताओं ने स्वराज की मांग शुरू की. अंग्रेजों ने अपने शोषण और दमन की नीतियों को और तेज कर दी. १९०० से १९२५ के बीच में अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बना रहा. ब्रिटेन दूसरे नंबर पर और उसके बाद चीन. फ्रांस, जर्मनी, हिन्दुस्तान और सोवियत संघ. इस समय हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था अमेरिका की तुलना में केवल १० फीसदी बची थी. १९२५ से १९५० के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था के दूसरे पायदान पर ब्रिटेन की बजाय सोवियत संघ आ गया था. अब सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका की तुलना में हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था केवल ७ फीसदी बची थी. पिछले ६३ वर्षों में विकास के चाहे जितने दावे किये जाएँ क्या सचमुच हिन्दुस्तान एक स्वावलंबी राष्ट्र बनने में कामयाब हुआ है? इस सवाल का जवाब नकारात्मक ही है.

विश्व बैंक की २००५ की रिपोर्ट बताती है कि हिन्दुस्थान की ४२फ़ीसदी आबादी अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे निर्वाह कर रही है. ऑक्सफोर्ड गरीबी एवं मानव विकास पहल नामक संगठन ने एक अध्ययन में पाया कि बिहार, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में लगभग ४२.१ करोड़ की आबादी गरीबी रेखा के नीचे बसर करती है. यह संख्या अफ्रीका के २६ दुनिया के सबसे गरीब देशों की कुल आबादी ४१ करोड़ से ज्यादा है. दुनिया के सारे गरीबों की एक-तिहाई आबादी हिन्दुस्तान में बसर करती है. नेशनल कमीशन फॉर इन्टरप्राइजेज नामक सरकारी संगठन ने २००७ में एक अध्ययन के बाद सार्वजनिक किया कि ८३.६ करोड़ हिंदुस्तानी प्रतिदिन २० रुपये आय से कम पर गुजारा करने के लिए मजबूर हैं. यह हिन्दुस्तान की कुल आबादी का लगभग ७७ फीसद है. जब हिन्दुस्तान आज़ाद हुआ था तब उसकी सकल राष्ट्रीय आय दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक व्यवस्था वाले देश की तुलना में केवल ७ फीसदी थी. तब एक अमेरिकी डालर की कीमत हुआ करती थी ४.७९ रुपये. आज हिन्दुस्तान का सकल राष्ट्रीय उत्पाद अमेरिका के सकल राष्ट्रीय उत्पाद की तुलना में है केवल ८ फीसदी. एक अमेरिकी डालर की कीमत है लगभग ४५ रुपये. महत्मा गाँधी जानते थे कि देश को आज़ादी तो दी जा रही है लेकिन स्वराज नहीं. हमारी अर्थव्यवस्था को पश्चिम के हवाले किया जा रहा था. जब देश में १९ वीं सदी में पहली बार जन गणना कराई गयी तब ग्रामीण भारत की आबादी लगभग ९९ फीसदी थी. आज ग्रामीण भारत का आकार दिन-प्रतिदिन सिकुड़ता जा रहा है. गांधी चाहते थे ग्राम स्वराज. अखंड भारत के लिए जिन्ना और जवाहर ले आये शहर कुराज. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय महाशक्तियों के लिए दक्षिण एशिया में बैठ कर साम्राज्य चलाना कठिन हो चुका था. इसलिए उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था तैयार की जिससे हिन्दुस्तान मजहबी आधार पर बाँट जाए .जिन्ना और जवाहर ने उस मजहबी बंटवारे को स्वीकारा था. सिर्फ सत्ता में बैठने की महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए. गांधी सत्ता की महत्वाकांक्षा की बजाय राजनीति को सेवा का साधन मानते थे. इसलिए जब जिन्ना पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस और जवाहर दिल्ली में लोर्ड और एडविना माउन्टबेटन के साथ भारत का स्वतन्त्रता दिवस मना रहे थे तब महात्मा गांधी नोआखाली में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए हाथ जोड़ रहे थे. गांधी देश तोड़ने वालों से देश नहीं बचा सके. वे हमलावर मुस्लिम युवक से हमले की बात किसी को न बताने की विनती क्यों कर रहे थे? वे जानते थे कि हिन्दू-मुस्लिम विवाद औपनिवेशिक सत्ता की देन है. बंगाल से बांग्लादेश अलग हुआ तो  परिणाम हर बंगाली को भुगतना पडा.विभाजन के पहले पूर्वी बंगाल के खेतों में कपास और जूट पैदा होता था और पश्चिमी बंगाल में चावल. दोनों एक-दूसरे की अर्थव्यवस्था के पूरक थे. विभाजन ने पूर्वी बंगाल को कंगाल कर दिया और पश्चिमी बंगाल के खेतों में जूट लगाने से भुखमरी फ़ैली. इस विभाजन से फ़ैली नफरत ने यूरोप और अमेरिका के विनाशक पर सड़े रहने को अभिशप्त हथियार कारखानों के लिए जितना कारोबार पैदा किया. हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का जो धन उनके पास गया यदि वह हमारी ग्राम्य अर्थव्यवस्था में लगा होता तो हम पहले न सही दुनिया की दूसरी सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था बन गए होते. यह तभी संभव था जब जिन्ना और जवाहर ने भी ब्रिटेन जाकर हिंदुस्तानी तहजीब का भी उतना ही मान रखा होता जितना महात्मा गांधी ने.

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vivek on 16 August, 2010 09:48;20
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."महात्मा गांधी के अंतर्मन में यह करुना का भाव कहाँ से आया था? निश्चित तौर पर उनके मानस पर हजारों साल की सहिष्णु हिन्दू संस्कृति का असर था. आप कल्पना करें कि किसी हिन्दू ने अगर यही प्रयास मोहम्मद अली जिन्ना के साथ किया होता तो क्या होता? जिन्ना खुद सारे मुसलामानों से हिन्दुओं के खिलाफ हमला बोलने की अपील कर सकते थे. गांधी और जिन्ना के बीच का यही अंतर आज भी कमोबेश हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच के संबंधों में कायम है. गांधी और जिन्ना के बीच यह वैचारिक अंतर आता कहाँ से है?
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अनूप on 16 August, 2010 13:15;30
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एक दम सटीक लेख....आप इय्से लिखते रहे.....
अफ़सोस इस बात का है की किसी धर्म विशेष लेख पे इतने कमेन्ट आते है.....
और देश की जब बात कोई लेखक करता है.....तो कमेन्ट करने वालो के हाथो को लकवा मार जाता है.....

अनूप
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Singrauli.Patrika on 16 August, 2010 13:34;12
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लेखक यदि इस घटना के विषय में कुछ सबूत पेश कर सके तो बेहतर होगा.
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Mukesh on 16 August, 2010 14:08;36
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agar gandhi ji me koyi kami thi to sirf ek Unka Javaher Prem aur Shayad ye itni badi galti thi ki koi bhi sachcha deshbhakt is baat ke liye gandi ji ko kabhi maaf nahi karega. Kyonki aaj yadi hindustan ki itni duragati ho rahi hai to sirf Javaher lal ki badaulat
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reenu on 16 August, 2010 16:41;32
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prem shukla ji aap ka lekh toh bahut hi badhiya hai. par aapne pehli hi line me galti kar di hai aapne likha hai ki desh ka 64 va swatantrata divas beet gaya pls use thik kariye.
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admin on 16 August, 2010 16:54;02
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यह चौसठवां स्वतंत्रता दिवस ही है. 63 साल पूरे हुए हैं. चौसठवां स्वतंत्रता दिवस था अब चौसठवां साल चलेगा.
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अंकुर गुप्ता on 16 August, 2010 19:55;13
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बेहतरीन लेख. मैं अभी सबको ईमेल से अग्रेषित करता हूं
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Gunnu on 17 August, 2010 00:14;21
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15th August 1947 was First independence day .So reenu and admin pls calculate it properly.
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पुष्यमित्र on 17 August, 2010 09:40;02
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प्रेम भाई ने अभूत अच्छा लिखा है पर उन्हें इसमें हिन्दुवाद का मसाला नहीं मारना चाहिए था. गांधी इसलिये महान नहीं थे क्योंकि वे हिंदू थे... अगर ऐसा ही है तो उनके जीवन पर रस्किन और टाल्सट्वाय का इतना असर क्यों है. यह सच्चाई है कि गांधी दूसरे राजनेताओं की तरह छद्म धर्मनिरपेक्ष नहीं थे, मगर किसी सूरत में हिंदूवादी नहीं थे. हिंदू धर्म उनके लिये व्यक्तिगत उपासना का मार्ग था राजनीतिक सफलता का उपकरण नहीं. वे अपने धर्म को अपनी राजनीति से अलग रखते थे.

बहरहाल प्रेम भाई ने यह सच लिखा है कि राजनीति उनके लिये आपद धर्म था कोई कैरियर नहीं...
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Yashovardhan Nayak on 23 October, 2010 01:36;25
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भारत को समझने के लिए गाँधी जी को पढ़ना , प्रेमचंद और रवीन्द्रनाथ को जानना जरुरी है .देश का विभाजन धर्म पर आधारित कट्टरता की वजह से हुआ .बंगलादेश का निर्माण भाषा की कट्टरता के कारण हुआ .चाहे धर्म हो या भाषा जबरिया नहीं थोपी जा सकती तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में बंगला भाषा बोली समझी जाती थी .किन्तु पाकिस्तान की हुकूमत ने उर्दू को बंगला के स्थान पर लादने की कोशिश की नतीजतन लोगो में गुस्सा पैदा हुआ
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image प्रेम शुक्ल मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक. संपर्क - premshukla@rediffmail.com
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लालू की करनी पर नीतीश की भरनी
हाल में ही बिहार की विधानसभा में जो कुछ हुआ उसने लोकतन्त्र को शर्मिन्दा तो किया ही है, लेकिन लोकतन्त्र भी अब ऐसी शर्मिन्दगी बार-बार झेलने को अभिशप्त है, और हम सब इसके आदी हो चुके हैं। बिहार विधानसभा में लालूप्रसाद और कांग्रेस ने जो हंगामा और तोड़फ़ोड़ की उसके पीछे कारण यह दिया गया कि महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि सन् 2002 से 2007 के बीच शासकीय कोषालय से करोड़ों रुपये निकाले गये और उनका बिल प्रस्तुत नहीं किया गया।...
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पूर्वोत्तर की आत्मघाती उपेक्षा
देश के पूरबी छोर पर स्थित प्रदेश मणिपुर को देश के अन्य हिस्सों से जोडने वाले राजमार्गो पर करीब दो महीने तक चली नाकेबंदियों की वजह से आवाजाही बंद रही। पूरे प्रदेश में खाने-पीने की चीजों, जीवनरक्षक दवाओं और पेट्रोलियम पदार्थों की घोर किल्लत उत्पन्न हो गई। सेना के विमानों की सहायता से अत्यावश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने की व्यवस्था हुई, पर ऐसी व्यवस्थाओं की अपनी सीमाएं होती है और इनसे जनजीवन को सामान्य तरीके से संचालित नहीं किया जा सकता। हालत आज भी कोई सुधरे नहीं है क्योंकि समस्या की जड़ें उसी तरह मजबूती से गड़ी हुई हैं....
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कश्मीर की विरासत है आजादी
कश्मीर में एक बार परिस्थितियां इतनी बिगड़ी कि केन्द्रीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ गयी. घाटी के मुहाने पर एक बार फिर सेना को बैठाना पड़ा. हालांकि अब घाटी में फौरी तौर पर शांति है लेकिन क्या कश्मीर में समस्या का समाधान सिर्फ केन्द्र सरकार का हस्तक्षेप है. शेष नारायण सिंह मानते हैं कि कश्मीर में अशांति के कारण गहरे हैं. कश्मीर पर पाकिस्तान का बेजा दावा और भारत का 'अनावश्यक' हस्तक्षेप समस्या का मूल कारण बन गया है. इसका निदान किये बिना कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है. ...
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कितना कामयाब होगा मुलायम का माफीनामा
जैसे तलाक देने के लिये तलाक को तीन बार बोला जाता है बिल्कुल इसी अंदाज मे सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह से अपने संबधो को लेकर माफी मांग कर मुसलमानो को रिझाने के लिये फिर से ट्रांपकार्ड फेंका है। अब देखना है कि मुलायम का यह ट्रांपकार्ड क्या हकीकत मे मुसलमानो को रिझाने मे कामयाब होगा।...
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शिवाजी के शौर्य को कलंकित करने का षण्यंत्र
छत्रपति शिवाजी के अपमान के मुद्दे पर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरम है. संभाजी ब्रिगेड जिसने पिछली बार भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बोरी) की तोड़-फोड़ की थी. इस बार महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल पर हमले का षण्यंत्र रचा था जिससे वे शनिवार को बाल बाल बच गये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जेम्स लेन की विवादास्पद पुस्तक "शिवाजी- द हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया" की बिक्री के लिए जिस अंदाज में छूट मिली है, उस पर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कई संगठन आंदोलनरत हैं. लेकिन हम पहले यह समझ लें कि यह जेम्स लेन महाशय हैं कौन और उन्होंने किताब आखिर किस इरादे से लिखी है?...
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बेमतलब हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस
हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है जो 1987 से हर साल 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विश्व की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं।...
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रमन सिंह की दमनकारी औद्योगिक नीति
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह नक्सली आंदोलन के खिलाफ चलनेवाले अभियान के अगुआ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन रमण सिंह इस आंदोनल को किसके इशारे पर कुचल रहे हैं? क्या वे आम आदमी और आदिवासियों के हित में नक्सली आंदोलन को कुचलने का दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं या फिर उनका एजेण्डा कुछ और है. हाल में ही छत्तीसगढ़ की नयी औद्योगिक नीति की समीक्षा करें तो साफ हो जाता है कि असल में यह संघर्ष वे किसके लिए कर रहे हैं. ...
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