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अधर्म का डेरा झूठा सौदा

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डेरा सच्चा सौदा के लाखों भक्त उन्हें इंसान के ऊपर भगवान मानते हैं. ऐसे भगवान के दरबार हरियाणा के सिरसा में अक्सर पत्रकारों को बुलाया जाता है. पत्रकारों को वहां की गतिविधियों से अवगत कराया जाता है. हालांकि उन्हें बाहर के पत्रकारों की कोई खास जरूरत नहीं होती कि कौन उनके बारे में क्या लिख रहा है.

"सच कहूं" उनका अपना अखबार है और डेरा के भक्त सच कहूं को ही सच मानते हैं. फिर भी जो लोग यहां लाये जाते हैं उनकी सेवा के लिए "ट्रू वर्ल्ड" है. 140 कमरों का वातानुकूलित गेस्ट हाउस. हमें भी यहीं ठहराया गया है. हम कशिश रेस्तरा में खाने के लिए आये हैं. दायीं तरफ शीशे का घेरा है और घेरे से बाहर पानी भरा है. यहां से स्केटिंग करती लड़कियां दिख रही हैं.

लेकिन इन उन्मुक्त और निर्भय लड़कियों को देखकर मन में यह बात आती है कि छत्रपति की हत्या के लिए हुजूर सीबीआई से जूझ रहे हैं. कहते हैं छत्रपति ने यह सवाल उठाया था कि डेरा आतताइयों का बसेरा है. छत्रपति को एक गुमनाम साध्वी का पत्र मिला था जिसमें उसने हुजूर के ऊपर यौनाचार का आरोप लगाया था. इसी पत्र के आधार पर 24 सितंबर 2002 को चंडीगढ़ हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया था. इसके विरोध में जिन आठ महिलाओं ने हाईकोर्ट में अपील की और हुजूर को पवित्र माना उनमें एक हैं शीला पुनिया. डेरा में शीला पुनिया से भी मुलाकात हुई. वे यहां उस लड़कियों के स्कूल की प्राचार्या हैं जिसे डेरा में परीलोक कहा जाता है. उनसे बात हुई तो उन्होंने कहा कि वे साध्वी हैं. मैंने जानना चाहा कि क्या इस तरह के विद्यालय का उद्येश्य लड़कियों को साध्वी बनाने के लिए प्रेरित करना है तो उनका कहना था कि नहीं, हम लड़कियों को उनकी मंजिल बता देते हैं. कोई 2000 परियां यहां हैं लेकिन किसी पर कोई दबाव नहीं डाला जाता. हां, कुछ मेधावी लड़कियां रोज मजलिस में जरूर जाती हैं.

मैंने कहा कि वैवाहिक जीवन के बिना आपकी इस संतुष्टि का राज क्या है? उन्होंने कहा मजलिस का वक्त हो रहा है. आपके सवालों का जवाब बाबाजी के पास मिल जाएगा. बाहर दो बसों में कुछ मेधावी लड़कियों को बैठाया जाता है. हमने पूछा- मेधावी लड़कियों का सेलेक्शन अच्छा है. सब खूबसूरत हैं. मैडम ने बताया कि जो खूबसूरत होती हैं वही मेधावी होती हैं. मजलिस लगी है. ऐसा हर रोज सुबह-शाम होता है. दस हजार से अधिक सात संगियों की भीड़ इंतजार कर रही है. बाबाजी साढ़े पांच बजे आयेंगे. गीतों की महफिल खत्म हुई तो कहा गया कि बाबा आ रहे हैं. महिलाओं की भीड़ एक तरफ, पुरूष दूसरी तरफ. महाराज जी सिंहासन पर विराजे तो सबने हांथ जोड़, आंख मूंद माथे को जमीन से लगाकर अभिवादन किया. सब धन्य हो रहे हैं. सिंहासन पर बिरजे हुजूर साहब सामने करके करब (हाथ) हिलाकर आशीष बांटते हैं. बंसल साहब बता रहे हैं कि हुजूर साहब के बगल में जो सेवादार पंखा झल रहे हैं वे अवकाश प्राप्त न्यायाधीश हैं. नित्यप्रति जो होता है वही आज भी हुआ. अपना आशिर्वाद देकर हुजूर गुफा में वापस चले गये.

गुफा के प्रवेशद्वार पर कुछ खुबसूरत साध्वियां अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं. गुफा द्वार पर खड़े सुरक्षा कर्मी को कुछ खास निर्देश दिये जा रहे हैं. प्रवक्ता महोदय बता रहे हैं कि हम लोग ही नहीं गुफा के अंदर कोई नहीं जा सकता. मैंने जानना चाहा- फिर ये साध्वी यहां इंतजार क्यों कर रही हैं? वे चुप रहे.

हम पूछते हैं कि क्या हम अलग से हुजूर से मुलाकात कर सकते हैं? हुजूर के प्रेस प्रवक्ता आदित्य अरोड़ा कहते हैं कि वे मेरे हर सवाल का जवाब देने में सक्षम हैं. इसलिए हुजूर को कष्ट देने का कोई मतलब नहीं है. पत्रकारिता का मतलब हर हाल में सच होता है लेकिन ऐसा भी सच नहीं जो लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाता हो. हुजूर इंसानों की तो छोड़िये पशु-पक्षियों के प्रति भी अत्यंत करूणा से भरे हैं. मैंने कहा- "लेकिन प्रवक्ता महोदय, हमें सवालों का जवाब सीधे भगवान से चाहिए. क्योंकि आरोप उन्हीं के ऊपर हैं." उन्होंने कहा कि आप नाहक परेशान कर रहे हैं. आपके सवाल हमें मेल कर दीजिए. आपको जवाब मिल जाएगा. "फिर भी गुफा के अंदर जाकर हुजूर से मिलने में पाबंदी क्यों है?" अरोड़ा साहब का जवाब था कि बाबाजी यहां चलनेवाले निर्माण कार्यों को खुद देखते हैं. फिर मजलिस की जिम्मेदारियां अलग. बाबा बहुत थक जाते हैं. "देखिये, गुफा को लेकर गलतफमियां हैं. अगर आप हमें अंदर नहीं जाने देंगे तो यह गलतफमियां और बढ़ेंगी."

अब अरोड़ा साहब उबल रहे थे "आप कुछ भी लिखने के लिए स्वतंत्र हैं. लेकिन किसी कि धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने से बचना चाहिए. बाबाजी की गुफा के अंदर देश के किसी प्रेस पत्रकार का प्रवेश वर्जित है. जाईये यह प्रचार कर दीजिए. हमें अच्छी तरह मालूम है कि आप हमारे खिलाफ लिखने के लिए आये हैं. आपको मालूम होना चाहिए कि मैं एमबीबीएस डाक्टर हूं और किसी जमाने में मैं बी पायनियर का खोजी पत्रकार हुआ करता था." गर्ग साहब बात पूरी करते हैं कि "प्रेस वालों ने बाबाजी के बारे में उल्टा सीधा लिख दिया तो लाखों भक्तों ने हफ्तों तक अन्न ग्रहण नहीं किया. उनकी भावनाओं को भारी ठेस पहुंची थी." मैंने कहा कि उन्हीं भक्तों ने छत्रपति ही हत्या पर जश्न क्यों मनाया था? तो वे चपु हो गये. सिर्फ इतना कहा कि छत्रपति भी कोई अच्छा आदमी नहीं था. खैर, न जाने क्यों वे लोग इस बात के लिए तैयार हो गये कि गुफा के अंदर तो नहीं लेकिन बाहर से वे गुफा दिखा देंगे. उनका तर्क था कि गुफा के अंदर है ही क्या? बस दो कमरे की कुटिया. हुजूर साहब का जीवन बहुत सीधा-सादा है. यह सादगी मैं अब तक डेरा में जगह-जगह देख ही चुका था. फिलहाल जिस सत्संग हाल से गुजरकर हम गुफा के लिए जा रहे थे उसकी क्षमता यही कोई 50 हजार भक्तों को साधने की होगी.

गुफा के बाहर हम जिस राह से गुजर रहे हैं वह एक डेग चौड़ी है. नीचे 30 फुट गहरी घाटी है. दूध की तरह सफेद संगमरमरी किले का सौंदर्य को निहारते पैर अपने आप ही ठिठक-ठिठक कर आगे बढ़ रहे थे. यहां किसी भी प्रकार की अनहोनी से इंकार नहीं किया जा सकता. सिरसा के कुछ पत्रकारों ने हमें पहले ही बताया है कि डेरा के बाहर हर महीने एक दो अज्ञात लाशें मिल जाती हैं. वैसे डेरा के अंदर भी अंत्येष्टि की अच्छी व्यवस्था है. गुफा के प्रवेशद्वार पर कुछ खुबसूरत साध्वियां अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं. गुफा द्वार पर खड़े सुरक्षा कर्मी को कुछ खास निर्देश दिये जा रहे हैं. प्रवक्ता महोदय बता रहे हैं कि हम लोग ही नहीं गुफा के अंदर कोई नहीं जा सकता. मैंने जानना चाहा- फिर ये साध्वी यहां इंतजार क्यों कर रही हैं? वे चुप रहे. रात ढलती जा रही है. गुफा का सौंदर्य बढ़ता जा रहा है. अपने गुरू डेरा के हुजूर को पूरण आनंद बतानेवाली शीला पुनिया भी साध्वियों की कतार में दिखाई दे रही हैं. 

गुफा से बाहर डेरा परिसर में रात के इस पहले प्रहर में सातसंगत विचर रहे हैं. उनके चेहरे कुछ अचेतन जान पड़ते हैं. एकाध को हमने हिलाया- क्या बात है? जवाब में अवचेतन से निकली वाणी- देह को फिर हिलाया तों ऐ.....! बाद में सिरसा के एक रिक्शाचालक ने इस ऐं का रहस्य बताया - "बुक्की (अफीम) का कमाल है. डेरा की ओर से भक्तों को यह प्रसाद रूप में मिलता है. भगवान पूरण आनंद में मगन हैं और भक्त बुक्की फांककर निढाल हैं. सच्चा सौदा डेरा की सौदागरी भी है तो सब साफ साफ. खुल्लम-खुल्ला........!

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marwah t. on 25 July, 2008 16:49;09
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Pushpraj ji dharti ke is aloukik swarg ki jhalki se awgat karane ke lie shukria,halanki aise kai swarg hindustan ke kone kone main aabad hain aur sabki apni apni gufain hain aur un gufaon main sirf apsrain hi prevesh kar sakti hain,ye aaj ka akhand satya he,in thakatikh math-dharion ka koi kuch nahi bigad sakta he kyounki inke aishoaaram ka theka hamare rajnetaion ke jimme he.KABHI-KABHI YE SAWAL AKSAR BAICHEN KAR DETA HE KI AAKHIR BHAGAT SINGH KO FAANCI KYON DI GAI THI.
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राजीव तनेजा on 25 July, 2008 21:01;27
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पुष्प राज जी डेरे की सच्चाई से रुबरू करवाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।धर्म के सभी ठेकेदारो का यही हाल है...सबके अपने-अपने किले...अपने-अपने सेवादार हैँ जो उनके एक इशारे पे अपनी जान दे भी सकते हैँ और ज़रूरत पड़ने पे किसी की जान ले भी सकते हैँ।

इनसे निबटने के लिए जागरूकता के साथ-साथ द्र्ढ निश्चय की भी ज़रूरत है।कभी तो इनकी पोल खुलेगी...कभी तो इनके चेहरे से ये भलमनसत के नकाब उतरेंगे
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tulsi singh bisht on 26 July, 2008 10:39;59
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पुष्पराज जी आपकी खोज काबिले तारीफ है। लेकिन इन धर्म के ठेकेदारों को मैं केवल इतना ही कहूंगा कि ये जो कहते है कि इनके पास लोग खुद आते है तो यह गलत है। इनके यहां केवल ज्यादातर गरीब लोग ही फंसते है या फिर मानसिक तौर पर बीमार व्यक्ति। इनका एक ही इलाज है जैसे सिगरेट और शराब पर लिखा होता है कि यह आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसी तरह इनके पंडालों पर भी लिखा होना चाहिए कि हमारे द्वार पर आते हो तो आपको स्वर्ग नहीं नरक भी मिल सकता है। क्योंकि ऐसे ढोंगी धर्म के ठेकेदार दुनिया में काफी ज्यादा है और इनके संबंध काफी राजनेताओं से भी है। इनको हटाना या जेल में बन्द करना, काफी मुश्किल है - बस एक ही लक्ष्य है लोगों में यह जानकारी देना कि भगवान सब जगह है उसे आप मंदिर में खोजे या अपने घर पर। लेकिन इंसान को भगवान मत माने। यही मेरी लोगों से विनती है और यही मेरा उद्देश्य भी। खोजी लेख के लिए आपको साधुवाद धन्यवाद।
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Bhushan Aggarwal on 20 September, 2008 21:05;37
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are bhai sache santo ka virodh to aadikal se hota aaya hai, Tum unki mahima ke bare
mein kya jano jo kabhi vahan ashram mein gaye hi nahi. Tumhe to bus hawa mein baate phekani aati hain
kabhi vahan jayo to tumhe pata chalega ki dera sacha sauda, Sirsa ke guruji kitne mahan hain
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Bhushan Aggarwal on 20 September, 2008 21:50;01
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वैसे जो लोग सच्चे गुरू की निन्दा करते हैं मै उनके मुंह नही लगना चाह्ता था, लेकिन फिर भी उन लोगों को बताना चाह्ता था, जो इस सनकी पत्रकार ( पुष्पराज) की बकवास पढकर भ्रमित हो रहे थे, लिख्नना तों बहुत कुछ चाहता था, पर हिन्दी की टाइपिंग अच्छी नही है
सधन्यावाद सहित
भूषण अग्रवाल
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visfot .com on 21 September, 2008 12:15;37
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भूषण भाई आपको हिन्दी लिखने में दिक्कत हो रही है तो आप रोमन में भी लिख सकते हैं.
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sweety on 09 April, 2009 20:11;43
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pushpraj ji sabse pahle to aapko aapki is story k liye saadhuvad kyonki aapne is aatank aur aadambar k adde k khilaf likhne ki himmat ki. aapki story padhkar pata chalta h k is dera k khilaf jisne b aawaz uthayi, chahe vo unki sadhvi ho, unka kaarinda ho, ya koi patarkar uska hashar bura hi hua h. isse pahle b maine is dera k baare m kaafi padha h. dera ki kaali kartooton ko media ne kaafi ujagar kiya h parantu pata nahi kyon dera chief par hath nahi daala jata. ise politicians ka voton ka lalach kahen ya noton ka, sabhi neta aise babo ki chamchagiri karte dikhte h. ye hmare desh ka durbhagya h. Dera k CBI jaanch k baad mamla adaalat m chl rha h. Sabhi nyaypriya naagrik ummeed lagaye baithe hn k is paapi ko adaalat saza degi parantu isme b sanshay barkrar h kyonki hamaari adaalton par b ab raajnetao ki ghatiya raajniti haavi ho rahi h.
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sweety on 09 April, 2009 20:21;59
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aur haan upar ek bhaai sahab ne tippani ki k rachnakar ne bina Dera gaye hi story kr di. shayad unki hindi padhne m b kaafi week h kyonki pushpraj ne poori story m apni dera ki yatra k baare m hi likha h. jo wahan dekha, bayan kr diya
pushpraj n yahaan bhukki (afim k daano) k baare m b jikar kiya h. shayad commentator bhai abhi abhi dera hokar aaye honge.
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hetram on 09 April, 2009 20:34;50
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pushpraj n apni jaan ko jokhim m daalkar dera sachcha souda ka baariki s bharman krne k baad der pramukh k shaandar mukhote k phiche chipi jin ander tak jhinjhod dene wali sachchayiyon ko jis bebaki v nidarta s bayan kiya h, pushpraj ko isne jaanbaj patarkaron ki phehrist m bahut unche rutbe pr sthapit kr diya h. story pr pratikriya krne wale ek dharambheeru ko pushpraj k dera m jaane ki baat pr sandeh h. is sandeh ko agar pukhta b maan liya jaaye to m jo ki dera k bilkul jad m basa hone k kaaran un darjano kisano ki peeda se bakhoobi wakif hoon jinki sainkado ekad zameen dera pramukh k ishare pr dera premiyon n zameen m khadi phaslon ko hr dafa isliye mal mootra kr k rond daala taki un bechare kisaano k paas dere ko aune-poune daamo m zameen bechne k alaawa aur koi chara hi n raha. aur hairani ki baat k dera premiyon n unki zameeno pr kabza karne k baad ise badi shaan se kahaanion k roop m pracharit kiya k dera pramukh k prataap k kaaran ye zameene kissan dere ko daan kr gaye. ek baar dobaara dhanyawad k saath.
ek peedit
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Nav on 19 September, 2009 11:33;16
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Pushpraj Jee, Aapne jo story likhi hai kasam se kai dinon ke baad aisa padhne ko mila hai. Main Hisar na niwasi hoon Ye sirsa ke najdik he padta hai. Is admi ke bare me logo ke jo rai hai (iske Bhakton ko chodkar) aapne uska sahni dhang se dere me jakar jo khulasa kiya hai vo kabile tarif hai. Yahan hisar me bhi ek magazine hai webmirchi ke naam se vo bhi aapke jaisa he bekhof likthi hai. Aaj ke daur me jahan patrkar chand paison ke liye story ki hatya kar dalte hain. Yahan hisar me he kai national dalies ki press hain lekin yahan bhi itne mamle dabten hain k man yahin yad karta hai k kabhi bhi pushpraj or webmirchi jaise log likhna na band karen.

Bahut Bahut Dhyanwad is Jhoote Sode ke kale Sach ko batane ke liye.
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रमन सिंह की दमनकारी औद्योगिक नीति
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह नक्सली आंदोलन के खिलाफ चलनेवाले अभियान के अगुआ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन रमण सिंह इस आंदोनल को किसके इशारे पर कुचल रहे हैं? क्या वे आम आदमी और आदिवासियों के हित में नक्सली आंदोलन को कुचलने का दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं या फिर उनका एजेण्डा कुछ और है. हाल में ही छत्तीसगढ़ की नयी औद्योगिक नीति की समीक्षा करें तो साफ हो जाता है कि असल में यह संघर्ष वे किसके लिए कर रहे हैं. ...
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