ओबामा के बाद अमेरिका-२
वित्त बाजार के धराशायी होने के फलस्वरूप अमेरिका लंबी आर्थिक मंदी के दौर में प्रवेश कर चुका है। रोजगार में छंटनी होने लगी है। सरकार करीब दो खरब डॉलर के जमानत पैकेज की परिणति से अनभिज्ञ नहीं है. इससे महंगाई कई गुना बढ़ेगी. सस्ते दामों पर उपभोग की आदी अमेरिकी जनता की इच्छाओं की पूर्ति करना संभव नहीं होगा। सरकार कंगाली की ओर बढ़ चुकी है। जनकल्याण के लिए उसके पास फंड नहीं है। उधर दो-दो युद्ध, अमीर निवेशकों के लिए जमानत, ढह रही सार्वजनिक संपत्ति का रख-रखाव, विदेशी लेनदारों की कर्ज अदायगी वगैरह के बाद जनता के लिए महज िढंढोरे ही बचेंगे। संसाधन के अभाव में अलगाववाद और गुटबाजियां बढेंगी.
अमेरिका के नए आर्थिक आंकड़ें चौंकाने वाले हैं। अमेरिका की कुल आबादी का 12.5 प्रतिशत हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे जी रहा है। तकरीबन 20 फीसदी बच्चों को भरपेट खाना नसीब नहीं हो रहा है। स्कूल में छुट्टी घोषित होने पर ये बच्चे दुखी रहते हैं, चूंकि उन्हें भोजन बैंकों में भोजन के लिए धींगामुश्ती करनी पड़ती है। गरीबी का स्तर भी अलग-अलग नस्लों में असमान है। जहां गोरी जाति में मात्र 8.2 प्रतिशत गरीब हैं, वहीं यह आंकड़ा हिस्पैनिक और काली जाति के लिए क्रमश: 21.5 प्रतिशत और 24.5 प्रतिशत है। अल्पसंख्यक बहुल दक्षिण क्षेत्र में अपेक्षाकृत गरीबी ज्यादा है। डेट्रॉयट जैसे औद्योगिक शहर में तो उन्नति का नामोनिशान मिट चुका है। कल-कारखाने ठप पड़े हैं। शहर की तकरीबन 34 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। वहीं ब्लूमिंगटन शहर में 42 फीसदी जनसंख्या गरीब है। अलग-अलग जाति समूहों की प्रति व्यक्ति आय में भी काफी विषमता है। सरकार ने सभी नागरिकों के लिए मेडीकेयर के रूप में स्वास्थ्य बीमा लागू किया है, परंतु 34 प्रतिशत हिस्पैनिक और करीब 20 प्रतिशत अश्वेत इस बीमा से वंचित हैं। क्षेत्रीय और जातीय विषमता दोनों बढ़ रही हैं, ऐसे में अर्थव्यवस्था के पटरी से लड़खड़ाते ही आर्थिक संघर्ष उग्र हो सकता है।
अमेरिका में गैर श्वेतों के लिए रोजगार के अवसर भी कम हैं। वहां कुल रोजगार का मात्र एक फीसदी ही खेती, मत्स्यपालन और वन क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। विनिर्माण कार्य में मात्र दस फीसदी नौकरियां हैं, वहीं सेवा क्षेत्र में सत्तर फीसदी रोजगार हैं। सरकारी नौकरियों में तकरीबन 17 प्रतिशत रोजगार है। गैर श्वेत समुदायों में शिक्षा के अवसर गोरी जाति की तुलना में कम हैं, अत: मंदी का सबसे ज्यादा असर पहले से ही गरीब समुदायों पर ज्यादा होगा। सरकारी नौकरियां भी बढ़ाई नहीं जा सकती हैं, चूंकि वे यहां दुनिया के किसी भी समाजवादी या फासीवादी देश से अधिक हैं। ऐसे में उभरने वाले आक्रोश पर लगाम नई सरकार के लिए सबसे टेढ़ी खीर साबित होगी। अमेरिका में गैर श्वेत समुदाय की तरक्की भी बहुसंख्यक नापसंद करते हैं। ओक्लाहोमा के नॉर्थ तुलसा में ब्लैक वॉलस्ट्रीट के नाम से मशहूर अश्वेतों के प्रभुत्व वाले बाजार को मई-1921 में जला कर राख कर दिया गया था। उसके बाद से ही तमाम सरकारी कोशिशों के बावजूद अश्वेत समुदाय में उद्यमशीलता का अभाव रहा है।
ओबामा के बाद अमेरिका- आर्थिक समस्याएं
सरकारी आंकड़ें यह दर्शाते हैं कि अश्वेत समुदाय द्वारा नियंत्रित कंपनियों को सन्-2002 में मात्र 89 अरब डॉलर की आमदनी हुई। आर्थिक असमानता का ही नतीजा था कि अगस्त-2005 में जब कैटरीना तूफान ने खाड़ी तट पर अवस्थित न्यू ओरलिंयस में तबाही मचाई और शहर में पानी घुस गया, तो अश्वेत निवासियों के साथ-साथ अश्वेत पुलिस भी गोरे लोगों के घरों को लूटने लगी। हॉस्टन एरोड्रोम में जब बाढ़ पीिड़त लोगों को सुरक्षा और भोजन के लिए रखा गया, तब वहां भी जमकर लूटपाट हुई, गोलियां चलीं, महिलाओं की इज्जत लूटी गई और राजसत्ता कुछ दिन के लिए पूर्णत: नििष्क्रय हो गई। यह सब आने वाले घटनाक्रम का एक ट्रेलर मात्र है। आर्थिक बदहाली बढ़ने पर पूरे दक्षिणी अर्धवृत्ताकार क्षेत्र से गोरी जाति का पलायन हो शुरू जाएगा और वह क्षेत्र सत्ताशून्य हो सकता है। एक अनुमान है कि अगले दो वर्षों में 73 लाख अमेरिकी घर का कर्ज नहीं चुका पाएंगे। करीब 43 लाख बेघर किए जा सकते हैं, जिसमें ज्यादातर बिना आय स्रोत के गैर श्वेत और हिस्पैनिक हैं।
अमेरिकी सरकार दुनिया पर वर्चस्व कायम रखने के लिए जितनी हिंसा करती है, वह उसे अपने समाज में भी झेलना पड़ता है। अमेरिका की आबादी विश्व जनसंख्या का मात्र 4 प्रतिशत है, परंतु विश्व के एक चौथाई कैदी यहां की जेलों में सड़ रहे हैं। जून-2007 तक यहां कुल 23 लाख कैदी थे। औसतन एक लाख की आबादी में 509 व्यक्ति कोर्ट द्वारा मुजरिम घोषित हैं। यह आंकड़ा बर्मा, ईरान और चीन से कई गुना ज्यादा है। अमेरिकी प्रशासन ने अपने देश के अंदर ही नागरिकों के लिए कितने ही ग्वांटेनामो तैयार कर रखे हैं। वर्ष-2005 में 70 लाख नागरिक या तो जेल में थे या प्रोबेशन और पैरोल पर रिहा थे। इनमें ज्यादातर अश्वेत हैं। सन्-2007 में प्रति एक लाख अश्वेत युवकों में कुल 4618 युवक जेल में सजा भुगत रहे थे। श्वेत आबादी के लिए यह संख्या मात्र 773 है। ये अधिकतर किसी हिंसक घटना में दोषी पाए गए हैं। ज्यादातर हिंसा अश्वेत समुदाय के युवक श्वेत आबादी के विरुद्ध करते हैं। उधर ईराक युद्ध ने समाज को उग्र तो बनाया ही है। यह उग्रवाद कानून व्यवस्था के दायरे में नहीं समेटा जा सकता है। आर्थिक मंदी में श्वेत समुदाय के विरोध में हिंसा और भी बढ़ेगी, जिससे श्वेत अल्पसंख्यक क्षेत्र से पलायन करेंगे। आबादी के नस्लीय आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में केंद्रित होते ही अमेरिका का बिखराव शुरू हो जाएगा।
अमेरिका में दोषी अपराधियों को वोट देने का अधिकार नहीं है। इसलिए इस चुनाव से पहले भी 31 लाख व्यक्तियों से यह अधिकार वापस लिया गया है, जिसमें आधी जनसंख्या अश्वेत समुदाय के लोगों की है। फ्लोरिडा और अलबामा में पिछले चुनाव में तीस प्रतिशत अश्वेत युवकों को वोट देने के अधिकार से वंचित रखा गया था। अमेरिका कभी भी किसी समूह के लिए फादरलैंड या मदरलैंड की उपाधि से अलंकृत नहीं हुआ। 9/11 हमले के उपरांत होमलैंड सिक्यूरिटी एक्ट ने एक समान `राष्ट्रवाद´ की नींव डालने की पहली कोशिश की। विडंबना है कि जब से `होमलैंड´ शब्द का प्रयोग शुरू हुआ, अमेरिका अपने अस्तित्व पर नित नए संकट से जूझ रहा है। विश्व वर्चस्व, सम्मान और आर्थिक उन्नति ही अमेरिकी एकता के तीन मंत्र थे। आज सब उड़नछू हो गए हैं। इतालवी नाविक अमेरिगो वेस्पुसी द्वारा एक नग्न स्त्री के रूप में चित्रित इस भूभाग को जो नाम दिया गया था, आगे उसका भविष्य संकट में ही है। (समाप्त)
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