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कांग्रेस का राहुल उदयः कितना सच, कितना झूठ

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16 मई को अभी चुनाव परिणाम आने शुरू भी नहीं हुए थे. सिर्फ रूझान आ रहे थे जो यह बता रहे थे कि कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए बड़ा उलटफेर करने जा रही है. सुबह के ग्यारह बजे तक जो रुझान आ रहे थे वे बता रहे थे कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर रही है. लेकिन रुझान आते ही कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि कांग्रेस ने जो सफलता अर्जित की है वह राहुल गांधी जी की कड़ी मेहनत का परिणाम है. इसके थोड़ी देर बार अंबिका सोनी का बयान आया कि राहुल गांधी जी को इस भारी जीत का सारा श्रेय देना चाहिए और पुरस्कार भी.

फिर तो जैसे राहुलगान गाने का तांता लग गया. कांग्रेस के नेताओं को छोड़िए. मीडिया ने यह काम अपने हाथ में ले लिया. इस गान में सबसे पहले कोरस मिलाया राजदीप सरदेसाई के चैनल ने फिर उसके बाद टाईम्स नाऊ भी इसी में शामिल हो गया. फिर देखा-देखी हिन्दी के चैनलों ने भी राहुल गान की तान छेड़ दी. पूरे दिन राहुल गांधी को कांग्रेस की जीत का श्रेय दिया जाता रहा. अगले दिन देश के हर अखबार ने यही काम किया. पंद्रहवीं लोकसभा का चुनाव परिणामों में कांग्रेस की सफलता राहुल गांधी को समर्पित हो गयी. पिछले दो-तीन महीने से राहुल गांधी के लिए जो मीडिया मैनेजमेन्ट चल रहा था उसका क्लाईमेक्स बहुत शानदार तरीके से हुआ. राहुल गांधी को मनमोहन सिंह ने भी मंत्री बनने के लिए आफर किया जिसे राहुल गांधी ने बड़ी शालीनता से अस्वीकार कर संगठन के काम में ही रमने का इरादा जताया. फिर भी प्रयास जारी है कि वे बिना विभाग के ही मंत्री बन जाएं. आगे वे क्या करेंगे मालूम नहीं लेकिन राहुल इफेक्ट को परिभाषित करते हुए कांग्रेस और मीडिया दोनों ही तीन राज्यों में कांग्रेस के उत्थान का तर्क दे रहे हैं.

उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान ऐसे तीन राज्य हैं जिसके बारे में कहा जा रहा है कि सिर्फ राहुल जी की "दूरदर्शी नीतियों" के कारण इन राज्यों में कांग्रेस को सफलता मिली है. फिलहाल हम यह सवाल नहीं करते हैं कि अगर ऐसा है तो फिर देश के शेष राज्यों में राहुल जी की दूरदर्शी नीतियां क्यों नहीं अपनाई गयी? लेकिन इतना जरूर पूछते हैं कि महाराष्ट्र के जिस कलावती का जिक्र उन्होंने संसद के अपने भाषण में किया था उस कलावती के गांव जालका ने शिवसेना के आनंदराव अडसुल कों क्यों जितवा दिया? अगर राहुल गांधी का करिश्मा ही है तो कम से कम अमरावती सीट जरूर कांग्रेस के खाते में जानी चाहिए थी क्योंकि अमरावती की कलावती को राहुल गांधी ने रातों-रात देशभर में चर्चित कर दिया था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. राहुल गांधी के प्रशिक्षण में लगे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने बहुत सोच समझकर राहुल गांधी को वहां-वहां पहुंचाया जहां दुख और तकलीफ है. इसी कड़ी में वे विदर्भ भी गये थे. बार-बार गये थे. लेकिन विदर्भ ने उनका साथ क्यों नहीं दिया? इस  सवाल को यहीं छोड़ आगे बढ़ते हैं.

उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार में राहुल गांधी ने ऐसा क्या कमाल किया है? राहुल गांधी के प्रशिक्षक विदर्भ के अलावा उनको उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड इलाके में भी लेकर गये थे. अगर कांग्रेस की जीत में राहुल की जनवादी और मर्मस्पर्शी नीतियां होती तो कम से कम हमीरपुर और बांदा की सीट कांग्रेस को जीतनी चाहिए थी. लेकिन इन दोनों सीटों में एक बसपा के खाते में गयी है और दूसरी सपा के खाते में. यहां राहुल गांधी का जादू क्यों नहीं चला? जबकि दलित के घर जाने से लेकर कड़ी धूप में विचरण करने तक सारे काम उन्होंने यहां किये थे. उत्तर प्रदेश में जहां-जहां कांग्रेस के उम्मीदवार विजयी हुए हैं उन सीटों को ही देख लीजिए. मोरादाबाद की सीट अजहरूद्दीन ने जीती है. खीरी जफर अली नकवी ने जीती है. इसी तरह धौरहरा से जतिन प्रसाद, उन्नाव से अन्नू टंडन, कानपुर से श्रीप्रकाश जायसवाल, अकबरपुर से राजाराम पाल, झांसी से प्रदीप कुमार जैन, बाराबंकी से पीएल पुनिया, फैजाबाद से निर्मल खत्री बहराईच से कमल किशोर, गोण्डा से बेनी प्रसाद वर्मा, डुमरियागंज से जगदम्बिका पाल चुनाव जीते हैं. इन सीटों का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि कांग्रेस ने ये सीटें समीकरण और उम्मीदवारों के कारण जीती हैं न कि राहुल गांधी के प्रभाव के कारण. इनमें अधिकांश सीटें मुस्लिम मतदाता बहुल हैं और इस बार सपा से छिटकर उत्तर प्रदेश के मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट किया है. रायबरेली, अमेठी, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर सीटों का जिक्र इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योकि ये चार सीटें तो कांग्रेस को जीतनी ही थी. इनमें से एक पर सोनिया गांधी चुनाव लड़ रही थी, दूसरे पर खुद राहुल गांधी, तीसरे पर दिनेश सिंह की बेटी राजकुमारी रत्ना सिंह और चौथे पर डॉ संजय सिंह. इन सीटों पर प्रियंका का सीधा प्रभाव था, और ये चारों सीटे आस-पास हैं. इसलिए यहां की जीत का श्रेय भी राहुल गांधी के खाते में नहीं जाता है.

अगर कांग्रेस की इस जीत को राहुल गांधी का करिश्मा मान भी लें तो यह करिश्मा बिहार में क्यों नहीं दोहराया गया? उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के वोट शेयर में 6 प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है. उसे कुल 12 प्रतिशत वोट और 21 सीटें हासिल हुई हैं. लेकिन बिहार में भी उसको कम वोट नहीं मिले हैं. बिहार में उसके मत में 4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है और इस बार उसे बिहार में कुल मतदान का 10 प्रतिशत वोट शेयर हासिल हुआ है. फिर बिहार में उसे केवल दो सीटें ही क्यों मिली और पिछली बार की तुलना में उसे एक सीट का नुकसान हो गया. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पक्ष में हुई जीत को आंकड़ों के ही लिहाज से देखेंगे तो जीत के कारण साफ होने लगते हैं. उत्तर प्रदेश में सपा के वोट शेयर में कमी दर्ज की गयी है. 2004 में 26.74 प्रतिशत वोटों की तुलना में इस बार उसे 23.26 फीसदी वोट मिले हैं. इसी तरह भाजपा के मत प्रतिशत में भी कमी आयी है. पिछले चुनाव में 22.17 प्रतिशत की तुलना में उसे 17.50 प्रतिशत वोट मिले हैं. हालांकि बसपा को पिछले चुनाव की तुलना में अधिक वोट मिले हैं. राज्य में उसे पिछली बार 24.67 फीसदी वोट मिला था जबकि इस बार 27.42 फीसदी वोट मिला है. अन्य के मत प्रतिशत में एक प्रतिशत का उतार है. साफ है कांग्रेस को सपा और भाजपा के परंपरागत वोटबैंक का हिस्सा मिला है. सपा का परंपरागत वोट बैंक मुस्लिम कल्याण सिंह के साथ आने से सपा से अलग हुआ है और भाजपा का परंपरागत वोटर जो कांग्रेस से छिटकर भाजपा के साथ आया उसने दोबारा कांग्रेस का साथ दिया है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मत प्रतिशत में बढ़ोत्तरी और जीत के यही दो कारण हैं.

अगर मायावती के मत प्रतिशत में कमी आती तो समझा जा सकता था कि यह राहुल गांधी का कमाल है क्योंकि मायावती भी आरोप लगाती रही हैं कि दलित के घर खाना खाने से कोई दलित का दुख-दर्द नहीं बांट लेता. साफ है, उन्हें इस बात का खतरा था कि राहुल गांधी उनके परंपरागत वोट में सेंधमारी कर सकते हैं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मायावती के वोट शेयर में बढ़ोत्तरी हुई है. नुकसान सिर्फ सपा और भाजपा को हुआ है. सपा को नुकसान के पीछे का एकमात्र कारण कल्याण सिंह हैं. कल्याण सिंह के ही कारण मुसलमान वोटर सपा से दूर हुआ जबकि उम्मीदों पर खरा न उतर पाने के कारण इस बार कांग्रेस के पुराने वोटर भाजपा को छोड़ कांग्रेस के साथ चले गये. फिर भी इस मत प्रतिशत से ज्यादा सीटों का समीकरण कांग्रेस की जीत के लिए ज्यादा जिम्मेदार है. मसलन उन्नाव से चुनाव लड़ रही अन्नू टंडन के पति रिलांयस के बड़े ओहदेदार हैं और खुद मुकेश अंबानी की नजर इस सीट पर लगी हुई थी. सलमान खान सबसे पहले इसी सीट पर अन्नु टंडन का प्रचार करने आये थे तो उनका यहां आना अनायास नहीं था. इसी तरह राजस्थान में सारा कमाल जादूगर कहे जाने वाले अशोक गहलोत का है. लेकिन कांग्रेस को मिली सफलता का एक और बड़ा कारण यहां 6 विधायकों का ऐन चुनाव से पहले कांग्रेस में शामिल होना भी है. बसपा जो कांग्रेस का वोट काट सकती थी उसका भी वोट कांग्रेस के खाते में आ गया.

यही तीन राज्य हैं जिसमें जीत को राहुल गांधी की "कड़ी मेहनत" का नतीजा बताया जा रहा हैं और उनकी कड़ी मेहनत को पलकों से बुहार लगायी जा रही है. अब आप ही बताइये, कांग्रेस की इस जीत में राहुल गांधी का योगदान कहां है, जिसे हमारा मीडिया बार-बार कांग्रेस के प्रवक्ता की तरह बखान कर रहा है?

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Gaurav Srivastava on 20 May, 2009 10:43;33
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सर , मीडिया की तो बात ही नहीं कीजिये , यह अपनी विस्वसनीयता खो चूका है . राजदीप सरदेसाई को सी एन एन आई बी एन का नाम बदल कर कांग्रेस आई बी एन रख लेना चाहिए .
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Arjun Sharma on 20 May, 2009 11:42;17
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aapke tarak achook hain.badhayi
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tulsisinghbisht@gmail.com on 20 May, 2009 12:24;43
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संजय जी लेख आपने पूरे दिल से लिखा है और खूब जांच पड़ताल के बाद आपने जो खुलासा किया है वो बिल्कुल ठीक लिखा है कि राहुल गांधी जहां से जुड़े वहां कोई भी सीट कांग्रेस नहीं जीत पाई। जहां तक इस जीत की बात है वो केवल इतना है कि आम आदमी अब कई पार्टियों से थक चुकी है। अब उनको भी मालूम हो चुका है कि कई तरह की पार्टियां बनने से देश का कल्याण नहीं हो सकता। इसलिए आम आदमी ने केवल दो तरफा वोट किए या भाजपा या कांग्रेस बाकी सब पार्टियों को धिक्कार दिया।
रही बात राहुल गांधी की जय करने वालों की। तो आज का समाज आधुनिक चाहत में भौतिक वस्तुओं को काफी चाहता है अथाZत् व्यापार का उद्देश्य किसी का कल्याण करना नहीं बल्कि अपना कल्याण करना। बात स्पष्ट है कि अगर कोई व्यक्ति डॉक्टर बनने के लिए 25-30 लाख रुपए खर्च करता है और फिर उससे अपेक्षा की जाए कि वो समाज का कल्याण करें, तो गलत ही होगा। अथाZत् सब जगह व्यावसायिक कारण हो गया है। आजकल के जितने भी मीडिया चैनल है उनका भी यह काम है कैसे दर्शकों को बढ़ाया जाए और कैसे अपनी टी आर पी बढ़ाई जाए। आज वही हो रहा है। ख्ौर लेख के लिए आपको साधुवाद धन्यवाद।
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अंकुर गुप्ता on 20 May, 2009 14:59;03
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बहुत बढिया लेख. आंखे खोल के रख दी आपने. बधाई.
एक बात और क्लियर कीजिये (किसी और लेख में). चुनाव के दौरान लगभग आधे लोगों ने मतदान नही किया. मीडिया इन्हे मिडिल क्लास नौकरीपेशा बता रहा था जो आरामपसंद होते हैं और घर के बाहर धूप में नही निकलते मतदान के लिये. दूसरा ये भी कहा गया कि अब लोगों की मतदान से रुचि घट रही है. यानि कि इनमें से ज्यादातर लोग युवा रहे होंगे.अब बचे आधे लोग. चुनाव के बाद मीडिया बता रहा है कि युवाओं ने देश को युवा नेता दिये. युवा शक्ति, ये वो.. और दुनिया भर का तीन तूफ़ान.
बचे आधे लोगों में अन्य उम्र के लोग भी तो होंगे. यानि बहुत ज्यादा युवा लोग तो ना रहे होंगे. (मेरा ये आकलन है.) ये बात मैं मानता हूं कि ज्यादातर मतदाता युवा हैं पर कुल मतदान करने वाले लोगों में से कितने लोग युवा हैं इसके बारे में कोई आंकड़ा नही है. फ़िर ये कैसे कहा जा सकता है कि चुनाव नतीजे युवा निर्धारित करते हैं?
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कुलदीप on 20 May, 2009 15:39;33
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आपकी बात सौ टके सही है, मीडिया मैनेजमेंट के जरिए राहुल को देष पर थोपा जा रहा है। यदि राजस्थान की ही बात करें तो वहां न तो राहुल की वजह से कांग्रेस का उत्थान हुआ है, न ही अषोक गहलोत ने कोई चमत्कार किया है। वहां भारतीय जनता पार्टी की ऐसी दुर्गति होने का एकमात्र कारण भैरोसिंह शेखावत का इन चुनावों से ठीक पहले लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताए जाने पर आपत्ति प्रकट करने के साथ वसुंधरा राजे के शासनकाल में हुए भ्रष्टाचार के मुद्दे को सार्वजनिक किया जाना रहा है। भाजपा की अंदरूनी खींचतान ने भी कांग्रेस को राजस्थान में अधिक सीटें दिलाई हैं।
राजस्थान के बारां जिले के एक आदिवासी गांव में राहुल का रात गुजारना और दिन भर तगारी से मिट्टी फैंकना भी यहां कांग्रेस के किसी काम नहीं आया, क्योंकि इस सीट से वसुंधरा पुत्र दुष्यंत ने अपनी जीत दर्ज की है। अब इंदिरा गांधी के पोते को फिर से शासन पाने के लिए इतने खटकरम तो करने ही पड़ेंगे। एक खास बात और यह भी है कि मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने से कमोबेष पूरे देष के सिखों ने कांग्रेस के पक्ष में एकतरफा मतदान किया है।
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नमन on 20 May, 2009 23:41;29
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कुलदीप जी में आपकी बात को काट नहीं रहा हूं सिर्फ उसमें कुछ जोडना चाहता हूं आपने सही कहा कि राजस्थान में भाजपा की कलह कांग्रेस की जीत का आधार बनी है और राहुल गांधी ने राजस्थान में कुछ अधिक संगठनात्मक काम भी नही किऐ है नरेगा में मिटटी डालना और गरीब के घर रात गुजारना ही एक यादगार पहल मानी जा सकती है लेकिन इस सच को भी स्वीकारना पडेगा कि राहुल ने जिन चार प्रत्याशियों के पक्ष में रैली की वो सभी जीत गऐ जबकि चारों के सामने मुश्किलें पहाड जैसी दिखाई पड रही थी।सचिन पायलट के लिए अजमेर नया क्षेत्र था तो प्रदेश अध्यक्ष सी पी जोशी विधानसभा का चुनाव हारे होने के साथ क्षेत्र के लिए नऐ थे ।अलवर से भंवर जितेन्द्र के लिए भी लोकसभा का पहला चुनाव था तो गिरिजा व्यास प्रदेश की राजनीति से कुछ दूर रहने के साथ नऐ क्षेत्र से चुनाव लड रही थी।भरतपुर क्षेत्र में लगातार पॉच चुनावों से भाजपा और कोली प्रत्याशी कांग्रेस के जाटवों को हराते आ रहे थे, ऐसे में इन चारों और उन तीनों जहॉ सोनिया गांधी ने सभाऐं की से कांग्रेस प्रत्याशियों का जीतना महज संयोग या फिर कुछ और नहीं हो सकता है।
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RAJKUMAR SINGH on 21 May, 2009 14:12;23
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मान गये सन्जय ! बहुत ही तथ्यात्मकता से तुम्ने इस राष्त्रीय चमचागीरी को बेनकाब किया है .तथ्य वो भी जानते हैन जो इस सहगान मे शामिल हैन .लेकिन वो सब कान्ग्रेस कल्चर फ़िर चालू हो गयी है .
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R. kumar on 24 May, 2009 03:14;04
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Bahut badhiya..sanjay ji,. aap suchhai ko samne lekar aaye.rahul gandhi ne kafi mehnat ki hei ye such hei lekin unhe hi jeet ka sherya dena satyta ko nakarne jeisa hei.kya manmohan singh ki bedag chavi or sarkar ke achhe kamkaj ko najarandaj kiya ja sakta hei..netaon ki to chamchagiri ki aadat hoti hei lekin media ko to eisee bhateiti nahi karna chahiye.....
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RAJKUMAR SINGH on 27 May, 2009 01:41;52
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किस मीडिया की बात कर रहे हैं ' R.kumar ' जी आप ??
जो मीडिया पैसे खाकर खबर बना भी रही है और छाप भी रही है ? बिक भी रही है और बेंच भी रही है ?

चलिए राहुल इतने इमानदार तो हैं ही की कम से कम अपने पिता की तरह खुद को कोई ' Mr. Clean' तो नहीं बता रहे . 'मामा' क्वात्रोची को तो अपने सी बी आयी और , मृदु ,सक्छाम ,ईमानदार , 'भाड़े के

प्रधानमंत्री ' से क्लीन चिट दे दिवा लूट का माल ले चंपत होने का मौका दिला चुप बैठे . इस विषय पे कांग्रेस के किसी ने बात नहीं की और इसे बासी कढी डिक्लेयर करवा दिया . मीडिया भी ताजे माल की फिराक में .अपनी नाक के नीचे , हजारों सरदारों का
खूनी खेल खेल चुकी कांग्रेस को ,'धर्म निर्पेक्स्छ ' और सिर्फ विरोधियों को ही 'सांप्रदायिक' बनवा दिया .
माना की छिनालें ही सिर्फ एक दूसरे को छिनाल और खुद को सीता सावित्री बताती रहती हैं पर इन
'नारदों' का चरित्र तो भडुओं से भी गया गुजरा है .

जय हो !

आप को राय दूंगा की किसी 'पेशेवर' पत्रकार की बातों में न आयें . सब के सब करीब करीब भाड़े के ही नज़र आ रहे हैं .
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R.kumar on 02 June, 2009 03:16;04
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rajkumar ji re-comment ke liye thanks,aapko padne se lagta hei media ke maujooda halat thik nahi hei..kuch na kuch dosh isme hei, iske prati aapka aakrosh aapke comment me saaf dikhta hei,lekin aap confused bhi hei. 20 may ko aap is report per lekhak ki tariff karte hei or 26 may ko isi report per lekhak ko peshewar kahkar sabko bhade ka kahte ho..ise kya kaha jaye..?
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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कितना कामयाब होगा मुलायम का माफीनामा
जैसे तलाक देने के लिये तलाक को तीन बार बोला जाता है बिल्कुल इसी अंदाज मे सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह से अपने संबधो को लेकर माफी मांग कर मुसलमानो को रिझाने के लिये फिर से ट्रांपकार्ड फेंका है। अब देखना है कि मुलायम का यह ट्रांपकार्ड क्या हकीकत मे मुसलमानो को रिझाने मे कामयाब होगा।...
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शिवाजी के शौर्य को कलंकित करने का षण्यंत्र
छत्रपति शिवाजी के अपमान के मुद्दे पर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरम है. संभाजी ब्रिगेड जिसने पिछली बार भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बोरी) की तोड़-फोड़ की थी. इस बार महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल पर हमले का षण्यंत्र रचा था जिससे वे शनिवार को बाल बाल बच गये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जेम्स लेन की विवादास्पद पुस्तक "शिवाजी- द हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया" की बिक्री के लिए जिस अंदाज में छूट मिली है, उस पर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कई संगठन आंदोलनरत हैं. लेकिन हम पहले यह समझ लें कि यह जेम्स लेन महाशय हैं कौन और उन्होंने किताब आखिर किस इरादे से लिखी है?...
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बेमतलब हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस
हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है जो 1987 से हर साल 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विश्व की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं।...
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रमन सिंह की दमनकारी औद्योगिक नीति
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह नक्सली आंदोलन के खिलाफ चलनेवाले अभियान के अगुआ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन रमण सिंह इस आंदोनल को किसके इशारे पर कुचल रहे हैं? क्या वे आम आदमी और आदिवासियों के हित में नक्सली आंदोलन को कुचलने का दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं या फिर उनका एजेण्डा कुछ और है. हाल में ही छत्तीसगढ़ की नयी औद्योगिक नीति की समीक्षा करें तो साफ हो जाता है कि असल में यह संघर्ष वे किसके लिए कर रहे हैं. ...
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