लश्कर-ए-तैयबा (Lashkar-e-Taiba)
मुंबई पर आतंकी हमले के बाद जमात-उद-दावा (Jama'at ud Dawa) और लश्कर-ए-तैयबा(Lashkar-e-Taiba) का नाम एक बार फिर सुर्खियों में है. जमात पर प्रतिबंध का क्या कोई औचित्य है? लश्कर-ए-तोएबा पर भारत ने पिछले आठ साल से प्रतिबंध लगा रखा है. संयुक्त राष्ट्र, ब्रिटेन और खुद पाकिस्तान द्वारा पिछले पांच सालों से लश्कर-ए-तैयबा पर प्रतिबंध लगा हुआ है? नतीजा क्या है? प्रतिबंध के बाद लश्कर ने ज्यादा व्याहरिक होते जमात-उद-दवा के नाम से काम शुरू कर दिया. अब वह एक ऐसा जेहादी समूह बन गया है जिसका एक सामाजिक आधार है और जो आतंक के स्कूल ही नहीं चलाता अस्पतालों का भी संचालन करता है.
लश्कर-ए-तैयबा की स्थापना १९९० में अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में हुई थी. असल में लश्कर खुद मरकज दावा वल इरशाद का आतंकी विंग है. लश्कर का मुख्यालय जमात-उद-दवा के नाम पर अभी लाहौर के पास मुरीदके में नेशनल हाईवे नंबर 5 पर स्थित है जो लाहौर से गुजरावालां के बीच में है. मुरीदके में लश्कर-ए-तोएबा का मुख्यालय २०० एकड़ के विस्तृत भूखण्ड पर फैला हुआ है. मुरिदके भारत के कुछ प्रमुख शहरों से भी बहुत कम दूरी पर है. यहां से नजदीकी भारतीय शहर अमृतसर मात्र 67 किलोमीटर की दूरी पर है. मुरीदके स्थित लश्कर का मुख्यालय मध्य एशिया उसमें भी मुख्यतया सउदी अरब के दानदाताओं के पैसे से बनाया गया है.
मुरिदके के लश्कर मुख्यालय में एक मदरसा, एक अस्पताल, एक बाजार और विद्वानों तथा तालिबों के लिए छात्रावास मौजूद है. मुख्यालय के खान-पान के लिए आस-पास के खेतों में यहीं के लोगों द्वारा खेती की जाती है और मछली पालन भी होता है. इसके अलावा लश्कर-ए-तैयबा १६ इस्लामिक संस्थाएं, १३५ सेकेण्डरी स्कूल, एम्बुलेन्स सेवा और मदरसों का संचालन करता है. सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि अपनी धर्मांधता के लिए लोगों को लहू पीनेवाले लश्कर जेहादियों के लिए ब्लड बैंक भी चलाता है. लश्कर एक उर्दू मासिक अल-दावा का भी प्रकाशन करता है जिसकी प्रसार संख्या ८० हजार है. इसके अलावा अंग्रेजी में वाईस आफ इस्लाम, अरबी में अल-अरबात और उर्दू में ही जेहाद टाईम्स नाम की पत्रिकाओं का प्रकाशन किया जाता है. हाफिज मोहम्मद सईद लश्कर का मुखिया (अमीर) है. सईद यूनिवर्सिटी आफ इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नालाजी(लाहौर) में इस्लामिक अध्ययन विभाग में प्राध्यापक था. संगठन का प्रवक्ता याह्या मोहम्मद है. हाफिज मोहम्मद सईद का बेटा तलहा लश्कर के मुजफ्फराबाद बेसकैंप का प्रभारी है, जबकि उसका दामाद खालिद वालिद लाहौर स्थित लश्कर के दफ्तर का संचालन करता है. 
लश्कर के सांगठनिक ढांचे के तहत मोहम्मद सईद सुप्रीम कमाण्डर है, जियाउर्रहमान लखवी उर्फ चाचा कश्मीर का कमाण्डर, एबी रहमान डिपुटी सुप्रीम कमाण्डर, मसूद उर्फ महमूद एरिया कमाण्डर हैं. इसके अलावा कश्मीर के विभिन्न हिस्सों के लिए उसने कमाण्डर नियुक्त कर रखे हैं. हैदर-ए-करार उर्फ सीआई डिप्टी कमाण्डर, बांदीपोरा, उस्मानभाई उर्फ सैफुल इस्लाम डिप्टी कमाण्डर लोलाब, अब्दुल नवाज डिप्टी कमाण्डर सोगम, अबू रफी, डिवीजनल कमाण्डर बारामूला, मुसेब उर्फ सैफुल्ला डिप्टी कमाण्डर बड़गाम है. लश्कर-ए-तैयबा का कैडर जिला स्तर पर नियुक्त किया जाता है. हर जिले का प्रमुख जिला कमाण्डर होता है. हर जिले की ईकाई में प्रशिक्षण शिविर और एक शाखा कार्यालय की व्यवस्था होती है जो नये जिहादियों को भर्ती करने और चंदा जमा करने के लिए प्राधिकृत होता है. लश्कर का अधिकांश कैडर पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आता है. लेकिन इसकी शाखाएं सूडान, बहरीन, मध्य एशिया, तुर्की और लीबीया में भी हैं. इसके लगभग एक हजार जेहादी किसी भी समय पाकिस्तान में मौजूद रहते हैं. इसकी नीतियों का निर्धारण करने में संगठन के अमीर, नायब अमीर और मुख्य कोश प्रबंधक शामिल होते हैं. फील्ड स्तर पर किये जानेवाले फैसले चीफ कमाण्डर, डिविजनल कमाण्डर, जिला कमाण्डर और बटालियन कमाण्डर करते हैं.
पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में लश्कर-ए-तैयबा के 97 ट्रेनिंग कैंप सक्रिय हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण ठिकाने मुजफ्फराबाद, लरकाना, कलात, मरकन, डेरा गाजी खान, मीरपुर, सरगोधा, फैसलाबाद, लाहौर, पेशावर, इस्लामाबाद, रावलपिण्डी, मुल्तान, गुजरावाला, सियालकोट और गिलगित में मौजूद हैं. पूरे पाकिस्तान में लश्कर के लगभग २२०० शाखा कार्यालय हैं. इनके पास आधुनिक शस्त्रों का जखीरा है. लश्कर के शिविरों में दो स्तर पर सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है जिसे दौरा-ए-आम और दौरा-ए-खास कहा जाता है. एक मुजाहिद को दो माह के कोर्स में उलेमा बनाने के साथ-साथ एके श्रृंखला की राईफलों, लाईट मशीनगन और हैंड ग्रेनेड चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है. दौरा-ए-आम २१ दिनों का प्रशिक्षण होता है जबकि दौरा-ए-खास तीन महीने का विशेष प्रशिक्षण होता है. वैसे तो लश्कर यह कहता है कि फिदायीन हमला गैर-इस्लामी है लेकिन जब जैश-ए-मोहम्मद द्वारा फिदायीन (आत्मघाती) हमला बढ़ाने पर अरब के दानदाताओं में साख बढ़ गयी तो लश्कर ने भी फिदायीन गुटों की स्थापना शुरू कर दी. इनके दो फिदायीन दस्ते हैं. एक का नाम जान-ए-फिदायी है और दूसरे का इब्न-ए-तैयमिया है. लश्कर के फिदायीन गुटों ने जम्मू और कश्मीर में कई फिदायीन हमले किये हैं.
प्रतिबंध के बाद क्या होता है? लश्कर-ए-तैयबा प्रतिबंधित आतंकी संगठन है. भारत, अमेरिका और ब्रिटेन इसे प्रतिबंधित आतंकी संगठन घोषित कर चुके हैं जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान ने लश्कर की कार्यवाही पर ऊपरी तौर पर प्रतिबंध लगा रखा है. लेकिन जब भी किसी आतंकी हमले में लश्कर या उससे जुड़े किसी संगठन का नाम आता है तो पाकिस्तान सरकार कार्रवाई के नाम पर लश्कर के बोर्ड हटा देती है. बाकी काम पूर्ववत चलता रहता है. हाल में ही जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध लगाया गया है जो लश्कर का नया मुखौटा है. लेकिन प्रतिबंध के बावजूद उसके दावाती विंग और अशकारी विंग पूर्ववत काम कर रहे हैं. दावाती विंग का मुख्यालय लाहौर के मस्जिद कटसिआ में है और ऐसा समझा जाता है कि इस मस्जिद में 400-500 जेहादी आतंकवादी हमेशा मौजूद रहते हैं. इसी तरह अशकारी विंग मुजफ्फराबाद बस अड्डे से सात किलोमीटर दूर बियुटल मुजाहिद में है. ऐसा समझा जाता है कि इस 300 एकड़ के परिसर में कोई 700 के आस-पास जेहादी आतंकवादी हमेशा मौजूद रहते है.हिन्दुस्तान में इसकी सक्रियता का पहला प्रमाण १९९३ में मिला था जब जम्मू एवं कश्मीर के पुंछ जिले में लश्कर-ए-तोएबा के १२ पाकिस्तानी और अफगानिस्तानी आतंकवादी अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण रेखा से घुसे. उनकी यह घुसपैठ इंकलाबी महाज नामक संगठन के सहयोग से हुई थी. लेकिन पिछले तीन सालों से लश्कर भारत में अलकायदा का सबसे विश्वसनीय सहयोगी बना हुआ है.कश्मीर में शायद ही कोई हफ्ता ऐसा बीतता हो जब लश्कर के आतंकवादी कोई आतंकी वारदात न करते हों. पाकिस्तान से आकर दर्जनों आतंकवादी सरगना पिछले दस सालों से लगातार कश्मीर को अस्थिर करने का काम कर रहे हैं. भारत के सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने ११ अगस्त २००६ को स्वीकार किया था कि लश्कर इस समय पश्चिम एशिया, यूरोप और भारत में इतने व्यापक स्तर पर सक्रिय है कि कई बार वह खुद को अलकायदा के विकल्प के रूप में पेश करता है."ऐसा समझा जाता है कि अकेले भारत में इस समय लश्कर के 865 स्लीपिंग सेल सक्रिय हैं जो भारत के बारे में लगातार लश्कर को जानकारी मुहैया कराते रहते हैं. इंटेलिजेन्स सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान और भारत के अलावा अरब, ब्रिटेन, बांग्लादेश और दक्षिण पूर्व एशिया में भी लश्कर बड़े पैमाने पर सक्रिय है.
अलकायदा के माध्यम से इसके लड़ाके फिलीपींस, मध्य पूर्व एशिया, चेचेन्या में भी लड़ते हैं. सर्बिया, बोस्निया और इराक में भी लश्कर के लड़ाके पकड़े जा चुके हैं. अमेरिका और आष्ट्रेलिया में लश्कर के स्लीपर सेल होने की आशंका जताई जा रही है. लश्कर को चंदा देनेवाली प्रमुख संस्थाओं में जर्मनी स्थित अल-मोहाजिराऊन और उत्तरी लंदन स्थित अबू हमजा मस्जिद का नाम लिया जाता है. इसके अलावा सऊदी अरब, कुवैत, यमन, ओमान, कोसोवा, बांग्लादेश, म्यांमार, अमेरिका, फिलीस्तीन, बोस्निया और चेचेन्या से भी बड़े पैमाने पर इस्लामी सम्मेलन आयोजित करके लश्कर के लिए चंदा जुटाया जाता है.
तमाम हमले करने के बाद भी लश्कर का काम बेरोक-टोक जारी है. जब भी किसी वारदात में लश्कर का नाम आता है तो पाकिस्तान सरकार दिखावे के लिए लश्कर के अमीर मोहम्मद हाफिज सईद को नजरबंद कर देती है और मामला शांत होते ही उसकी रिहाई हो जाती है. पिछले तीन सालों में यह खेल तीन बार हो चुका है. यह चौथी बार है जब पाकिस्तान सरकार हाफिज सईद के साथ आंख-मिचौली खेल रही है. कभी भी न तो लश्कर का कोई ट्रेनिंग सेंटर बंद किया जाता है न ही उसके काम-काज पर कोई रोक लगती है. उल्टे इस तरह वैश्विक स्तर पर प्रचार पाने से उसके दान-दाताओं में उसकी साख बढ़ती है और पेट्रो डालर से हाफिज सईद की तिजोरियां और भरने लगती है.
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