धारा 377 और इतिहास से झांकता समलिंगी
जब दिल्ली हाईकोर्ट में यह केस आया तो केन्द्र सरकार ने दलील दी थी कि देश में समलैंगिकों की आबादी महज 0.3 फीसदी है। यदि समलैंगिक संबंधों को मान्यता दी गई, तो बाकी 99.07 आबादी के लिए शालीन और नैतिक जीवन जीने में बाधा पहुंचेगी। केंद्र सरकार ने धार्मिक उदाहरणों के भी बात समझाने की कोशिश की, पर कोर्ट ने कहा कि आप जाइए और वैज्ञानिक आधार लाइए। अब देश में हडकंप मचना लाजिमी था। मुल्ला-मौलवी-पंडित-पादरी, जैन गुरू सब विरोध में उतर आए। योग गुरू बाबा रामदेव और खूबसूरत तारिका सेलिना जेटली की समलैंगिकता पर तीखी नोंकझोंक भी टीवी पर आपने देखी होगी। भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी के हौसले की तारीफ करनी होगी। उन्होंने कहा कि एक-दो जज हर बात का फैसला नहीं कर सकते। संसद, देश और समाज न्यायपालिका से भी ऊंचे हैं। दिल्ली हाइकोर्ट के फैसले को ज्योतिष सुरेश कुमार कौशल ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी, तो सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और उच्च न्यायालय में समलैंगिकों की पैरवी करने वाली नाज फाउंडेशन को नोटिस थमा दिया। मामला आगे चलता जाएगा, पर एक बात साफ है कि इससे भारतीय जनमानस की शुचिता की सीमाओं को लांघकर समलैंगिक शब्द उनकी जुबान पर चढ़ गया। सारे टीवी चैनल वालों के लिए तो यह मुद्दा टीआरपी का खजाना बन चुका था। नजारा देखिए कि टीवी पर जब से ये खबरें चली, सात समलैंगिकों की शादी के मामले देशभर में सामने भी आ गए। वाकई दो जुलाई एलजीबीटी के लिए के खुशी का दिन था। पर पहला सवाल उठता है कि ये एलजीबीटी आखिर है क्या? एल मतलब लेस्बियन मतलब दो महिलाओं के बीच यौन संबंध, जी मतलब गे मतलब दो पुरुषों के बीच यौन संबंध, बी मतलब बाइसेक्चुअल मतलब महिला और पुरुष दोनों से संबंध रखने वाले स्त्री-पुरुष और टी मतलब ट्रांसजेंडर मतलब जो पुरुष या महिला अपना सेक्स बदल लेते हैं।
आईपीसी का विवादित सेक्शन 377- जो भी स्वेज्छा से किसी व्यक्ति, महिला या पशु से कुदरती व्यवस्था के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाएगा, उसे उम्रकैद या दस साल तक के कारावास और जुर्माने की सजा दी जाएगी। यह कानून करीब 150 साल पुराना है। सन् 1861 के भारतीय दंड विधान की धारा 377 का समावेश लार्ड मैकॉले ने किया था। इस धारा के अनुसार समलैंगिक संबंध और अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करना गैर कानूनी और सजापात्र गुनाह माना गया है. धारा 377 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध [गुदामैथुन] ( स्वैज्छा से ही सही) स्थापति करता है तो यह अपराध है। 1935 में इस धारा में सुधार किया गया और इसमें मुखमैथुन भी जोड़ दिया गया।
ये है फैसला
दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एपी शाह और न्यायाधीश एस मुरलीधर की खंडपीठ ने दो जुलाई को अपने फैसले के पैराग्राफ 132 में कहा कि हम घोषणा करते हैं कि भारतीय दंड विधान की धारा 377, जो एकांत में समान लिंग के व्यस्कों के बीच आपसी रजामंदी से बनाए गए संबंधों को अपराध मानती है, संविधान के अनुज्छेद 21, 14 और 15 का उल्लंघन है। लेकिन धारा 377 के तहत बिना रजामंदी के समान लिंग वालों के बीच यौन संबंध और अवयस्क के साथ यौन संबंध अपराध माने जाएंगे। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह फैसला पूरे देश में लागू होगा या सिर्फ दिल्ली में।
उज्च न्यायालय के निर्णय के मुख्य बिंदु-
धारा 377 संविधान के खिलाफ है और मानव के गौरव की रक्षा का हनन करती है।
18 वर्ष से ऊपर के समलिंगी व्यक्तियों के बीच स्थापित होने वाला यौन सबंध गैर कानूनी नही है।
वयस्क व्यक्ति आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध स्थापित कर सकते हैं।
18 वर्ष से कम उम्र के लोगों के बीच यौन संबंध मान्य नही है।
परदे के पीछे
यह फैसला 2001 में एक इतरलिंगी महिला और नाज फाउंडेशन की संस्थापिका अंजलि गोपालन के प्रयासों का नतीजा है। अंजलि ने धारा 377 के कुछ प्रावधानों को न्यायिक हस्तक्षेप से हटाने की मांग की थी। नाज फाउंडेशन ने दलील दी कि वह ऐसे समलैंगिक पुरुषों के बीच में एड्स रोकथाम कार्यक्रम चलाना चाहता है, पर उसे धारा 377 के चलते काम में दिक्कत आ रही है। 2001 में दिल्ली हाइकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। पांच साल बाद उच्चतम न्यायालय ने इसे वापस अदालत को भेज दिया। इस बार अंजलि ने आनंद ग्रोवर के नेतृत्व में लायर्स कलेक्टिव के वकीलों के मदद से जीत हासिल कर ली। दिल्ली उज्च न्यायालय ने समलैंगिकता पर प्रतिबंध को धार्मिक उद्धरण के जरिये न्यायोचित ठहराने के लिए पिछले 16 अक्टूबर को केंद्र सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि इसे उचित ठहराने के लिए वह कोई वैज्ञानिक रिपोर्ट पेश करे। केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सालिसीटर जनरल पीपी मल्होत्रा ने प्रतिबंध को उचित ठहराने के लिए धार्मिक उद्धरण पेश किया। मुख्य न्यायाधीश एपी शाह की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा यह एक धार्मिक निकाय का एकतरफा बयान है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। यह धार्मिक सिद्धांत का एक हिस्सा है। हमें कुछ वैज्ञानिक रिपोर्ट दिखाई जाए, जो दर्शाए कि समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। महिला और पुरुष समलिंगियों की ओर से 15 याचिकाएं दायर कर इन कानूनों को चुनौती दी गई। इनमें उन्होंने अपनी पीड़ा का भी बखान किया है। पुलिस और दूसरे लोगों द्वारा किस तरह उन्हें उत्पीड़न झेलना पड़ता रहा है इसका उन्होंने अपनी याचिकाओं में जिक्र किया है। बंगलौर स्थित गैर-सरकारी संगठन क्वअल्टरनेटिव लॉ फोरमं के मुताबिक धारा 377 के कारण समलिंगियों को काफी उत्पीड़न झेलना पड़ा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय का मानना है कि समलैंगिक कृत्य में शामिल लोगों को भारतीय समाज अपराधी मानती है इसलिए यह सार्वजनिक तौर पर नहीं हो रहा है। ऐसे में यदि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को हटा दिया जाए तो समलैंगिक कृत्य बड़े पैमाने पर होने लगेंगे। दूसरी ओर स्वास्थ्य मंत्रालय का मानना है कि आपसी सहमति के आधार पर शारीरिक संबंध बनाने वाले समलैंगिक व्यक्तियों को सजा से दूर रखा जाना चाहिए।
चाल है या सुरक्षा है?
कुछ लोगों का आरोप है कि जिस नाज फाउंडेशन ने यह मामला अदालत में जीता है, उसके कर्ता-धर्ता को पुलिस ने दस साल पहले इसलिए पकड़ा था कि उन्होंने बेंगलुरू में लोगों को समलैंगिक रिश्तों का प्रशिक्षण देने के लिए बाकायदा कक्षाएं शुरू कर दी थीं। नाज फाउंडेशन देश में समलैंगिकता के प्रसार के लिए काम कर रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि समलैंगितकता को वैध बनाने के वैश्विक सेक्स माफिया काम कर रहा है। वह भारत को मैक्सिको और थाइलैंड से भी बड़ा सेक्स बाजार बनाना चाहता है। हाइकोर्ट का फैसला आते ही जिस तरह लोग खुशी में सड़कों पर उतर आए, उसके पीछे भी कोई साजिश समझी जा रही है। क्या यह वाकई कोई इतनी बड़ी बात थी कि पूरा देश में चेहरे गद्गद् हो जाएं। संस्कृति पुरोधाओं की सोच है कि सेक्स इंडस्ट्री दुनिया की तीसरी सबसे ताकतवर इंडस्ट्री है। तीन टि्रलियन डॉलर की यह इंडस्ट्री 198भ् से ही भारत को अपने कब्जे में लेना चाहती थी। पर धारा 377 उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा थी। अब इस फैसले के बाद दिल्ली, मुंबई जैसी मैट्रो सिटीज में गे-पार्लर और गे क्लब खुलने में देर नहीं लगेगी। हो सकता है, वेश्यावृत्ति को भी कानूनी दर्जा मिल जाए। जानकारों का मानना है कि इस धारा का इस्तेमाल नाबालिगों की यौन उत्पीड़न से रक्षा करने में भी किया जाता रहा है। अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जे. एन. सल्डान्हा ने भी एक बार इस धारा का इस्तेमाल यौन उत्पीड़न के शिकार हुए 10 साल के बज्चे को इंसाफ देने में किया था और इस मामले में दोषी पाए गए एक तांत्रिक को 10 साल की कैद व 25 लाख रुपये के जुर्माने की सजा मिली थी। न्यायाधीश सल्डान्हा ने खुद युवा वकील के तौर पर तीन दशक पहले मुंबई में लड़े गए एक केस का हवाला दिया। इस मामले में एक युवा कॉलगर्ल ने एक अरबी के खिलाफ शिकायत की थी। उस कॉलगर्ल की शिकायत थी कि अरबी नागरिक ने उसके साथ अप्राकृतिक कुकर्म कर उसे चोट पहुंचाई थी। हालांकि इस मामले में यौन संबंध सहमति से हुआ था, लेकिन वह व्यक्ति समलैंगिक प्रवृत्ति का था। कॉलगर्ल मुआवजा चाहती थी और आखिरकार उस व्यक्ति को दो लाख रुपये का मुआवजा देना पड़ा। ये तो हुई संस्कृति पुराधाओं की बातें। अब खुद समलिंगी समाज की बातों पर भी गौर कर लें। कुछ लड़के व्यस्क होने के बाद लड़कियों की तरह व्यवहार करना शुरू कर देते हैं। घरवालों को जब यह पता लगता है, तो वे उन्हें परेशान करना शुरू कर देते हैं। उनके निराशा, कुंठा घर करने लगती है। गे और लेस्बियन होना एक मानसिकता है। ऐसे में उन्हें बुरी नजरों से देखने की बजाय उनकी सोच को समझने की जरूरत ज्यादा होती है। जयपुर में समलैंगिकों के लिए पिछले डेढ़ साल से काम कर रही संस्था नई भोर गे और किन्नरों के मनोविज्ञान को समझने के लिए रिसर्च कर रही है। राज्य में लाखों समलैंगिक होने का दावा करने वाली संस्था के कार्यकर्ता बताते हैं कि हमारे पास आने वाले समलैंगिक कई तरह की समस्याएं लेकर आते हैं। समाज, घर-परिवार और कानून से जुड़े लोगों की ब्लैकमेलिंग से ये लोग परेशान रहते हैं। किसी तरह ये लोग अपने जोड़ीदार के साथ जीवन व्यतीत करते हैं। कभी इनके मन में सेक्स चैंज करवाने की बात भी आती है, पर सेक्स चेंज करवाने के चलते इनमें हार्मोनल डिसऑर्डर पैदा हो सकता है। साथ ही सेक्स चैंज करवाने में खर्चा भी काफी आता है, ऐसे में ये लोग ताउम्र परेशान रहते हैं। अब कोर्ट का फैसला आने के बाद यह वर्ग खुद को कानूनी रूप से सुरक्षित महसूस कर रहा है।
पूरी दुनिया में है गे
26 लाख भारतीय समलैंगिकों में 25 लाख गे और एक लाख लेस्बियन हैं। महाराष्ट्र में देश के सबसे ज्यादा समलैंगिक रहते हैं। अकेले महाराष्ट्र में 48 हजार गे हैं। समलैंगिक यौनसंबंधों को कानूनी मान्यता देने वाला भारत दुनिया का 127 वां देश बन गया है। दुनिया के कई अन्य देश इसे पहले से ही मान्यता दे चुके हैं वहीं अभी भी 80 देश ऐसे हैं जहा¡ यह मान्य नहीं है। तुर्की, सऊदी अरब और ईरान में यह अब भी प्रतिबंधित है। दक्षिण अफ्रीका एकमात्र ऐसा देश है, जहां संवैधानिक रूप से लैंगिक आधार पर भेदभाव की मनाही है। अमरीका के न्यूयॉर्क में वर्ष 1969 में स्टोनवाल पब में दंगे भड़के थे और इन घटनाओं को समलैंगिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष की बुनियाद माना जाता है। समलैंगिक सेक्स को मान्यता देने वाला प्रथम देश डेनमार्क था। यहां 1989 को समलैंगिंक सबंधों को मान्यता दी गई थी। इसके बाद कई अन्य यूरोपीय देशों जैसे कि नार्वे, स्वीडन और आयरलैंड ने भी इसे मान्यता दी। 2001 में नीदरलैंड ने समलैंगिक युगल को नागरिक विवाह अधिकार देकर नई प्रथा शुरू की और कई यूरोपीय देशों ने उसका अनुसरण भी किया। 16 देशों में समलैंगिक जोड़ों के संयोजन को मान्यता प्राप्त है। नीदरलैंड, बेल्जियम, स्पेन, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और नार्वे में समलैंगिक विवाह मान्य हैं। भारत जैसी दण्ड संहिता को अख्तियार करने वाले सिंगापुर ने साफ किया है कि वह अपने यहां समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से नहीं हटायेगा।
इतिहास से झांकता समलिंगी
पौराणिक इतिहास का सबसे चर्चित समलिंगी पात्र शायद शिखंडी है। भीष्म की मृत्यु में महत्वपूर्ण पात्र निभाने वाले शिखंडी का जन्म कन्या के रूप में हुआ था परंतु उसके पिता को यकीन था कि शिव के वचनानुसार शिखंडी एक दिन पुरूष बन जाएगा और उसे उसी तरह से पाला गया था। इससे शिखंडी महिला और पुरूष के बीच में पीस गया। मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की महिला समलैंगिकता पर लिखी किताब क्वलिहाफं पर 1941 में जोरदार हंगामा हुआ था और उन पर ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया था। बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में समलैंगिक रिश्तों का जिक्र करते हुए कई बड़े-बड़े लोगों को फटकार लगाई थी कि उन्होंने अपनी जिस्म की भूख मिटाने के लिए लड़के रख रखे हैं। कहा जाता है कि लखनऊ के कई नवाब, माइकल एंजिलो, अरस्तू, सुकरात, शेक्सपीयर, अब्राहम लिंकन, लोरेंस नाइटेंगल, टेनिस खिलाड़ी मार्टिना नवरातिलोवा, हिटलर जैसे कई लोग कम या ज्यादा मात्रा में समलिंगी थे। सिकंदर और नेपोलियन की सेनाओं में ऐसे संबंध आम थे। प्रसिद्ध लेखक सलीम किदवई के अनुसार मीर तकी मीर और शरमद शाहीद जिन्हें हरे भरे शाह के नाम से भी जाना जाता है, भी समलैंगिक थे। मशहूर उर्दू शायर हाफिज फारसी कहते थे- गर आन तुर्क शीराजी बे-दस्त आरद दिल-ए-मारा, बा खाल हिंदोश बख्शम समरकंद ओ बुखारा। इसका अर्थ है- अगर यह तुर्क लड़का मेरे दिल की पुकार सुन ले, तो इसके माथे पर लगे मस्से के लिए मैं समरकंद और बुखारा कुर्बान कर दूं। समकालीन उर्दू कविता में इफतिखार नसीम "इफ्ती" खुद को समलैंगिक मानते थे। हिंदी साहित्य में श्याम मनोहर जोशी में अपने लेखन में समलैंगिक संबंधों को खूब दुत्कारा है।
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
रही बात सहमती के आधार पे, इस तरह के सम्बन्ध को जायज नहीं ठहराया जा सकता.
यह अपने देश, समाज और संस्कृति के भी विरुद्ध है।
सवाल यह है कि क्या आपसी सहमति से कुछ भी जायज हो जाता है? अगर सहमति से किया जाने वाला अपराध, अपराध नहीं तो फिर दुनिया के 95 प्रतिशत अपराध, अपराध ही नहीं रहेंगे।
उदाहरण के लिए पिछले कुछ वर्षो में मुंबई में बार बालाएं चर्चा में रहीं। एक बार बाला धन कमाने के लिए या मजबूरी में अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए किसी शराबखाने में जाकर ग्राहकों को शराब पिलाना, उनका मनोरंजन करना, अपने शरीर का अश्लील प्रदर्शन करना जरूरी मानती है। वह यह अपनी इच्छा से करती है। दूसरी ओर कुछ पुरुष धन-बल के सहारे मनोरंजन करने के लिए वहां जाते हैं, पीते-पिलाते हंै, उन पर रुपये लुटाते हैं जो उनका मनोरंजन करती हैं। क्या यह सब सहमति से नहीं हो रहा था? एक को मनोरंजन चाहिए, दूसरे को रोजगार। हजारों परिवार पल भी रहे थे। फिर क्यों कानून ने वहां हस्तक्षेप किया? इसका मूल कारण है हमारे जीवन मूल्य। हमारा देश इस ढंग से रोटी कमाना और नोट उड़ाना सामाजिक मर्यादाओं के विरुद्ध मानता है। अब प्रश्न यह है कि अगर बार बाला धंधा सहमति से नहीं चलाया जा सकता तो प्रकृति के नियमों के विरुद्ध समलैंगिकता को स्वीकार कैसे किया जा सकता है?
आपका
अनूप
Post your comment