पुण्य प्रसून का पुण्य प्रसूत
दो तीन दिन पहले दिल्ली में भारतीय पत्रकारिता की परंपरा पर एक सेमिनार था. मुख्य वक्ता थे प्रभाष जोशी. बात आयी टीवी पत्रकारिता की तो प्रभाष जोशी ने कहा कि "हमारे पुण्य प्रसून जी जिस चैनल को छोड़कर पुण्य प्रसूत हो गये हैं उस चैनल....." जब प्रभाष जी यह बोल रहे थे तो सामने की एक कुर्सी पर नकवी साब भी बैठे हुए थे. जी हां, ये वही नकवी साहब हैं जो आज तक के सर्वे-सर्वा हैं और बहुत अच्छे ज्योतिषी हैं. प्रभाष जी का यह कहना कि आज तक छोड़कर पुण्य प्रसूत हो चुके पुण्य प्रसून मुझे अच्छा लगा. क्योकि कोई भी गैरतवाला पत्रकार आज तक और इंडिया टीवी जैसे घरानों के साथ शायद ही काम करना चाहे.
ऐसे पुण्य प्रसूत के बारे में हमारे छत्तीसगढ़िया ब्लागर संजीत ने बताया था कि उन्होंने ब्लाग लेखन शुरू किया है. उस दिन मैंने देखा तो अच्छा लगा कि एक संजीदा पत्रकार ब्लाग लेखन की दुनिया में आ रहा है. उस दिन के बाद आज पुण्य प्रसून के ब्लाग पर जाने का मौका मिला. वे लिख रहे हैं जो अमरनाथ समझौता हुआ है वह कश्मीर पर हिन्दूवादी डंका है. निश्चित रूप से ऐसा तो प्रधानमंत्री और गृहमंत्री शिवराज पाटिल भी नहीं मानेंगे जिनके प्रयास से 1953 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि केन्द्र ने जम्मू के लोगों को महत्व दिया है और वार्ता की मेज पर जम्मू के लोगों को बुलाया गया. जाहिर सी बात है इससे घाटी के अलगाववादियों को निराशा हाथ लगी क्योंकि अभी तक हमेशा यह होता रहा है कि हिंसा के सहारे वार्ता की टेबल कश्मीर के अलगाववादी आते रहे हैं और सीक्रेट मंत्र पाकिस्तान जिंदाबाद बोलकर जो चाहा वह करवाते रहे हैं.
यहां सवाल हिन्दू या मुसलमान का नहीं बल्कि एक राज्य के ऐसे दो हिस्सों का है जो गैरबराबरी का शिकार हैं. जम्मू के लोगों को मौका मिला तो उन्होंने उस मानसिकता से लड़ने की कोशिश की जो जम्मू पर कश्मीर को हावी करता है. केन्द्र ने पूर्वाग्रहों को किनारे रखते हुए बिगड़ चुकी बात को कुछ हद तक ठीक करने की कोशिश की. यह सब कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को न अच्छा लगना था न लगा. लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर विरोध का आधार भी खत्म हो चुका था. घाटी में नेशनल कांफ्रेस ने एक बार फिर इस मुद्दे से किनारा कर लिया और जानकार तो यह भी बताते हैं कि केन्द्र को इस निर्णय तक पहुंचने में नेशनल कांफ्रेस के ओमर अब्दुल्ला ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.यह सर्वविदित तथ्य है कि आज भी घाटी में नेशनल कांफ्रेस के सबसे ज्यादा समर्थक हैं इसलिए ओमर अब्दुल्ला के इस सहयोग से जम्मू-कश्मीर को अनावश्यक हिंसा से जल्दी निजात पाने में मदद मिली.
बंद और हिंसा से जम्मू और कश्मीर दोनों ही रियासतों को नुकसान हो रहा था. घाटी के लोग हमसे आपसे बेहतर जानते हैं कि मुजफ्फराबाद की सड़क भारत को धमकी देने के लिए तो इस्तेमाल तो की जा सकती है लेकिन इस सड़क के रास्ते समृद्धि नहीं आती. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के निवासियों की हालत खराब ही नहीं दयनीय है. चिकित्सा, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिहाज से पाकिस्तान की ही हालत पतली है तो वह अधिकृत कश्मीर के लिए अलग से कुछ व्यवस्था करेगा ऐसा हो नहीं सकता. फिर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भारत का तिरंगा भी नहीं लहराता जिसे रोकने के लिए वह इस इलाके पर विशेष ध्यान दे. यह सब कश्मीर के अलगाववादी नेता भी जानते हैं. फिर भी अगर पाकिस्तान जिन्दाबाद कहने पर घाटी को सब्सिडी का प्रसाद मिलता रहता है तो इसमें कुछ हर्ज नहीं है. पिछले कुछ सालों से हिंसा में कमी, पर्यटकों की संख्या में इजाफा और अमरनाथ यात्रा कुछ ऐसे संकेत है जो घाटी को मुख्यधारा से जोड़ रहे थे. लगातार दूसरी बार बिना राज्यपाल शासन लगे लोकतांत्रिक सरकारों ने अपना कार्यकाल पूरा किया. अलगाववादी भला इससे कैसे खुश हो सकते हैं?
अमरनाथ मुद्दा ही बना इसलिए क्योंकि अभी तक जो कुछ हुआ वह कश्मीर को मुख्यधारा से जोड़ता है. पिछले चार-पांच सालों से सर्दियों के दिनों में घाटी से भारी संख्या में शाल व्यापारी दिल्ली आ रहे हैं. उनकी बढ़ती तादात का मैं प्रत्यक्ष गवाह हूं क्योंकि उनका मुख्य ठिकाना दरियागंज ही है. वे यहां किराये पर कमरा लेकर दो-तीन महीना रहते हैं और सर्दियां उतरने के साथ ही वापस घाटी लौट जाते हैं. और लोगों की छोड़िये अलगाववादी नेता गिलानी खुद ज्यादातर दिल्ली रहते हैं और ग्रेटर कैलाश के अपने दो अपार्टमेन्ट में मजे से दिन गुजारते हैं. फिर भी अलगाववादी नेता मानते हैं कि अगर यह सब प्रक्रिया कुछ सालों तक जारी रहे तो शायद कश्मीर समस्या की श्रेणी से ही बाहर आ जाए. अगर ऐसा होता है तो उनकी रोजी-रोटी पर संकट आ सकता है.जाहिर है इस संकट से बचने के लिए वे ऐसा नहीं होने देना चाहते. पुण्य प्रसून जो कुछ लिख रहे हैं वह उसी समझ का हिस्सा है.
पुण्य प्रसून अलगाववादी नेता यासीन मलिक के अच्छे दोस्त है. इसका मतलब यह नहीं कि आप पुण्य प्रसून पर किसी प्रकार का शक करें कि यासीन मलिक के कहने पर उन्होंने ऐसा लिखा होगा. लेकिन दोस्ती उन्हीं लोगों में होती है जिनके बीच वैचारिक साम्यता होती है. इसी साम्यता को दर्शाने के लिए वे यासीन मलिक के बंद हो चुके ब्लाग के सहयोगी ब्लाग लेखक भी हुआ करते थे. कहते हैं ब्लाग विरोध की आशंका बहुत ज्यादा देख ब्लाग बना और बिना कुछ लिखे-पढ़े जानबूझकर बंद कर दिया गया. यह महज संयोग भी हो सकता है कि जिस इट्जमाईब्लाग पर यासीन मलिक का ब्लाग हुआ करता था उसी वेबस्थान पर यासीन मलिक का ब्लाग डिलीट होने के बाद पुण्य प्रसून का ब्लाग बना. और केवल पुण्य प्रसून ही नहीं बल्कि शीतल राजपूत और मनोज वाजपेयी ने भी इट्जमाईब्लाग पर ही अपने ब्लाग बनाये. इन लोगों में एक ही समानता है ये सब पहले यासीन मलिक के सहयोगी ब्लाग लेखक हुआ करते थे. एक अनाम ब्लाग पर किसी ने लिखा है कि यही सवाल जब उसने मनोज वाजपेयी से पूछा तो जवाब देने की बजाय उनका सवाल ही डिलीट कर दिया गया.
तो क्या अमरनाथ विवाद सुलझने को कश्मीर पर हिन्दूवादी डंका साबित करनेवाले पुण्यप्रसून के पुण्य विचार बिला शक-शुबहा धर्मनिर्पेक्षता की दुहाई देकर स्वीकार कर लेना चाहिए या फिर ऐसे "महान विचार" पर शक करने की वजहें बनती हैं?
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aadi aadi aasakte hai.kal hi sanjoy mila tha aur kah raha tha ki mai kuch aur logo se tippani kara do .
visfot ngo ke jarie chalta hai to iska matlab yeh nahi ki patrkaro se site chalai jay.samaj me aur bhi log hai unki bhi chinta karni chahie.
विस्फोट ने किसी प्रकार से पत्रकारों की मार्केटिंग का ठेका नहीं लिया है. उल्टे यह तो निहंग पत्रकारों की जमात है जो भीड़ में अकेला और अकेले में मेला बनाये रखते हैं.
आप जो भी हैं इतना तय है कि आप खोजी पत्रकार हैं. अब देखिए जो बात मुझे भी नहीं पता वह आपने खोज ली कि विस्फोट एनजीओ के जरिए चलता है.
खोजी पत्रकारिता जारी रखो मुन्नाभाई. हां, उस एनजीओ के बारे में पता चले तो हमें भी बताना कम से कम मुझे तो पता हो कि मैं किस एनजीओ से मिलकर काम कर रहा हूं.
nihang nahi aap ke yaha kai nang bhi jut gaye hai.alok tomar ya bhojpuri ke bahane
jo bhasha istemal ki gai aur aapne use vaise hi jane diya.
jaha tak ngo ki bat hai to vah yedi kadvi lag gai to hum vapas le lete hai.
note hemant sharma kab se nihang ho gaye
yeh jarur sodh ka vishai hai.puri jamat
yedi koi nihang hai to vah sirf alok tomar.ye punai to bajar ke banaye patrkar hai jo ab bodhikta me apna brand
ek marketing firm ke jarie bana rahe hai.aur aap log bina paisa liye unki madad ker rahe hai.
mujhe apki baat par akbar illahaabaadi ke ek sher yaad aa rhaa hai, pata nahi aap use kis tarah len-
mera iman kya poochhti ho munni
shiya ke sath shiya sunni ke sath sunni.
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