Home | परत-दर-परत | लश्कर-ए-तैयबा (Lashkar-e-Taiba)

लश्कर-ए-तैयबा (Lashkar-e-Taiba)

image मुरिदके स्थित लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय

मुंबई पर आतंकी हमले के बाद जमात-उद-दावा (Jama'at ud Dawa) और लश्कर-ए-तैयबा(Lashkar-e-Taiba) का नाम एक बार फिर सुर्खियों में है. जमात पर प्रतिबंध का क्या कोई औचित्य है? लश्कर-ए-तोएबा पर भारत ने पिछले आठ साल से प्रतिबंध लगा रखा है. संयुक्त राष्ट्र, ब्रिटेन और खुद पाकिस्तान द्वारा पिछले पांच सालों से लश्कर-ए-तैयबा पर प्रतिबंध लगा हुआ है? नतीजा क्या है? प्रतिबंध के बाद लश्कर ने ज्यादा व्याहरिक होते जमात-उद-दवा के नाम से काम शुरू कर दिया. अब वह एक ऐसा जेहादी समूह बन गया है जिसका एक सामाजिक आधार है और जो आतंक के स्कूल ही नहीं चलाता अस्पतालों का भी संचालन करता है.

लश्कर-ए-तैयबा की स्थापना १९९० में अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में हुई थी. असल में लश्कर खुद मरकज दावा वल इरशाद का आतंकी विंग है. लश्कर का मुख्यालय जमात-उद-दवा के नाम पर अभी लाहौर के पास मुरीदके में नेशनल हाईवे नंबर 5 पर स्थित है जो लाहौर से गुजरावालां के बीच में है. मुरीदके में लश्कर-ए-तोएबा का मुख्यालय २०० एकड़ के विस्तृत भूखण्ड पर फैला हुआ है. मुरिदके भारत के कुछ प्रमुख शहरों से भी बहुत कम दूरी पर है. यहां से नजदीकी भारतीय शहर अमृतसर मात्र 67 किलोमीटर की दूरी पर है. मुरीदके स्थित लश्कर का मुख्यालय मध्य एशिया उसमें भी मुख्यतया सउदी अरब के दानदाताओं के पैसे से बनाया गया है.

मुरिदके के लश्कर मुख्यालय में एक मदरसा, एक अस्पताल, एक बाजार और विद्वानों तथा तालिबों के लिए छात्रावास मौजूद है. मुख्यालय के खान-पान के लिए आस-पास के खेतों में यहीं के लोगों द्वारा खेती की जाती है और मछली पालन भी होता है. इसके अलावा लश्कर-ए-तैयबा १६ इस्लामिक संस्थाएं, १३५ सेकेण्डरी स्कूल, एम्बुलेन्स सेवा और मदरसों का संचालन करता है. सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि अपनी धर्मांधता के लिए लोगों को लहू पीनेवाले लश्कर जेहादियों के लिए ब्लड बैंक भी चलाता है. लश्कर एक उर्दू मासिक अल-दावा का भी प्रकाशन करता है जिसकी प्रसार संख्या ८० हजार है. इसके अलावा अंग्रेजी में वाईस आफ इस्लाम, अरबी में अल-अरबात और उर्दू में ही जेहाद टाईम्स नाम की पत्रिकाओं का प्रकाशन किया जाता है. हाफिज मोहम्मद सईद लश्कर का मुखिया (अमीर) है. सईद यूनिवर्सिटी आफ इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नालाजी(लाहौर) में इस्लामिक अध्ययन विभाग में प्राध्यापक था. संगठन का प्रवक्ता याह्या मोहम्मद है. हाफिज मोहम्मद सईद का बेटा तलहा लश्कर के मुजफ्फराबाद बेसकैंप का प्रभारी है, जबकि उसका दामाद खालिद वालिद लाहौर स्थित लश्कर के दफ्तर का संचालन करता है.
लश्कर प्रमुख मोहम्मद हाफिज सईद
लश्कर के सांगठनिक ढांचे के तहत मोहम्मद सईद सुप्रीम कमाण्डर है, जियाउर्रहमान लखवी उर्फ चाचा कश्मीर का कमाण्डर, एबी रहमान डिपुटी सुप्रीम कमाण्डर, मसूद उर्फ महमूद एरिया कमाण्डर हैं. इसके अलावा कश्मीर के विभिन्न हिस्सों के लिए उसने कमाण्डर नियुक्त कर रखे हैं. हैदर-ए-करार उर्फ सीआई डिप्टी कमाण्डर, बांदीपोरा, उस्मानभाई उर्फ सैफुल इस्लाम डिप्टी कमाण्डर लोलाब, अब्दुल नवाज डिप्टी कमाण्डर सोगम, अबू रफी, डिवीजनल कमाण्डर बारामूला, मुसेब उर्फ सैफुल्ला डिप्टी कमाण्डर बड़गाम है. लश्कर-ए-तैयबा का कैडर जिला स्तर पर नियुक्त किया जाता है. हर जिले का प्रमुख जिला कमाण्डर होता है. हर जिले की ईकाई में प्रशिक्षण शिविर और एक शाखा कार्यालय की व्यवस्था होती है जो नये जिहादियों को भर्ती करने और चंदा जमा करने के लिए प्राधिकृत होता है. लश्कर का अधिकांश कैडर पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आता है. लेकिन इसकी शाखाएं सूडान, बहरीन, मध्य एशिया, तुर्की और लीबीया में भी हैं. इसके लगभग एक हजार जेहादी किसी भी समय पाकिस्तान में मौजूद रहते हैं. इसकी नीतियों का निर्धारण करने में संगठन के अमीर, नायब अमीर और मुख्य कोश प्रबंधक शामिल होते हैं. फील्ड स्तर पर किये जानेवाले फैसले चीफ कमाण्डर, डिविजनल कमाण्डर, जिला कमाण्डर और बटालियन कमाण्डर करते हैं.

पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में लश्कर-ए-तैयबा के 97 ट्रेनिंग कैंप सक्रिय हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण ठिकाने मुजफ्फराबाद, लरकाना, कलात, मरकन, डेरा गाजी खान, मीरपुर, सरगोधा, फैसलाबाद, लाहौर, पेशावर, इस्लामाबाद, रावलपिण्डी, मुल्तान, गुजरावाला, सियालकोट और गिलगित में मौजूद हैं. पूरे पाकिस्तान में लश्कर के लगभग २२०० शाखा कार्यालय हैं. इनके पास आधुनिक शस्त्रों का जखीरा है. लश्कर के शिविरों में दो स्तर पर सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है जिसे दौरा-ए-आम और दौरा-ए-खास कहा जाता है. एक मुजाहिद को दो माह के कोर्स में उलेमा बनाने के साथ-साथ एके श्रृंखला की राईफलों, लाईट मशीनगन और हैंड ग्रेनेड चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है. दौरा-ए-आम २१ दिनों का प्रशिक्षण होता है जबकि दौरा-ए-खास तीन महीने का विशेष प्रशिक्षण होता है. वैसे तो लश्कर यह कहता है कि फिदायीन हमला गैर-इस्लामी है लेकिन जब जैश-ए-मोहम्मद द्वारा फिदायीन (आत्मघाती) हमला बढ़ाने पर अरब के दानदाताओं में साख बढ़ गयी तो लश्कर ने भी फिदायीन गुटों की स्थापना शुरू कर दी. इनके दो फिदायीन दस्ते हैं. एक का नाम जान-ए-फिदायी है और दूसरे का इब्न-ए-तैयमिया है. लश्कर के फिदायीन गुटों ने जम्मू और कश्मीर में कई फिदायीन हमले किये हैं.

प्रतिबंध के बाद क्या होता है? लश्कर-ए-तैयबा प्रतिबंधित आतंकी संगठन है. भारत, अमेरिका और ब्रिटेन इसे प्रतिबंधित आतंकी संगठन घोषित कर चुके हैं जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान ने लश्कर की कार्यवाही पर ऊपरी तौर पर प्रतिबंध लगा रखा है. लेकिन जब भी किसी आतंकी हमले में लश्कर या उससे जुड़े किसी संगठन का नाम आता है तो पाकिस्तान सरकार कार्रवाई के नाम पर लश्कर के बोर्ड हटा देती है. बाकी काम पूर्ववत चलता रहता है. हाल में ही जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध लगाया गया है जो लश्कर का नया मुखौटा है. लेकिन प्रतिबंध के बावजूद उसके दावाती विंग और अशकारी विंग पूर्ववत काम कर रहे हैं. दावाती विंग का मुख्यालय लाहौर के मस्जिद कटसिआ में है और ऐसा समझा जाता है कि इस मस्जिद में 400-500 जेहादी आतंकवादी हमेशा मौजूद रहते हैं. इसी तरह अशकारी विंग मुजफ्फराबाद बस अड्डे से सात किलोमीटर दूर बियुटल मुजाहिद में है. ऐसा समझा जाता है कि इस 300 एकड़ के परिसर में कोई 700 के आस-पास जेहादी आतंकवादी हमेशा मौजूद रहते है.हिन्दुस्तान में इसकी सक्रियता का पहला प्रमाण १९९३ में मिला था जब जम्मू एवं कश्मीर के पुंछ जिले में लश्कर-ए-तोएबा के १२ पाकिस्तानी और अफगानिस्तानी आतंकवादी अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण रेखा से घुसे. उनकी यह घुसपैठ इंकलाबी महाज नामक संगठन के सहयोग से हुई थी. लेकिन पिछले तीन सालों से लश्कर भारत में अलकायदा का सबसे विश्वसनीय सहयोगी बना हुआ है.कश्मीर में शायद ही कोई हफ्ता ऐसा बीतता हो जब लश्कर के आतंकवादी कोई आतंकी वारदात न करते हों. पाकिस्तान से आकर दर्जनों आतंकवादी सरगना पिछले दस सालों से लगातार कश्मीर को अस्थिर करने का काम कर रहे हैं. भारत के सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने ११ अगस्त २००६ को स्वीकार किया था कि लश्कर इस समय पश्चिम एशिया, यूरोप और भारत में इतने व्यापक स्तर पर सक्रिय है कि कई बार वह खुद को अलकायदा के विकल्प के रूप में पेश करता है."ऐसा समझा जाता है कि अकेले भारत में इस समय लश्कर के 865 स्लीपिंग सेल सक्रिय हैं जो भारत के बारे में लगातार लश्कर को जानकारी मुहैया कराते रहते हैं. इंटेलिजेन्स सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान और भारत के अलावा अरब, ब्रिटेन, बांग्लादेश और दक्षिण पूर्व एशिया में भी लश्कर बड़े पैमाने पर सक्रिय है.

अलकायदा के माध्यम से इसके लड़ाके फिलीपींस, मध्य पूर्व एशिया, चेचेन्या में भी लड़ते हैं. सर्बिया, बोस्निया और इराक में भी लश्कर के लड़ाके पकड़े जा चुके हैं. अमेरिका और आष्ट्रेलिया में लश्कर के स्लीपर सेल होने की आशंका जताई जा रही है. लश्कर को चंदा देनेवाली प्रमुख संस्थाओं में जर्मनी स्थित अल-मोहाजिराऊन और उत्तरी लंदन स्थित अबू हमजा मस्जिद का नाम लिया जाता है. इसके अलावा सऊदी अरब, कुवैत, यमन, ओमान, कोसोवा, बांग्लादेश, म्यांमार, अमेरिका, फिलीस्तीन, बोस्निया और चेचेन्या से भी बड़े पैमाने पर इस्लामी सम्मेलन आयोजित करके लश्कर के लिए चंदा जुटाया जाता है.

तमाम हमले करने के बाद भी लश्कर का काम बेरोक-टोक जारी है. जब भी किसी वारदात में लश्कर का नाम आता है तो पाकिस्तान सरकार दिखावे के लिए लश्कर के अमीर मोहम्मद हाफिज सईद को नजरबंद कर देती है और मामला शांत होते ही उसकी रिहाई हो जाती है. पिछले तीन सालों में यह खेल तीन बार हो चुका है. यह चौथी बार है जब पाकिस्तान सरकार हाफिज सईद के साथ आंख-मिचौली खेल रही है. कभी भी न तो लश्कर का कोई ट्रेनिंग सेंटर बंद किया जाता है न ही उसके काम-काज पर कोई रोक लगती है. उल्टे इस तरह वैश्विक स्तर पर प्रचार पाने से उसके दान-दाताओं में उसकी साख बढ़ती है और पेट्रो डालर से हाफिज सईद की तिजोरियां और भरने लगती है.

Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
visfot news network विस्फोट.कॉम इंटरनेट पर नये दौर की पत्रकारिता में परंपरागत मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है, जो कि पूरी तरह से जनकेन्द्रित, वास्तविक और निहित स्वार्थी तत्वों के प्रभाव से मुक्त है. हमारा संपर्क है visfot@visfot.com
Rate this article
5.00
More from परत-दर-परत
Previous
image
इस्लामी रणनीति है हिन्दू आतंकवाद का हौव्वा
क्या देश में हिन्दू आतंकवाद पूरी तरह पैर पसार चुका है जो उतना ही खतरनाक है जितना कि अरब के पैसे से पलनेवाला बहावी आतंकवाद? भारत में कुछ छुटपुट ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्हें न केवल आतंकी घटनाओं के समान बनाकर पेश किया गया बल्कि उनका हिन्दू कनेक्शन भी साबित करने की कोशिश की गयी. प्रेम शुक्ल की पड़ताल है कि भारत में हिन्दू आतंकवाद का हौव्वा भी इस्लामिक चमपंथी विचारकों और रणनीतिकारों की "फेश सेविंग एक्सरसाइज" है िजसमें उन्हें मुस्लिम वोट की लालची सरकार का संरक्षण मिला हुआ है. ...
image
कंधमाल: सांप्रदायिक धुव्रीकरण नई चुनौती
कंधमाल की आग उड़ीसा से अधिक अब राजधानी दिल्ली में धधक रही है. पिछले महीने 22 से 24 अगस्त के बीच दिल्ली में चर्च संगठनों द्वारा एक जनसुनवाई करके यह साबित करने की कोशिश की गयी कि कंधमाल में दंगा पीड़ितों का पुनर्वास नहीं हो रहा है. इस जन-सुनवाई के संयाजकों में जॉन दयालॅ, कटक-भुवनेश्वर के बिशप रिफेल चैनथ एवं वामपंथी विचाराधरा सहमत की माला हाशमी प्रमुख थी....
image
सुलझी हुई समस्या को उलझाने पर आमादा
आज जो लोग भी कश्मीर की समस्या निपटाने निकले हैं सवाल पैदा होता है क्या उन्हें कश्मीर की समस्या का ओर-छोर भी पता है? क्या राहुल गांधी और ओमर अब्दुल्ला की नयी पीढी १९४७ से २०१० के बीच कश्मीर में क्या हुआ है उसकी प्रामाणिक जानकारी से लैस भी है? यदि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार कश्मीर की स्थिति को ठीक से समझ ही रही होती तो क्या पिछले ६ वर्षों के शासनकाल में उसने एक सुलझ चुकी समस्या को उलझा लेने की मूर्खता की होती?...
image
छत्तीस हुआ तिरसठ का आंकड़ा
सोनिया गांधी बीते शुक्रवार को चौथी बार कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयी .उनके इस चयन के साथ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में सत्ता परिवर्तन का निर्णायक दौर शुरू हो जाएगा. सोनिया गांधी अपने पति राजीव गांधी की १९९१ में हत्या के बाद राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखने के लिए जिस अंदाज में १०,जनपथ से कांग्रेस की राजनीति का नियंत्रण रखने का परोक्ष-अपरोक्ष प्रयास करती रही हैं उसका एकमेव उद्देश्य रहा है अपने पुत्र राहुल गांधी को एक दिन इस देश का प्रधानमंत्री बनाना....
image
चीन के सामने दीन हीन
पिछले कुछ वर्षों से चीन हिन्दुस्तान को पूर्वोत्तर तथा जम्मू एवं कश्मीर के मसले में अनावश्यक आँख तरेरने लगा है. चीन के इस दुस्साहस के लिए हिन्दुस्तान सरकार की अनावश्यक मिमियाहट जिम्मेदार है. जुलाई के महीने में चीन ने हिंदुस्तानी सेना के उत्तरी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस.जसवाल को बीजिंग का वीजा यह कह कर नकार दिया कि वे विवादास्पद क्षेत्र के सैन्य प्रमुख हैं. लेफ्टिनेंट जनरल जसवाल का वीजा मध्य जुलाई माह में नकारा गया। इसके बाद ११ अगस्त को निर्वासित तिब्बतियों की सरकार के प्रमुख दलाई लामा हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह से मिले तो इस पर चीनी राजनायिक इतने गरम हो गए कि हिन्दुस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान चीन के समक्ष याचना वाली मुद्रा में खड़ा हो गया....
image
संसद का हाल: सांसद को पसंद केवल बवाल
पंद्रहवीं लोकसभा ने एक साल पूरे कर लिये हैं. यह साल वैसे तो कामकाज के लिहाज से ऐसी किसी खास उपलब्धि का नहीं रहा है जिसके लिए संसद का पिछला एक साल याद किया जाए लेकिन क्या पूरे साल सांसदों ने उस 'बिजनेस' में हिस्सा लिया जिसके लिए जनता ने उन्हें चुनकर सदन तक पहुंचाया है? संसद के कामकाज के बारे में आम धारणा यही है कि संसद में जनता के अपेक्षाओं के अनुरूप काम काज नहीं होता. संसद जितनी चलती है उससे अधिक ठप रहती है. अब वेतनवृद्धि के बाद एक नयी तोहमत और लग गयी है कि देश की जनता मंहगाई से परेशान है और सरकार ने जनप्रतिनिधियों का वेतन चार गुना बढ़ा दिया. सवाल है कि क्या हमारे सांसद सचमुच जनता की उम्मीदों और अपेक्षाओं पर पानी फेर रहे हैं?...
image
गांधी का स्वराज बनाम जिन्ना जवाहर का कुराज
देश का ६४ वां स्वतन्त्रता दिवस बीत गया. कुछ सरकारी-अर्ध सरकारी, निजी, राजनीतिक समारोहों की औपचारिकता के अलावा अब १५ अगस्त का दिन एक सार्वजनिक अवकाश के सिवा शायद ही किसी अन्य महत्त्व का शेष रह गया हो. साल दर साल आजादी के गौरव के प्रति आम आदमी उसी तरह अनभिज्ञ होता जा रहा है जिस तरह राही मासूम रजा के उपन्यास की एक स्त्री पात्र पाकिस्तान को नजदीकी शहर में बनने वाली कोई मस्जिद समझ रही थी. ऐसा क्यों? क्योंकि ६३ साल पहले इस देश को आज़ादी के नाम पर एक सत्तान्तारण जरूर मिल गया था पर जिस स्वराज की परिकल्पना लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी कर रहे थे, वह स्वराज हिन्दुस्तान को आज दिन तक नसीब नहीं है....
image
हिंदू धर्म और हिंदुत्व में फर्क
हिंदू धर्म भारत का प्राचीन धर्म है। इसमें बहुत सारे संप्रदाय हैं। संप्रदायों को मानने वाला व्यक्ति अपने आपको हिंदू कहता है लेकिन हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है जिसका प्रतिपादन 1924 में वीडी सावरकर ने अपनी किताब 'हिंदुत्व में किया था। सावरकर इटली के उदार राष्ट्रवादी चिंतक माजिनी से बहुत प्रभावित हुए थे। उनके विचारों से प्रभावित होकर ही उन्होंने हिंदुत्व का राजनीतिक अभियान का मंच बनाने की कोशिश की थी।...
image
जरूरी है जाति की जनगणना
जाति आधारित जनगणना आखिरी बार 1931 में हुई थी। 1941 में सरकार का पूरा ध्यान दूसरे विश्व युद्ध पर था जिसके चलते जनगणना नहीं हो पाई। आजादी के बाद जब 1951 में पहली जनगणना शुरू हुई तो जाति का मसला उठाया गया। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा कि जाति आधारित जनगणना से सामाजिक ताना-बाना बिखर जाएगा। उन्होंने इसे राष्ट्रभंजक मांग बताते हुए अस्वीकार कर दिया था।...
image
सारे जहां में धूम हमारे ज़बां की है
कभी उर्दू की धूम सारे जहां में हुआ करती थी, दक्षिण एशिया का बेहतरीन साहित्य इसी भाषा में लिखा जाता था और उर्दू जानना पढ़े लिखे होने का सबूत माना जाता था। अब वह बात नही है। राजनीति के थपेड़ों को बरदाश्त करती भारत की यह भाषा आजकल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वह उर्दू जो आज़ादी की ख्वाहिश के इज़हार का ज़रिया बनी आज एक धर्म विशेष के लोगों की जबान बताई जा रही है।...
image
लालू की करनी पर नीतीश की भरनी
हाल में ही बिहार की विधानसभा में जो कुछ हुआ उसने लोकतन्त्र को शर्मिन्दा तो किया ही है, लेकिन लोकतन्त्र भी अब ऐसी शर्मिन्दगी बार-बार झेलने को अभिशप्त है, और हम सब इसके आदी हो चुके हैं। बिहार विधानसभा में लालूप्रसाद और कांग्रेस ने जो हंगामा और तोड़फ़ोड़ की उसके पीछे कारण यह दिया गया कि महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि सन् 2002 से 2007 के बीच शासकीय कोषालय से करोड़ों रुपये निकाले गये और उनका बिल प्रस्तुत नहीं किया गया।...
image
पूर्वोत्तर की आत्मघाती उपेक्षा
देश के पूरबी छोर पर स्थित प्रदेश मणिपुर को देश के अन्य हिस्सों से जोडने वाले राजमार्गो पर करीब दो महीने तक चली नाकेबंदियों की वजह से आवाजाही बंद रही। पूरे प्रदेश में खाने-पीने की चीजों, जीवनरक्षक दवाओं और पेट्रोलियम पदार्थों की घोर किल्लत उत्पन्न हो गई। सेना के विमानों की सहायता से अत्यावश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने की व्यवस्था हुई, पर ऐसी व्यवस्थाओं की अपनी सीमाएं होती है और इनसे जनजीवन को सामान्य तरीके से संचालित नहीं किया जा सकता। हालत आज भी कोई सुधरे नहीं है क्योंकि समस्या की जड़ें उसी तरह मजबूती से गड़ी हुई हैं....
image
कश्मीर की विरासत है आजादी
कश्मीर में एक बार परिस्थितियां इतनी बिगड़ी कि केन्द्रीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ गयी. घाटी के मुहाने पर एक बार फिर सेना को बैठाना पड़ा. हालांकि अब घाटी में फौरी तौर पर शांति है लेकिन क्या कश्मीर में समस्या का समाधान सिर्फ केन्द्र सरकार का हस्तक्षेप है. शेष नारायण सिंह मानते हैं कि कश्मीर में अशांति के कारण गहरे हैं. कश्मीर पर पाकिस्तान का बेजा दावा और भारत का 'अनावश्यक' हस्तक्षेप समस्या का मूल कारण बन गया है. इसका निदान किये बिना कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है. ...
image
कितना कामयाब होगा मुलायम का माफीनामा
जैसे तलाक देने के लिये तलाक को तीन बार बोला जाता है बिल्कुल इसी अंदाज मे सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह से अपने संबधो को लेकर माफी मांग कर मुसलमानो को रिझाने के लिये फिर से ट्रांपकार्ड फेंका है। अब देखना है कि मुलायम का यह ट्रांपकार्ड क्या हकीकत मे मुसलमानो को रिझाने मे कामयाब होगा।...
image
शिवाजी के शौर्य को कलंकित करने का षण्यंत्र
छत्रपति शिवाजी के अपमान के मुद्दे पर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरम है. संभाजी ब्रिगेड जिसने पिछली बार भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बोरी) की तोड़-फोड़ की थी. इस बार महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल पर हमले का षण्यंत्र रचा था जिससे वे शनिवार को बाल बाल बच गये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जेम्स लेन की विवादास्पद पुस्तक "शिवाजी- द हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया" की बिक्री के लिए जिस अंदाज में छूट मिली है, उस पर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कई संगठन आंदोलनरत हैं. लेकिन हम पहले यह समझ लें कि यह जेम्स लेन महाशय हैं कौन और उन्होंने किताब आखिर किस इरादे से लिखी है?...
image
बेमतलब हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस
हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है जो 1987 से हर साल 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विश्व की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं।...
image
रमन सिंह की दमनकारी औद्योगिक नीति
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह नक्सली आंदोलन के खिलाफ चलनेवाले अभियान के अगुआ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन रमण सिंह इस आंदोनल को किसके इशारे पर कुचल रहे हैं? क्या वे आम आदमी और आदिवासियों के हित में नक्सली आंदोलन को कुचलने का दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं या फिर उनका एजेण्डा कुछ और है. हाल में ही छत्तीसगढ़ की नयी औद्योगिक नीति की समीक्षा करें तो साफ हो जाता है कि असल में यह संघर्ष वे किसके लिए कर रहे हैं. ...
Next
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2