अमरनाथ विवाद कैसे बना फसाद
यह जानने की गंभीर कोशिश नहीं हुई कि सिर्फ फुटबाल के पांच मैदानों के बराबर जमीन दिये जाने के खिलाफ इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों हुई? इसे समझने की कोशिश तो बिल्कुल नहीं हुई कि छत्तरहामा में मारे गये दो संदिग्ध नौजवानों को अमरनाथ विवाद का शहीद बताकर जिस फसाद की फसल बोई गयी क्या वे नौजवान कश्मीरी थे? क्या छत्तरहामा के किसी निवासी ने इससे पहले कभी किसी जिहाद में शिरकत की थी? अगर इसे सिर्फ चुनाव के लिए खड़ा किया गया टंटा भी मान लें तो यह विवाद फसाद में कैसे तब्दील हो गया?
छत्तरहामा में जो दो नौजवान मारे गये थे उनमें से एक की उम्र 14-15 साल थी. स्थानीय व्यापारी जहूर अहमद का कहना है "एक तरफ भारत है जो हमारी जमीन हड़पकर काफिरों को देने की साजिश रच रहा है, वहीं दूसरी तरफ ये विदेशी हैं जिन्होंने कश्मीर में इस्लाम को बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी." अगर वर्तमान अमरनाथ विवाद को समझना हो तो उसे छत्तरहामा से ही समझने की शुरूआत करनी होगी. ये दोनों संदिग्ध आतंकी नौजवान गंदरबल शहर से 30 किलोमीटर दूर 22 जून को छत्तरहामा में मारे गये थे जिनकी शिनाख्त अभी तक नहीं हो पायी है. इसके बाद छत्तरहामा में प्रतिक्रियास्वरूप 23 जून को स्थानीय लोगों की एक रैली हुई. 1990 के बाद से अब तक के इस तथाकथित सबसे बड़े जन आंदोलन के बारे में जो दावा किया गया वह कितना सही है यह अभी तक स्पष्ट नहीं है. पुलिस का वीडियोटेप देखें तो कोई चार-पांच हजार लोगों का हुजूम था. फिर भी उनके असामान्य अनुपात और प्रचण्डता पर सवाल नहीं खड़े किये जा सकते. अगले दिन शुक्रवार को छत्तरहामा में उन दो आतंकवादियों की रस्म-ए-चहल्लुम हुई और और फिर गांववालों ने श्राईनबोर्ड के खिलाफ यात्रा निकाली. निश्तित रूप से पीडीपी-कांग्रेस सरकार के पतन के लिए यह आंदोलन जिम्मेदार है.
वकील नजीर अहमद रोंगा कहते हैं "यह असैनिक कब्जे के द्वारा कश्मीर घाटी का चरित्र बदलने की साजिश है. दिल्ली सैनिक कब्जे के बाद अब सांस्कृतिक कब्जे की ओर बढ़ रहा है."लेकिन यह भी तथ्य है कि यहां नेशनल कांफ्रेस का दबदबा है और शायद ही कभी किसी ने हिजबुल मुजाहीदीन जैसे आतंकी गुटों के जेहादियों को शरण दी हो. इससे पहले छत्तरहामा ने कभी भी जेहादियों और फौज पुलिस के बीच होनेवाले मुटभेड़ का नजारा नहीं देखा था. पहली बार ऐसा हुआ था और इसने पूरा नजारा ही बदल दिया. स्थानीय निवासी उस दिशा में आगे बढ़ गये जिससे वे अब तक परहेज करते आ रहे थे. इस्लामी कट्टरपंथियों ने इस लड़ाई को अपने अस्तित्व की लड़ाई घोषित कर दिया. श्राईन बोर्ड की खिलाफत करनेवाले वकील नजीर अहमद रोंगा कहते हैं "यह असैनिक कब्जे के द्वारा कश्मीर घाटी का चरित्र बदलने की साजिश है. दिल्ली सैनिक कब्जे के बाद अब सांस्कृतिक कब्जे की ओर बढ़ रहा है."
निश्चित रूप से यह बकवास है यह जानते हुए कि छत्तरहामा में श्राईनबोर्ड विरोधी आंदोलन की सफलता का एक कारण यह है कि गांव के जीवन पर इस्लाम का गहरा प्रभाव है. छत्तरहामा के उबलने के बड़ा कारण यहा हो रहे नाटकीय बदलाव हैं. छत्तरहामा के अधिकांश निवासी मुख्य रूप से शाल तैयार करने का काम करते हैं. लुधियाना और जालंधर जैसे शहरों में मशीनों द्वारा तैयार किये जा रहे सस्ते शालों की वजह से यहां शाल कारीगर और निर्माता दोनों परेशान है. इसके अलावा कशीदाकारी युक्त शाल तैयार करना एक खतरनाक काम भी है. दिनभर की मेहनत के बदले 80 रूपये मिलते हैं. जबकि बहुत से कारीगर 40 साल से पहले पहले ही आंख की रोशनी घुटने की ताकत दोनों खो देते हैं. छत्तरहामा में स्कूल कालेज तो हैं लेकिन यहां के लड़के नयी तकनीकि के साथ अपने आपको अभी नहीं जोड़ पाये हैं. बहुत कम लोग ऐसे हैं जो सरकारी नौकरी के लिए रिश्वत और अपना उद्यम शुरू करने लायक धन की व्यवस्था कर सकें.
इस बार जब आग सुलगी तो छत्तरहामा के भारत समर्थक राजनीतिक समूहों ने भी मुख्यधारा को त्याग दिया और इस्लामी कट्टरपंथियों के दावे को वैधता प्रदान करने लगे. सबने अपने-अपने तरीके से इसे हवा दिया. बारामुला में 27 जून को 600 लोगों की भीड़ के साथ जमात-ए-इस्लामी के सक्रिय कार्यकर्ता निसार अहमद गनई ने श्राईन बोर्ड के विरोध में प्रदर्शन किया. लेकिन बारामुला में ही दूसरी जगहों पर जो प्रदर्शन हुए उनका नेतृत्व भारत समर्थक दलों के स्थानीय नेताओं ने किया. 30 जून को शीरी में 5000 हजार से अधिक लोगों ने प्रदर्शन किया जिसका नेतृत्व नेशनल कांफ्रेस के कार्यकर्ता अब्दुल कयूम और असंतुष्ट पीडीपी कार्यकर्ता गुलाम मोहीद्दीन कर रहे थे. इसी तरह अनंतनाग में भी आल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेस और सैयद अली शाह गिलानी के तहरीक-ए-हुर्रियत ने विरोध प्रदर्शन के आयोजन जरूर किये लेकिन उन्होंने जो किया वह उनका रूटीन का काम होता है. तहरीक के बुलावे पर 25 जून को अनंतनाग के लाल चौक पर कोई 800 लोग इकट्ठा हुए उसके अगले दिन उसी स्थान पर आल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेस ने भी लगभग इतनी ही भीड़ जुटायी. लेकिन कांग्रेस ने इसे इस्लामी से ज्यादा शहरी आंदोलन बनने की भूमिका निभाई. 30 जून को स्थानीय कांग्रेसी नेताओं ने बंदी-बड़गाम में मुफ्ती का पुतला फूंका जबकि पाईबुग में हुए विरोध प्रदर्शन के पीछे नेशनल कांफ्रेस के कार्यकर्ता सक्रिय थे.
असल में अलगाववादी तो उन विरोध प्रदर्शनों की परिधि से ही बाहर थे जिन्हें उनके बढ़ते प्रभाव का उदाहरण बताया जा रहा है. खबर आयी कि 27 जून को अलगाववादियों ने श्रीनगर के लाल चौक पर अलगाववादियों ने 2000 की रैली की और उसमें पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया. लेकिन शायद ही किसी ने इस ओर ध्यान दिया हो कि वहां दिखनेवाले झंडों पर आधे चांद और तारे का इस्लामी प्रतीक चिन्ह अंकित था न कि पाकिस्तान का राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह. पुलिस के वीडियो टेप से पता चलता है कि इस देश विरोधी घटना के लिए जिन्हें नेतृत्वकारी कहा गया वे जावेद मीर और फिरदौस अहमद घटनास्थल पर ही काफी देर से आये थे. श्रीनगर की सड़कों पर संघर्ष कर रहे बहुत से युवाओं ने जींस पहन रखी थी और धूप के चश्मे लगा रखे थे. पूंजीवाद के समर्थक ये युवा कुछ न मिल पाने की हताशा में कट्टरपंथियों के पाले में जा गिरे हैं.
(प्रवीण स्वामी फ्रण्टलाईन के एसोसिएट एडीटर हैं.)
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