पाकिस्तान का परमाणु बम
`इस्लामी बम´ का बाप भले ही डॉ. अब्दुल कादिर खान हों, पर इसके संकल्पनाकार मरहूम जुल्फिकार अली भुट्टो थे। जुल्फिकार अली भुट्टो ने उस समय ईरान, लीबिया और सउदी अरेबिया के दिमाग में यह भरने का काम किया कि ईसाई, यहूदी और हिंदू बम के खिलाफ `इस्लामी बम´ की बेहद आवश्यकता है। इस बम का बड़ा खर्च साउदी अरेबिया ने वहन करने का फैसला किया। लीबिया ने भी इस गुप्त परियोजना में दिल खोलकर हिस्सा दिया।
इस बीच जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान में अपदस्थ कर मौत के घाट उतार दिए गए। ईरान में शाह को अयातुल्ला खुमैनी ने अपदस्थ कर दिया। अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों ने ईरान की आर्थिक नाकेबंदी शुरू कर दी। अमेरिकी बैंकों में मौजूद सारी ईरानी संपत्तियों को जब्त कर लिया गया। 1980 में ईरान और इराक के बीच युद्ध छिड़ गया। साउदी अरेबिया के वहाबी शासक अयातुल्ला खुमैनी को शक की नजरों से देखते थे। पाकिस्तान में शियों की आबादी लगभग 20 फीसदी थी। भुट्टो का तख्ता पलटने वाले जनरल जिया इस समुदाय से नफरत करते थे। इस परिस्थिति में `इस्लामी बम´ के लिए ईरान सहयोग उन दिनों न के बराबर रहा। ईरान-इराक युद्ध के खात्मे के बाद ईरान की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और फिर उसने इस परियोजना की दिल खोलकर मदद की। पाकिस्तान ने `इस्लामी बम´ को साकार करने के लिए तीन सूत्री फार्मूला बनाया था-
1. `इस्लामी बम´ इस्लामी उम्मा की खातिर पाकिस्तान के कब्जे में रहेगा।
2. यह बम आवश्यकता पड़ने पर न केवल भारत बल्कि इजरायल के खिलाफ भी उपयोग में लाया जा सकता है।
3. फंडिंग करने वाले देशों यानी सउदी अरेबिया, लीबिया और ईरान यदि कभी स्वतंत्र रूप से अपना `परमाणु हथियार´ बनाना चाहें तो पाकिस्तान उनके वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित करेगा, उनके परमाणु संयंत्र को उपकरण और आवश्यक सामग्री की आपूर्ति में सहयोग देगा।
इसी समझौते के चलते 1980 के दशक से ईरान, साउदी अरेबिया और लीबिया के वैज्ञानिक पाकिस्तानी परमाणु संयंत्र, कहूटा की नियमित यात्रा करते रहे हैं। डॉ. अब्दुल कादिर खान भी तीनों देशों की यात्रा कर उनके परमाणु वैज्ञानिकों का दो दशकों तक खुला मार्गदर्शन करते रहे हैं। लीबिया और ईरान में कहूटा की डिजाइन के आधार पर डॉ. खान के मार्गदर्शन में परमाणु संस्थान स्थापित किए गए। यूरेनियम परिष्करण की डिजाइन डॉ. खान हॉलैंड से चुरा लाए थे, पर उन्हें परमाणु बम बनाने की डिजाइन चीन ने उपलब्ध कराई। चीनी रणनीति है कि पाकिस्तान यदि परमाणु शस्त्र सम्पन्न रहा तो भारत से वह इतना उलझा रहेगा कि भारत चीन की ओर रूख करने की फुरसत भी नहीं पाएगा। चीन ने उसे बम की डिजाइन के साथ-साथ बम वाहक मिसाइलें भी उपलब्ध कराई। 1998 में परमाणु परीक्षण किया गया तब परीक्षण स्थल पर साउदी अरेबिया और उत्तर कोरिया के भी वैज्ञानिक मौजूद थे।
उत्तर कोरिया, लीबिया और ईरान तो अमेरिका और पूरे पश्चिम की नजर में `दुष्टता की धुरी´ हैं। पर साउदी अरेबिया तो अमेरिका का सबसे `शरीफ मुसलमान´ है। अमेरिका ही नहीं दुनिया के किसी भी छद्म धर्मनिरपेक्ष से पूछा जाए तो वह साउदी शराफत की कसम खा लेगा। हालांकि सच्चाई कुछ और है! साउदी यदि परमाणु राजनीति में गहन रूचि न लेता तो वह पाकिस्तान के `इस्लामी बम´ को सबसे ज्यादा आर्थिक सहयोग क्यों देता? यदि उसकी इतनी महत्वपूर्ण भूमिका न होती तो पाकिस्तानी परमाणु संस्थान में उसे विशेष सम्मान क्यों हासिल रहता? साउदी अरेबिया जितना सम्मान तो पाकिस्तानी परमाणु संस्थान में लीबिया, ईरान और उत्तरी कोरिया को कहीं से भी नहीं हासिल है। साउदी अरेबिया का राजदूत या साउदी शाह के प्रतिनिधि को पाकिस्तानी सेना और परमाणु संस्थान की गुप्त बैठकों में सम्मानपूर्वक शामिल किया जाता है। साउदी अरब के शाहजादे अब्दुल्ला जब भी पाकिस्तान यात्रा पर आते हैं उन्हें विशेषतौर पर पाकिस्तान के कहूटा परमाणु संयंत्र की यात्रा कराई जाती है। उन्हें डॉ. ए.क्यू खान और उनके दल के सदस्य पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम के महत्वपूर्ण अंशों से अवगत कराते हैं। विश्व मुस्लिम राजनीति के किसी भी अध्येता के मन में एक सवाल सहज जन्म लेता है कि क्या साउदी अरेबिया किसी भी कीमत पर लीबिया और ईरान पर विश्वास करेगा? यदि नहीं, तो फिर अपने व्यापक प्रभाव के बावजूद वह इन दोनों को पाकिस्तान परमाणु कार्यक्रम में क्यों शामिल करने की अनुमति देगा? इस तथ्य को भलीभांति समझ लेना चाहिए कि मुस्लिम देशों में चाहे वह शिया बहुल हो, सुन्नी बहुल या वहाबी बहुल उनमें पिछले एक अर्से से एक दूसरे पर जनसंहार के व्यापक अस्त्रों के प्रयोग न करने की सहमति विकसित कर ली गई है। साउदी शाह पाकिस्तान को परमाणु कार्यक्रम का सरदार बनाकर मुस्लिम विश्व पर अपना सिक्का चला रहा है। पाकिस्तानी राजनयिकों के युक्तिपूर्ण राजनय की प्रशंसा की जानी चाहिए क्योंकि वे साउदी अरेबिया और ईरान, अमेरिका और रूस, चीन और जापान तथा दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया जैसे एक दूसरे की जान के दुश्मनों को समानंतर पटा कर अपना काम निकालने में दक्ष है।´
उत्तर कोरिया से पाकिस्तान के संबंधों की पड़ताल भी `इस्लामी बम´ को समझने के लिए अनिवार्य है। दोनों देशों के बीच क्रय और संयुक्त विकास कार्यक्रम पारंपरिक हथियारों के मामले में 1971 के भारत और पाकिस्तान युद्ध के समय से हैं। 1993 में जब बेनजीर भुट्टो, पाकिस्तानी परमाणु संकल्पनाकार की बेटी और तत्कालीन प्रधानमंत्री, प्यांगयांग की यात्रा पर गइ± तो दोनों देशों के बीच मिसाइल और परमाणु कार्यक्रमों में परस्पर सहयोग का फैसला हुआ। दोनों देशों के बीच यह समझौता चीन की मध्यस्थता से हुआ था। याद रहे कि पिछले माह निवृत हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के पिता जॉर्ज बुश के कार्यकाल में 1988 और 1992 के बीच चीनी आपूर्ति पर अमेरिका बारीक नजर रखे हुए था। इस दौरान चीन पाकिस्तान को एम-9 और एम-11 मिसाइलों की आपूर्ति कर रहा था। चीन अपने `पाप´ को चुपचाप उत्तर कोरिया के खाते डालकर खुद को तनावमुक्त कर प्रगति के `एक्सप्रेस वे´ पर दौड़ना चाहता था। 1993 में श्रीमती भुट्टो की यात्रा का परिणाम 1995 में आया जब पाकिस्तान और उत्तर कोरिया के बीच मिसाइल तकनीकी सहयोग को औपचारिक स्वरूप प्राप्त हो गया। 1993-97 के बीच दोनों देशों का सहयोग मिसाइल तक ही सीमित रहा। 1997 से 2003 के बीच दोनों के बीच परमाणु क्षेत्र में सहयोग पर सहमति बनी। पहले उत्तर कोरिया मिसाइल के बदले नकद या गेहूं की आपूर्ति स्वीकारता था। कालांतर में पाकिस्तान ने मिसाइल प्रौद्योगिकी के बदले परमाणु बम की डिजाइन देने का फैसला कर लिया। उत्तरी कोरिया के वैज्ञानिकों ने पाकिस्तानी परमाणु परीक्षण में जिम्मेदारी का निर्वाह किया तो पाकिस्तानी वैज्ञानिकों ने उत्तर कोरिया को यूरेनियम संवर्द्धन में सेंट्रिफ्यूज की आपूर्ति कर बदला चुकाया। उत्तरी कोरिया के संबंध विशुद्ध अवसरवाद पर निर्भर हैं। मजेदार तथ्य है कि पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम में उत्तर कोरिया के शत्रु दक्षिण कोरिया ने भी रूचि दिखाई थी। ब्राजील भी कहूटा परमाणु संयंत्र से जुड़ना चाहता था।
अमेरिका के साथ पाकिस्तानी राजनयिक बड़ी चालाकी से आतंकवाद विरोधी धुरी के प्रमुख सहयोगी बन जाते हैं, वही राजनयिक बड़ी धूर्तता से अपने वैज्ञानिकों द्वारा आतंक के सर्जक और नेता अल-कायदा और इंटरनेशनल इस्लामी फ्रंट यानी आईआईएफ को परमाणु बम से लैस कराने के पाप को पचा जाते हैं। मुंबई पर 26/11 को हमला करने वाले `लश्कर-ए-तोयबा´ का एक विंग है जिसमें परमाणु शस्त्र परियोजना के तमाम वैज्ञानिक हैं। मुरीदके में होने वाले वार्षिक सम्मेलनों में परमाणु वैज्ञानिक अक्सर मौजूद रहते हैं। हिजबुल तहरीर नामक आतंकी संगठन से भी कई परमाणु वैज्ञानिक जुड़े रहे हैं। रिटायर्ड परमाणु वैज्ञानिक सुल्तान बशीरूद्दीन चौधरी और अब्दुल माजिद के अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के संबंध तो सार्वजनिक हो चुके हैं। दोनों वैज्ञानिक मानवतावादी संगठनों से जुड़कर राहत कार्यक्रमों के नाम पर ओसामा के संपर्क में आए ओर इन पर परमाणु बम यानी `इस्लामी बम´ की तकनीक आतंकी संगठनों को उपलब्ध कराने का शक है।
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