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चीन के सामने दीन हीन

image चीनी प्रीमीयर वेन जियाबाओ के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

पिछले कुछ वर्षों से चीन हिन्दुस्तान को पूर्वोत्तर तथा जम्मू एवं कश्मीर के मसले में अनावश्यक आँख तरेरने लगा है. चीन के इस दुस्साहस के लिए हिन्दुस्तान सरकार की अनावश्यक मिमियाहट जिम्मेदार है. जुलाई के महीने में चीन ने हिंदुस्तानी सेना के उत्तरी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस.जसवाल को बीजिंग का वीजा यह कह कर नकार दिया कि वे विवादास्पद क्षेत्र के सैन्य प्रमुख हैं. लेफ्टिनेंट जनरल जसवाल का वीजा मध्य जुलाई माह में नकारा गया। इसके बाद ११ अगस्त को निर्वासित तिब्बतियों की सरकार के प्रमुख दलाई लामा हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह से मिले तो इस पर चीनी राजनायिक इतने गरम हो गए कि हिन्दुस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान चीन के समक्ष याचना वाली मुद्रा में खड़ा हो गया.

दलाई लामा १९५० के दशक से हिन्दुस्तान के सम्माननीय मेहमान हैं। वे तिब्बतियों के साथ-साथ बौद्ध धर्मावलम्बियों के शीर्ष नेता हैं। शान्ति के नोबल पुरस्कार से विभूषित इस व्यक्तित्व से मुलाक़ात के लिए क्या हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री को चीन से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना पड़ेगा? एक तरफ चीन हिन्दुस्तान को उन दलाई लामा से मिलने पर आँखें दिखा रहा है जिनके तिब्बत पर उसने कब्जा जमा रखा है, दूसरी ओर वह उस कश्मीर के क्षेत्र को विवादास्पद करार दे रहा है जिसे १९४७ में अन्य रियासतों की तरह वैश्विक अधिनियमों के धरातल पर हिन्दुस्तान में विलीन किया गया था. इस जम्मू कश्मीर के क्षेत्र में पाकिस्तान अतिक्रमण कर चुका है और उसी अतिक्रमित क्षेत्र में अच्छे  खासे क्षेत्र पर चीन ने खुद कब्जा जमा रखा है. कश्मीर के मुद्दे पर चीन की हरकतों पर तो हिन्दुस्तान की ओर से आपत्ति उठायी जानी चाहिए, लेकिन यहाँ उलटा चोर कोतवाल को डांट रहा है.आश्चर्यजनक रूप से कोतवाल यानी हिन्दुस्तान इस मुद्दे पर सहमा हुआ है. जसवाल के मुद्दे पर भी भारतीय विदेश मंत्रालय की बकार एक माहीने के बाद फूटी है.

बीते शुक्रवार यानी २७ अगस्त को साउथ ब्लाक ने चीनी राजदूत जहाँग यांग को इस मुद्दे पर बुला कर अपने विरोध से अवगत कराया. डेढ़ माह तक हमारा विदेश मंत्रालय इस मुद्दे पर चुप क्यों रहा? चीन अरुणाचल प्रदेश में भारतीय प्रधान मंत्री की यात्रा पर विरोध दर्ज कराने का दुस्साहस करता है,दलाई लामा से न मिलने की चेतावनी जारी करता है. दूसरी ओर एक हम हैं कि चीन की पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में घुसपैठ पर भी चुप्पी साधे रहते हैं.जम्मू एवं कश्मीर में कोई एक पत्थर भी फेंकता है तो वैश्विक मीडिया में उसे कश्मीर की आजादी के आन्दोलन के रूप में पेश किया जाता है. अरुंधती रॉय और विनोद मेहता जैसे लेखक-पत्रकार भी इस पाकिस्तान-चीन समर्थित आन्दोलन को समर्थन देने के लिए एक पाँव पर खड़े हो जाते हैं. लेकिन नियंत्रण रेखा के उस पार पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में क्या चल रहा है उस पर सारे मानवता वादी आँख मूंदे रहते हैं. अमेरिकी अखबार 'दि न्यू योर्क टाइम्स 'में छपी एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले एक अरसे से गिलगित-बल्टिस्तान क्षेत्र में चीनी सेना पीपल्स लिबरेशन आर्मी के लगभग ११,००० सैनिक घुसपैठ कर चुके हैं. स्थानीय कश्मीरी आबादी के विद्रोह को दबाने के लिए चीनी सेना को वहाँ लाया गया है. इस सेना ने स्थानीय आबादी की हकाल पट्टी कर उस इलाके में गुप्त टनेल बनाने का काम शुरू किया है. रिपोर्ट का मानना है कि चीनी सेना कुल २२ टनेल्स के निर्माण में जुटी है. कुछ विशेषज्ञों का मत है के ये टनेल इरान -पाकिस्तान-चीन के बीच प्रस्तावित गैस लाइन के लिए बनाए जा रहे हैं तो कुछ का मत है कि चीन यहाँ मिसाइल भंडारण के लिए इन टनेल्स का उपयोग करेगा.चीनी सेना ने जब इस इलाके घुसपैठ किया तो शुरू में वह इस इलाके में तात्कालिक रिहायश के इंतजाम में लगी थी,अब चीनी सेना यहाँ स्थायी निवासी संकुल बनाने में जुटी हुयी है. चीन इस इलाके में रेल और सड़क परिवहन प्रणाली विकसित करने में भे जुटी हुयी बतायी  जाती है. खाड़ी देशों से तेल के टैंकरों को समुद्री मार्ग से चीन पहुँचने में इस समय १६ से २५ दिनों का समय लगता है। अगर गिलगित-बालतिस्तान होकर रेल या सड़क मार्ग का निर्माण पूरा हो गया तो खाड़ी देशों से बिलकुल करीब स्थित पाकिस्तान के ग्वादर,पसनी और ओरमारा से पूर्वी चीन तक केवल ४८ घंटों में पहुंचा जा सकता है. सनद रहे कि ग्वादर,पसनी और ओरमारा का निर्माण चीनी सहयोग से किया गया है. मीडिया क्या गिलगित और बालतिस्तान में किसी पाकिस्तानी का भी प्रवेश निषिद्ध है. आप कल्पना करें कि अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हो जाए, अमेरिका की रुचियाँ इस इलाके में सीमित हो जाएँ, सोवियत संघ दशकों पहले बिखर चुका है। चीन और पाकिस्तान जम्मू एवं कश्मीर पर भिड़ जाए तो हिन्दुस्तान की स्थिति क्या होगी? जब तक हिदुस्तान हमले की खबर पायेगा तब तक कश्मीर हमारे हाथ से जा चुका होगा.

जम्मू एवं कश्मीर पर लेफ्टिनेंट जनरल जसवाल के मुद्दे पर हिंदुस्थानी विदेश मंत्रालय के बयान के ठीक एक दिन पहले लोक सभा में कश्मीर मुद्दे पर चर्चा हुयी,उस चर्चा में जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री ओमर अब्दुला के पिता डॉ.फारूक अब्दुला ने चर्चा में हिस्स्सा लेते हुए बड़े लच्छेदार ढंग से कहा कि हिन्दुस्थान को तो पाकिस्तान से अब उसके कब्जे वाला कश्मीर मांगना चाहिए. अब्दुल्ला के इस बयान को  देश के लगभग हर मीडिया संस्थान ने प्रमुखता दी. अब्दुल्ला परिवार के प्रति हामरे दश में विस्वास भी बढेगा. लेकिन क्या पाकिस्तान,चीन और अब्दुला परिवार कश्मीर के मामले में ज़रा भी विश्वसनीय हैं? क्या हमें कश्मीर का मुद्दा पूरी तरह अमेरिकी समर्थन के आधार पर छोड़ देना चाहिए? हिन्दुस्तानी कश्मीर में इसी अब्दुल्ला परिवार जैसों पर अंधविश्वास के चलते आज दिन तक संविधान की धारा ३७० को लागू रखा गया है जिसके परिणाम स्वरुप कश्मीर मुस्लिम्बहुल प्रांत बन कर हमेशा अलगाव वाद के लिए उर्वर बना रहता है.दूसरी ओर पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में पाकिस्तानी  शासन वहाँ के बहुसंख्यक मूल कश्मीरियों जो कि शिया मुसलमान थे, का सफाया कर वहाँ कट्टरपंथी वहाबियों को बसा चुका है. हम आये दिन कश्मीर को स्वायत्तता देने की बात करते हैं जबकि नियंत्रण रेखा  के उस पार सेना का पूर्ण नियंत्रण है. वहाँ की विधायिका एवं कार्यपालिका को संविधान द्वारा प्रदत्त ५६ विषयों में केवल ४ का नियंत्रण प्राप्त है .फिर भी दुनिया की नजर में पाकिस्तान उन्हें'आज़ाद' साबित कर चुका है और सारे लोकतांत्रिक माप दण्डों पर पूर्णतया स्वतंत्र जम्मू एवं कश्मीर 'गुलाम'करार दिया जाता है. यह हमारे सत्ताधीशों की विफलता नहीं तो क्या है?

हिंदुस्तानी कश्मीर में अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की निगरानी में चुनाव होता है जबकि पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर के तमाम हिस्सों में विदेशी मीडिया,मानवाधिकार कार्यकर्ता तो दूर कई हिस्सों में कश्मीरियों का प्रवेश भी वर्जित है. इन दिनों कश्मीर में ठीक उसी तरह की स्थिति है जिस तरह की स्थिति १९६० के दशक में थी. चीन और पाकिस्तान दोनों इस समय हिन्दुस्थान को अमेरिका के करीब पाते हैं. अधिकाँश भारतीयों को याद  है कि १९७१ के भारत-पाक युद्ध के समय अमेरिका ने भारत को डराने के लिए 'इंटरप्राइज़ ' नामक जहाजी बड़े को भेजा था,कम लोग ही इस तथ्य को जानते हैं कि १९६२ में उसी अमेरिका ने हिन्दुस्थान के पक्ष में इसी 'इंटरप्राइज़'को भेजा था और चीन को चेतावनी दी थी कि यदि चीन हिदुस्थान की अखण्डता को खतरा पहुंचाने का प्रयास करेगा  तो अमेरिका हिन्दुस्थान को पर्याप्त सैन्य  सहायता देगा,युद्ध की समाप्ति इसी सहायता के बाद चीन की ओर से एकतरफा की गयी थी.युद्ध के बाद भी अमेरिका ने हिन्दुस्तान को चीनी सीमा पर नजर रखने के लिए टेक-इंट के अत्याधुनिका उपकरण दिए थे. इससे चिढ कर चीन ने ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो और जनरल अयूब खान को हिन्दुस्तान से युद्ध के लिए उकसाया था. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने निधन से कुछ दिन पहले ही डॉ.फारूक अब्दुल्ल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला को नजरबंदी से रिहा किया था. हिन्दुस्तान के सत्ताधीशों को कश्मीर की बजाय नेफा की चिंता जब ज्यादा लगी तब चीन ने बड़ी चतुराई से भुट्टो के माध्यम से कश्मीर तोड़ने की योजना तैयार की थी. भुट्टो उस समय चीन के संपर्क में थे और जनरल अयूब ने सोविअत संघ के खिलाफ अमेरिका को पाकिस्तानी मदद का वादा कर अमेरिकी मदद हासिल की थी. कश्मीर तोड़ने के लिए शेख अब्दुल्ला को भितरघात के लिए राजी किया गया था. शेख अब्दुल्ला नजरबंदी से रिहा होने के बाद पेरिस और सऊदी अरब की यात्रा के अलावा पाकिस्तान भी गए थे. सी.आई.ए. के अधिकारी डान आर.क्लेरिज ने अपनी पुस्तक 'स्पाई फॉर आल सेशन:माई लाइफ इन दि सी.आई.ए.'में  लिखा है कि उनसे शेख अब्दुल्ला पेरिस और सऊदी अरब में मिले थे.१९६३ और १९६५ के बीच अमेरिका ने योजनाबद्ध ढंग से पाकिस्तान को पैटन टैंक और लड़ाकू विमानों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर सैन्य सहायता दी थी. क्लेरिज ने लिखा है कि जब वे शेख अब्दुल्ला से सऊदी अरब में मिले तो उन्हें शेख ने बताया कि पाकिस्तानी अधिकारियों को कश्मीर की स्थिति से पूरी तरह अवगत करा दिया गया है. शेख अब्दुल्ला ने क्लेरिज को बताया कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन्हें बताया है कि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर से जम्मू एवं कश्मीर में गुरिल्लों के छोटे-छोटे दस्ते भेज रहा है. इन गुरिल्लों को हिंदुस्तानी कश्मीर में पहुँच का उत्पात मचाना है. अंत में पाकिस्तानी सेनायें कश्मीर पर धावा बोलेंगी. हिंदुस्तानी सेना के मनोबल के परीक्षण के लिए पाकिस्तानी सेना पहले कच्छ के रन में हमला बोलेगी. कच्छ के रन में जब पाकिस्तानी हमला हुआ तब हिन्दुस्तानी फ़ौज ने मुकाबला तो किया पर उसमें जबरदस्त मजबूती का अभाव था सो पाकिस्तान ने जम्मू एवं कश्मीर में हमला बोल दिया.इस हमले के पहले पाकिस्तान ने जो रणनीति बनायी वह निम्न लिखित थी:

  • पाकिस्तान द्वारा भेजी गयी गुरिल्ला टुकड़ियां कश्मीर में इतना उत्पात मचाएंगी कि कश्मीर के हालात काबू से बाहर हो जायेंगे.
  • हिन्दुस्तान कश्मीर में कोई प्रभावी कार्रवाई करे उसके पहले ही पाकिस्तानी सेना कश्मीर पर धावा बोल कर उसे अपने कब्जे में ले लेगी.
  • पाकिस्तानी सेनाओं की तुलना में हिंदुस्तानी सेना जवाबी कार्रवाई कर नहीं पाएगी और कश्मीरी जनता तो पाकिस्तान का साथ देगी.
  • हिन्दुस्तान प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई में पूर्वी पाकिस्तान पर हमला करेगा तो पाकिस्तान चीन को हिन्दुस्तान पर हमले के लिए राजी कर लेगा.

जनरल अयूब और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो सोच रहे थे कि १९४७-४८ में जिस प्रकार पंडित नेहरू ने कश्मीर में पाकिस्तानी हमले पर निर्णय में देरी की थी वैसे ही नए और नरम लाल बहादुर शास्त्री भी सैन्य कार्रवाई में देरी करेंगे सो दोनों ने 'सितम्बर ओपरेशन' शुरू कर दिया. पाकिस्तान ने अखनूर पर कब्जा कर लिया और अस्थायी रूप से जम्मू एवं कश्मीर में हिंदुस्तानी सेना को जाने से रोक दिया. शास्त्री नेहरू की तुलना में बहादुर साबित हुए. हिंदुस्तानी सेना ने अंतर्राष्ट्रीय सीमा से परे पश्चिमी पाकिस्तान पर हमला बोल दिया. पाकिस्तान ने जो सोचा भी नहीं था हिंदुस्तानी सेना ने लाहौर समेत पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमला कर दिया था. खेमकारन की लड़ाई में पाकिस्तान को भारी शिकस्त मिली थी. पूर्वी पाकिस्तान में लड़ाई शुरू ही नहीं हुई सो चीन चुपचाप लड़ाई देखता रह गया. जब पाकिस्तान के महानगर युद्ध की जद में आ गए तो जनरल अयूब अमेरिका से युद्ध रुकवाने की गुहार लगाने लगे. अमेरिकी विद्वान् सिडनी के.ग्रिफिन की पुस्तक 'दि क्राइसिस गेम' में 'कश्मीर १९६५; एज ए फिक्शनल क्राइसिस' में सप्रमाण लिखा गया है कि फरवरी १९६५ में कच्छ में घुसपैठ के दो माह पहले अमेरिका ने अध्ययन कर पाया था कि १ सितम्बर १९६५ को पाकिस्तानी सेना कश्मीर पर धावा बोलेगी. उनका भी अंदाज था कि जल्द ही पाकिस्तानी सेना श्रीनगर को कब्जे में ले लेगी. अंदाज था कि जब पूर्वी पाकिस्तान में युद्ध छिड़ेगा और चीन युद्ध में उतर आयेगा तब मजबूर होकर हिन्दुस्तान सहायता के लिए अमेरिका की ओर दौड़ेगा तब अमेरिका कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की शर्त पर सहयोग के लिए राजी होगा. सनद रहे कि जो अमेरिका इस तथ्य को जान रहा था उसने १९६३ में आइजन्होवर तथा जॉन फास्टर ड्यूले से पंडित नेहरू को आश्वासन दिलाया  था  कि यदि पाकिस्तान ने अमेरिकी हथियारों का उपयोग भारत के खिलाफ किया तो वे पाकिस्तान की सहायता रोक देंगे,अमेरिका ने कोई सहायता नहीं रोकी.

१९६२ में हिन्दुस्तान की मदद में 'इंटरप्राइज़' भेजने वाला अमेरिका हिन्दुस्तान के खिलाफ यह षड्यंत्र क्यों कर रहा था? १९६२ में वह चीन को एशिया की शक्ति बनने से रोकना चाहता था लेकिन साथ ही वह गुट निरपेक्ष आन्दोलन का नेतृत्व कर सोविअत संघ के करीब जा रहे हिन्दुस्थान को भी सबक सिखाने की फ़िराक में था. १९६० में कांगो को जब बेल्जियम ने आज़ाद किया और वहाँ गृह युद्ध छिड़ा तो संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव डग हेम्रस्क्जोल्ड के कहने पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र के भारतीय प्रतिनिधि राजेश्वर दयाल के नेतृत्व में भारतीय शान्ति सेना कांगो गयी, यही कांगो कालांतर में जैरे गणराज्य बन गया. अमेरिका जैरे के खिलाफ था ,सी.आई.ए. के इशारे पर जैरे गणराज्य के राष्ट्रपति लुमम्बा की नृशंस ह्त्या कर दी गयी. डग हेम्रस्क्जोल्ड भी एक विमान  दुर्घटना में मारे गए. उनकी मौत भी आज दिन तक रहस्यमय बनी हुयी है. सी.आईए. भारत को भी सबक सिखाना चाहता था,तभी तो शेख अब्दुल्ला को उसने अपने संपर्क में ले रखा था. कुल मिला कर इतना तय है कि चीन और पाकिस्तान ५० साल से कश्मीर पर नजर गडाए बैठे हैं. अमेरिका को कल लग जाए कि कश्मीर हिदुस्तान से अलग हो जाए तो इस्लामी दुनिया से उसकी दुश्मनी ख़त्म  हो जायेगी  और उसका अगले दशक भर के लिए भी दुनिया की चौधराहट बरकरार रहेगी तो वह चीन और पाकिस्तान से अरुणाचल से लेकर कश्मीर तक युद्ध छेड़ने की सलाह देगा.क्या हम ऐसी स्थिति से निपटने के लिए तैयार हैं. कदापि नहीं. जब हम दलाई लामा पर चीन की घुड़की पर सिकुड़ जा रहे हैं,और अब्दुल्ला परिवार की लच्छेदार भाषा पर फ़िदा हुए पड़े हैं. जब  हमारी वैश्विक राजनीति को वाशिंगटन के खूंटे बाँध कर खुद को सुरक्षित मानने की है,जब हम पाकिस्तान के मरियल विदेश मंत्री से अपमानित होने की आदत पाल चुके हैं,तब ऐसी किसी लड़ाई से निपट लेने की उम्मीद करना ब्रिहन्नल्ला के पौरुष से बभ्रुवाहन पैदा करने की उम्मीद पालने जैसा है.

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deepak dudeja on 29 August, 2010 20:18;58
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क्षमा शोभती उस भुजंग को,जिसके पास गरल हो। श्री रामधारी सिंह दिनकर की कविता की ये पंक्तियाँ ही सब कुछ कह देती है..........


दम दिखाना होगा.......... शासन करना है - तो. अन्यथा ..... कटोरा लेकर खड़े रहो......
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vicky hindustani on 30 August, 2010 18:45;32
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बिलकुल सही लिखा है आपने !
हमारा छत्रिय धर्म , हमारा पुरुषार्थ खो गया है !
हमारा राजनैतिक नेतृत्व हिंजड़ा हो गया है !
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RAJ SINH on 30 August, 2010 22:59;34
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अब भी देर नहीं हुयी है . देश की जनता डरे हुए चूहों और उसकी मुखिया , जिसे 'सी आई ए ' ने ही पी एम निवास में स्थापित किया था ,को हटाये . गद्दारों की सरकार और उसके नपुंसक सरदार से क्या उम्मीद करते हैं ?

निर्बल होते जब शस्त्र , शास्त्र रोते हैं
ऋषियों के भी यज्ञं सफल तब हो पाते
जब स्वयं धनुर्धर राम वहां पहरा देते हैं .
- दिनकर
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Yashovardhan Nayak on 24 October, 2010 13:20;26
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चीन से निपटने के लिए भारत को जापान ,रूस ,फ़्रांस तथा जर्मनी इन चार देशो से मदद लेना होगी . जापान भी इस समय चीन पीड़ित है .रूस हमारे देश का परखा हुआ मित्र है .फ़्रांस और जर्मनी, यूरोप में हमारे भरोसेमंद दोस्त साबित हो सकते है ,सिक्किम का भारत में विलय और बंगलादेश का जन्म हमने आजादी के बाद अपने बलबूते ही किया था .यह निर्विवाद सत्य है कि चीन भौगौलिक रूप से हमसे बड़ा है तथा उसकी सेना हमसे बड़ी है .चीन ने तिब्बत हड़प लिया नेपाल को चंगुल में ले चुका है .पाकिस्तान तक सड़क मार्ग विकसित कर चुका है .लेकिन उसके जिनजियांग प्रान्त में इस्लामिक उग्रवाद तेज हुआ है .आम आदमी कम्युनिस्ट तानाशाही से तंग आ चुका है. भारत को इन बातो का लाभ उठाना होगा.यशोवर्धन नायक टीकमगढ़ (मध्य-प्रदेश).
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ashish on 30 October, 2010 01:22;12
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भारत कमजोर देश नहीं है लेकिन स्वार्थी नेताओ ने पूरे देश को बर्बाद किया हुआ है. बस एक बार पूरे देश में देश प्रेम की लहर आ जाये फिर आप देखिएगा भारत क्या है.
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image प्रेम शुक्ल मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक. संपर्क - premshukla@rediffmail.com
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पूर्वोत्तर की आत्मघाती उपेक्षा
देश के पूरबी छोर पर स्थित प्रदेश मणिपुर को देश के अन्य हिस्सों से जोडने वाले राजमार्गो पर करीब दो महीने तक चली नाकेबंदियों की वजह से आवाजाही बंद रही। पूरे प्रदेश में खाने-पीने की चीजों, जीवनरक्षक दवाओं और पेट्रोलियम पदार्थों की घोर किल्लत उत्पन्न हो गई। सेना के विमानों की सहायता से अत्यावश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने की व्यवस्था हुई, पर ऐसी व्यवस्थाओं की अपनी सीमाएं होती है और इनसे जनजीवन को सामान्य तरीके से संचालित नहीं किया जा सकता। हालत आज भी कोई सुधरे नहीं है क्योंकि समस्या की जड़ें उसी तरह मजबूती से गड़ी हुई हैं....
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कश्मीर की विरासत है आजादी
कश्मीर में एक बार परिस्थितियां इतनी बिगड़ी कि केन्द्रीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ गयी. घाटी के मुहाने पर एक बार फिर सेना को बैठाना पड़ा. हालांकि अब घाटी में फौरी तौर पर शांति है लेकिन क्या कश्मीर में समस्या का समाधान सिर्फ केन्द्र सरकार का हस्तक्षेप है. शेष नारायण सिंह मानते हैं कि कश्मीर में अशांति के कारण गहरे हैं. कश्मीर पर पाकिस्तान का बेजा दावा और भारत का 'अनावश्यक' हस्तक्षेप समस्या का मूल कारण बन गया है. इसका निदान किये बिना कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है. ...
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कितना कामयाब होगा मुलायम का माफीनामा
जैसे तलाक देने के लिये तलाक को तीन बार बोला जाता है बिल्कुल इसी अंदाज मे सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह से अपने संबधो को लेकर माफी मांग कर मुसलमानो को रिझाने के लिये फिर से ट्रांपकार्ड फेंका है। अब देखना है कि मुलायम का यह ट्रांपकार्ड क्या हकीकत मे मुसलमानो को रिझाने मे कामयाब होगा।...
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शिवाजी के शौर्य को कलंकित करने का षण्यंत्र
छत्रपति शिवाजी के अपमान के मुद्दे पर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरम है. संभाजी ब्रिगेड जिसने पिछली बार भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बोरी) की तोड़-फोड़ की थी. इस बार महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल पर हमले का षण्यंत्र रचा था जिससे वे शनिवार को बाल बाल बच गये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जेम्स लेन की विवादास्पद पुस्तक "शिवाजी- द हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया" की बिक्री के लिए जिस अंदाज में छूट मिली है, उस पर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कई संगठन आंदोलनरत हैं. लेकिन हम पहले यह समझ लें कि यह जेम्स लेन महाशय हैं कौन और उन्होंने किताब आखिर किस इरादे से लिखी है?...
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बेमतलब हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस
हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है जो 1987 से हर साल 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विश्व की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं।...
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रमन सिंह की दमनकारी औद्योगिक नीति
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह नक्सली आंदोलन के खिलाफ चलनेवाले अभियान के अगुआ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन रमण सिंह इस आंदोनल को किसके इशारे पर कुचल रहे हैं? क्या वे आम आदमी और आदिवासियों के हित में नक्सली आंदोलन को कुचलने का दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं या फिर उनका एजेण्डा कुछ और है. हाल में ही छत्तीसगढ़ की नयी औद्योगिक नीति की समीक्षा करें तो साफ हो जाता है कि असल में यह संघर्ष वे किसके लिए कर रहे हैं. ...
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