बुन्देले हर बोलो कि...
बुन्देलखण्ड के खेत-खलिहानों में पसरे सन्नाटे की जड़ें गहरी हैं. इतिहास के पन्नों में, बुजुर्गों की यादों में जहां से जो सूचनाएं मिलती हैं वे बताती हैं कि बुन्देलखण्ड आज जैसा बेबस और बदहाल पहले कभी नहीं रहा.
आज जिस बरबादी को हम देख रहे हैं उसकी जड़ों में ऐसे लापरवाहियों की लंबी सूची बनती है जो जाने अनजाने बुन्देले लोगों ने की हैं. बांदा के पंचायत अध्ययन केन्द्र के अवधेश गौतम कहते हैं "बुन्देलखण्ड प्राकृतिक संपदा के साथ ही साथ अपनी आन-बान-शान के लिए भी इतिहास में दर्ज रहा है. वह बुन्देलखण्ड ही था जिसने एक समय अंग्रेजों का पांव यहां से उखाड़ दिया था. जिन बुन्देलों ने अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था वही बुन्देली आन-बान और शान अपनी सरकार की योजनाओं और नीतियों के आगे घुटने टेक देती है." अवधेश गौतम जिस ओर संकेत कर रहे हैं उसकी ठीक-ठीक शुरूआत सन सैंतालीस के बाद हुई हो ऐसा नहीं है. ब्रिटिश हुकूमत ने पहले ही उन इलाकों को कमजोर कर दिया था जहां से उनको सबसे ज्यादा प्रतिरोध मिलता था. बुन्देलखण्ड भी ब्रिटिश नापसंदगी के उन्हीं इलाकों में था. लेकिन आजादी के बाद आये देशी अंग्रेजों ने भी कम कहर नहीं ढाया है. आजीविका की परंपरा और प्रथाएं कुप्रथाओं में बदल गयी और बुन्देलखण्ड को हमने उसके इतिहास से वर्तमान में लौटने का मौका ही नहीं दिया.
पंचायत अध्ययन केन्द्र ने एक रिपोर्ट तैयार की है जिसमें सूखा के कारणों को जानने समझने की कोशिश की गयी है. फिलहाल बुन्देलखण्ड जिस सूखे से सूख रहा है उसकी जड़ें कोई अट्ठाईस-तीस साल पहले तक फैली हुई मिलती हैं. 1978 में केन में बाढ़ और बुन्देलखण्ड में सूखा दोनों साथ ही साथ आये थे. फिर 1992 में भी ऐसा ही हुआ. एक बार फिर 2005 में यही दोहराव दिखाई दिया जब केन में बाढ़ भी आयी और बुन्देलखण्ड में सूखा भी बना रहा. आप ध्यान से देखेंगे तो बुन्देलखण्ड में बाढ़ और सूखे का एक रिश्ता दिखाई देगा. यहां कि वार्षिक औसत वर्षा 760 मिलीमीटर होती है. जिन सालों में यहां सूखा पड़ता है उन सालों में भी यहां औसत वर्षा से अधिक पानी बरसता है.
बाढ़ और सूखे को एकसाथ अपने आंचल में समेटे बुन्देलखण्ड के इस इलाके को समझने के लिए यहां की केवल भौगोलिक संरचना को ही नहीं देखना होगा बल्कि उस भौगोलिक संरचना के आधार पर बने सामाजिक और आर्थिक बुनावट को समझना होगा. फिर हमें यह भी समझ में आयेगा कि इस बुनावट में से कहां कहां से धागों को उधेड़ा कि कपड़ा चीथड़े में बदल गया. जहां कहीं भी भौगोलिक परिस्थितियां जटिल होती हैं वहां की सामाजिक और पारिवारिक संरचना उससे ज्यादा जटिल रहती है. इसमें कुछ अतिश्योक्ति नहीं है. प्रकृति जब हजार रूपों में चुनौती प्रकट करती है तो सामाजिक व्यवस्था उसके हिसाब से अपने हजार रूप निर्धारित कर लेता है. अब यह बात भले ही छोटी दिखाई दे लेकिन एकल परिवारों का बढ़ना बुन्देलखण्ड के हित में नहीं है. यहां के खेतों की संरचना और पानी की सरपट भागती लहरों के बीच आजीविका को टिकाये रखने के लिए परिवारों का एकजुट रहना बहुत जरूरी होता है. शायद इसीलिए बुन्देलखण्ड के इलाके में ताकत को परिवार के मर्दों की संख्या से जोड़ दिया गया था.
बुन्देली लोगों की मूछें ही ऊंची नहीं होती थी उनके खेतों की मेड़ भी इतनी ऊंचाई पर होती थी कि शान का प्रतीक बन जाती थीं. इसका एक व्यावहारिक पक्ष यह था कि पानी की सरपट भागती धारा को जितनी देर हो सके अपने खेतों को तर रख सको. लेकिन तर रखने की इस कला को शायद सरकार के कारिंदे नहीं समझते थे इसलिए उन्होंने चकबंदी के जरिए खेतों को तो बांटा ही मेड़ों को भी छांट दिया. मेड़ गये तो मेड़ पर खड़े पेड़ भला कैसे बचते. सारी हदें खेतों के पेट में समा गयीं. भरतकूप गांव के राम सनेही बताते हैं "वह जमाना भी देखा है जब खेतों में सिंचाई के लिए सात बांध थे. पहाड़ों से पानी निकलता था तो रूकरूक कर सींचता हुआ आगे बढ़ता था." ये सात बांध चार किलोमीटर के दायरे में खेतों के हरियाली की गारंटी रखते थे. लेकिन अब सेहरड़िया बंधान, छलकदार बंधान, पंडित बाबा का बांध और सबसे ऊपर राधे का बांध नामरूप में ही शेष हैं.
इसी गांव के गणेश प्रसाद तिवारी कहते हैं कि कोई चालीस साल पहले हम खूब कपास पैदा करते थे. यहां से लोग अपना कपास बेचने बनारस जाते थे.कपास की बलिहारी थी कि घर-घर को रोजगार और काम मिला हुआ था. घर-घर चरखियां लगी हुईं थी जो कपास से बिनौला निकालती थीं. यह सारा काम प्रकृति और परमात्मा की इच्छा के अनुसार होता था. मृगशिरा नक्षत्र में पानी बरसा तो आद्रा नक्षत्र में कपास की बुआई पक्की होती थी. लेकिन 63-64 के बाद ऐसा पागलपन छाया कि धीरे-धीरे सब खत्म हो गया." 1972-73 के बाद से यह पागलपन तो जैसे चरम पर चढ़ने को आतुर हो गया." लगातार छोटी होती जोत के बावजूद ट्रैक्टर रूपी दैत्य के पहिये दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगे. खाद, बीज, पानी का दोहन यह पागलपन अंतहीन होता गया. जब तक यह सब रूकता बुन्देलखण्ड में नये सिरे से बोने के लिए न बीज बचा है और न बीज का संस्कार. बांधों से छलकाकर पानी को उतारलानेवाला बुन्देली समाज आज टैंकरों से पानी पी रहा है.
बुन्देलखण्ड में खेती, बागवानी और पशुपालन का तंत्र टूटने का असर सिर्फ खेती किसानी पर ही नहीं है बाजारों में भी दिख रहा है. बांदा के मशहूर टेलर सम्राट का कारीगर संतूलाल बताता है कि सालभर की बात छोड़िये ईद दिवाली पर लोग नये कपड़े सिलाने की हिम्मत छोड़ चुके हैं. कभी-कभी तो हफ्तों कपड़े का कोई नया नाप नहीं आता. कभी इस दुकान पर 7-8 कारीगर काम करते थे लेकिन आज केवल दो बचे हैं. सम्राट टेलर की दुकान से ही दो तिहाई लोग गायब नहीं हुए. पूरे बुन्देलखण्ड से दो तिहाई लोग जा चुके हैं. भोजन पानी की तलाश में लगातार लोग यहां से बाहर जा रहे हैं. जो बच गये वे या तो बूढे हैं या बच्चे. या फिर ऐसे अपंग लोग जिन्हें शहर कोई काम देने से मना कर दे. अब हालात कब सामान्य होंगे, कब बाहर जानेवाले लोग लौटने और फिर से कपास के बिनौले से अपने रोजगार की बात सोचेंगे, यह कोई नहीं जानता. कोई नहीं.
(रूपेश पाण्डेय प्रथम प्रवक्ता के संवाददाता हैं और दस दिन बुन्देलखण्ड में रहकर आये हैं. rupeshpandey1973@gmail.com)
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