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गल्ली के नेता दिल्ली का नेतृत्व

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हाल में ही लालकृष्ण आडवाणी ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह प्रस्ताव दिया कि वे देश के सामने टीवी पर सीधी बहस में शामिल हों. आडवाणी का यह प्रस्ताव उनकी इस पीड़ा से पैदा होता है जिसका समर्थक कई दक्षिणपंथी दलों सालों से करते आ रहे हैं. वे कहते हैं कि भारत में बहुदलीय शासन प्रणाली की जगह द्विदलीय शासन प्रणाली लागू होनी चाहिए. यानी भारत को भी अमेरिका की तर्ज पर संसदीय गणतंत्र की बजाय राष्ट्रपति प्रणाली कायम करनी चाहिए जहां कोई दल नहीं बल्कि नेता देश का प्रतिनिधित्व करता है.

जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए तब चर्चा चली कि भारत का बराक ओबामा कब चुना जायेगा . मेरा मानना है कि 'कभी भी नहीं'. ऐसा इसलिए कि भारत और अमेरिका में दो अलग अलग लोकतान्त्रिक प्रणालियाँ हैं. अमेरिका में पूरा देश एक साथ अपना मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) यानी प्रेजिडेंट चुनता है, जबकि भारत में स्थानीय प्रतिनिधि चुने जाते हैं जो कि फिर केंद्र में सामूहिक नेत्रित्व तय करते हैं .शायद आशय था कि दलित नेतृत्व सत्ता के सबसे ऊंचे ओहदे पर कब पहुंचेगा. हम इस से ज्यादा सोच ही नहीं पा रहे.ए क आकलन यह भी था कि भारत के किसी चुनाव में, जहाँ सिर्फ समस्त जनहित की, मुद्दों की ही बात पर ही कोई चुनाव लड़े तो , ऐसे बराक ओबमाओं की ज़मानत जब्त  हो जायेगी . यहाँ तो सिर्फ तिकड़म की राजनीती ही सफल हो सकती है .

जाति, धर्म, प्रदेश, भाषा अदि न जाने कितने मुद्दे होते हैं असली, बाकी तो सिर्फ चुनाव घोषणा पत्र होता है जिसकी औकात पश्चिम में निवृत्ति के बाद उपयोग किये जाने वाले कागज़ से भी गयी बीती है. चिंता यह भी प्रकट की गयी कि अमेरिका में नेतृत्व युवा है, इंग्लैंड फ्रांस में भी, भारत में बूढा है. सब बातें सही हैं और चिंताजनक भी, पर हल क्या है और क्या किसी इलाज की जरूरत है? क्या इतना भी सोचने की जरूरत नहीं कि कैसे अमेरिका में कोई बराक ओबामा , अल्पसंख्यक हो कर भी ,संसाधनों में कमी के बावजूद भी, अभी तक के आकलन के हिसाब से रंगभेद पर आधारित बहुसंख्यक गोरे अमेरिकी की सोच की वास्तविकता के बावजूद भी, सिर्फ मुद्दों पर, कैसे राष्ट्रपति की कुर्सी पा लेता है? विरोधियों द्वारा समय समय पे किये गए नस्लवादी आतंरिक धारा को  सुलगाने के प्रयासों के बावजूद .

पहली बात तो भारत की इन सब देशों में सिर्फ इंग्लैंड से तुलना की जा सकती है. वहीं पर संसदीय गणतंत्र है .बाकी दोनों में राष्ट्रपतीय प्रणाली है .वह भी थोड़ी अलग अलग ही तरह की. भारत के सन्दर्भ में प्रणाली 'संसदीय' हो या 'अध्यक्षीय ' यह बहस  कभी भी गंभीरता से नहीं हुई. आजादी के बाद संविधान सभा में  भी  हुयी तो छुट पुट.दर असल इंग्लैंड का उपनिवेश होने और सभी नेत्रित्व इंग्लैंड  में ही दिक्षित होने के कारन हम 'संसदीय' व्यवस्था के  अलावा शायद कुछ और सोचने में ही असमर्थ थे . उसके पहले इसी व्यवस्था के ही तहत करीब दस साल पहले प्रांतीय असेम्बलियां और फिर केन्द्रीय शासन भी की शुरुआत इसी के अंतर्गत ही हुयी थी. पिछली बार, याद आता है कि राष्ट्रपति बनने  पर, माननीय डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम ने यह चर्चा की. राष्ट्रपति प्रणाली को भारत के लिए ज्यादा सही और उपयोगी बताया. सारांश यह था कि संसदीय लोकतंत्र इंग्लैंड जैसे छोटे एक टापू में सिमटे देश के लिए तो सही होगा पर भारत जैसे विराट महादेश के लिए नहीं. भारत को अमेरिका और फ्रांस जैसे राष्ट्रपति प्रणाली अपनानी चाहिए. जहाँ स्थानीय प्रतिनिधित्व द्वारा केंद्र में सामूहिक नेतृत्व चुनने की बजाय, पूरे देश कों अपना एक नेता सीधे मतदान द्वारा चुनने का मौका हो. येही पूरे देश को ज्यादा एकजुट बनाएगा.

उन्होंने मधुमक्खी के छत्ते में ढेला मार दिया. सभी नेता और सब से बढ़ लोकल नेता और प्रादेशिक, क्षेत्रीय पार्टियों ने कुहराम मचा दिया . कुछ ने तो यहाँ तक कह डाला कि उनकी महत्वाकांछा बढ़ गयी है और वे राष्ट्र नेता बन जाने की फिराक में हैं. इन 'नेताओं' का डर सही ही था. बांटो और राज करो जितना ही बड़ा सच यह है कि छोटे से छोटे में बँट जाओ और उसी में जितना बड़ा हो सके राज्य स्थापित करो, और राज करो. क्योंकि इनमे से अधिकांश में अखिल भारतीय होने का माद्दा ही नहीं था न है. सिर्फ छत्रप बन जाओ और केंद्रीय सत्ता से या किसी भी गंठजोड़ से अपनी लोकल सत्ता बनाये रखो और अपने पाँव राजनीति में टिकाये रखो. और बिना किसी व्यय या रिस्क के सबसे दुधारू  गाय कों दुहते रहो. इनमे कुछ की राष्ट्रिय आकांक्षा भले हो, किसी में राष्ट्रीय आकांछा के लिए न योग्यता है न आधार, समग्र राष्ट्र के रूप में तो इनका सोचना ही वर्जित है. हाँ अवसरीय चमत्कार से जन्मे देवगौड़ाओ का भाग्य और ज्योतिष पर श्रद्धा जरूर दीखती है. हर लल्लू और हर देवी ,भाग्य के छींके के फूटने के इंतजार में है. पूरी राजनीति स्थानीय बन गयी है. एक मित्र ने विमर्श में कहा कि "जब सिस्टम ऐसा होगा कि चुनाव गलियों तक ही सिमित होगा तो कुत्तों के चुने जाने के अवसर ज्यादा होंगे और गली के कुत्तों में से ही दिल्ली का भी कुत्ता चुना जायेगा." राजनीति के  भारतीय स्तर पर यह टिप्पणी काफी कुछ कह जाती है और लगने वाली बात भी है .

यह स्वीकार करने में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है कि अमेरिका, यूरोप और भारत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक ही नहीं आर्थिक ताने बाने में भी इतनी विभिन्नता है कि इनकी तुलना करना असंभव है.वे तुलनाएं बेमतलब भी हैं और गैरजरूरी भी. और विनम्रता से कहूं तो मैं ऐसा कोई प्रयास भी नहीं कर रहा हूँ .लेकिन एकध्रुवीय बनती जा रही दुनिया में लोकतान्त्रिक और प्रशासनिक ढांचा जो भारत के लिए जरूरी है, उसमे संसदीय लोकतंत्र विफल ही रहा है और विफल ही होता जा रहा है और सब से बड़ी विफलता लगातार कमजोर होते जा रहे केंद्र और उस के कमजोर ही होते जा रहे नेत्रित्व में देखी जा सकती है .आजादी के संघर्ष से उपजे उसके बाद का नेत्रित्व अलग था .तबके सत्ता संघर्ष का चरित्र भी अलग था इसलिए अभी तक संसदीय व्यवस्था की खामियां उजागर नहीं हुईं. लेकिन भारत जैसे महादेश के लिए और महादेश बनने का स्वप्न देखने के लिए इसे कुडेदानी में ही डालना होगा.

सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया के किसी भी देश के इतिहास को देखें तो कमजोर केन्द्रीय सत्ता और नेतृत्व में ही बिखराव, हार, अव्यवस्था और अराजकता और पतन के बीज छुपे मिल जायेंगे. यहाँ तक कि अमेरिका भी इंग्लैंड के खिलाफ  एकजुट हो आजादी की खूनी जंग जीतने के बाद भी मज़बूत केन्द्रीय सत्ता बनने तक घोर अराजकता का शिकार रहा .उसी अरसे में नेपोलियन ने उस नए आजाद देश पर ही कब्ज़ा कर लेने की सोच ली थी पर अमेरिका के सौभाग्य से हैयिती के गुलामों ने बगावत कर दी और अमेरिका इंग्लैंड के बाद फ्रांस का गुलाम होने से बच गया. यहाँ तक की अमेरिका में बेहद खूनी गृह युद्ध के बाद ही मज़बूत केन्द्रीय सत्ता आयी और उसके बाद ही, एक शक्ति बनकर अमेरिका उभरा .भारत के सन्दर्भ में तो यह बात न जाने कितनी बार साबित हो चुकी है.ज्यादा नहीं तो पिछले एक हजार साल का इतिहास इसी का गवाह है. जब भी केंद्र कमजोर हुआ बाहरी आक्रमण हुए. देश गुलाम हुआ या तो आंतरिक अराजकता उस गुलामी से भी बदतर रही .

भारत एक संघ राज्य राष्ट्र है .कागज़ पर जो भी हो,क्या संघ मज़बूत हो रहा है? या राज्यों की तथाकथित मजबूती क्षेत्रीयता और स्थानीय छत्रपों की ही मजबूती नहीं बनती जा रही है .वह भी कमजोर केंद्र की शर्त पर? क्या भारत की कोई भी पार्टी अखिल भारतीय है? और किसी भी पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र है? जो लोकतंत्र की पहली शर्त है! नहीं है तो फिर पार्टी की अवधारणा ही क्या है? संविधान सम्मत है? चुनाव आयोग की कसौटी पर इसको नहीं कसा जाना चाहिए? बहु पार्टी प्रणाली की संसदीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर यह सवाल भारी है. और भारत के सन्दर्भ में दूर दूर तक ऐसे किसी भी प्रश्न का जबाब नहीं है, समाधान तो दूर की बात है. इस पर गंभीर सवाल उठे हैं कभी? कम से कम बौद्धिक समुदाय के स्तर से आगे? वह भी यदा कदा ही. बुद्धिजीवियों की भूमिका तो और भी हास्यास्पद है. तथाकथित बुद्धिजीवी भी, तीसरा खम्भा भी, सत्ता के ही खेमों में  बिखरे चारे की जुगाड़ में हैं. यह सच्चाई बताने की जरूरत नहीं है कि भाजपा और कॉमुनिस्ट पार्टियों और जनता दल (यु ) को छोड़ करीब करीब सभी पार्टियाँ, व्यक्ति और परिवार की ही पार्टियाँ हैं. जेबी पार्टियाँ. सत्ता से धन और धन से सत्ता बनाये रखने की पार्टियाँ. बाहुबलियों का योगदान लेने देने और पालने पोसने का भी इन्तेजाम ही नहीं भागीदारी भी रोजमर्रा की चीज है. इसलिए अगर मजबूत भारत का सपना देखना हो तो भारत को, पूरे भारत को, एक नेता, एकसाथ चुनना होगा. वह भी अनंत काल के लिए नहीं सिर्फ निश्चित अवधि के लिए वर्ना अपनी लाश ढोते बूढे ही कुर्सियों से चिपके मिलेंगे.गल्ली के नेता दिल्ली का नेत्रित्व हथियाने पर अखिल भारतीय जोकर बन जाने की संभावनाओं से भरपूर हैं पर यह तमाशा देश की ही शर्त पर देखा जा सकता.

यह चुनाव जो भी हों परिणामों का अंदाजा चाहे जो भी लगे पर एक बात तय है. मतदाता बाध्य है करीब करीब जाति, धर्म, कुनबा, परिवार, प्रांतीयता, भाषा वगैरह मुद्दों पे सिमट जाने के लिए और वही करेगा भी. और अरसे से यही हो भी रहा है.चुनाव भारत के लिए होकर भी चरित्र में 'लोकल' ही रह गया है . नेता भी अब करीब करीब सब लोकल ही हैं. मुद्दे तो और भी लोकल. तो चुनाव में यह देश भारत कहाँ है? होकर भी नहीं है और है भी तो सिर्फ नाम की खातिर .मैं कल्पना करता हूँ कि अगर यही पूरे देश का नेता चुनने का मौका हर वोटर को होता तो मुद्दे कम से कम ये नहीं होते .शायद तब देश के बारे में ही सोचा जाता और हर नागरिक शायद उस से कम सोचने की मानसिकता न दिखाता.

(भारतीय और अमेरिकी राजनीतिक को नजदीक से देखनेवाले राजकुमार सिंह स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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anup on 04 April, 2009 11:29;27
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bahut badiya likhaa hai aap ne....
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