मानवाधिकार बचाने की कमाई
दंतेवाडा़ के सलवा जुडूम कैंप को देखने के बाद मैंने रायपुर की ओर कूच कर दिया। मैं जानना चाहता था कि भारी-भरकम बजट और विदेशी सहयोगियों के सहारे चलनेवाले मानवाधिकार आंदोलनों का जमीनी जुड़ाव क्या है और ऐसा करने के पीछे उनके अपने तर्क क्या हैं?
मन में यह सवाल था कि सुरक्षाकर्मी यदि लोगों के मानवाधिकार का हनन कर रहे हैं तो नक्सली क्या कर रहे हैं? रायपुर में रहकर कई तरह की बातें मानवाधिकारवादियों के बारे में सुनने को मिल रही थी। जिनमें से एक था कि मानवाधिकारवादी सलवा जुडूम का विरोध करके नक्सलवाद को जस्टीफाई कर रहे हैं। दूसरी ओर महेंद्र कर्मा तथा डीजीपी विश्वरंजन से जब मुलाकात हुई तो उन्होंने इस तरह की कवायदों को सलवा जुडूम के खिलाफ एक दुष्प्रचार करार दिया। डीजीपी ने तो यहां तक कहा कि दुष्प्रचार करने वालों को यह तय करना होगा कि आप किसके साथ हैं, प्रजातांत्रिक व्यवस्था के साथ या फिर नक्सलवाद के साथ, यदि आप नक्सलवाद के साथ हैं तो आपको इस देश के संविधान के मुताबिक यहां की सुरक्षा एजेंसियों से कोई नहीं बचा पाएगा।
इस तरह उहापोह को लेकर मैंने किसी मानवाधिकार कार्यकर्ता से मिलकर जिज्ञासा शांत करने का निर्णय लिया। रायपुर पहुंचकर मैंने मानवाधिकार कार्यकर्ता सुभाष महापात्र को फोन लगाया तो किसी महिला ने फोन उठाया और कहा कि आप आ जाइये, सुभाष जी अभी घर पर ही मिलेंगे। सवेरे ही मैं ऑटो पकड़ कर सुभाष महापात्र के महावीर नगर स्थित घर की तरफ निकल पड़ा। रास्ते में मैं डीजीपी विश्वरंजन की वह बात बार बार मस्तिष्क में झंझावात उत्पन्न कर रही थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि `नक्सली इस देश का संविधान ही नहीं चाहते हैं।´ फिर नक्सलवादियों के आदर्श माने जाने वाले `माओ´ की बात भी याद आती है कि `सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है।´ मन में सवाल उठ रहा था कि क्या नक्सलवाद वास्तव में इस देश के संविधान, प्रजातंत्र के लिए ख़तरा है?
यही सब सोचते सोचते मैं महावीर नगर के नाके पर पहुंच गया, मुझे वहां से एमआईजी-22 सहयोग अपार्टमेंट जाना था। पूछने पर पता चला कि सहयोग अपार्टमेंट अभी करीब डेढ़ दो किलोमीटर की दूरी पर है। रिक्शे में बैठकर मैं सहयोग अपार्टमेंट की तरफ चल पड़ा। सहयोग अपार्टमेंट पहुंचकर रिक्शा छोड़कर पैदल ही एमआईजी-22 को खोजना शुरु कर दिया। कई गलियों में ढूंढा, लेकिन जब नहीं मिला तो मैने एक लड़के से पूछा। उस लड़के ने कहा कि `भाई साहब यहां कई लोग आते हैं जो एमआईजी-22 के बारे में पूछते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि यह पता ही गलत है।´ उसकी बात सुनकर एक बार तो मैं चकरा गया और संदिग्धता तनिक और बढ़ गई। लेकिन मैं उस गली से बाहर निकल कर आया और नुक्कड़ के एक जनरल स्टोर के मालिक से पता पूछा तो उसने इशारा करते हुए बताया कि उस गली के कोने पर एमआईजी-21 है और एमआईजी-22 भी वहीं होना चाहिए। इतना बताकर उस व्यक्ति के मुंह से सहज ही निकल पड़ा कि वहां तो विदेशी (अंग्रेज) रहते हैं। उसकी बात सुनकर मुझे विश्वास सा हो गया कि हो न हो, वही मेरा गंतव्य स्थान है, क्योंकि अपने देशवासियों के मानवाधिकार की वकालत हम खुद तो कर ही नहीं सकते न, इसके लिए हमें विदेशियों की शरण में जाना ही पड़ता है। वहां जाकर देखा तो एक बड़े से मकान के बाहर बड़ा सा लोहे का गेट लगा हुआ था। गेट पर एक आदिवासी पुरुष लुंगी लपेटे खड़ा था और लुंगी के दूसरे सिरे को घुमाकर उसने कंधे पर रखकर अपने एक हाथ को ढका हुआ था। ध्यान से देखने पर पता चला कि उसका वह हाथ जिसको ढका गया था, इंजर्ड होने के कारण सूजा हुआ था। उस घायल आदिवासी को देखकर यह तो निश्चित हो गया था कि यही मानवाधिकार कार्यकर्ता का घर होना चाहिए।
मैंने उस आदमी को बुलाकर दरवाजा खोलने के लिए इशारा किया। पहले तो आदिवासियों की सहज प्रवृत्तिवश वह सकुचाता हुआ सिर झुकाकर दूसरी तरफ चला गया, लेकिन मैंने जब दुबारा बुलाया तो उसने आकर दरवाजा खोल दिया। अंदर घुसते ही दाहिने हाथ पर दरवाजे के बाहर छोटी सी तख्ती लगी हुई थी, जिस पर लिखा था `एफएफएफडीए´ (फोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डाक्युमेंटेशन एण्ड एडवोकेसी)। यह सुभाष महापात्र द्वारा चलाए जा रहे मानवाधिकार संगठन का नाम है। दरवाजा खोलते ही सामने एक रॉकस्टार की तरह बाल बढ़ाए हुए गोरा विदेशी कम्प्यूटर स्क्रीन पर नजर गड़ाए हुए बैठा हुआ था। मैने उससे सुभाष महापात्र के बारे में पूछा तो इशारा करते हुए उसने अंदर जाने को कहा। उसके भावविहीन चेहरे को देखकर लग रहा था मानो वह भारत में हो रहे इस तथाकथित मानवाधिकार को लेकर बेहद चिंतित हो। अंदर जाने के लिए जैसे ही मैं बढ़ा तो वहीं पर संभवत: दो अन्य विदेशी मानवाधिकारवादी कम्पयूटर पर नजरे गड़ाए ऐसे तल्लीन बैठे थे, मानो वे निरंतर कुछ ट्रैक करने में जुटे हुए थे। उनमें एक महिला थी, जिसने कानों में हैडफोन भी लगाया था। थोड़ा और आगे बढ़ने पर सामने ही कुछ और लोग खड़े दिखाई दिये, जिनमें कई लोग विशुद्ध जनजातीय वेशभूषा में थे, जिन्हें देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि वे आदिवासी हैं।
जनअदालत लगाकर नक्सली आदिवासियों को प्रताड़ित करते हैं, बाप को भरी सभा में बेटे से मरवाया जाता है, भरी सभा में लोगों को मार दिया जाता है, आखिर यह भी तो मानवाधिकार हनन के दायरे में आना चाहिए, फिर इस पर कभी चर्चा क्यों नहीं होती? इस बात पर सुभाष सहमती जताते हुए कहते हैं कि नक्सली भी गलत कर रहे हैं। दूसरे ही क्षण वे कहते हैं कि सरकार और नक्सली दोनों ही पक्ष गलत कर रहे हैं। एसपीओ को लेकर विरोध क्यों है, जबकि उसकी भर्ती तो पुलिस एक्ट के तहत की जाती है और वह सरकार के पे-रोल पर काम कर रहा है? जवाब मिलता है कि नाबालिग बच्चों को हथियार थमाया जा रहा है,जबकि संयुक्त राष्ट कन्वेंशन के मुताबिक 14 साल के उम्र वाले को बच्चा माना गया है। मैने पूछा कि हमारे यहां तो 18 साल वाले को ही बालिग माना जाता है, हमें अपने देश का कानून मानना चाहिए या कहीं और का? जवाब में वे कहते हैं कि अपने देश का ही कानून मानना चाहिए, लेकिन जो व्यवस्था गलत है, उसे बदल देना चाहिए।अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब तक आप किसी चीज से अनभिज्ञ हैं तब तक आप समान्य व्यक्ति की तरह बेपरवाह होकर जीवन जी रहे होते हैं, लेकिन जब आप चीजों को समझने लगते हैं तो आप संतोष का अनुभव होता है अथवा निराशा में डूब कर व्यक्ति मानसिक तौर पर अशांत होने लगता है। कुछ ऐसा ही मुझे उन देशी विदेशी मानवाधिकारवादियों और उनके बीच मुंह लटकाये खड़े करीब दर्जन भर आदिवासियों को देखकर महसूस हो रहा था। लेकिन मैंने सहज होने की कोशिश करते हुए पूछा, क्या बात है? सुभाष जी, आप काफी टेन्श दिखाई पड़ रहे हैं। वे बोले हां, अब देखिये न इन लोगों को कोई रात को तीन बजे यहां छोड़कर चला गया और बताया भी नहीं कि ये लोग कौन हैं। सुभाष ने बताया कि उन आदिवासियों में से दो को पुलिस की गोली भी लगी है। यह सुनते ही मेरे मन में सवाल उठा कि क्या ये आम आदिवासी ही हैं, जिन्हें गोली लगी है? संभवत: नक्सली भी हो सकते हैं, क्योंकि दंतेवाड़ा में जिन सुरक्षा बलों पर बाजार में नक्सलियों ने हमला किया था, वे भी तो आम आदिवासियों की ही वेशभूषा में थे. हालांकि यह मेरी तत्कालीन मन:स्थिति की उपज हो सकती है, इसे निर्णायक नहीं माना जाना चाहिए।
उनके पूछने पर मैने बताया कि सलवा जुडूम को लेकर मुझे बात करनी है। इतना सुनकर सुभाष महापात्र थोड़ा अचकचाए फिर उन्होंने कहा कि `सलवा जुडूम तो 2005 से पहले ही शुरु हो गया था। पुलिस इसके लिए काफी पहले से ही रिहर्सल कर रही थी और 2003 में बीजेपी सरकार के आने पर ही इसकी शुरुआत हो गई थी। बकौल सुभाष सलवा जुडूम को नेता लोग चला रहे हैं। मैंने पूछा कि आखिर नेता इस आंदोलन को क्यों चला रहे है? जबकि सरकार और यहां तक कि विपक्ष के नेता महेन्द्र कर्मा भी यह कहते हैं कि यह लोगों का स्व-स्फूर्त आंदोलन है। जवाब में वे कहते हैं कि ऐसा सरकार जंगल में कंपनियों के सम्राज्य को खड़ा करने के लिए कर रही है। लोगों को गांवों से निकालकर लाया जा रहा है, जिससे कंपनियों का रास्ता साफ हो सके। लेकिन साथ ही इस ओर भी ध्यान देना होगा कि आदिवासियों के वनक्षेत्र में बसे गांव छोड़ देने से नक्सलियों की ढाल खत्म हो जाएगी। यह भी नक्सलियों के लिए चिंता का एक विषय है। मैनें अगला सवाल पूछते हुए कहा कि महेन्द्र कर्मा, जो इस आंदोलन के नेता है वे तो बाद में इस अभियान से जुड़े थे, जबकि आप कह रहे हैं कि यह नेताओं द्वारा शुरु किया गया है? इस पर वे कहते हैं कि अगर कर्मा बाद में सलवा जुडूम से जुड़े थे तो वे नेता कैसे बन गए। मैनें पूछ लिया कि नक्सलियों का संघर्ष किससे है और किस वर्ग के हित की लड़ाई वे लड़ रहे हैं? सुभाष थोड़ा तिलमिला जाते हैं और कहते हैं कि इसका जवाब देना मेरा काम नहीं है, मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं, यह सवाल आप नक्सलियों से जाकर पूछिये।
सुभाष कहते हैं कि जनता ने वोट के रूप में अपनी शक्तियां सरकार को दे दी हैं और सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह जनता की रक्षा करे। मैनें कहा कि सरकार ने सुरक्षा के लिए ही तो सलवा जुडूम कैंपों में सुरक्षा बल तैनात किये हैं। जवाब में वे कहते हैं कि आखिर कैम्प में क्यों आदिवासियों को रखा जा रहा है? क्यों नहीं उन्हें उनके गांव में रहने दिया जाता? मैंने कहा कि यदि सलवा जुडूम शिविरों से सुरक्षा हटा ली जाए तो क्या नक्सली गांव वापस जाने पर उन आदिवासियों को जिन्दा छोड़ेंगे? तब क्या आदिवासियों का मानवाधिकार हनन नहीं होगा? वे कहते हैं कि इस बात की क्या गारंटी है कि शिविरों में रहने पर पुलिसवाले इन लोगों को नहीं मारेंगे, उनका मानवाधिकार हनन नहीं करेंगे? वे कहते हैं कि सरकार और प्रशासन ने इस तरह की परिस्थितियों को पैदा किया हैं। आप आदिवासियों को सुरक्षा नहीं दे पाए, विकास नहीं किया जिसका आक्रोश नक्सलवाद के रूप में उभर कर आता है। वे कहते हैं कि व्यवस्था में भ्रष्टाचार है, इसलिए नक्सली टावर गिरा देते हैं। आप इसकी भी सुरक्षा नहीं कर पाते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या बिजली का टावर गिराने से बस्तर के करीब 20 लाख लोगों का मानवाधिकार हनन नहीं हुआ? इसका जवाब वे गोलमोल कर जाते हैं और कहते हैं कि इसकी परिस्थितियां सरकार ने ही पैदा की हैं।
जब उनसे सवाल किया कि सर्वहारा की वकालत करने वाले नक्सली आखिर उनकी आजीविका के एकमात्र साधन हाट बाजार को क्यों जला देते हैं, उनके गांवों को क्यों जला देते हैं, आंगनबाड़ियों और बाल आश्रमों को क्यों धवस्त कर देते हैं, क्या यह मानवाधिकार हनन नहीं है? सुभाष सीधे तौर पर इसके लिए सलवा जुडूम के नेता महेन्द्र कर्मा पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि `गांवों को तो ये नेता लोग जलवा रहे हैं, जिससे आदिवासियों को वहां से बाहर लाया जा सके।´ मैंने पूछा कि दूर दराज के गांवों में बसे करीब 60 हजार आदिवासी किसी नेता के कहने पर क्या इकट्ठा किये जा सकते हैं, जबकि उन्हें यह मालूम हो कि ऐसा करने पर वे नक्सलियों की बंदूक के निशाने पर आ जाएंगे? इस प्रश्न का वे संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते हैं और कहते हैं कि लोगों को जर्बदस्ती कैंपों में लाया जा रहा है। लेकिन जब यह पूछा जाता है कि पुलिसकर्मी भी तो इस लड़ाई में मर रहा है, क्या उसका और उसके परिवार का कोई मानवाधिकार नहीं है? जवाब मिलता है `नहीं, पुलिस का कोई मानवाधिकार नहीं होता, वह तो ड्यूटी पर होता है, मानवाधिकार तो आम नागरिकों का होता है।" क्या हमें सुभाष महापात्र की बात मान लेनी चाहिए?
सुभाष सवाल उठाते हैं कि आपने सलवा जुडूम क्यों शुरु किया? कंधार का उदाहरण देते हुए वे "सेफ पैसेज" की भी बात करते हैं। पुलिस व्यवस्था पर आरोप लगाते हुए वे कहते हैं कि पुलिस भ्रष्ट है, यही कारण था कि नक्सलियों से लड़ने के लिए आए केपीएस गिल भी वापस लौट गए? लेकिन जब उनसे पूछा गया कि केपीएस गिल ने जिस तरह की कार्यवाही पंजाब में की थी, क्या वैसा ही बस्तर में भी हो सकता है? जवाब में सुभाष कहते हैं कि पुलिस को चाहिए की नक्सलियों को गिरफतार करे और कोर्ट में ट्रायल करवाए। अंत में सुभाष कहते हैं कि हो सकता है आप मेरी बातों का संदर्भ बदलकर प्रस्तुत कर दें, क्योंकि अक्सर ऐसा किया जाता है और हम भी ऐसा ही करते हैं। वे कहते हैं कि अगर आप ऐसा करते हैं तो मुझे खण्डन करना पड़ेगा। उस पल मुझे अपने पास टेपरिकार्डर न होने की कमी बेहद खली थी, क्योंकि उनकी इस बात से ऐसा लगा कि संभवत: वे मेरे लिखे को भी गलत ठहरा दें। ख़ैर जो भी हो, इस उठापटक का दुष्परिणाम आखिरकार आम आदिवासियों को ही भुगतना पड़ रहा है।
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
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- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
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पुलिस महानिरीक्षक अभिसूचना तथा सुरक्षा अनिल कुमार रतूड़ी ने अपने पत्र के पत्रांक संख्या इण्ट (5) ए/आर-एलर्ट 2006, दिनांक 27 जून को पुलिस महानिरीक्षक गढ़वाल रेंज अशोक कुमार को लिख पत्र में इस बात का उल्लेख किया कि भारत के नक्सलवादी संगठनों के संबंध नेपाल के माओवादियों से है। अपने पत्र में आईजी अभिसूचना एवं सुरक्षा अनिल कुमार रतूड़ी ने इस बात का भी उल्लेख किया कि उत्तर प्रदेश के जनपद पीलीभीत की सीमा नेपाल और उत्तराखंड से मिलती है। उन्होंने अपने पत्र में इस बात का भी उल्लेख किया कि रामपुर और पीलीभीत का रास्ता उत्तराखंड से जाता हे।
आईजी अभिसूचना एवं सुरक्षा ने गढ़वाल रेंज के आईजी को लिखे पत्र में इस बात का भी उल्लेख किया कि भारत के नक्सलवादियों द्वारा अपने हथियारों के भंडार को मजबूत करने के लिए पुलिस व पीएसी व सुरक्षा बलों के हथियारों को लूटकर पीलीभीत के रास्ते नेपाल ले जाने की योजना है। अनिल कुमार रतूड़ी ने अपने पत्र में खास तौर से इस बात का भी उल्लेख किया कि पीएसी के शस्त्रागारों, अभियुक्तों एवं करेंसी की एस्कोर्ट कराए साथी ही उन्होंने रेलवे एवं गार्ड डयूटी के दौरान सख्ती के साथ सुरक्षा के प्रबंध कराने की भी बात कही। पुलिस महानिरीक्षक अभिसूचना एवं सुरक्षा अनिल कुमार रतूड़ी का पत्र मिलने के बाद आईजी गढ़वाल रेंज ने रेंज के सभी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों और पुलिस अधीक्षकों को पत्र लिखते हुए सभी मामलों में सख्त कार्रवाई करने के आदेश दिए। आईजी अभिसूचना एवं सुरक्षा का पत्र मिलने के बाद उत्तराखंड के पुलिस अधिकारियों के होश उड़े हुए है।
is turk ke sare samarthak half paint vale milenge .naxaliyo ke khilaf raipur me bade bade akhbar aur patrkar tak nahi likhte hai
raipur se bahar bhasan de rahe hai.pusadker
to transporter hai aur baki raman sarkar se
koi na koi faydale rahe hai.
नक्सलवाद और मानवाधिकार के इस मुद़दे पर नए नजरिए से प्रकाश डालने के लिए बधाई। यह आलेख मोटे तौर पर सुभाष महापात्रा के पक्ष में तो नहीं ही जा रहा है, जाहिर है, मानवाधिकार के आवाज उठाने वाली संस्थाएं, लोग सैद़धांतिक तौर पर इसके खिलाफ होंगे। लेकिन एक बात यह भी है कि जिन ढाई सौ के करीब गांवों से ये आदिवासी सलवा जुड़ूम कैंपों में लाए गए हैं, उनमें से करीब 70 फीसदी गांवों में, जो वीरान हो चुके हैं, हाल तक तमाम सरकारी योजनाओं के पैसे खर्च किए जाते रहे। आपको डीजीपी साहब से यह भी पूछना चाहिए था कि लोकतंत्र में सरकार जब जीवित लोगों की रक्षा नहीं कर सकती तो छग सरकार इन वीरान गांव के भूतों के लिए सरकारी पैसा क्यों खर्च कर रही है। यही सरकारी भ्रष्टाचार और असंवेदनशीलता लोगों को हथियार उठाने पर मजबूर करती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकार के वर्दीधारी सरकारी नियमों के तहत बाकायदा प्रशिक्षण लेकर जनता की हिफाजत के लिए हथियार उठाते हैं, जब वे मानवाधिकार का उल्लंघन करते हैं तो उनपर सवाल उठाना लाजिमी है, वहीं गांव के उपेक्षित, पीडि़त, गरीब अपने हकों के लिए हथियार उठाते हैं तो उनसे हुए मानवाधिकार हनन के लिए दोनों को एक ही तराजू में तौलना कहां का इंसाफ है। मैं नक्सलवाद की तारीफ नहीं कर रहा, लेकिन आज की सत्ता, पुलिस और भ्रष्टाचारियों का गठजोड़ भी कहीं से तारीफ के काबिल मुझे तो नहीं लगता। अमरनाथ के मुद़दे पर विहिप, बजरंग दल के कार्यकर्ता, भोपाल, इंदौर, जबलपुर से मुंबई तक की सड़कों पर नंगी तलवारों,त्रिशुल लिए वाहनों को तोड़ते आग लगाते घूमते हों तो यह उनकी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का अधिकार माना जाता है, गांव का गरीब अपने लिए इज्जत और दो वक्त की रोटी के लिए हथियार उठाता है तो वह देशद्रोही कहलाता है। अगर इस देश में यूं ही व्यवस्था चलती रही तो संभव है देशद्रोहियों की संख्या में खासी बढ़ोतरी हो जाए।
आपने सुना होगा कि जो ओके से नहाये वो कमल सा खिल जाये ।
यह कैसे संभव हो सकता है भाई ?
आपने यह भी सुना होगा कि फेयर एंड लवली चुपड़ने से एक काली बालिक देखते ही देखते गोरी बन जाती है और फिर सुंदरता का ताज़ ही उसके सिर पर मढ़ दी जाती है ।
यह भी कैसे संभव है ?
तो मित्र आपकी बात सही है ।
यहाँ मानव अधिकार के संरक्षण के नाम पर केवल विदेशी धन लेकर व्यापार किया जा रहा है । ठीक भी है, हमारे युवाओं को एक रोज़गार भी तो मिला हुआ है । हवाई की यात्रा कर पा रहे हैं । फाईव स्टार होटलों में रूकने ठहरने का मौका मिल रहा है । पर सिर्फ़ यही होता तो बात ठीक भी होती ।
मुश्किल तो यही है कि ऐसे मानव अधिकारवादियों की ओर से सिर्फ एकतरफ़ा चिल्लपों मचाया जाता है जो भारतीय नहीं बल्कि विदेशी इशारों पर होता है और जाहिर है ये ही भारत को अस्थिर करने वाली ताकतें है । समाज मे सदैव तनाव देने वाली ताकतें हैं । पुलिस और व्यवस्था के विरूद्ध बोलना इनके उसी दिनचर्चा का अंग है । दरअसल उन्हें किसी भी प्रकार के मानववाद से कोई लेना देना नहीं है ।
इनका काम सिर्फ माओवाद या हिंसावादियों के लिए वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करना है । इनका काम प्रजातांत्रिक व्यवस्था (जिसमें वैसे तो बहुत ख़ामी भी है) को प्रश्नांकित करना है । यानी कि प्रजातंत्र को कमजोर करना और माओवाद या हिंसक, अराजक ताकतों के लिए वातावरण निर्माण करना है । ये सारे देश में हैं । इनका नेटवर्क नेपाल से लेकर लंका और अमेरिका से लेकर रूस तक है ।
जिनके दो आँख हों और वे साबुत भी हों पर वह एक ही आँख से देखने का नाटक करे तो उसे आप क्या कहेंगे उमाशंकर जी.... आपने सही पकड़ा है ।
महापात्र नाम ब्राह्मणत्व की ओर इशारा करता है । ब्राह्मणत्व में कभी भी अन्याय और पक्षपात को तवज्जो नहीं मिलता । महापात्र जी जो कर रहे हैं वह मानवअधिकार भी हो सकता है पर आदिवासियों के खिलाफ हर हरक़त भी मानवअधिकार के खिलाफ़ है उसके बारे में वे खुलकर बोलें तो कोई बात बने । जैसा कि वे कर ही नहीं सकते । उन्हें कौन समझाये कि अब बस्तर में सबसे अधिक मानवअधिकार का उल्लघंन वे ही कर रहे हैं जिन्हें नक्सलवादी कहते हैं । जो अब बस्तर मे हैं ही नहीं । ये तो माओवादी हैं । हिंसावादी हैं ।
और ऐसे लोगों पर विश्वास नहीं किया जा सकता । कोई भी नहीं विश्वास कर सकता । न आदिवासी न गैर आदिवासी ।
मानव अधिकारवादी विश्वास करें तो कर लें । अब छद्म के पुजारियों को रोका तो नहीं जा सकता ना । हाँ कानून ज़रूर इन पर निगरानी रखेगी । और हाँ प्रकृति भी जिसे सबसे बड़ा न्यायी कह सकते हैं ।
मैं विस्तार से लेख लिख रहा हूँ इस पर ।
अच्छे लेख के लिए बधाई । सत्यान्वेषण के लिए बधाई
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