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ओबामा के बाद अमेरिका-१

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ओबामा गैर श्वेत और प्रवासी निवासियों के प्रतीक हैं और अंतरराष्ट्रीयता, भूमंडलीकरण, मुक्त व्यापार, सेकुलरवाद, संकर प्रजाति और खिचड़ी संस्कृति के नायक बन बैठे हैं. जो विरोधी खेमे के अमेरिकी राष्ट्रवाद, क्रिश्चियन धर्म, संरक्षात्मक आर्थिक नीति और नैतिक मूल्यों पर भारी पड़ा. इस राष्ट्रपति चुनाव में ओबामा को अमेरिका के 34 प्रतिशत अल्पसंख्यकों के वोट, यहूदी लॉबी द्वारा संचालित मीडिया और जॉर्ज सोरोस द्वारा प्रदत्त प्रचुर वित्त का सहारा था, तो मैक्केन 66 प्रतिशत श्वेत जाति के बीच कट्टर क्रिश्चियन धर्मावलंबियों के समर्थन की आस लगाए बैठे थे। बहरहाल पलड़ा ओबामा का भारी पड़ गया.

लेकिन यहां कुछ तथ्यों को समझ लेना चाहिए. अमेरिकी जनता यहूदी लॉबी से काफी नाराज है, जिसने पहले तो जॉर्ज बुश को ईराक युद्ध के लिए उकसाया और फिर अमेरिका को मध्यपूर्व में ऐसा फंसाया कि पूरी विदेश नीति हलक में अटक गई है। वॉलस्ट्रीट पर पूरा कब्जा इसी यहूदी लॉबी का रहा है। गोल्डमैन सैच हो या लेहमन ब्रदर्स, इनके कर्ताधर्ता इसी नस्ल के लोग रहे हैं। जब ट्रेजरी सेक्रेटरी हेनरी पॉलसन ने इन उच्छृंखल निवेशक बैंकों को मदद करने के लिए सात सौ अरब डॉलर के पैकेज का ऐलान किया, तो समस्त अमेरिकी जनता चौकन्नी हो गई। लोग विरोध में खड़े होने लगे कि जनता की गाढ़ी कमाई की बंदरबांट करना अन्याय है।ओबामा के बाद अमेरिका- सामाजिक चुनौती जनता के दबाव में ही बिल हाउस ऑफ रिप्रेजेन्टेटिव्स में गिर गया। चर्चा यह भी उठी कि बुश प्रशासन बिल हर हाल में पारित कराएगा, फिर चाहे इसके लिए जनता के विरोध को दबाने के लिए सशस्त्र बलों का प्रयोग ही क्यों न करना पड़े. कुछ तो फ्रेंच क्रांति का ताना-बाना बुनने भी लगे थे. यह नाराजगी और भी बढ़ गई, चूंकि अमेरिका में आए इस संकट के लिए जिम्मेदार एलन ग्रीनस्पैन को माना जा रहा था, जो तकरीबन 16 वर्षों तक फेडरल रिजर्व के चेयरमैन थे। ग्रीनस्पैन इस संकट पर चुटकी लेने लगे कि ऐसी स्थिति तो सदी में एक बार ही होती है। अब ग्रीनस्पैन हों या अभी के फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बेन बेरनान्के या कि हेनरी पॉलसन, सब के सब यहूदी ही हैं। ऐसे में अमेरिकी श्वेत जनता इस लॉबी के बीच चल रहे घपले और गड्डमगड्ड से काफी नाराज है और यहूदियों के खिलाफ गुस्सा बढ़ता जा रहा है। ऐसे में यहूदी लॉबी द्वारा ओबामा को खुलेआम समर्थन अमेरिकी नीतियों के भविष्य पर प्रतिकूल असर डालेगा. राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान निर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के समर्थन में बुश के दाहिने हाथ रहे कॉलिन पॉवेल, जिमी कार्टर के विश्वस्त योद्धा बिग्नेव ब्रेझेंस्की, रोनाल्ड रीगन के चहेते पॉल वॉल्कर जैसे लोग खड़े थे. अमेरिका की ताकतवर यहूदी लॉबी तो इसी साल जून में ओबामा को इस्राइल यात्रा पर भी ले गई थी।

इधर यहूदी गुटों ने एक अभियान छेड़ रखा है, जिससे अमेरिका में लैटिन भाषी समुदाय मजबूत होता जा रहा है। अत: उनके युवा नेतृत्व को अभी से वित्तपोषण करने की वकालत स्टीवन विंडमेलर रिपोर्ट में की गई है। यहूदी समुदाय यह मानने लगा है कि लैटिन भाषियों के साथ गठबंधन करना हितकर है, इसलिए कि दोनों प्रवास और गृह-प्रदेश के मुद्दे पर समान राय रखते हैं। ऐसा नहीं है कि यह ध्रुवीकरण चुनाव प्रक्रिया के दौरान शुरू हुआ है। अमेरिका में पिछले एक दशक से कई अंदरूनी विभाजक रेखाएं िखंचनी शुरू हो गई थीं। जनसंख्या की बनावट बदलती जा रही है। हाल ही में रिलीज हुए सन्-2007 के आंकड़े दर्शाते हैं कि अब अल्पसंख्यक चार राज्यों में बहुसंख्यक हो गए हैं। जॉर्ज बुश के गृह-राज्य टेक्सास, कैलीफोिर्नया, न्यू मेिक्सको और हवाई में गैर श्वेतों की जनसंख्या पचास फीसदी पार कर चुकी है, वहीं साउथ कैरोलिना के कोलंबिया डििस्ट्रक्ट में तो यह आंकड़ा 68 प्रतिशत के पार जा पहुंचा है। कुल 3,141 काउंटीज में 303 काउंटीज ऐसे हैं, जहां श्वेत अल्पसंख्यक हो चुके हैं। अमेरिकी प्रशासन के लिए यह चिंताजनक है, क्योंकि ये काउंटीज पूरे देश में समान रूप से नहीं हैं, अपितु पश्चिमी तट और दक्षिणी राज्यों में अवस्थित हैं। लॉस ऐंजेल्स काउंटी का आंकड़ा तो चौंकाने वाला है। वहां कुल सत्तर लाख आबादी गैर श्वेत है, जो वहां की जनसंख्या की 71 प्रतिशत है। यहां लैटिनभाषी हिस्पैनिक समुदाय के 47 लाख और एशियाई मूल के 14 लाख लोग गुजर-बसर करते हैं। टेक्सास राज्य के व्हारटन, विंकलर और वैलर में हिस्पैनिक मूल के व्यक्ति बहुसंख्यक हैं। स्टार काउंटी में तो 98 फीसदी मैिक्सको से आए हिस्पैनिक हैं। वहीं काली नस्ल के लोग 50 काउंटियों में बहुसंख्यक हैं। ये सारी काउंटियां अमेरिका के दक्षिणी हिस्से में हैं। कुक काउंटी में 14 लाख काली नस्ल के व्यक्ति हैं और मिसीसिपी राज्य के क्लेबोरन काउंटी में कुल आबादी में उनका हिस्सा 85 फीसदी है.

जुलाई-2007 तक के आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि अमेरिका में जनसंख्या के आधार पर विभाजन रेखा खिंच चुकी है। हिस्पैनिक समुदाय की जनसंख्या साढ़े चार करोड़ से ज्यादा है। वहीं अश्वेत नस्ल के लोगों की संख्या तकरीबन चार करोड़ है। एशियाई मूल की आबादी भी डेढ़ करोड़ पार कर चुकी है। कुल आबादी का चौंतीस फीसदी गैर श्वेत आबादी है। हिस्पैनिक समुदाय तीन फीसदी से भी अधिक गति से बढ़ रहा है, वहीं श्वेत निवासी मात्र एक तिहाई फीसदी की दर से। सन्-2010 की जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। जनसंख्या विभाग अभी से अनुमान लगा रहा है कि सन्-2042 तक आधी आबादी गैर श्वेत होगी और सन्-2050 तक उनका अनुपात 54 फीसदी होगा। ऐसे में, सन्-2023 आते-आते आधे से ज्यादा बच्चे गैर श्वेत दिखने लगेंगे।

जैसे ही सन्-2010 की जनगणना समाप्त होगी, अमेरिका की पूरी राजनीति नस्ल, अल्पसंख्यक, भाषा और अस्मिता के दायरे में सिमट जाएगी। हिस्पैनिक स्पेनिश भाषा बोलते हैं और अब पंद्रह प्रतिशत से ज्यादा आबादी घर में अंग्रेजी की जगह स्पैनिश बोलती है। मजबूरी में अब तो अमेरिकी सरकार को अपनी हर नीति और सूचना अंग्रेजी के अलावा स्पैनिश में भी जारी करनी पड़ रही है।पूरे चुनाव प्रचार के दौरान अमेरिकी आबादी में गोरी नस्ल के कम होते अनुपात को सारा पालिन ने अपने चिर-परिचित शैली में अभिव्यक्त किया. वे अपने पांच बच्चों की कतार लेकर जनता के सामने जाती थीं. अलास्का के गवर्नर पद पर रहते हुए भी उन्होंने इस वर्ष ही एक और संतान को जन्म दिया। उनकी एक पुत्री मात्र सत्रह वर्ष की आयु में ही बिना शादी के गर्भवती हो गई है। पालिन इस बात को समाज से छुपाना नहीं चाहती हैं, उलटे इसका गुणगान करती रहीं. संकेत साफ था कि गोरी नस्ल को ज्यादा से ज्यादा संतान पैदा करनी चाहिए। नस्ल और आबादी का यह संघर्ष इस चुनाव में ही सांकेतिक रूप में प्रचार पा सका है। नई मतगणना और जनगणना के बाद उसका और वीभत्स रूप उभरना अवश्यंभावी है।

अमेरिका में मूल निवासी और प्रवासी समूहों के बीच संघर्ष का हिंसक अतीत रहा है। जब उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में पूर्वी, मध्य और दक्षिण यूरोप से गोरी नस्ल के ही प्रवासी आकर बसने लगे तो पहले से बसी हुई उत्तर और पश्चिम यूरोप की आबादी ने पुरजोर विरोध शुरू किया। सन्-1882 में अमेरिकी कांग्रेस ने चीनियों के अमेरिका में आने पर पाबंदी लगा दी और 1924 के प्रवासी कानून में हर राष्ट्र के लिए कोटा नियमित कर दिया गया, ताकि गरीब यूरोपीय देशों के निवासी अमेरिका में ज्यादा न बस सकें। सन्-1965 में कोटा पद्धति खत्म हो गई। तदुपरांत लैटिन अमेरिका और एशिया से आकर बड़ी जनसंख्या बसने लगी। ऐसे तो वीसा पर अधिकतम सालाना संख्या नियमित की गई है, पर दक्षिण में दो हजार किलोमीटर खुली लंबी सीमा से अवैधानिक घुसपैठ जारी है, जिससे दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों से मोटी आबादी उलटे पलायन कर रही है। पश्चिमी तट में कैलिफोिर्नया से लेकर पूर्वी तट पर अवस्थित न्यूयॉर्क को जोड़ने वाली दक्षिणी वृत्ताकार रेखा की परिधि अल्पसंख्यक गैर श्वेत और बहुसंख्यक श्वेत जातियों के बीच नई विभाजन रेखा बन चुकी है।   

शनै:शनै: यह रेखा उत्तर की ओर खिसक रही है। गोरे लोग मध्य-पश्चिम (कोलोरेडो, व्योमिंग, इदाहो और मौंटेना) और उत्तर-पूर्व (कॉनेिक्टकट, मैन, मैसाचुएट्स, न्यू हैंपशायर और वर्मोंट) के राज्य में सिमटते जा रहे हैं। काली नस्ल की आबादी पूर्वी तट, दक्षिणी राज्य और मध्य-पश्चिम के मिशिगन एवं इलिनॉयस में केंद्रित होती जा रही है। वहीं दक्षिण अमेरिका और मेिक्सको से घुसपैठ कर रही हिस्पैनिक जाति कैलिफोिर्नया, टेक्सास, फ्लोरिडा और न्यू मैिक्सको में पूर्ण जनसंख्या वर्चस्व स्थापित कर चुकी है। यह विडंबना है कि अमेरिका ने मेिक्सको से टेक्सास, कैलीफोिर्नया और न्यू मैिक्सको 1840 के दशक में अपने नागरिकों को बसाने के बाद युद्ध में हड़पा था। इतिहास चक्र की यह नियति है कि मात्र डेढ़ सौ वर्ष की अवधि में वही अमेरिकी क्षेत्र पूर्णत: मेिक्सकोकृत हो चुका है।

इस विभाजन रेखा में कुछ और अलगाववादी कारण जुड़ते चले जा रहे हैं। अमेरिका में कैथोलिक ईसाई धर्म के विरुद्ध संघर्ष अकसर होता रहा है। अमेरिकी बुिद्धजीवी मानते हैं कि कैथोलिक धर्म का राजनीति पर दुष्प्रभाव पड़ता है और तानाशाही की प्रवृत्ति विकसित होती है। इससे अमेरिकी गणतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। सन 1830 और 1840 के दशक में कैथोलिक निवासियों के विरुद्ध दंगे हुए। सैकड़ों देसी संस्थान बनने लगे, जो यूरोप से आ रहे कैथोलिक प्रवासियों को अपना निशाना बनाते थे। आज अमेरिका की सांस्कृतिक धुरी आंग्ल-प्रोटेस्टेंटवाद है। ऐसे में बढ़ती हुई हिस्पैनिक आबादी उनके पहचान के संकट को और भी प्रभावित कर रही है।

गौरतलब है कि हिस्पैनिक रोमन कैथोलिक हैं और धार्मिक स्तर पर टकराव टाला नहीं जा सकता है। वहीं अमेरिका में इस्लाम धर्म के प्रति अश्वेतों में बढ़ते आकर्षण से प्रशासन असमंजस में है। ओबामा के विरुद्ध भी विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी ने यह प्रचार किया ही था कि उनके नाम के मध्य में मुस्लिम नाम विद्यमान है। माइकल जैक्सन इस्लाम धर्म अपनाने की घोषणा कर चुका है। वहीं करीब 15 लाख अफ्रीकी-अमेरिकी मुस्लिम बन चुके हैं। सन्-2002 में न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रॉबर्ट डैनिन की पुस्तक `ब्लैक पिलग्रिमेज टू इस्लाम´ से काफी सनसनी फैली थी। प्रशासन इस आकर्षण की काट में लग गया है। सूडान के दारफूर में अरब मुस्लिम और अफ्रीकी मुस्लिमों के बीच सन्-2003 से चल रहे संघर्ष को अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर ला खड़ा किया, ताकि अपने घर में भी अश्वेत अमेरिकी अरबी मूल के इस्लाम के विरोध में हो जाएं। हॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री मिआ फैरो 'सेव दारफूर कोलिशन' का नेतृत्व कर रही हैं। वहीं अमेरिका ने इस वर्ष ओलंपिक में सूडान से भागे लोपेज लोमोंग की अगुआई में राष्ट्रीय टीम को झंडोत्तोलन समारोह में भेजा। सामाजिक और धार्मिक धुव्रीकरण के अलावा अमेरिका में आर्थिक असमानता भी बढ़ती जा रही है।

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नीरज कुमार Arise Asia:Respond To White Peril(2002),Autopsy of Revolution(2006) के लेखक नीरज कुमार रक्षा और रणनीति के क्षेत्र में कार्यरत अकादमिक संस्था इड्सा IDSA, के एसोसिएट मेंबर हैं. इसके साथ ही वे अंग्रेजी की पत्रिका अदर साईड और हिन्दी पत्रिका दलित आदिवासी संवाद के संपादकीय सलाहकार मण्डल के सदस्य हैं. वे अमेरिका से अलग एशिया को नये विश्व ध्रुव बनाने की वकालत करते हैं क्योंकि वे इस दलील में पूरी संभावना देख रहे हैं.
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