यहां लाचार है हर आम आदमी
मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार कह रही है कि उसने बहुत काम किया है. उसने क्या किया है उसके आंकड़े उसके पास छोड़ दीजिए लेकिन मध्य प्रदेश आज भी भूख से हो रही मौतों, पानी की किल्लत, बांधों की बढ़ती महामारी और उससे निकले विस्थापन जैसे मूलभूत सवालों में उलझा हुआ है. क्या सरकार बदल जाने से इन समस्याओं का समाधान हो जाएगा? या फिर यह सरकार दोबारा आ भी गयी तो क्या कर लेगी?
हाल में इंटनेशनल फूड पॉलिसी रीसर्च इंस्टीट्यूट ( आईएफपीआरआई) ने 88 देशों में अपने सर्वेक्षण के आधार पर `ग्लोबल हंगर इंडेक्स´ जारी किया है। भारत के 17 राज्यों में आईएफपीआरआई द्वारा किए गए सर्वेक्षण में सबसे अच्छा प्रदर्शन पंजाब का रहा। इसकी तुलना इंडेक्स में वियतनाम से की गई है और सबसे हौलनाक हालत मध्य प्रदेश की रही। जिसकी तुलना इंडेक्स में दक्षिण अफ्रीका के इथोपिया जैसी जगह से की गई है। राज्य के खंडवा, झाबुआ, सतना, खरगौन, शिवपुरी में भूख से मरने वालों की संख्या में प्रतिदिन इजाफा हो रहा है। सरकार कहती है- भूख की वजह से मध्य प्रदेश में मौतें नहीं हो रही है। इसकी वजह कोई खतरनाक बीमारी है। अब सरकार से जाकर कौन पूछे कि इस दुनिया में भूख से खतरनाक कौन सा रोग है? लेकिन जो खाए-पीए और अघाए लोग हैं, उन्हें इस बात का विश्वास दिलाना बहूत मुश्किल है। सीधी की शुभउआ कहती हैं-`सुना है राज्य सरकार द्वारा कुपोषण मुक्ति के लिए कई सारी योजनाएं चल रहीं हैं। लेकिन गांव में यह योजनाएं कहीं नजर नहीं आ रहीं हैं।´
इस महीने होने वाले चुनाव में विपक्षी पार्टियों के लिए राज्य के अंदर कुपोषण से हो रही मौतें एक बड़ा मुद्दा बन सकती हैं। इससे निपटने के लिए सरकार द्वारा 150 पोषण पुनर्वास केंद्र (Nutrition Rehabilitation Centre) चलाए जा रहे हैं। जिनमें 1700 बीस्तरों की व्यवस्था है। जबकि गैरसरकारी आंकड़ों की माने तो राज्य में कुपोषण बच्चों की संख्या 13 लाख को पार कर गई है। हो सकता है, यह सभी तथ्य आपको मध्य प्रदेश सरकार द्वारा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और टेलीविजन चैनलों के लिए जारी विज्ञापन के माध्यम से किए गए प्रदेश के विकास संबंधी झूठे दावों की याद दिला रहे हों। `सर एल्बर्ट हावर्ड मेमोरियल ट्रस्ट´ की निदेशक लोरी बेंजामीन होशंगाबाद के आदिवासी बहूल प्रखंड केसला में रहती हैं। वह शिवनी, सोहागपुर और केसला के आदिवासियों को शिक्षा, स्वास्थ और स्वच्छता के प्रति जागरूक करने का काम कर रहीं हैं। वह बताती हैं- इन प्रखंडों में आज भी बहूल से लोग चिकित्सा के अभाव में मलेरिया, टीबी, जॉडिन्स जैसे रोगों से मर रहे हैं। चिकित्सा की अच्छी व्यवस्था ना होने की वजह से यहां रोगियों के साथ चिकित्सकों का व्यवहार दोस्ताना नहीं है। बेंजामीन कुपोषण के संबंध में कहती हैं- `बच्चे का विकास मां के पेट से होना चाहिए। उसके बाद ही उसका सही विकास होगा।´
मध्य प्रदेश का जन-जीवन गांव, कृषि और किसान पर आधारित है। 55 वें नमूना सर्वेक्षण के अनुसार राज्य की 74 फीसदी आबादी गांव में रहती है। 84 फीसदी ग्रामीण पुरूष और 92 फीसदी ग्रामीण महिलाएं मध्य प्रदेश में कृषि कार्य में लगी हैं। माने राज्य की 71 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है। वर्ष 2001 में राज्य में प्रति व्यक्ति निश्चित घरेलू उत्पाद 10,803 रूपए रहा। वहीं पंजाब में यह 25,048, हरियाणा में 23,742 रहा। राज्य में आधिकारिक रूप में गरीबी रेखा के नीचे वर्ष 1999-00 में 37.1 फीसदी लोग थे। जो 27 फीसदी के राष्ट्रीय आंकड़े की तुलना में बहुत अधिक है। राज्य में 16 फीसदी आबादी आदिवासियों की है। जिनके 74 फीसदी बच्चों का वजन औसत वजन से कम है। जिसके लिए आदिवासी क्षेत्र में व्याप्त कुपोषण को जिम्मेदार माना जा सकता है।
राज्य का आदिवासी समाज व्यवस्था के हाथों सबसे अधिक छला गया तबका है। यह तबका बड़ी संख्या में भूमिहीन है। आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन का मुद्दा लंबे समय से मध्यप्रदेश में उठ रहा है लेकिन उसका अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सका है। यहां का आदिवासी समाज अपने पुश्तैनी जमीन पर बसा है। यह अपने जीवन यापन के लिए खेती करते हैं और जंगली उत्पादों पर निर्भर रहते हैं। इसके बाद, अब तक यह लोग कानूनी तौर पर अपने जमीन के मालिक नहीं हैं। किसी भी समय सरकार विकास के नाम पर इन्हें जंगल से बेदखल कर सकती है। इनके भूमि अधिकार के लिए कुछ आदिवासी संगठन सेंधवा, अलीराजपुर, बड़वानी, खंडवा, बुरहानपुर, देवास बैतुल जैसे जिलों में सक्रिया हैं। नर्मदा नदी पर बने बांधों की वजह से विस्थापित हुए लोगों की पीड़ा भी यहां उल्लेखनीय है। महाराष्ट्र और गुजरात से भी होकर बहनेवाली इस नदी का बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश से होकर गुजरता है। लगभग 1300 किलोमीटर में बहने वाली नर्मदा नदी का 1072 किलोमीटर हिस्सा मध्य प्रदेश में है। इस पर और इसकी सहायक नदियों पर 30 बड़े, 350 मध्यम और 3000 छोटे बांध बनने हैं। इसकी वजह से आने वाले समय में नर्मदा मानव नीर्मित छोटी-छोटी झीलों में तब्दील होने वाली है। बताया जा रहा है, विस्थापित हुए लोगों के पुनर्वास के लिए सरकार के पास जमीन नहीं है।
स्वतंत्र पत्रकार विनीत तिवारी के अनुसार `मध्यप्रदेश में रियल वाले बेहद सक्रिय हैं। सरकार राज्य में जो एसईजेड की योजना बना रही है, इसमें आम आदमी के हाथों तो विस्थापन ही आएगा। इसका फायदा रियल स्टेट वालों को मिलेगा।´ `राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना´ के क्रियान्वयन से राज्य सरकार खुश है। जबकि इस संबंध मं पुख्ता काम कागजों पर ही हुआ है। आधिकारिक तौर पर 18 जिलों में 44 लाख जॉब कार्ड का वितरण हुआ है। जबकि विभिन्न जिलों में काम करने वाले जन संगठनों और गैर सरकारी संगठनों के अनुभव कुछ और ही कहानी बयान करते हैं। गांव में एनआरईजीए के नाम पर जमकर नियम और शर्तों की धज्जी उड़ाई गई है। 100 दिनों के रोजगार नियम का यदि ठीक-ठीक तरह से पालन होता तो राज्य की बहुत सारे संकटों का हल हो जाता। इसके बाद यदि बात करें राज्य में शिक्षा व्यवस्था की तो जुलाई-अक्टूबर 2005 में एमएचआरडी द्वारा कराए गए सर्वेक्षण कहते हैं कि लगभग 10.85 लाख ऐसे बच्चे, जिन्हें स्कूल में होना चाहिए, वे स्कूल से बाहर हैं। इसमें 70 फीसदी बच्चों ने कभी स्कूल का चेहरा देखा ही नहीं है। मध्य प्रदेश की गिनती वर्श 2000 से पहले बीमारू प्रदेश के रूप में ही होती थी। आज फिर इसको उसी श्रेणी में देखकर अदम गोंडवी याद आते हैं-`जनता के पास एक ही चारा है बगावत, यह बात कह रहा हूं, मैं होशो हवास में।´
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चिट्ठों में सब ठीक है,अन्दर फ़टेहाल.
अन्दर फ़टेहाल,सभी गाँवों की हालत.
शहर बन रहे तेजी से पश्चिम के पालित.
कह साधक कवि,बनती कैंसर-गाँठ इन्डिया.
भारत है बेहाल, पनपा जबसे इन्डिया.
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