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जुलुम नहीं है सलवा-जुड़ुम

image सलवा जुड़ुम कैंपों में सामान्य है जिन्दगी

मैं उम्मीद कर रहा था कि कैंप में युद्ध के राहत कैंप की तरह बुरे हालात होंगे. लेकिन वहां पहुंचते ही जो नजारा दिखा वह मेरी धारणा के उलट था.

सलवा जुडूम को लेकर जिस तरह का दुष्प्रचार प्रगतिशील वर्ग के स्वघोषित प्रतिनिधि कर रहे हैं, उसे देखकर सवाल उठता है कि उन्हें भी क्या नक्सलियों का समर्थक मान लिया जाय? अभी हाल ही में दंतेवाडा के एक सलवा जुडूम कैंप में जाने का मौका मिला. रायपुर से ही कई मित्रों ने रोका की मत जाओ वंहा हालात ठीक नहीं हैं, ब्लैकाउट है. जनजीवन ठप्प पड़ा है, आदि आदि. फिर भी मैं रायपुर में रहकर कई लोगों से मुलाकात की और बस्तर के हालात के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाने में लगा रहा.  एक पत्रकार मित्र ने तो यह तक कह दिया की वहां मत जाओ, क्यों जान जोखिम में डालते हो. ऐसे में एक अकेला व्यक्ति जो दिल्ली से रिपोर्टिंग के लिए गया हो उसकी मनोदशा को समझा जा सकता है और वह भी तब जब इस तरह की बात आप ही का मित्र कह रहा हो.

फ़िर भी मैंने दंतेवाडा जाने का निश्चय कर लिया था. दो दिन जगदलपुर रहकर स्थिति को करीब से समझा. उस दौरान वंहा बिजली नही थी, क्योंकि नक्सलियों द्वारा टावर उड़ा देने से बस्तर संभाग के चारों जिले अंधेरे में डूबे हुए थे. जगदलपुर में भी कुछ लोगों ने कहा की आप का काम है, हम रोकेंगे नहीं, लेकिन आपको वहां जाने के लिए नही सजेस्ट करेंगे. दंतेवाडा जगदलपुर से करीब १०० किलोमीटर की दूरी पर है. एक मित्र ने तो यह तक कहा की आपको कलेक्टर से कैंप में जाने के लिए इजाजत लेनी पड़ेगी. मन में सवाल उठा की क्या सलवा जुडूम कैंप कोई प्रतिबंधित क्षेत्र है, जो इजाजत लेनी पड़ेगी. लेकिन लोगो का यह कहना कि नक्सली गाड़ियों को निशाना बना रहे हैं. उनका कोई सामाजिक चरित्र नहीं है. मुझे भयभीत तो कर रहे थे, लेकिन मेरा निश्चय दृढ़ था.

अंततः दंतेवाडा से करीब ३० किलोमीटर दूर गीदम विकासखंड स्थित कसोली के सलवा जुडूम कैंप की तरफ मैंने कूच कर दिया. रास्ते में मैं सोचता जा रहा था की यह कैसी आजादी है कि आज अपने देश में हम निडर होकर घूम भी नहीं सकते. ऐसे में क्या अर्थ रह जाते हैं हमारी आजदी के. अभी तक के अनुभवों से मुझे रास्ते में ऐसा लगता था कि न जाने पहाड़ी के कौन से कोने से गोली चल जाए. दंतेवाडा पहुँच कर मैंने यह सोचकर कलेक्टर साहब से मुलाकात की कि कैंप तक जाने में कोई समस्या हो तो उसे समझ लिया जाय. लेकिन कलेक्टर एसपी शौरी ने कहा की आप जाइये. किसी तरह की रोकटोक नहीं होती वहां पर. बस चेकपोस्ट पर समान्य पूछताछ की जायेगी. मेरे मन में भी सलवा जुडूम कैंप को लेकर धारणा थी कि बहुत ही बुरे हालत होंगे किसी युद्ध के राहत कैंप की तरह. तम्बू तने होंगे और तम्बुओं के बाहर बैठे बच्चे अपनी माँ से लिपटकर बिलख रहे होंगे. उस महिला ने जवाब दिया की नक्सलियों के डर से कैंप में रह रहे हैं. उसने बताया कि वे लोग (नक्सली) मारते हैं, राशन लूट लेते हैं और उसने यह भी कहा की खाना बनवाते हैं, खाते हैं फ़िर घर की लड़की को उठाकर ले जाते हैं.

लेकिन पहली नजर में मैंने जब सलवा जुडूम कैंप देखा तो मेरी वह धारणा टूट गई जिसके वशीभूत मैं यहां तक आया था.  कासोली का वह राहत कैंप किसी बसे बसाये गाँव से कम नहीं था. पानी के लिए नल, आंगनवाडी, स्वास्थ्य केन्द्र, शौचालय, उचितदर वाली राशन की दुकान इत्यादि. यही नहीं आदिवासियों को रोज़गार मिल सके इसके लिए हथकरघे भी लगये गए थे लेकिन स्वछन्द प्रवृति के आदिवासी बजाय हथकरघा चलाने के महुआ बीनना ज्यादा पसंद करते हैं. कुछ महिलाओं से बात हुई. वे बात करने से घबरा रही थीं. क्योंकि उनके पास मै बात करने के लिए जाने लगा तो वे बचकर निकल जाना चाहती थी. मैंने उन्हें विश्वास में लिया और बात शुरू की तो उन्होंने बताया की वे आंगनवाडी में बच्चों को पढाती हैं और इसके लिए उन्हें ९४० रूपये महीना मिलता है. जब उनसे पूछा कि घर छोड़कर कैंप में क्यों रहते हो तो एक महिला ने जवाब दिया की नक्सलियों के डर से कैंप में रह रहे हैं. उसने बताया कि वे लोग (नक्सली) मारते हैं, राशन लूट लेते हैं. उसने यह भी कहा कि खाना बनवाते हैं, खाते हैं फ़िर घर की लड़की को उठाकर ले जाते हैं. मन घृणा से भर गया और समझ में आने लगा की भ्रष्टाचार और विकास के आभाव का रोना रोने वाले नक्सलियों को शहरों में भेदभाव और भ्रष्टाचार क्यों नजर नहीं आता. भ्रष्टाचारी नेता उनके निशाने पर क्यों नही आते, आम आदमी का ही खून क्यों बहाया जाता है.

सबसे दुखद त्रासदी तो यह है की मानवाधिकार के नाम पर सुरक्षाकर्मियों का विरोध और नक्सलवाद को जस्टिफाई किया जा रहा है. अब तो गाँधी जी की भी छीछालेदर की जाने लगी है. और उन्हें सलवा जुडूम से बाहर निकलने की सलाह दी जा रही है. अगर ऐसा हुआ तो फ़िर असत्य का राज होगा, हिंसाचार होगा और शान्ति की आवाज उठाने वाले निरीह आदिवासियों की चीखें सुनाई दे रही होंगी, और हम बहरे होने का ढोंग करके उन चीखों से बच नहीं सकेंगे.

मानवाधिकार बचाने की कमाई

सलवा जुडूम : कब क्या हुआ नक्सलियों के खिलाफ क्रांति की शुरूआत बस्तर के आदिवासियों ने 5 जून 2005 को की। इस दिन फरसेगढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम अंबेली में आदिवासियों की पहली बैठक हुई। इस बैठक में पांच संघम सदस्यों को सजा दी गई। इसके बाद बैठकों का सिलसिला ही चल पड़ा। कुटरू, कुदमा, अट्टावली, रानीबोदली, तालमेंटरी, दरे और मारवाड़ा में नक्सलियों के खिलाफ ग्रामीणों ने आवाज उठाई। 5 जून के बाद 18-19 जून को फरसेगढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम तालमेंद्री, कोतरापाल और जांगला व 48 गांवों के करीब पांच हजार ग्रामीण एकत्र हुए। ग्रामीणों की इस बैठक में दो नक्सली भी भेष बदलकर बैठे हुए थे जिन्हें ग्रामीणों ने पहचान लिया और उनकी इतनी पिटाई की कि मौके पर ही उनकी मौत हो गई। अपने साथियों की ग्रामीणों द्वारा की गई हत्या नक्सलियों को सहन नहीं हुई और उन्होंने सैकड़ों संख्या में 20 जून को ग्रामीणों की उसी बैठक में हमला बोल दिया। ग्रामीणों के समूह पर अचानक नक्सलियों द्वारा की गई गोलीबारी से 8 ग्रामीणों की मौके पर ही मौत हो गई जबकि 45 को बंधक बनाकर नक्सली अपने साथ ले गए। इनमें से चार की हत्या कर उनके शव जंगल में ही फेंक दिए गए थे। इस प्रकार इस बैठक में ग्रामीणओं को अपने 12 साथियों की जान की आहुति देनी पड़ी। इस हमले के बाद नक्सली शायद सोच रहे होंगे कि ग्रामीण अब शांत बैठ जाएंगे, पर ऐसा हुआ नहीं, ग्रामीणों के हौसले और भी बढ़ गए। नक्सली उनके इस बढ़े हुए हौसले से बौखला गे हैं। यही कारण है कि वे मौका मिलते ही उन पर कहर बनकर टूट रहे हैं। मगर गजब के जीवट हैं ये तीर-धनुषधारी आदिवासी जंग का ऐलन कर चुके हैं तो अब पीछे हटेंगे नहीं, भले ही उनकी जान क्यों न चली जाए। इसके बाद 22 जून को भैरमगढ़ क्षेत्र में बैठक हुई। इस बैठक में बोदली, मारवाड़ा, नेमेड़, कुटरू, सिंगाचल, भैरमगढ़ और सतवा सहित 40 गांवों के करीब कई हजार ग्रामीण तीर-धनुष के साथ एकत्र हुए। बैठक में नक्सली घुसपैठ न कर सके इसलिए युवक पहरे पर चारों ओर तैनात थे। उन्होंने शपथ ली कि वे बस्तर की परंपरा संस्कृति को नष्ट करने तथा उनका लगातार शोषण करने वाले नक्सलियों से बस्तर को मुक्त करके ही दम लेंगे, मर जाएंगे पर अपनी अगली पीढ़ी को उनसे मुक्ति दिलाते ही रहेंगे। यह समूचा दृश्य आजादी के आंदोलन में कम नहीं था। पश्चात 27 जून को नेलगुड़ा और भैरमगढ़ के पास 22 गांवों के लोगों की बैठक हुई इस बैठक में नक्सलियों ने नारा दिया कि अपनी लड़ाई हम खुद लड़ेंगे। क्षेत्र में यह नक्सलियों के खिलाफ 16वीं बैठक थी जिसमें नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा भी उपस्थित थे। इस बैठक में ही आंदोलन को 'सलवा जुडूम' नाम भी दिया गया। इसी दिन कांकेर जिले के परलकोट क्षेत्र में भी नक्सलियों के खिलाफ जनजागरण अभियान की शुरूआत कलेक्टर डॉ. राजू की उपस्थिति में हुई। 29 जून को दक्षिण बस्तर के धुर नक्सली क्षेत्र कुटरू में हुई बैठक में लगभग 55 गांवों के पांच हजार से भी ज्यादा ग्रामीणों ने ----की। इस दिन उन्होंने संकल्प लिया कि कोटा से अंबिकापुर तक पूरे छत्तीसगढ़ से नक्सलियों को उखाड़ फेकेंगे। अब नक्सलियों के खिलाफ आदिवासियों की बैठक ऐसे खाली नहीं रही है। चाहे जैसे नक्सलियों तक ग्रामीणों की बैठकों की जानकारी पहुंच जाती है और इसके पहले की नक्सली रात में धावा बोलकर जनजागरण अभियान के बड़े लोगों को आतंकित करने कत्लेआम करने लगे हैं। इस प्रकार के हमलों में अब तक 45 से भी ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। लेकिन ग्रामीणों के भी हौसले पस्त हुए हैं। उन्होंने भी नक्सलियों को मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया है। कुटरू क्षेत्र में ही करीब पांच नक्सली मारे गए हैं, जिन्हें ग्रामीणों के समूह ने मौत की सजा दी है। इसके अतिरिक्त लगभग 50 संघम सदस्यों को ग्रामीणों ने बंधक बना रखा था।  

बहरहाल बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ शुरू हुई क्रांति की यह आग अब धीरे-धीरे फैलने लगी है। दक्षिण बस्तर के ही सुकमा और नारायणपुर पुलिस जिला बिजली, पालकी, महका, खड़कागांव और केरलापाल के लोगों ने भी मोर्चा खोल दिया है। इसके बाद तो मानो जन आंदोलन का सिलसिला ही चल पड़ा है। इसी तारतम्य में छह चुलाई को तोएनार के जंगल में 45 गांवों के पांच हजार ग्रामीण एकत्र हुए। आदिवासियों के इस जन आंदोलन को संबोधित कर लौट रहे नेता प्रतिपक्ष दंतेवाड़ा जिले के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप के काफिले को निशाना बनाकर नक्सलियों ने हमला बोला। लेकिन सुरक्षा व्यवस्था के कारण उनका हमला खाली गया प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा स्वयं भी दो बार नक्सली क्षेत्रों में पदयात्रा कर चुके हैं। नक्सल विरोधी आंदोलन में सहभागिता की कीमत भी श्री कर्मा को चुकानी पड़ी है। उनके ग्राम फरसेपाल में पांच सौ से भी अधिक नक्सलियों ने हमला बोलकर उनके रिश्ते में बड़े भाई सुकू कर्मा की हत्या कर दी और उनके घर में लूटपाट की। इस हत्या के बाद भी श्री कर्मा का मनोबल नहीं टूटा है। इसी क्रम में पुलिस की कार्रवाई भी नक्सलियों के खिलाफ तेज हुई है। इस अभियान के दौरान ही दर्जनों नक्सलियों को ग्रामीणों ने बंदी बनाया है वहीं उन्हें सहयोग करने वाले लगभग सौ संघम सदस्य भी पुलिस के हत्थे चढ़े हैं। 

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satyendra on 29 June, 2008 12:34;47
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बहुत अच्छी जानकारी दी है। लोगों के डराने और दुष्प्रचार के बावजूद कैंप तक जाने का आपका फैसला आपके अन्दर के सच्चे पत्रकार के वजूद को उजागर करता है। आपकी इस रिपोर्ट से कई गलतफहमियां दूर हुई हैं
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जयराम दास. on 29 June, 2008 14:00;27
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कभी नागार्जुन ने लिखा था.....
खेतों मे बंदूके उगती,गली-गली मे बम बिकता है,
आ तुझको मे सैर करा दूँ....घर मे घुस कर क्या लिखता है.
संस्कार अनुमति नहीं दे रहा है,अन्यथा इन खून के सौदागर इन वामपंथियों के लिए कोई संसदीय शब्द इस्तेमाल लायक है ही नहीं.खैर उमाशंकर जी की जितनी तारीफ की जाये कम है कि उन्होंने तमाम अवरोधों को दूर कर,शिविर मे जा कर सच्चाई से दिल्ली को अवगत करने का काम किया है .वह आ गया है जब उमा भाई जैसे लोग चाइना के दलालों की कारगुजारियो से इसी तरह अवगत कराते हुए देश सेवा करें.बहुत साधुवाद आपको....साथ ही विस्फोट टीम को भी बधाई.
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Sudhir K Jha on 29 June, 2008 15:56;11
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This article is indeed an eye opener for me as well as many. A common man like me normally gets information through various sources including media and newspaper. We seldom go to such places like 'Salwa-Judum' camps to know the actual facts. Hence at times public opinion lacks in clarity and the facts get distorted. Thanks to Mr. Umashankar Mishra for his first hand reporting of actual facts and providing us a clear information about such operational camps of public rescue/interest. Based on this report I must say that Govt. initiatives in CG is praiseworthy and it has long term vision in public interest. However I further feel that public awareness needs to be increased in proportion so that Naxal activities are condemned through common public voice till it's end. Govt should put such machinery in place to ensure that actual facts are known in public, and common people do not get misled due to propagation of wrong information / reports by some racists & fascists in society.
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tulsi singh bisht on 01 July, 2008 16:54;10
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उमाशंकर मिश्र जी आपकी दंतवाडे़ जाकर जो स्टोरी आपने छापी है काबलियत तारीफ है वो भी जान जोखिम में डालकर। इसी तरह बिहार के मंत्री भी नक्सलियों से निपटने के लिए जी-जान से जुड़ जाए तो नक्सली ही खत्म हो जाते। लेकिन उनको तो पैसे कमाने और भ्रष्टाचार करने के अलावा फुरसत ही कहां है। आपके जैसे देशभक्त पत्रकार की जरूरत है आज भारत को। काश! ऐसा सब सोच लेते तो आज नक्सलियों का जन्म ही न होता।
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dilip keshav mukharaiya on 02 July, 2008 01:32;55
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i alaways feel that there are two sections of journalists or reporters working everywhere. some are pseudos and some are genuines. and there is no need to tell about their works and mottos. Mr. Umashankar Mishra did a remarkable job by visiting the 'Salwa Judum' camps to feel the truth. I really hail your efforts and praise your courage and spirit. Keep it up man. Good luck for you.
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rajni beniwal on 02 July, 2008 13:52;15
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U really did a great job. congratulations for this and all the very best for future & hoping further u'll do more greter jobs then this....keep this spirit up and touch the heights.
my all gud wishes with you.
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Nilesh Shukla on 02 July, 2008 14:23;12
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Dear Mishra Ji,
Really, this is a good article. I appriciate your courage to visit in naxalite camp. I will be happy if you can focus more on this burning issue.
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akshey on 02 July, 2008 14:43;08
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Mr. Umashankar your work is really appreciable and hats off to your courage and taking risk of life to go there.I thnk your thoughs also aware others to know about reallity and truth and not to beleive on blind talks. I hope you will keep doing these type of challenging works in future also n make people aware about naksalism.All the very best & congratulations.
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Anshuman Anand on 02 July, 2008 19:01;49
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Indeed Great..!!!
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sanjeev kumar sinha on 02 July, 2008 20:07;49
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जैसी स्‍टोरी लिखने के लिए उमाशंकर जी जाने जाते है वैसे ही विषय पर उन्‍होंने अपनी लेखनी चलाकर लेखन धर्म का निर्वाह किया है। नक्‍सलवाद के बारे में क्‍या कहना। यह भारतीय लोकतंत्र पर काला धब्‍बा है। नक्‍सलवाद कुछ और नहीं, आतंकवाद है। यह गुंडों का गिरोह है।

ऐसे समय में जब गूगल बाबा और एयरकंडीशनर कमरे में बैठकर पत्रकारिता की जा रही है वैसे समय में बस्‍तर जाकर नक्‍सलवाद और सलवा जुडुम के सच से देशवासियों को अवगत कराना साहस भरा काम है। नक्‍सलवाद को सामाजिक प्रतिरोध से ही ध्‍वस्‍त किया जा सकता है। सलवा जुडुम सामाजिक प्रतिरोध का सबसे बढिया उदा‍हरण है। एक बात मैं कहना चाहूंगा कि सलवा जुडुम की खामियों पर भी प्रकाश डाला जाता तो अच्‍छा रहता।
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शिवाजी के शौर्य को कलंकित करने का षण्यंत्र
छत्रपति शिवाजी के अपमान के मुद्दे पर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरम है. संभाजी ब्रिगेड जिसने पिछली बार भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बोरी) की तोड़-फोड़ की थी. इस बार महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल पर हमले का षण्यंत्र रचा था जिससे वे शनिवार को बाल बाल बच गये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जेम्स लेन की विवादास्पद पुस्तक "शिवाजी- द हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया" की बिक्री के लिए जिस अंदाज में छूट मिली है, उस पर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कई संगठन आंदोलनरत हैं. लेकिन हम पहले यह समझ लें कि यह जेम्स लेन महाशय हैं कौन और उन्होंने किताब आखिर किस इरादे से लिखी है?...
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बेमतलब हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस
हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है जो 1987 से हर साल 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विश्व की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं।...
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रमन सिंह की दमनकारी औद्योगिक नीति
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह नक्सली आंदोलन के खिलाफ चलनेवाले अभियान के अगुआ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन रमण सिंह इस आंदोनल को किसके इशारे पर कुचल रहे हैं? क्या वे आम आदमी और आदिवासियों के हित में नक्सली आंदोलन को कुचलने का दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं या फिर उनका एजेण्डा कुछ और है. हाल में ही छत्तीसगढ़ की नयी औद्योगिक नीति की समीक्षा करें तो साफ हो जाता है कि असल में यह संघर्ष वे किसके लिए कर रहे हैं. ...
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