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संसद का हाल: सांसद को पसंद केवल बवाल

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पंद्रहवीं लोकसभा ने एक साल पूरे कर लिये हैं. यह साल वैसे तो कामकाज के लिहाज से ऐसी किसी खास उपलब्धि का नहीं रहा है जिसके लिए संसद का पिछला एक साल याद किया जाए लेकिन क्या पूरे साल सांसदों ने उस 'बिजनेस' में हिस्सा लिया जिसके लिए जनता ने उन्हें चुनकर सदन तक पहुंचाया है? संसद के कामकाज के बारे में आम धारणा यही है कि संसद में जनता के अपेक्षाओं के अनुरूप काम काज नहीं होता. संसद जितनी चलती है उससे अधिक ठप रहती है. अब वेतनवृद्धि के बाद एक नयी तोहमत और लग गयी है कि देश की जनता मंहगाई से परेशान है और सरकार ने जनप्रतिनिधियों का वेतन चार गुना बढ़ा दिया. सवाल है कि क्या हमारे सांसद सचमुच जनता की उम्मीदों और अपेक्षाओं पर पानी फेर रहे हैं?

इस सवाल का जवाब न तो इतना सीधा है कि सीधे तौर पर समझा जा सके और न ही इतना टेढ़ा कि इसे समझा ही न जा सके. भारतीय संसद और सांसदों के काम काज को समझने के लिए सीधे तौर पर कुछ मानक हैं जिस पर हम अपनी संसद और सांसदों के काम काज को आंक सकते हैं. संसद में सांसदों की उपस्थिति कितनी रहती है, कार्यवाही (बिजनेस) में सांसदों की रूचि और भागीदारी कितनी रहती है, संसद ने सांसदों को जो विशेषाधिकार दिये हैं, सांसद उसका कितना उपयोग करते हैं, सांसदों को क्षेत्र विकास के लिए सरकार जो पैसा देती है वे उसका उपयोग कैसे करते हैं और सरकार तथा संसद के बीच सांसदों की भूमिका का क्या असर होता है? इन्हीं कुछ सवालों के आधार पर अगर हम अपने सांसदों को आंकना शुरू करें तो भारतीय संसद की तस्वीर उभरना शुरू हो जाती है. अगर इस तस्वीर की तुलना सांसदों की जननी ब्रिटेन से तुलना करें तो परिस्थितियां इतनी नकारात्मक भी नहीं हैं लेकिन भारतीय परिवेश में आम आदमी की जरूरतों पर संसद की कार्यवाही को अगर कसें तो परिणाम आशा के अनुकूल भी नहीं है.

भारतीय संसद के कामकाज पर "मास फार अवेयरनेस" नामक संस्था ने एक रिपोर्ट तैयार की है. रिपोर्ट इन्हीं पहलुओं की पड़ताल करती है कि क्या हमारे सांसद जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हैं? रिपोर्ट के कुल दस हिस्से हैं जिसमें सांसदों की उपस्थिति से लेकर संसद छोड़कर जाने तक का जायजा लिया गया है. जिस एक साल (2009-10) की अवधि के लिए यह रिपोर्ट तैयार की गयी है उस साल में 433 घण्टे 04 मिनट संसद चली है. 433 घण्टों में 124 घण्टे 34 मिनट बर्बाद हुए हैं और 102 बार सदन को स्थगित करना पड़ा है. हालांकि इस दयनीय स्थिति के बावजूद सांसदों की उपस्थिति उत्साहजनक है. संसद की कार्यवाही के दौरान 78 प्रतिशत सांसदों की उपस्थिति रही है. इसलिए इस स्थापित मान्यता में कोई खास नजर नहीं आता कि हमारे सांसद सदन से गायब रहते हैं. फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि कई बार ऐसा मौका जरूर आता है जब राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर भी कोरम पूरा करने के िलए पार्टियों को अपने सांसदों पर दबाव बनाना होता है. सांसदों की उपस्थिति अगर संतोषजनक है तो उनके कामकाज की गणना बेहद निराश करनेवाली है. एक साल के दौरान सदन में उपस्थित सांसदों में 58 प्रतिशत सांसदों सक्रियता निराशाजनक रही है. हालांकि 40 फीसदी सांसदों की सक्रियता बहुत ही अच्छी रही है. अगर दलों के हिसाब से देखें तो सदन में दलों की उपस्थिति के लिहाज से केरला कांग्रेस, सीपीआई, बहुजन विकास आघाड़ी, नागालैण्ड पीपुल्स फ्रण्ट, मुस्लिम लीग, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रण्ट, जनता दल युनाइटेड, सीपीआई (एम), सपा और राष्ट्रीय जनता दल के सांसदों की उपस्थिति सबसे बेहतर रही है. ये शीर्ष के दस ऐसे दल हैं जिनके सांसदों ने सदन की कार्यवाही में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया है. इन दलों के सांसदों की उपस्थिति 85 से 95 फीसदी के बीच रही है. अगर आप इन आंकड़ों के लिहाज से विश्लेषण करें तो साफ हो जाता है कि सदन में छोटे दलों की उपस्थिति बेहतर है जबकि बड़े दल कांग्रेस और भाजपा अपने सांसदों की उपस्थिति के मामले में क्रमश: बारहवें और बाइसवें नंबर पर आती है. इसी तरह राज्यों से सदन में उपस्थिति के मामले में उत्तर पूर्व राज्यों के सांसद ज्यादा सक्रिय है. सदन में उपस्थिति के लिहाज से मणिपुर अव्वल है. उसके बाद मिजोरम, दिल्ली, नागालैण्ड, उत्तराखण्ड, हिमाचल, सिक्किम, केरल, जम्मू और कश्मीर तथा अरुणाचल प्रदेश अन्य नौ राज्य हैं जिनके सांसदों की सदन में उपस्थिति 88 से 99 प्रतिशत के बीच रही है. सदन में उपस्थिति के मामले में जहां झारखण्ड मुक्ति मोर्चा सबसे फिसड्डी दल रहा है वहीं झारखण्ड सबसे फिसड्डी राज्य साबित हुआ है.

सदन में उपस्थिति सबसे अहम मसला जरूर है लेकिन जो सांसद सदन में उपस्थित रहते हैं उनके कामकाज का आंकलन भी इस रिपोर्ट में किया गया है. सदन में कामकाज के लिहाज से शून्यकाल सबसे महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसी के जरिए सांसद सरकार के कामकाज पर निगरानी रखते हैं और सदन के माध्यम से सरकार तक अपनी शिकायतें पहुंचाते हैं. अब तो प्रश्न लेकर सवाल पूछने का मामला भी प्रकाश में आ चुका है और हेमा मालिनी के ऊपर एक वाटर प्यूरिफायर के बारे में सवाल पूछने पर भी सवाल खड़े हो चुके हैं क्योंकि हेमा मालिनी उस वाटर प्यूरिफायर के विज्ञापन में काम करती हैं. कारपोरेट घराने सदन का इस्तेमाल अपना काम करवाने के लिए भी करते हैं और झारखण्ड से एक सांसद ने सदन में यह स्वीकार किया था कि वह रिलायंस कंपनी के बोर्ड आफ डायरेक्टर में है तथा वह रिलायंस कंपनी का हितैषी है. फिर भी शून्यकाल ही एकमात्र वह माध्यम है जिसके जरिए आम आदमी की जरूरतों से जनप्रतिनिधि सरकार को अवगत कराते हैं. शून्यकाल के दौरान पूछे जानेवाले प्रश्नों में सबसे आगे शिवसेना के आनन्दराव अडसुल का नाम आता है जिन्होंने एक साल के दौरान 326 सवाल पूछे. अगर शीर्ष के दस प्रश्न पूछनेवाले सांसदों का नाम देखें जो आनंदराव अडसुल के अलावा भाजपा के हंसराज अहिर (310), कांग्रेस के प्रदीप मांझी (308), आल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन के असद्दुद्दीन ओवैसी (291), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की श्रीमती सुप्रिया सुले (288), शिवसेना के भाऊसाहब वाकचुरे (280), बसपा के अशोक कुमार रावत (270), कांग्रेस के एस एस रामसुब्बु (268), कांग्रेस के ही विक्रमभाई मादान (267) और जनता दल (एस) एन चारुवरया स्वामी (265) के नाम शामिल हैं. शून्यकाल के दौरान प्रश्न पूछनेवालों में जहां महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश और उड़ीसा अव्वल राज्य हैं तो त्रिपुरा, नागालैण्ड, मिजोरम ऐसे राज्य भी हैं जिनके सांसदों ने महज तीन सवाल पूछा है. सवाल पूछने के मामले में भी देश के दो बड़े दल फिसड्डी हैं. सवाल पूछने के मामले में भाजपा तेरहवें नंबर पर है तो कांग्रेस पंद्रहवें नंबर पर है. 96 सांसद तो ऐसे हैं जिन्होंने पूरे साल में एक भी सवाल नहीं पूछा है.

सदन में होनेवाली बहसों में संसद सदस्यों की हिस्सेदारी उनकी सक्रियता का सबसे सटीक प्रमाण होता है. लोकसभा के आंकड़े बताते हैं कि सदन में होनेवाली बहसों में सबसे अधिक सीपीआई के सदस्यों ने भागीदारी की है जबकि तेलंगाना राष्ट्रवादी पार्टी ने पूरे साल किसी भी बहस में हिस्सा ही नहीं लिया. पार्टी के स्तर पर बहस में हिस्सेदारी के सवाल पर भी कांग्रेस और भाजपा दूसरे दलों के मुकाबले सदस्यों के अनुपात में काफी पीछे है. उत्तर प्रदेश में कौशांबी से सपा सांसद शैलेन्द्र कुमार ऐसे सांसद हैं जिन्होंने सबसे अधिक 92 बहसों में हिस्सेदारी की है इसके बाद भाजपा के अर्जुन राम मेघवाल (73) तथा बीजू जनता दल के भर्तहरी माहताब ने सालभर में सर्वाधिक 71 बहसों में हिस्सा लिया है. 69 सदस्य ऐसे हैं जिन्होंने सालभर में किसी बहस में हिस्सा ही नहीं लिया जबकि 48 सदस्यों ने साल में एक बार तथा 42 सांसद ऐसे हैं जिन्होंने लोकसभा की बहसों में दो बार हिस्सा लिया है. राज्यसभा के आकड़े इस रिपोर्ट में शामिल नहीं हैं जहां बहसों का अच्छा रिकार्ड रहा है लेकिन लोकसभा में भी बहसों के प्रति सांसदों की यह उदासीनता चिंतित करनेवाली है. मास फॉर अवेयरनेस से जुड़े नीरज गुप्ता कहते हैं -"पिछली दफा चुनाव के दौरान हमने देशभर में मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित करने का कार्यक्रम चलाया. नागरिकों ने वोट न देने के जितने कारण बताएं अगर उन सबको मिला लिया जाए तो 1001 से कम कारण नहीं होंगे. सदन में जनप्रतिनिधियों का यह नकारात्मक रवैया नागरिकों को मतदान के प्रति और अधिक उदासीन कर देगा." क्या हमारे जनप्रतिनिधि नीरज गुप्ता की बात सुन रहे हैं या उन्हें अपने वेतनवृद्धि पर बवाल करने से ही फुर्सत नहीं है?

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Sanjeet Tripathi on 28 August, 2010 01:19;41
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इसे पढ़ कर जो बात सबसे पहले मन में आती है वो यह की shame-shame....... इस से आगे और क्या कहा जाए. कांग्रेस - बीजेपी के आलाकमान को यह आलेख / रिपोर्ट जरुर पढवाना चाहिए ताकि उन्हें भी थोडा शर्म आये .....
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