लोकतंत्र के नाम पर लालतंत्र
माओवादियों और उनके समर्थकों का लोकतांत्रिक ढोंग लंबा नहीं चल सका. लोकतंत्र के नाम लालतंत्र बिछाने के असली मंसूबे अब खुलकर सामने आ रहे हैं.
शनिवार को वरिष्ठ माओवादी नेता देव प्रसाद गुरंग ने कहा कि वे चाहते हैं कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति में शक्तियों का बंटवारा न हो. यानी राष्ट्रपति के पास ही सारी सैनिक और विधायी शक्तियां हो. दो दिन पहले ही बाबूराम भट्टराई ने भी एक बयान देकर कहा था कि अगर सर्वदलीय बैठकों से कुछ खास हासिल नहीं होता तो वे एक बार फिर सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हैं. कुछ दिन पहले करण थापर से बात करते हुए माओवादी नेता प्रचण्ड ने अपनी यह इच्छा जगजाहिर की थी कि हां, वे नेपाल का राष्ट्रपति बनना चाहते हैं.
अगर इन तीनों बातों को मिला दें तो तस्वीर साफ हो जाती है. माओवादी प्रचण्ड को देश का सर्वशक्तिमान राष्ट्रपति बनाना चाहते हैं. सर्वशक्तिमान राष्ट्रपति का नेपाल में मतलब हुआ लोकतंत्र के रास्ते तानाशाही का पदार्पण. चीन इसका जीता-जागता उदाहरण है. संभवतः प्रचण्ड और उनके माओवादी मित्र नेपाल को चीन की फोटोकापी बनाना चाहते हैं. अब संविधान सभा की बैठकों में जब इसमें अटकाव आ रहा है तो माओवादी तरह-तरह के बयान दे रहे हैं.
यह सब तब हो रहा है जब माओवादियों को संविधान सभा के चुनाव में 29 प्रतिशत वोट और 38 प्रतिशत सीटें ही मिली हैं. लेकिन वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि नेपाली जनता की वे निर्विरोध पसंद हैं. नेपाली कांग्रेस और यूएमएल के नेताओं का विरोध इसलिए भी है. उनका आरोप है कि माओवादी 60 प्रतिशत लोगों की आवाज को अनसुना करना चाहते हैं. लेकिन प्रचण्ड अपनी इच्छाओं पर अडिग हैं. उन्होंने धमकी दी है कि अगर उनकी मांग नहीं मानी गयी(उन्हें सर्वशक्तिमान राष्ट्रपति) नहीं बनाया गया तो वैसी ही क्रांति होगी जैसी 1917 में रूस में हुई थी.
काठमांडू में आयोजित विजय दिवस समारोह में प्रचण्ड ने कहा कि जनता ने जिन्हें ठुकरा दिया है अब उन्हें राष्ट्रपति पद देने का कोई औचित्य नहीं है. अगर दूसरे दल प्रचण्ड को राष्ट्रपति मान भी लें तो माओवादी नहीं चाहते कि प्रधानमंत्री के हाथ में किसी प्रकार की प्रशासनिक और विधायी शक्तियां केन्द्रित हों. हो सकता है जल्द ही माओवादी ऐसे तर्क गढ़ने लगें कि नेपाल में सर्वसक्तिमान राष्ट्रपति इसलीए भी होना चाहिए क्योंकि अभी तक लोकतंत्र के नाम पर नेपाल में जो कुछ हुआ है वह सफल नहीं रहा है. यह नेपाल ही है जहां दस साल में 15 प्रधानमंत्री बदले गये. ऐसे में यह तर्क अपने आप मजबूत हो जाता है कि नेपाल में लोकतंत्र लाने ही नहीं इसे लोकतंत्र सिखाने की भी जरूरत है. जाहिर है यह करने के लिए एक ताकतवर राष्ट्रपति होना ही चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता है तो शस्त्र और संघर्ष तो माओवादियों के पास है ही.
अगर माओवादी लोकतंत्र आया तो वह दौर कैसा होगा इसकी झलक तब मिली जब कांतीपुर अखबार समूह को प्रचण्ड ने सार्वजनिक रूप से धमकी दे डाली. कांतीपुर अखबार समूह नेपाल का बड़ा मीडिया समूह है. नेपाल पर उसकी निष्पक्ष रिपोर्टिंग से पूरी दुनिया में लोग नेपाल में होनेवाली घटनाओं को देख समझ रहे हैं. लेकिन शनिवार को प्रचण्ड ने धमकी देते हुए कहा कि "अब हम आपलोगों की आलोचना ज्यादा सहन नहीं करेंगे. आपको याद रखना चाहिए कि हमें जनता ने चुना है." केवल मीडिया ही निशाने पर नहीं हैं बल्कि अन्य राजनीतिक दलों को भी खुले तौर पर धमकियां दी जा रही हैं. अपनी मांग को मनवाने के लिए बाबूराम भट्टराई ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि "भिखारियों के सामने चुनने का विकल्प नहीं होता."
कभी-कभी लगता है कि नेपाल किसी भयानक षण्यंत्र का शिकार हो गया है. राजा वीरेन्द्र के समूल नाश, ज्ञानेन्द्र को गद्दी फिर ज्ञानेन्द्र के खिलाफ बगावत, लोकतंत्र के नाम पर खून-खराबा का लंबा सिलसिला और अब माओवादियों द्वारा सत्ता के शीर्ष पर हर हाल में कब्जे की मानसिकता. यह सब घटनाएं कुछ संकेत करती हैं.
तो क्या हम मान लें कि नेपाल में लोकतांत्रिक गणतंत्र के नाम पर माओवादी एक कम्युनिस्ट रिपब्लिक बनाना चाहते हैं? ऐसा शासन जहां विरोध और असहमति की कोई गुंजाईश न हो. एक ऐसा लोकतंत्र जो नफरत और उन्माद की बुनियाद पर खड़ा हो. एक ऐसा लोकतंत्र जिसमें तानाशाही के पूरे दुर्गुण मौजूद हों. माओवादियों द्वारा अन्य दलों और मीडिया को दी जा रही धमकियों को देखें तो साफ हो जाता है कि माओवादी हर कीमत पर नेपाल को लाल करना चाहते हैं. फिर तरीका कोई भी हो. रास्ता कैसा भी हो.
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