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इंटरनेट पर हिन्दीः मिथक और यथार्थ

image इंटरनेट को बढ़ावा देने के िलए तैयार की गयी गूगल की बस

अपने वर्तमान यूनिकोडित स्वरूप में हिन्दी का इंटरनेट पर अवतरण इंटरनेट पर हिन्दी के आगाज की कहानी शुरू करता है. यूनिकोड मानक अपनाने से पहले भी हिन्दी में वेब पन्ने बनते थे लेकिन उनका बनना न बनना एक जैसा ही होता था. जो जानकारी उपलब्ध है उसके अनुसार अक्टूबर 2002 में पहली बार हिन्दी.ब्लागस्पाट.कॉम पर विनय जैन नामक व्यक्ति ने पहली बार यूनिकोडित हिन्दी में कुछ शब्द लिखे. इसके बाद वे नियमित लिखने लगे. विनय जैन के बाद दूसरे व्यक्ति आलोक कुमार हैं जिन्होंने हिन्दी में ब्लाग लिखना शुरू किया. उनका नौ-दौ-ग्यारह नाम का ब्लाग भारत में शुरू किया गया पहला ब्लाग बन गया क्योंकि विनय जैन अमेरिका में रहते हैं. कुछ शब्दों के सहारे इंटरनेट पर अवतरित होनेवाली हिन्दी ने सात साल के भीतर क्या उत्साहजन प्रगति की है?

इस समय दुिनया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल पर अगर आप 'हिन्दी' लिखकर खोंजे तो पांच करोड़ परिणाम प्रदर्शित करता है. अगर हिन्दी रोमन में लिखें तो परिणाम आता है बारह करोड़ चालीस लाख. यानी गूगल के डाटाबेस में देवनागरी लिपी और रोमन लिपी में हिन्दी शब्द इतनी बार दर्ज है. निश्चित रूप से यह केवल एक शब्द और दुनियाभर में नान यूनिकोडेड भाषाओं के रिजल्ट इसमें शामिल नहीं हैं. हिन्दी का यह फैलाव सात साल में अच्छी प्रगति कही जाएगी? इस बारे में और बात करने से पहले हम इंटरनेट पर हिन्दी की विभिन्न विधाओं के बारे में जान लेंगे तो और आसानी होगी.

इसमें कोई शक नहीं है कि अगर इंटरनेट के डूबते व्यापार को गूगल ने सहारा दिया तो इस बात से भी शायद ही कोई इंकार करे कि हिन्दी को इंटरनेट पर भी सबसे अधिक विस्तार भी गूगल ने ही दिया. गूगल की रणनीति साफ थी कि उसे भाषाई विस्तार करना है. अंग्रेजी में इंटरनेट का जो बाजार था वह गूगल गणराज्य के लिए नाकाफी था इसलिए पब्लिक लिमिटेड कंपनी बनने के साथ ही उसने दुनिया की दूसरी भाषाओं में पूंजी निवेश शुरू कर दिया. गूगल ने हिन्दी, चाईनीज, फ्रेंच जैसी भाषाओं में खोज और अन्य सेवाएं प्रदान करने के लिए भारी निवेश को तैयार हो गया. अकेले भारत में गूगल नौ भाषाओं में अपनी सेवाएं प्रदान करता है जिसमें चार भाषाओं में गूगल न्यूज (जो कि अपेक्षाकृत जटिल काम है) अपनी सेवाएं दे रहा है. गूगल की इस रणनीति को इंटरनेट पर भाषाओं को बहुत फायदा हुआ.

2002 में बने पहले ब्लाग ने हिन्दी की इंटरनेट पर जो उपस्थिति दर्शायी थी उसने हिन्दी को इंटरनेट पर बढ़ाने में सबसे अधिक योगदान किया. पक्के तौर पर तो नहीं कहा जा सकता िक हिन्दी में कितने ब्लाग हैं लेकिन हिन्दी में ब्लाग एग्रीगेटरों के आंकड़े जरूर थोड़ी मदद करते हैं. ऐसे ही एक ब्लाग एग्रीगेटर चिट्ठाजगत.इन का आंकड़ा है कि इस समय उसके डाटाबेस में कुल 9,842 ब्लाग दर्ज हैं. यह पूरा आंकड़ा होगा ऐसा नहीं है. चिट्ठाजगत के डाटाबेस में जो हिन्दी के ब्लाग दर्ज हैं वे मुख्यरूप से ब्लागस्पाट और वर्डप्रेस पर बने ब्लाग हैं. इसके अलावा कुछ वेबसाइटों को भी यह एग्रीग्रेटर क्राल करता है. लेकिन उन ब्लाग्स का आंकड़ा अभी किसी के पास नहीं है जो विभिन्न वेबसाइटें अपने डोमेन पर देती है. छोटे ब्लाग माध्यम मसलन रिडिफलैण्ड, मायस्पेश, इट्जब्लाग, ब्लाग.को.इन आदि की सेवाओं का उपयोग करनेवाले लोगों का पक्का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. खुद ब्लागस्पाट और वर्डप्रेस पर जितने ब्लाग बनते हैं वे इन एग्रीगेटरों की पकड़ में हैं ऐसा भी कहना मुश्किल हैं. लेकिन अगर सारे ब्लाग रूझानों को भी मिला लिया जाए तो आंकड़ा पांच हजार और जुड़ जाता है. इस तरह हिन्दी में ब्लाग 15,000 से अधिक होंगे ऐसा सोचना भी मुश्किल है.

सात साल के सफर के दौरान भी इंटरनेट पर भारत में हिन्दी की दशा दयनीय है. देश में कुल साढ़े चार करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं जिनका सर्वाधिक घनत्व महानगरों और दक्षिण के शहरों की ओर है जहां हिन्दी का नाम लेनेवाला कोई नहीं है. जो कुछ लोग हैं भी वे सीधे बड़ी वेबसाइटों पर जाते हैं. वेबसाइटों का बैरोमीटर नापनेवाली एलेक्सा 2000 यूजर्स होने पर आपको एक लाख के दायरे में फेंक देती है. इस लिहाज से देखें तो दैनिक भास्कर भी इंटरनेट पर केवल दस हजार लोगों द्वारा ही रोज पढ़ा जाता है जो कि एलेक्सा रैंकिंग में दस हजार से थोड़ा ही नीचे है. ऐसे में हम यह दावा कैसे कर सकते हैं कि इंटरनेट पर िहन्दी एक भरा-पुरा बाजार बन चुकी है? ऐसा सोचना हमारी मूर्खता नहीं तो और क्या है?  इन संभावित 15000 ब्लाग में भी अधिकतर ब्लाग बनने के साथ बिगड़ जाते हैं. चिट्ठाजगत का ही आंकड़ा है कि इन दस हजार ब्लाग में बमुश्किल दो हजार ब्लाग ही एक्टिव ब्लाग हैं. इन एक्टिव ब्लाग में एक हफ्ते में 1098 ब्लाग पर पोस्टें लिखीं गयीं जिनकी कुल संख्या 3330 है. यानी कह सकते हैं कि कुल 1100 ब्लाग हैं जो सप्ताह में औसतन तीन पोस्ट लिख रहे हैं. ऐसी स्थिति में हम कैसे कह सकते हैं कि ब्लाग ने कोई क्रांति कर दी है? निश्चित रूप से कुछ शब्दों से शुरू हुआ सफर ब्लाग के सहारे थोड़ा सक्रिय जरूर हुआ है लेकिन उसने कोई यात्रा शुरू कर दी हो ऐसा बिल्कुल नहीं है. आमतौर पर ब्लाग लेखक ही ब्लाग का पाठक होता है. इस लिहाज से देखें तो संभवतः दस हजार लोग भी नहीं हैं जो ब्लाग को नियमित पढ़ रहे हैं.

इंटरनेट पर दूसरा बड़ा माध्यम समाचार वेबसाइटे हैं. अगर आप समाचार वेबसाइटों को देखें तो पायेंगे कि तीन वेबसाइटें ऐसी हैं जिनकी गणना करना संभव नहीं है. ये हैं- बीबीसी हिन्दी, जागरण याहू और नवभारत टाईम्स. इन वेबसाइटों का आंकड़ा मिलना सार्वजनिक रूप से मिलना मुश्किल है क्योंकि एलेक्सा इनकी रैंकिंग इनके मदर डोमेन के साथ जोड़ता है. मसलन बीबीसी हिन्दी का आंकड़ा बीबीसी के साथ और जागरण याहू का याहू के मदर डोमेन के साथ जुड़ जाता है इसलिए हम अलग से यह नहीं जान सकते कि इन साइटों पर कितने विजिटर्स आ रहे हैं. लेकिन हिन्दी की इस समय जो सबसे बड़ी समाचार वेबसाइट है उसका नाम है दैनिक भास्कर. 40 करोड़ के संभावित बाजार को रिपोर्ट करती इस हिन्दी वेबसाइट की एलेक्सा रैंकिंग 9,122 है. यह अकेली हिन्दी की वेबसाइट है जो दुनिया की दस हजार वेबसाइटों में शामिल है. यह दयनीय हिन्दी बाजार का ही हाल है कि 100 करोड़ वाले देश का दूसरे नंबर का सबसे बड़े अखबार की वेबसाइट मुश्किल से 10,000 साइटों में अपनी जगह बना पायी है. दुनिया के कुल इंटरनेट यूजर्स के 0.00126% ही भास्कर के पास आते हैं.

इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है. क्योंकि पूरी दुनिया का यह ट्रेन्ड अब साफ दिखाई दे रहा है इंटरनेट पर परपंरागत समाचार साइटों पर लोग कम आ रहे हैं. नील्सन द्वारा इसी अगस्त में जारी एक सर्वे बता रहा है कि दुनिया के कुल इंटरनेट यूजर्स का मात्र 1 प्रतिशत समाचार साइटों तक आता है. शेष 99 प्रतिशत यूजर्स सोशल नेटवर्किंग साईट्स और दूसरी साइटों पर ही सारा वक्त बिताता है. यह दुनिया का आंकड़ा है जिसमें अंग्रेजी और चाइनीज सबसे प्रभुत्वशाली हैं. इस लिहाज से समाचार साइटों पर भारत में कितने लोग आते हैं? अभी भारत में कुल 4.5 करोड़ से 5 करोड़ के बीच एक्टिव इंटरनेट यूजर्स हैं. इनमें अधिकांश बड़े शहरों में हैं जो कि हिन्दी में इंटरनेट को प्रयोग करने से ही कतराते हैं. फिर हिन्दी इसमें कितने माइक्रो परसेन्ट बैठती है आप खुद अंदाज लगा लीजिए?

साफ है इंटरनेट पर हिन्दी का विस्तार अभी न के बराबर है. भारत में कितने लाख लोग हिन्दी में ब्लाग या समाचार साइट पढ़ते होंगे कहना मुश्किल है लेकिन इनकी संख्या लाख सवा लाख से ऊपर होगी कहना बहुत मुश्किल है. हिन्दी का बड़ा बाजार अभी भी गूगल के पास है क्योंकि वह सर्च के साथ साथ ढेरों सुविधाएं भी मुहैया कराता है. लेकिन गूगल खुद कोई कंटेट हिन्दी में जनरेट नहीं करता. यह काम तो ब्लागरों और वेब साइटों को ही करना होगा जिनकी संख्या और पहुंच अभी न के बराबर है. आनेवाले वक्त में चाइनीज भाषा के बैदू.कॉम की तर्ज पर हम भी कुछ बैदू बना सकें जो दस हजार में नहीं बल्कि दुनिया के शीर्ष दस वेबसाइटों में शामिल हों. 

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shyamalsuman on 24 August, 2009 07:33;03
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सुन्दर विश्लेषण मिथक और यथार्थ का। बहुत जानकारी भी मिली। काफी मेहनत करके आपने यह आलेख तैयार किया है। बधाई।
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अविनाश on 24 August, 2009 11:36;34
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बंधु, आप सूचनाओं पर थोड़ा और काम कर सकते हैं। हिंदी की वेबसाइट वेबदुनिया डॉट कॉम अलेक्‍सा रैंकिंग में 2000 के अंदर है। यानी भास्‍कर से कई गुना आगे। विश्‍वास न हो तो इस लिंक के सहारे देखिए - http://alexa.com/siteinfo/webdunia.com दूसरी बात, आप जो कह रहे हैं - आलोक तोमर इसके ठीक उलट कह रहे हैं। वो बड़े पत्रकार हैं। हम उनकी बात पर भरोसा करें कि आपकी बात पर? कृपया स्‍पष्‍ट करें।
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संजय तिवारी on 24 August, 2009 12:51;28
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अविनाश जी आपकी बात सही है. और मैंने जो लिखा है वह भी सही है. वेब दुनिया हिन्दी का पोर्टल नहीं है. वह बहुभाषी पोर्टल है जो कई तरह की सेवाएं प्रदान करता है. मैंने यहां सिर्फ समाचार साइटों का जिक्र किया है.

आलोक तोमर इस बारे में क्या कह रहे हैं उसके लिए उनकी अपनी जानकारी और छानबीन होगी. उनकी जानकारी और छानबीन का स्रोत क्या है वे तो वही जाने, फिर भी तथ्य और आंकड़ों न तो आलोक तोमर झुठला सकते हैं और न ही कोई और.

हिट्स, पेजलोड, विजिट और यूनिक विजिट का ऐसा पंगा है कि सही तथ्य तक पहुंचना ही मुश्किल है. ले देकर एलेक्सा ही थोड़ी जानकारी मुहैया कराता है. जिस साइट की असलियत जाननी हो एलेक्सा में चले जाइये, दावों और हकीकत का बहुत हद तक फैसला हो जाता है.

वेब दुनिया की जानकारी के लिए धन्यवाद. हिन्दी वेबसाइटों में फिलहाल कोई भी पूरे पानी में नहीं उतरा है क्योंकि अभी भी हिन्दी के कुल लाख सवा लाख पाठकों से ज्यादा होंगे इसमें पूरा संदेह है.
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paramjitbali on 24 August, 2009 14:06;42
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सुन्दर विश्लेषण मिथक और यथार्थ का।
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मंगल सैणचा on 24 August, 2009 21:51;03
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आप का आलेख प्यारा लगा. जानकारी में दम है.
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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