क्रिकेट का भांगड़ा टोपी, टीपू और लंगड़ा
मुकेश कुमार गुप्ता उर्फ एमके अगर बुकियों का किंग था तो रतन मेहता पंटर बिरादरी का बेताज बादशाह हुआ करता था। रतन मेहता ने 1990 में क्रिकेट पर सट्टा खेलना शुरू किया। वह हंस कुमार जैन, पोली और विकास सब्बरवाल नामक दिल्ली के कुख्यात बुकियों के यहां दांव लगाता था।
रतन मेहता दिल्ली में `मिनी महल´ नामक होटल चलाया करता था। उसका भारतीय क्रिकेट टीम के उप कप्तान अजय जाडेजा से गहरा याराना था। हालांकि रतन मेहता हमेशा दावा करता रहा कि उसने कभी कोई मैच फिक्स नहीं किया लेकिन पिच, टीम की अंदरूनी कहानी और प्रतिद्वंद्वी टीम की ताकत जानने के लिए वह अजय जाडेजा की पहुंच का हमेशा लाभ उठाता था। पाकिस्तान के कई खिलाड़ियों से रतन मेहता के मधुर संबंध थे। 1994-95 में वह पाकिस्तानी कप्तान जावेद मियांदाद से मिला था। पाकिस्तान के हरफनमौला खिलाड़ी वसीम अकरम, वकार यूनुस, इंजमाम उल हक और सईद अनवर से उसकी गहरी छनती थी। 1999 में जब पाकिस्तानी टीम भारत के दौरे पर आई तो पूरी पाकिस्तानी टीम रतन मेहता की मेहमान बनकर उसके रेस्तरां गई। रतन मेहता ने पाकिस्तान के हर खिलाड़ी का हाथ गरम किया था। 1997 में श्रीलंका-पाकिस्तान के बीच हुई श्रंखला के कई मैच रतन मेहता ने फिक्स किए थे। इसके चलते टीपू कोहली और रतन मेहता के बीच झगड़ा भी हुआ था। कई बार रतन मेहता पाकिस्तानी टीम के साथ उन्हीं होटलों में रूकता था जहां पाकिस्तानी टीम के सदस्य रूका करते थे। 1999 में अहमदाबाद टेस्ट के दौरान भारतीय टीम पाकिस्तान को फॉलोऑन देने की स्थिति में थी। उस समय रतन मेहता ने अपने प्रभाव से फॉलोऑन के निर्णय को बदलवा दिया था। इससे रतन मेहता के दोस्त पवन पुरी और शोभन मेहता को भारी फायदा हुआ था।
उत्तमचंद जैन उर्फ टोपी कपड़े के व्यवसाय के क्रिकेट की सट्टेबाजी करने लगा। उत्तमचंद जैन का बाप फेरी करके धोती और टोपी बेचा करता था। इसलिए उत्तमचंद जैन को लोग टोपी के नाम से जानने लगे। टोपी अपना कारोबार चेन्नई से संचालित करता था। 1988 से 1993 तक टोपी बुकी के रूप में सक्रिय था। बाद में शोभन मेहता, अनिल स्टील, लक्ष्मीचंद ठाणा, हितेश लंगड़ा, जयंत मालाड, कोठारी, जया, महादेव, कामाड़ी और विनोद चेंबूर नामक बुकियों से मुंबई में सौदा करता था। जबकि हंस, कोली, आनंद सक्सेना, सुनील दीपक और श्याम गुरुनानी से वह दिल्ली में सट्टा खेला करता था। मनोज प्रभाकर ने भारतीय क्रिकेट के सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी कपिल देव पर बेजा आरोप लगाया था। उसने कपिल देव पर कई बुकियों और पंटरों से संपर्क रखने का आरोप उछाला था। सीबीआई ने अपनी पूरी जांच में पाया कि कपिल देव का न किसी बुकि से संबंध था और न ही किसी पंटर से। टोपी अकेला सटोरिया था जो किसी समय कपिल देव को मिला था। चेन्नई के होटल अदयार पार्क शेरेटन में हीरालाल नामक व्यक्ति ने ताश का ग्रुप बैठाया था। उसमें कपिल देव भी शौकिया ताश खेलने बैठे थे। टोपी भी ताश खेलनेवाले समूह में बैठा था, लेकिन टोपी का दावा था कि कपिल देव उसे पहचानते नहीं थे। टोपी अन्य खिलाड़ियों से भी अपने संबंधों की बात होने से इनकार करता रहा। सीबीआई की टीम ने उसे उसके मोबाइल नंबर-9848037700 के जब प्रिंट आउट दिखाए और उस प्रिंट आउट में अजय जाडेजा के फोन नंबर- 9810034882 से तमाम कॉल आने-जाने का सबूत दिया तो टोपी टूटा। टोपी ने बताया कि मैच के दौरान वह अजय जाडेजा से बात कर टीम के गठन, मौसम अैर संभावित रिजल्ट के बारे में परामर्श किया करता था। जाडेजा से उसकी पहली मुलाकात चेन्नई के होटल चोला शेरेटन में हुई थी। पहली मुलाकात में ही उसने जाडेजा को एक लाख रूपयों का `गुडलक´ दिया था। बाद में उसने मुंबई के एक मैच के दौरान जाडेजा को पांच लाख पए का भुगतान किया। यह भुगतान मूलचंद नामक हवाला ऑपरेटरके माध्यम से किया गया था। राजेश कालरा नामक पंटर भी क्रिकेट के सट्टा बाजार का एक प्रमुख मोहरा हुआ करता था। राजेश कालरा दिल्ली के आनंद सक्सेना और पप्पू पालिका और मुंबई के यासिन नामक बुकी के यहां दांव लगाता था।
अजय जाडेजा, निखिल चोपड़ा और मनोज प्रभाकर नामक खिलाड़ियों से उसका संबंध था। मनोज प्रभाकर से उसकी पहली मुलाकात होटल पार्क रॉयल के जिम में हुई थी। कई बार मनोज प्रभाकर ने उसके साथ क्रिकेट पर 30 से 40 हजार रूपयों की रकम का सट्टा लगाया था। नागपुर के एक मैच के दौरान जो कि भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेला जा रहा था, में राजेश कालरा को निखिल चोपड़ा से टिप मिली थी। मुंबई के कुख्यात बुकी शोभन मेहता ने 1985 में एक छोटे पंटर के रूप में अपने क्रिकेट करियर की शुरूआत की थी। 1987-88 में वह क्रिकेट का बुकी बन गया। उसने मुंबई के अलावा जयपुर, चेन्नई, कोलकाता और दिल्ली में भी अपना जाल बिछा रखा था। सट्टे के कारोबार में उसका भाई अनीस उसकी मदद किया करता था। शोभन मेहता का मुंबई पुलिस में जबरदस्त प्रभाव है। 1992 में अमर नाईक गिरोह ने उसे धमकाया था। उसके बाद से किसी न किसी बहाने शोभन मेहता को हमेशा पुलिस की सुरक्षा प्राप्त रही है। 1999 में छोटा शकील गिरोह ने शोभन मेहता को धमकाया। मुंबई के पुलिस आयुक्त महेश नारायण सिंह उर्फ एमएन सिंह वैसे तो कानून और पुलिस की विशेषज्ञता का दावा किया करते हैं। किन्तु ये महोदय हमेशा शोभन मेहता पर फिदा रहते थे। इनके कार्यकाल में शोभन मेहता को जेड कैटेगरी की सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई गई थी। उन्हीं के कार्यकाल के दौरान उपायुक्त (इनफोर्समेंट) ने जब शोभन मेहता पर कार्रवाई कर दी तो एमएन सिंह उस पर लाल-पीले पड़ गए थे। एमएन सिंह की विदाई के बाद रंजीत सिंह शर्मा के कार्यकाल में उसी उपायुक्त ने एक मैच के दौरान शोभन मेहता को उठवा लिया। शोभन मेहता उसके सामने पड़ते ही सिर्फ एक तमाचा खाने पर अपनी पैंट गिली कर बैठा। अगर एमएन सिंह जैसे बेईमान लोग शोभन मेहता को प्रश्रय नहीं देते तो शोभन मेहता बारंबार भारतीय क्रिकेट टीम को खरीदने का पराक्रम नहीं करता। शोभन मेहता छोटा शकील के लिए मैच फिक्स करता था। उसने बाजार में खुद को सचिन तेंदुलकर की ससुराल का संबंधी बताकर अपना जलवा बना रखा था। हालांकि जब सीबीआई ने शोभन मेहता को पूछताछ के लिए बुलाया तो उसने साफ किया कि वह सचिन की पत्नी अंजलि का रिश्तेदार होना तो दूर उनकी शादी में भी उसे किसी ने नहीं बुलाया था।
बुकियों और पंटरों के बीच संचार नेटवर्क का काम मुंबई के दिलीप सेठ उर्फ सत्यम बाबा नामक व्यक्ति करता था। सत्यम बाबा ने अपना करियर मुंबई के भुलेश्वर रोड स्थित लाल बाबा मंदिर के पास एक दुकान से 1990 में पीसीओ/एसटीडी बूथ से शुरू किया था। उसके पास ईपीएबीएक्स की सुविधा के तहत लगभग 200 टेलीफोन लाइनों का एक्सचेंज था। 3777500 से 3777599 और 3777700 से 3777799 सीरीज के सारे नंबर महानगर टेलीफोन निगम के अधिकारियों से मिलीभगत से उसके पास थे। इस तरह वह लगभग 200 लाइनों का एक मिनी एक्सचेंज चलाता था। वह 112 लाइनें एकमुश्त संचालित कर रहा था। जिसमें से 102 लाइन उसने विभिन्न बुकियों को उपलब्ध करा दिया था और शेष 10 लाइनों को उसने इनकमिंग के लिए छोड़ रखा था। उसका यह एक्सचेंज विभिन्न बुकियों और पंटरों से जुड़ा हुआ था। उसकी इस मिनी एक्सचेंज व्यवस्था को `डिब्बा सिस्टम´ कहा जाता था। बुकी-पंटर मुंबई सहित पूरे भारत ही नहीं बल्कि विदेशों तक इसी एक्सचेंज के माध्यम से अपना सट्टा बुक करते थे। पूरा एक्सचेंज कंप्यूटर से जुड़कर रिकॉर्डिंग की सुविधा से युक्त था। टेलीफोन स्पीकर और रिकॉर्डिंग की सुविधा के चलते किसी मानवीय श्रम की आवश्यकता इस व्यवस्था में नहीं होती है। सत्यम बाबा के माध्यम से ही सीबीआई को पहली बार बुकी और पंटर के बीच चलने वाले क्रिकेट सट्टे के अत्याधुनिक प्रणाली का ज्ञान हुआ। इस ज्ञान के बावजूद आज दिन तक सत्यम बाबा जैसे दर्जनों लोग अपना डिब्बा क्रिकेट, विंबलडन, टेनिस और विश्वकप फुटबॉल के दौरान संचालित करते हैं।
मोबाइल और लैपटॉप सुविधा हो जाने के कारण अब किसी बुकी या पंटर को अपना डिब्बा चलाने के लिए किसी दुकान या फ्लैट की आवश्यकता नहीं। चूंकि दुकान या फ्लैट पर पुलिस वाले छापा मार सकते हैं। इसलिए शोभन मेहता, शेखर वडाला, हितेश लंगड़ा, लक्ष्मीचंद ठाणा, जयंती मालाड आदि बुकी इन दिनों लग्जरी कार में डिब्बा चलाने का प्रबंध करते हैं। मैच के दौरान टेलीविजन सेट अपनी वाहन में लगा उसी में सट्टा लेने-देने का कारोबार चलता है। पुलिस सेल्युलर नेटवर्क के सहयोग के बिना किसी चलते-फिरते डिब्बे पर दबिश डालने में समर्थ नहीं होती। ऐसे में पुलिस इस तरह के बुकियों से पंगा करने की बजाय मोटी रकम हफ्ते के रूप में वसूल लेने में अपना भला समझती है। जब भी बुकियों और पंटरों पर दबिश की खबर आए तो समझना चाहिए कि उस इलाके के बड़े अफसर ने बुकियों से अपना हफ्ता बढ़ाने का संदेश भेजा है। बुकियों और पंटरों के इस खेल में भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड उर्फ बीसीसीआई की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बीसीसीआई को जो पसंद नहीं आता वह क्रिकेट पर सौदे नहीं कर सकता।
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