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छत्तीस हुआ तिरसठ का आंकड़ा

image सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह में दूरियां साफ नजर आने लगी हैं

सोनिया गांधी बीते शुक्रवार को चौथी बार कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयी .उनके इस चयन के साथ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में सत्ता परिवर्तन का निर्णायक दौर शुरू हो जाएगा. सोनिया गांधी अपने पति राजीव गांधी की १९९१ में हत्या के बाद राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखने के लिए जिस अंदाज में १०,जनपथ से कांग्रेस की राजनीति का नियंत्रण रखने का परोक्ष-अपरोक्ष प्रयास करती रही हैं उसका एकमेव उद्देश्य रहा है अपने पुत्र राहुल गांधी को एक दिन इस देश का प्रधानमंत्री बनाना.

इसी एक उम्मीद को सीने में पाल कर सोनिया गांधी ने पिछले १९ वर्षों की कांग्रेस की राजनीति में किसी को भी गांधी परिवार का विकल्प नहीं बनने दिया. १९९१ में राजीव गांधी की ह्त्या के बाद पी.वी. नरसिंहराव किसी भी कीमत पर कांग्रेस के संसदीय दल के नेता नहीं चुने जाते यदि उन्हें १०,जनपथ की महारानी सोनिया गांधी का समर्थन नहीं प्राप्त होता. सोनिया गांधी पी.वी. नरसिंहराव के नाम पर उस समय क्यों सहमत हुयी होंगी? सोनिया गांधी को उस समय लगता था कि पी.वी.नरसिंहराव ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी कांग्रेस में गांधी परिवार के प्रति निष्ठा के अलावा कोई अपना राजनीतिक अस्तित्व नहीं है. वे बूढ़े पड़ चुके थे और कांग्रेस की सक्रिय राजनीति से उन्हें निवृत्त किया जा चुका था. उनका अपने गृहराज्य आंध्र प्रदेश में भी कोई राजनीतिक अस्तित्व नहीं बचा था इसीलिये उन्हें १९८९ में महाराष्ट्र के रामटेक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जितवा कर भेजा गया था. १९९१ के लोकसभा चुनावों तक वे इतने ज्यादा अप्रासंगिक हो गए थे कि उन्हें टिकट भी नहीं दिया गया था. जब रनिवास से पी.वी. नरसिंहराव के नाम को हरी बत्ती दिखाई गयी थी तब राव दिल्ली में मौजूद भी नहीं थे. वे रामटेक से अपना बसेरा बदलने के लिए सामान लेने गए थे. १९९१ में राजीव गांधी की हत्या और संसदीय दल के नेता के चुनाव में एक पखवाड़े से अधिक का अंतर था. जो लोग कांग्रेस का नेतृत्व हथियाने में रूचि ले रहे थे वे सब किसी न किसी रूप में दिल्ली में सक्रिय थे. नरसिंहराव का रामटेक जाकर अपना सामान समेटना साबित करता था कि वे नेतृत्व की होड़ में कहीं नहीं थे.उनकी यही नीरसता कांग्रेस के संसदीय दल के नेता के रूप में उनकी सर्वश्रेष्ठ योग्यता बन गयी. नरसिंहराव का पहला मंत्रिमंडल भी कोई उनकी मर्जी से नहीं बना था. नरसिंहराव ने अपने मंत्रिमंडल में सबसे अप्रत्याशित समावेश किया था वित्तमंत्री के रूप में वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह का. आज तक राजनीतिक विश्लेषक यही मानते हैं कि डॉ.सिंह की नियुक्ति अकेले नरसिंहराव का फैसला था. सनद रहे कि वित्त मंत्री बनने के पहले डॉ.मनमोहन सिंह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष और उसके पहले रिजर्व बैंक के गवर्नर के पद पर थे. इन दोनों पदों पर उस समय क्या गांधी परिवार से करीबी के बिना नियुक्ति संभव थी?

डॉ.मनमोहन सिंह किस कदर राजनीतिक चातुर्य वाले प्राणी हैं इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि वित्तमंत्री के रूप में पहला बजट पेश करते समय उदारीकरण की बात कर तमाम फिजूलखर्चियों में कटौती करते समय गांधी परिवार को प्रसन्न करने के लिए राजीव गांधी फाउण्डेशन के लिए १०० करोड़ रुपए की सरकारी मदद देने में उन्होंने कोई संकोच नहीं किया. कालान्तर में नरसिंह राव और १०,जनपथ की महारानी के बीच कांग्रेस की दरबारी राजनीति ने मुटभेड़ करा दिया. १९९३ के तिरुपति के कांग्रेस अधिवेशन में नरसिंहराव हर किसी पर सत्ता में बने रहने के चलते भारी पड़े थे. १९९३ में राव के हाथों में सरकार के साथ-साथ कांग्रेस के संगठन की कमान भी लग गयी थी. साल भर में राव ने १०,जनपथ की सत्ता को चुनौती देना शुरू कर दिया. राजीव गांधी के निजी सचिव जो उनके निधन के बाद सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार की हैसियत में आ गए थे, उन विन्सेंट जार्ज के खिलाफ सी.बी.आई जांच शुरू कर दी गयी. जैसे ही नरसिंहराव पूर्ण सत्ता में आये उन्होंने अपने आसपास राजनीति और नौकरशाही में बेरिया वृत्ति के लोगों को पालना शुरू कर दिया.

पहले यह समझ लें कि यह बेरिया वृत्ति क्या होती है? लाव्रेंतीय पावलोविच बेरिया रूसी तानाशाह स्टालिन के युग का क्रूरतम सहयोगी हुआ. स्टालिन जिस किसी पर उंगली रख देते थे बेरिया उसे अपराधी सिद्ध कर मौत के घाट उतारने का प्रबंध कर देता था. बेरिया ने स्टालिन के इशारे पर लगभग एक करोड़ लोगों को मौत के घाट उतारने का प्रबंध किया. स्टालिन के साथ-साथ बेरिया अपने विरोधियों का भी सफाया करता रहा. हर नरसंहार या सोवियत प्रतिद्वंदी के सफाए के साथ-साथ बेरिया का सोवियत राजनीति में कद बढ़ता जाता था. बेरिया क्रूर होने के साथ-साथ पराक्रमी एवं रणनीतिकार भी जबरदस्त था.द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी पर सोवियत सेनाओं की विजय का मुख्य शिल्पकार बेरिया को ही माना जाता है. १९४४ में स्टालिन ने बेरिया को सोवियत परमाणु बम की परियोजना का प्रभारी बनाया,१९४९ में बेरिया ने सोवियत परमाणु बम बनाने में सफलता दिला दी. बेरिया ने सबकुछ अपने बॉस स्टालिन की छत्रछाया में सफलतापूर्वक किया. स्टालिन की मौत के बाद बेरिया सोवियत का पहला उप प्रधानमंत्री बनने में सफल हुआ. द्वितीय विश्व युद्ध के समय बेरिया ने बड़े ही युक्तिपूर्व ढंग से अमेरिका से भारी सहायता प्राप्त की थी. स्टालिन की मौत के बाद जब पूर्वी बर्लिन में अमेरिकी सहयोग से जर्मनी के एकीकरण के लिए प्रदर्शन शुरू हुए तो बेरिया अमेरिका से सोवियत संघ के लिए भारी आर्थिक सहायता प्राप्त कर जर्मनी से कम्युनिस्ट शासन के खात्मे का सौदा करना चाहता था. यहीं बेरिया को बुल्गानिन और ख्रुश्चेव के गुट ने ठिकाने लगाने का मौक़ा पा लिया. २६ जून १९५३ को बेरिया को गिरफ्तार किया गया और उसके साथ ठीक वही बर्ताव हुआ जो उसने करोड़ों लोगों के साथ किया था,यानी बिना किसी सबूत के देशद्रोही साबित कर विरोधी को मौत के घाट उतारने की छद्म कानूनी प्रक्रिया. बेरिया पर स्टालिन को जहर देकर मारने समेत देशद्रोह, रिश्वतखोरी और बलात्कार जैसे मामलों में मुकदमा चलाया गया. मुकदमे के बाद उसे मौत की सजा सुनायी गयी,सजा सुनाने के कुछ देर बाद ही सेना के दस्ते ने उस पर अंधाधुंध गोलियां चला कर उसकी ह्त्या कर दी. बेरिया की नीति थी कि जिसे मारना हो उसे पहले फर्जी मुक़दमा चला कर और सोवियत अखबार प्रावदा में उसके खिलाफ प्रचार कर उक्त व्यक्ति के खिलाफ एकतरफा माहौल तैयार करता था.

हिन्दुस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान में सोवियत प्रतिष्ठान की तरह क्रूरता का कोई स्थान नहीं लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत बेरिया वृत्ति से काम करने की यहाँ लम्बी परम्परा है. इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में अपने विरोधियों को निपटाने के लिए उनके खिलाफ सरकारी जांच एजेंसियों में बेरिया के सिद्धांत को मानने वालों को बैठा रखा था. आपातकाल के दौरान लगभग पूरे विपक्ष के खिलाफ बेरिया की प्रणाली में ही मुकदमे चलाये गए. बाद में भी जो कोई इंदिरा गांधी को अपने हितों के आड़े दिखाई देता था तो उसे देशद्रोही साबित करने का प्रयास किया जाता था. पी.वी. नरसिंह राव को इंदिरा के शासन काल में ही बेरिया वृत्ति का प्रशिक्षण दिया गया था. इसीलिए जब राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स का मामला उछला तो नरसिंह राव ने तांत्रिक चंद्रास्वामी से मिलकर बोफोर्स मुद्दे को उछालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह और राम जेठमलानी के खिलाफ षड्यंत्र रचा था. वी.पी.सिंह और उनके बेटे अजेय सिंह के खिलाफ सेंट किट्स का फर्जी खाता खुलवा कर मीडिया में उन्हें बदनाम करने की कोशिश हुयी. राम जेठमलानी को अदनान खशोगी के निजी जहाज पर निमंत्रित कर हनी ट्रैप में लेने का प्रयास किया गया. १९९३ में कांग्रेस पर पूर्ण वर्चस्व स्थापित करने के बाद जब नरसिंह राव सोनिया के मुखालिफ हुए तो चंद्रास्वामी,मातंग सिंह,भुवनेश चतुर्वेदी आदि को साथ लेकर वे सोनिया के निष्ठावंतों को ठिकाने लगाने की योजना बनाने लगे. जनपथ के इशारे पर सूरज कुंड के कांग्रेस अधिवेशन में राव विरोधी अभियान तैयार हुआ.राव उसी समय राजनीतिक रूप से निपटा दिए जाते लेकिन एन मौके पर भजन लाल और शरद पवार अर्जुन सिंह, शीला दीक्षित, नटवर सिंह आदि से दगा दे गए. सूरजकुंड अधिवेशन के बाद ही राव ने अपने सारे राजनीतिक विरोधियों को निपटाने के लिए जैन हवाला डायरी का सहारा लिया. उसी डायरी ने विपक्षी नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस के माधव राव सिंधिया,कमल नाथ,गुलाम नबी आज़ाद आदि का राजनीतिक काम तमाम करने  का प्रयास हुआ था. राव ने सबसे ज्यादा विश्वास किया था सीता राम केसरी पर उन्हें १९९६ में अध्यक्ष बनाकर. केसरी ने भी बेरिया नीति का अनुसरण किया और अध्यक्ष की कुर्सी पाते ही पहला काम किया कुर्सी दिलानेवाले नरसिंह राव पर भ्रष्टाचार के मामलों की आड़ में  राव को पार्टी से ही निकाल कर बाहर फेंक दिया. केसरी ने सबसे ज्यादा विश्वास किया था शरद पवार,पी,ए.संगमा,तारिक अनवर, अहमद पटेल पर. तारिक के अलावा हर किसी ने केसरी के साथ गद्दारी की और १९९८ में एक दिन सबने मिल कर २४,अकबर रोड स्थित कांग्रेस के मुख्यालय से केसरी को जबरन ढकी मार कर निकाल दिया और सोनिया गांधी को लाकर नया अध्यक्ष बना दिया. राव ने जिन लोगों को कांग्रेस से निकाला था उन सबको केसरी कांग्रेस में लाये उन सबने केसरी को इतना अपमानित किया कि केसरी उस झटके से उबार ही नहीं पाए और बीमार पड़े तो फिर कभी बिस्तर से नहीं उठ पाए. सोनिया गांधी को जो लोग अध्यक्ष बनाने के लिए ले आये थे उन्हें जब १९९९ में लगा कि सोनिया के नेतृत्व में लोक सभा चुनाव नहीं जीता जा सकता तो उनमें से कुछ  सोनिया के विदेशी मुद्दे का मामला छेद कर कांग्रेस से बाहर चले गए.

जब कांग्रेस में यह उठक -पटक चली तो सोनिया के बेरिया मंडल ने उस हर किसी को निपटा दिया जिसने १९९१ से १९९८ के बीच १०,जनपथ की महारानी की शान में किसी भी प्रकार की गुस्ताखी की थी. नरसिंह राव से करीबी रखने वाला कोई कांग्रेस के सत्ताकेंद्र में घुस भी नहीं सकता था,लेकिन राव के सबसे करीबी समझे जानेवाले डॉ.मनमोहन सिंह के खिलाफ सोनिया और उसकी मंडली ने कभी कोई परहेज क्यों नहीं किया? जैसे ही सोनिया गाँधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनी उन्होंने डॉ.मनमोहन सिंह को पार्टी के आर्थिक मामलों का प्रमुख और कालांतर में राज्यसभा में विपक्ष के नेता पद पर बैठा दिया. नरसिंह राव के कार्यकाल में राव विरोधियों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग, राजस्व खुफिया निदेशालयों ने तमाम कार्रवाईयां की थीं. इन सारे विभागों के प्रभारी मंत्री स्वयं डॉ. मनमोहन सिंह थे, यदि वे राव के बेरिया नहीं होते तो ईमानदारी की धरातल पर उन्हें इन कार्रवायिओं का विरोध करना चाहिए था.कांग्रेस के तमाम विश्लेषक मानते रहे हैं कि अर्जुन सिंह-नटवर सिंह, प्रणव मुखर्जी आदि १९९८ -२००४ के बीच सोनिया गाँधी के ज्यादा करीबी थे,यह भी एक फ़साना है. यदि ये सोनिया गाँधी के करीबी होते तो मनमोहन सिंह इन सबके रहते राज्यसभा में विपक्ष के नेता कैसे बन जाते? सोनिया इस तथ्य को जानती थी कि नरसिंहराव की तरह ही मन मोहन सिंह अन्य कांग्रेसियों की अपेक्षा बेरिया वृत्ति के ज्यादा कारगर व्यक्तित्व हैं, इसलिए जब  मई २००४ में सोनिया को तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे.अबुल कलाम ने स्पष्ट किया कि तीनों सेना प्रमुखों के विरोध के चलते वे किसी विदेशी मूल के व्यक्ति को संसदीय दल का नेता चुने जाने के बावजूद प्रधान मंत्री पद की शपथ नहीं दिला सकते  तो सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति भवन में संसदीय दल के नेता के अधिकार से डॉ.मनमोहन सिंह को प्रधान मंत्री  पद के लिए नामित कर दिया. मीडिया और कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग मानता है कि सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री के पद का परित्याग किया था,यह बड़ा ऐतिहासिक असत्य है. यदि सोनिया गाँधी को प्रधान मंत्री के पद में किसी प्रकार की अरुचि होती तो वे संसदीय दल का नेता चुने जाते वक़्त ही डॉ.मन मोहन सिंह का नाम प्रस्तावित करवा देतीं,ऐसा करने से उस समय शरद पवार और मुलायम सिंह यादव जैसों के मन का संकोच भी खतम हो जाता. रही बात कांग्रेस के सांसदों की तो वे जान रहे थे कि बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा है उन्हें अपने-अपने मंत्री पद की चिंता थी, कोई भी प्रधानमंत्री बनाता वे विरोध नहीं करते.

हमने बात शुरू की थी कांग्रेस के सत्तांतर पर्व से. १९९१ से १९९६ तक तक कांग्रेस के प्रधानमंत्री रहे नरसिंह राव इंदिरा और राजीव गांधी के बेरिया थे,वे सोनिया गांधी के भी बेरिया बन कर रह जाते लेकिन जैसे ही लोगों ने उन्हें समझाया कि सोनिया उनसे सत्ता छीन  कर खुद या उस पर किसी और को नामित कर देंगी तो उन्होंने कांग्रेस को ही कब्र में भेजने का इंतजाम कर दिया. यही मापदंड डॉ. मन मोहन सिंह पर भी लागू है.जब तक उन्हें लगेगा कि उनके प्रधान मंत्री पद की कुर्सी खाली है तब तक वे सोनिया के इशारे पर गांधी परिवार के किसी भी विरोधी का काम तमाम करने का कारनामा करेंगे. बेरिया ने स्टालिन के हर विरोधी को निपटाया लेकिन जैसे ही उसे लगा कि स्टालिन उसकी जगह ख्रुश्चेव-बुल्गानिन का रास्ता साफ़ कर देंगे तो बेरिया ने स्टालिन को धीमा जहर दे दिया.जब तक मनमोहन सिंह को लग रहा था कि वे प्रधानमंत्री पद पर बने रहेंगे तब तक वे उत्तम शासन चला रहे थे,अब उन्हें शक नहीं पूरा विश्वास हो गया है कि सोनिया उनको विदा करना चाहेंगी सो कर्तव्यदक्ष प्रधानमंत्री अब अराजकता की स्थिति पैदा कर रहे हैं. महंगाई नियंत्रण का उन्हें इलाज नहीं सूझ रहा,कश्मीर की समस्या उलझती जा रही है. नक्सलवाद उफान पर है. मंत्रिमंडल का हर मंत्री दूसरे मंत्री को नीचा दिखाने पर आमादा है. आर्थिक सुधार लटके पड़े हैं. हर दिन सरकार का कोई न कोई घोटाला बाहर आ रहा है. कहीं बेरिया ने अब अपने बॉस को सबक सिखाना तो नहीं शुरू किया है?

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Poonam on 07 September, 2010 01:45;33
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Do you want to prove that Dr.Manmohan Singh is going to backstab Gandhifamily ?I think you are just dreaming like a true RSSwala.Your drem will never come true.
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Dr Pawan on 07 September, 2010 15:13;37
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kya history de mari shukla ji jabardast research h aapki congress national congress nahi h ye to chmcho ne nehru congress bana di sonia k tyag ki fake story ka bhi pata lg gaya aajjj or manmohan singh to ek bechara h jo time pass kar rha h apna old age desh ko pseudo chmchay hi chala rhe h digvijay type log chidambram mukherji jo is desh ki majority ko 24 hours gali dete nahi thak te thanks
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PRASHANT on 08 September, 2010 00:18;49
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बहुत बढ़िया लिखा शुक्ला जी आप ने तो भारत के ठेकेदारों की कहानी ... ये गाँधी के नाम पार वोट मांगते फिरते है ... पार जनता कों ये नहीं बताते है की ये कौन सी गंधी के सन्तान है .... महात्मा गाँधी या फिरोज ...?
ये पुरे देश कों बेवकूफ बनाकर रख दिए है...
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Sanjiv Dube on 08 September, 2010 01:52;09
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Mr.Shukla,Dr.Manmohan Singh must have seen narsinghrao's KUTTE KEE MAUT like situation.Once Gandhi family decides against him he will be nowhere.There is no alternate of RAHULRULE.
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RAJ SINH on 08 September, 2010 02:55;38
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शुक्ल जी एक बात बताना तो आप भूल ही गए . जब नरसिंह राव के विरोध का आदेश मिला राजमाता से तो इन्हीं सरदार जी ने अपने प्रधान मंत्री के खिलाफ क्या कहा था .......सीजर की बीबी को .......:):) .
वैसे यह बेचारा पुछ्छ्हीन चाकर है , क्या कर लेगा .
वैसे आपके अध्ययन , आकलन और समीक्षा का लोहा मानना ही पड़ेगा .
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Rinkoo on 21 October, 2010 20:33;13
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संघियों वाला परम घटिया विश्लेषण।
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Yashovardhan Nayak on 23 October, 2010 12:09;05
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सोनिया जी के बारे में यही कहा जा सकता है .कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद त्याग कर मिसाल कायम क़ी थी .मनमोहन सिंह जी का चुनाव करके देश को काबिल प्रधानमंत्री दिया .ज्यादा सांसद लाने वाला दल प्रधानमंत्री चुनता है .उससे कम सांसदों वाला दल नेता अपोजिशन होता है .पर सोनिया जी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना से घबरा कर सुषमा जी जैसी शालीन भाजपा नेता ने कहा कि वे भुने चने खाकर ,सर मुडाकर ,जमीन पर सोयेंगी. पर सोनिया जी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगी क्या तमाशा है.? जो अपोजिशन का लीडर बन सकता वह प्रधानमन्त्री क्यों नहीं बन सकता ? प्रेम जी आप नितिन गडकरी के बारे में तो लिखे कि वे बिना कोई चुनाव जीते संघ कि गोद में बैठ कर भाजपा के सर्वे-सर्वा बन गए .
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ashish on 30 October, 2010 00:52;26
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भाई साहब सोनिया तो कभी पी ऍम बन ही नहीं सकती थी ये बात शायद आप नहीं जानते. भारत का पी ऍम केवल वही बन सकता है जिसका जन्म भारत में हुआ हो. इसलिए बलिदान वलिदान कुछ नहीं है केवल पोलिटिकल स्टंट है जिसे पता नहीं क्यों हेर कोई नहीं समझ पा रहा है.
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image प्रेम शुक्ल मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक. संपर्क - premshukla@rediffmail.com
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कश्मीर की विरासत है आजादी
कश्मीर में एक बार परिस्थितियां इतनी बिगड़ी कि केन्द्रीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ गयी. घाटी के मुहाने पर एक बार फिर सेना को बैठाना पड़ा. हालांकि अब घाटी में फौरी तौर पर शांति है लेकिन क्या कश्मीर में समस्या का समाधान सिर्फ केन्द्र सरकार का हस्तक्षेप है. शेष नारायण सिंह मानते हैं कि कश्मीर में अशांति के कारण गहरे हैं. कश्मीर पर पाकिस्तान का बेजा दावा और भारत का 'अनावश्यक' हस्तक्षेप समस्या का मूल कारण बन गया है. इसका निदान किये बिना कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है. ...
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कितना कामयाब होगा मुलायम का माफीनामा
जैसे तलाक देने के लिये तलाक को तीन बार बोला जाता है बिल्कुल इसी अंदाज मे सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह से अपने संबधो को लेकर माफी मांग कर मुसलमानो को रिझाने के लिये फिर से ट्रांपकार्ड फेंका है। अब देखना है कि मुलायम का यह ट्रांपकार्ड क्या हकीकत मे मुसलमानो को रिझाने मे कामयाब होगा।...
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शिवाजी के शौर्य को कलंकित करने का षण्यंत्र
छत्रपति शिवाजी के अपमान के मुद्दे पर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरम है. संभाजी ब्रिगेड जिसने पिछली बार भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बोरी) की तोड़-फोड़ की थी. इस बार महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल पर हमले का षण्यंत्र रचा था जिससे वे शनिवार को बाल बाल बच गये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जेम्स लेन की विवादास्पद पुस्तक "शिवाजी- द हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया" की बिक्री के लिए जिस अंदाज में छूट मिली है, उस पर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कई संगठन आंदोलनरत हैं. लेकिन हम पहले यह समझ लें कि यह जेम्स लेन महाशय हैं कौन और उन्होंने किताब आखिर किस इरादे से लिखी है?...
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बेमतलब हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस
हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है जो 1987 से हर साल 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विश्व की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं।...
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रमन सिंह की दमनकारी औद्योगिक नीति
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह नक्सली आंदोलन के खिलाफ चलनेवाले अभियान के अगुआ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन रमण सिंह इस आंदोनल को किसके इशारे पर कुचल रहे हैं? क्या वे आम आदमी और आदिवासियों के हित में नक्सली आंदोलन को कुचलने का दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं या फिर उनका एजेण्डा कुछ और है. हाल में ही छत्तीसगढ़ की नयी औद्योगिक नीति की समीक्षा करें तो साफ हो जाता है कि असल में यह संघर्ष वे किसके लिए कर रहे हैं. ...
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