सिर्फ नारा नहीं है कश्मीर की आजादी- मीरवाईज
मीरवाईज उमर फारूख हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमैन हैं. पहली बार वे पाकिस्तान समर्थक सैयद अली शाह गिलानी की तहरीके हुर्रियत के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. उमर फारूख हुर्रियत कांफ्रेस में उदार धड़े के नेता समझे जाते हैं और कश्मीर घाटी में छाये संकट के बीच दो बार प्रधानमंत्री से मिलकर बात कर चुके हैं. मिन्ट की डिप्लोमेटिक एडीटर ज्योति मल्होत्रा ने उनसे श्रीनगर में बातचीत की.
सवालः क्या घाटी में आजादी की आवाज को अपने दम पर नयी ताकत मिल गयी है?
जवाबः भारत के लोग जानते हैं कि कश्मीर में क्या हो रहा है, लेकिन वे जानबूझकर ऐसा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि जैसे यहां सब ठीक है. सड़कें बन रही हैं, अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, जनता खुश है, मोबाईल फोन बढ़ रहे हैं और कंपनियों कश्मीर में अपना कारोबार कर रही हैं. यह दिखाने की कोशिश हो रही है ट्युलिप गार्डेन में भरपूर हरियाली फैली हुई है. यह सब बातें तो ठीक हैं लेकिन असली सवाल है राजनीतिक स्थिरता की. दिल्ली ने हमेशा वास्तविकता को नकारने की कोशिश की है. मसलन, हां हम चुनाव में यकीन करते हैं लेकिन चुनाव तब होने चाहिए जब हमारी समस्या का स्थायी समाधान मिल जाए. विरोधाभासों के बीच आप चुनाव की बात कैसे कर सकते हैं? आप यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि कश्मीर में शासन व्यवस्था खराब है, आर्थिक गैरबराबरी है और आतंकवाद से मुकाबला कर रही सेना के कारण थोड़ी बहुत समस्या है. अगर आप घाटी में पिछले दो हफ्ते के हालात को देखें तो साफ हो जाता है कि हमने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के जरिए ही अपनी बात कही है जबकि जबकि जम्मू में लोग कारों को लूट रहे हैं और एटीएम जला रहे हैं.
सवालः आज का आपका संघर्ष ९० के संघर्ष से अलग कैसे है?
जवाबः पहली बार कश्मीर आंदोलन पाकिस्तान के फ्रेम से बाहर है. भारत के लोग समझते हैं कि यहां जो कुछ होता है वह पाकिस्तान के इशारे पर ही होता है. कोई यह नहीं जानना चाहता कि कश्मीर के लोग क्या कह रहे हैं? यही असल समस्या है. आपको मानना ही होगा कि कश्मीरी लोगों की अपनी पहचान है. यहां जो कुछ हो रहा है उसमें हर समय पाकिस्तान की भूमिका देखने की जरूरत नहीं है.
सवालः इस समय जो कश्मीर में हो रहा है उसे आप क्या कहेंगे?
जवाबः निश्चित रूप से यह कश्मीर की आजादी के लिए है. सवाल सिर्फ इतना है कि आप इस आजादी की परिभाषा कैसे करते हैं? आजादी केवल नारा नहीं, यह एक अवधारणा है. कश्मीर की जनता अपने भाग्य का फैसला खुद करना चाहती है. कश्मीरी लोगों का फैसला दिल्ली और इस्लामाबाद में बैठे लोग नहीं कर सकते. जम्मू में जिस तरह से हमारे ट्रकों को रोक दिया गया है उससे यहां की जनता में यह भावना दृढ़ हुई है कि हमें विकल्प की ओर देखना होगा. बंटवारे की भावना बहुत बढ़ गयी है. अब भारत समर्थक नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी भी हमारे साथ मिलना चाहते हैं.
सवालः आपकी प्रधानमंत्री से मुलाकात हुई थी. इस बारे में आप क्या कहेंगे?
जवाबः बस फोटो खिंचवाने भर की बात थी. अपनी मुलाकात में हमने दिल्ली से यह कहने की कोशिश की कि आप कश्मीर में काले कानूनों को खत्म करिए, सेना को वापस बुलाईये और जनता को अहसास होने दीजिए की शांति प्रक्रिया सचमुच में कुछ होती है.
सवालः उन्होंने क्या कहा?
जवाबः उन्होंने कहा कि मानवाधिकार के मुद्दे पर वे जीरो टालरेंस नीति को लागू करेंगे. उन्होंने यह भी कहा था कि कैदियों के बारे में भी समीक्षा करेंगे लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने कुछ नहीं किया. मुझे लगा कि वे (प्रधानमंत्री) जानबूझकर कुछ नहीं करना चाहते.
सवालः अगर प्रधानमंत्री हुर्रियत कांफ्रेस को बातचीत के लिए बुलाते हैं, तो क्या आप जाएंगे?
जवाबः केवल बात करने के लिए बात करने का कोई मतलब नहीं है. गंभीर बातचीत करने का वक्त आ गया है. कांग्रेस के प्रवक्ता कह रहे हैं कि कश्मीरी अवाम के साथ जो बातचीत होगी वह केवल संविधान के दायरे में ही होगी. अगर यही रवैया है तो हम क्या बात करेंगे? हम उन्हें याद दिलाना चाहते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि हमें हम इंसानियत के दायरे में बातचीत करेंगे. मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस नेतृत्व में ऐसी दूरदर्शिता है कि वे सार्थक बातचीत शुरू कर सकें.
सवालः तो आप इतना मानते हैं कि दिल्ली और कश्मीर के बीच बातचीत की संभावनाएं बन रही हैं?
जवाबः पहले भी भारत-पाकिस्तान और कश्मीरी अवाम के बीच साझा बातचीत हो चुकी है लेकिन मुझे दुख है कि भारत ने वह मौका गवां दिया था. पाकिस्तान में मुशर्रफ भी जा चुके हैं जो कि बहुत संजीदगी से कश्मीर मुद्दे पर आगे बढ़ने के लिए तैयार थे. यह मुशर्रफ ही थे जिन्होंने कहा था कि हम कश्मीरी हितों के लिए पाकिस्तान के हितों को कुर्बान करने के लिए तैयार हैं.
सवालः आपको लगता है कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह भी वैसा ही करेंगे?
जवाबः मुझे नहीं लगता. मनमोहन सिंह बहुत अच्छे आदमी हैं लेकिन वे ऐसी स्थिति में नहीं है कि वे कोई बड़ा निर्णय ले सकें. जहां तक सोनिया गांधी का सवाल है, वे कश्मीर मुद्दे से अपने आप को अलग ही रखना चाहेंगी क्योंकि वे खुद बाहर की है इसलिए भारत के राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर शायद ही बोलना चाहें. यह दिल्ली की राजनीतिक कमजोरी का ही नतीजा है कि कश्मीर को सेना के भरोसे संभाला जा रहा है.
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