मुरिया दरबार का करमा नृत्य है सलवा जुडूम
सलवा जुड़ुम ना कोई ब्राण्ड है और न ही गांधी को ब्राण्ड एम्बेसडर जैसे शब्दों से दूषित करने की जरूरत. ये दोनों शब्द बिल्कुल बाजार की उपज है.
तीसरी दुनिया के प्रखर चिंतक ´पॉलो फ्रेरे` के अनुसार ´शोषक और शोषित दोनों का अमानुषीकरण मानवीय विडंबना है। इस दो तरफा अमानवीकरण से इंसानी नियति को बचाने की क्षमता एवं जिम्मेदारी शोषक के पास न होकर शोषित की है। पहले तो शासकों ने शोषक बनकर छत्तीसगढ खासकर बस्तर को हर तरह की मानवीय सुविधाओं से दूर रखा और उसके बाद उस शोषण से मुक्ति का सपना दिखाने कुछ लोग सुदूर बंगाल से आये और बेचने लगे आदिमजनों के सपनों को। दशकों बाद उत्पीडित की भूमिका में रहे आदिवासी जनों ने अपनी आंखें खोली अपनो को उन सपनों के सौदागरों के रक्तिम चंगुल से छूट सकने क्षमता को पहचाना, अमानवीकरण से अपनी नियति को बचाने की जिम्मेदारियों को समझा और तब एक ऐतिहासिक आंदोलन शुरू हुआ, जिसका नाम पडा ´सलवा जुडूम`।
´सलवा जुडूम` ना कोई ब्रांड हैं, और न ही गांधी को´ब्रांड एम्बेसडर` जैसे शब्दों से दूषित करने की जरूरत। ये दोनों शब्द बिल्कुल बाजार की उपज हैं और बाजार जैसी चीजों से आदिमजनों का न ज्यादा संबंध है और ना ही उन्हें इसकी जरूरत। रही बात गांधी की, तो यह तय है कि जहां भी अव्यवस्थाओं के खिलाफ असहयोग की शुरुआत होगी, जहां भी अपनी भूमि को उत्पीडकों के चंगुल से मुक्ति हेतु कोई प्रयास शुरू होगा तो उसके शाश्वत प्रतीक होंगे महात्मा गांधी। लडाई चाहे अफ्रिकी ´नस्लवाद`के खिलाफ हो या बस्तरिया ´नक्सलवाद` के। अपनी लाठी लेकर 139 वर्ष का वह महामानव बिल्कुल सीना ठोककर खडा होगा राक्षसों के समक्ष प्रतीकों के रूप में, नैतिक बल के रूप में। पीढ़िया आयेंगी चली जायेगी, गांधी की उम्र भी बढती जायेगी लेकिन, उसकी वही तेजिस्वता, वही आध्यात्मिक आभा, वही आत्मिक बल और अन्याय के विरूद्ध खडे होने की वही जिजीविषा दिखेगा आज और हजार साल के बाद भी।
यदि गांधी की वह प्रेरणादायी ताकत नहीं हो तो एक बारगी तो आत्मा कांप जाती है, रोंगटे खडे हो जाते हैं यह सोचकर कि हमारा पाला कितने खतरनाक लोगों से पडा है। अस्तित्व की कितनी विकट लडाई लड रहे हैं ये आदिम जन। क्या नहीं है नक्सलियों के पास? ढेर सारा देशी-विदेशी पैसा, अत्याधुनिक हथियार, सैकडों लोगों को क्षणभर में मांस के लोथडे में तब्दील कर देने वाले भूमिगत बम, मिसगाइडेड मिसाइल की तरह ढेरों प्रतिभाशाली एवं उर्जावान लोग, वेतनभोगी मीडियाकर्मी, चीन के चेयरमैन की शागिर्दी, भारत की सरकार के बैसाखी बने लोगों का सहयोग, अमानवधिकारियों का संरक्षण और जंगली लडाई के जानकार उसकी खुंखार गुरिल्ला सेना। एक´सत्य`और इमानदारी के सिवाय सबकुछ तो है नक्सलियों के पास। और यही पर गांधी प्रतीक बन जाते हैं इन बस्तरिया वीरों के। इसी कारण मोहनदास राजदूत बन जाते हैं सलवा जुडूम के। आखिर उस युवा बैरिस्टर के पास भी सत्य की ताकत के अलावा था क्या? लेकिन दक्षिण आफ्रिका में उसी ताकत के बदौलत गांधी ने ट्रेन के बाहर फेकने वाले फिरंगियों को उसकेसमूचे साम्राज्य के उसके सारे उपनिवेश के बाहर फेककर ही दम लिया था।
जहां तक सवाल गांधी के अहिंसा की है, तो आज यदि गांधी होते तो शायद फिर अपनी इसी बात को दोहराते कि ´हिंसा और कायरता में से अगर हमें एक चुनना पडे तो हम हिंसा चुनना पसंद करेंगे, आखिर वह सत्य का पुजारी इस असत्य को कभी नहीं दुहराता कि उसे आजादी बिना खडग बिन ढाल, मिल गयी थी। निश्चय ही वह नमन करते उन क्रांतिकारियों का भी जिन्होंने वनवासियों की तरह ही पशुता पर उतर गये अंग्रेजों की चूले हिलाकर रख दी थी। एक जगह तो नेहरू ने भी गांधी जी की अहिंसा को अपने आत्मकथा में एक रणनीति कहा है, जब काफी हिंसा के कारण जब महात्मा ने अपने आंदोलन को विराम दिया था। एक दोहा है ´गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट, भीतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट` यानि गुरु को कुम्हार की तरह होनी चाहिए जो भीतर से तो सहारा दे मगर बाहर चोट भी मारने की कुबत रखे। शायद किसी के पाप का घडा फोडने में भी इसी नीति की जरूरत होती है।
गांधी जी ने कभी यह दावा नहीं किया कि उन्होंने कोई नया विचार देश को दिया है। 28 मार्च 1936 के हरिजन के अंक में उन्होंने लिखा था। ´नये सिद्धांतों को जन्म देने का दावा में नहीं करता, मैंने तो केवल अपने ढंग पर सनातन सत्यों को जीवन और समस्याओं पर लागू करने का प्रयास किया है।` यानि अपने समग्र जीवन में गांधी अपने उसी सनातन सत्य के साथ प्रयोग करते रहे जो पूर्ववर्ती विचारकों शास्त्रों पुरानों ने उन्हें दिया था। अन्य कई चीजों के अलावा अहिंसा भी उनमें से एक था, लेकिन वे कोई लकीर के फकीर नहीं थे। समयानुकूल विचारों में लचीलापन लाना भी उनके सिद्धांतों में शामिल था। ऐंजिल की पुस्तक के आधार पर उन्होंने कहा था कि कोई एक गाल पर थापड मारे तो दूसरा गाल उसके आगे कर दो। लेकिन जब दूसरे पर भी थप्पड मार दे तो तीसरा गाल कहां से लायेंगे आप? उस समय भले ही तीसरे गाल का प्रयोग करने की जरूरत नहीं पडी हो, कुछ तो तात्कालीन वैश्विक परिस्थितियां, गांधी का तेज और क्रांतिकारियों का बलिदान अंग्रेजों को वापसी के लिए मजबूर होना पडा।
लेकिन आज तो ये नक्सली हमसे हमारा तीसरा गाल भी मांग रहे हैं। राम राज्य की स्थापना को ही अपना ध्येय मानने वाले गांधी के रामकथा में ही इस तीसरे गाल की गुत्थी सुलझी नजर आती है। जब तीन दिन तक विनय करने के बाद भी राह नहीं देने पर राम समुद्र को सोखने को यह कहते हुए उद्यत हुए थे कि´भय बिनु होई ना प्रीति` कभी आपने पढा है कि गांधी ने कभी आलोचना की हो भगवान राम के इस कदम की। जब इसी दण्डकारण्य (बस्तर) में राक्षसों द्वारा संहार किये गये वनवासियों के हिìयों का पर्वत देख भगवान राम, राक्षसों के खात्मे का संकल्प लेते हैं, क्या आपने कहीं सुना कि अपने किसी आलेख या भाषण में गांधी जी ने उस प्रसंग की आलोचना की हो? राक्षसों के संहार की कथा ´रामायण` पढते-पढते ही तो बकौल गांधी, गांधी जी सत्य हो गये थे। इस रावण को समाप्त करने वाले भगवान राम ही तो अंत समय में भी उनके जिह्वा पर विराजमान रहे। गीता पर सर्वश्रेष्ठ टीका लिखने वाले, और उसमें वर्णित उपदेशों को अपने जीवन में अंगीकार करने वाले उस कर्मयोगी को कभी आपने ये कहते पढा कि अर्जुन को युद्ध के लिए ´उकसाने` वाले कृष्ण गलत थे।
गांधी के प्रयोगों पर किसी तरह के विवेचना की पात्रता न रखते हुए भी विद्वतजनों से यह आग्रह करना उचित होगा कि वे सभी गांधी को उनके आस्था, विश्वास एवं कर्म के साथ समग्रता में समझने की कोशिश करें। बिना किसी पूर्वाग्रह के गांधीवाद पर विमर्श करते समय लंका और कुरुक्षेत्र के नायकों पर, गांधी की असीम आस्था पर भी विचार करना होगा। उपरोक्त का कहीं भी आशय यह नहीं है लेखक किसी नतीजे पर कूद कर पहुंच गया है, या किसी भी तरह के अनावश्यक हिंसा का समर्थन कर रहा है। गांधी के बारे में कोई भी प्रशंसा या आलोचना तो निश्चय ही सूर्य पर थुकने या उसे दीया दिखाने के सदृश होगा। लेखक का आशय सिर्फ इतना है कि´छीनता हो जब तुम्हारा स्वत्व तो,आंख से आंसू नहीं शोला निकलनी चाहिए।
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Bharat ko ab in naksaliyon ki chungal se churane ka waqt aagya hai. Waqt aagya hai ki wo "teesra gaaal" naksaliyon ki ho jispey thappad mara jaye!
Let us take some tough decisions and eradicate this menace called NAXALITES.
जबरन उलझाये जा रहे और दुष्प्रचार की फांस में जकडे हुए विषय पर बड़ी ही सटीक एवं सार्थक टिप्पणी जय साहब ने की है.
साधुवाद
प्रश्न -
ये जो आंध्र में, छत्तीसगढ़ में, झारखंड में ये जो हथियारबंद आंदोलन चल रहे हैं. आपके शब्दों में मार्क्सवादी, लेनिनवादी आंदोलन. इसको आप ऐसा कहते हैं क्या?
उत्तर -
नहीं हम कहते हैं कि ये terrorist हैं. They mainly base themselves on terror campaign पैसा से बंदूक से. ये बहुत कम जगह में दो incident हुआ है. बहुत कम जगह में. बहुत जगह के आदमी को जमा करके एक थाना में हमला करके भाग गए. खाली that is not the only source. ये लोग आदमी को धमकी देकर पैसा देकर, पैसे वाले को अदा करते हैं कि कुछ कर रहे हैं. ऐसे ही, yes in the form of armed struggle. I never condemn it. पर ऐसे, you cannot do it. In the last analysis, you will be defeated. काहे कि Terror campaign से होगा नहीं unless people are with you.
http://www.raviwar.com/baatcheet/b7_kanu-sanyal-interview-alokputul.shtml
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने ठीक ही हुंकार भरा था-
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं
कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे
नक्सलवाद कुछ और नहीं बल्कि गुंडों का गिरोह है। वे सामाजिक क्रांति की बात करते है। क्या यह क्रांति बेगुनाह आदिवासियों की लाशें बिछाने से होगा। स्कूल, कॉलेज और अस्पताल को बम से उडा देने से होगा। उनका लक्ष्य सर्वहारा की तानाशाही स्थापित करना है तो क्या यह मजदूरों-किसानों को गोलियों से भून देने पर संभव होगा। जो विचारधारा मानव प्राण का सम्मान करना नहीं जानती वो क्या खाक क्रांति लाएंगे। दरअसल, नक्सलवादियों-माओवादियों का जनता से कोई सरोकार नहीं है। उन्हें जनता का विश्वास प्राप्त नहीं है।
लोकनायक जयप्रकाश बाबू ने ठीक ही कहा था-
हिंसा का सहारा वो लेते है जिन्हें जनता का विश्वास प्राप्त नहीं होता।
नक्सलवाद को केवल बस्तर की समस्या मानकर जो निश्चिंत हो अपने घरों में बैठे हैं उनको यह जान लेना चाहिए कि यदि वे इस आतंकवाद के खिलाफ लामबंद नहीं हुए तो जल्द ही इसकी तपिश के वे भी शिकार होंगे-
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध
जयराम जी ने नक्सलवादियों की अच्छी खबर ली है और छदम पंथनिरपेक्षवादियों को बेनकाब कर दिया है।
यह कथन एकदम सत्य प्रतीत होता है कि बस्तर में नक्सलवाद कहां है अब, जो है वह तो करीब-करीब आतंकवाद है।
It is imperative that intellectual class of the society should come forward to draw logical inference in larger National Interest and discount all such acts/statements which relates to Petty gains in political/social circles. Relevent issue of National Concern must be viewed in wider perspective and it has been touched upon by the author Shri Jayram Dasji very nicely.
Atrocities on the plain and simple people of Bastar by whomsoever it may be whether NAXALITES or TERRORISTS, is now widely known to all and such act is indeed disgraceful. This act of nuisance like mass massacre should not have any place in a fully democratic country like India and it is a matter of shame, not pride. However we need to re-look into the facts thoroughly and investigate that why Democratic Independence in India is yet to be established across its length and breadth in all sections of society even after 6 decades of Indias Freedom??? Though it requires a conscious thinking at all levels of governance in political circle to work out control measures and eradicate such evils (which does not happen by doing simple politics for petty gains on such public issues), yet it remains a fact that Indian Governance post Independence has lacked in its direction as well as objectives for a longer period of time.
Our father of Nation Mahatma Gandhi is a world icon to reckon with and should not be dragged at such level of politics in India. GANDHIAN PHILOSOPHY is not a cheap talk, it requires enough level of maturity to understand it and I personally feel that present level of Politics in India is not upto that standard. I sincerely urge that political people who are responsible for governance should now focus on setting right directions with a clear vision in a suitable time frame, so that ball starts rolling in the right direction. This will help we Indians to feel true independence in due course of time and will also ensure & establish true democratic values in the days to come.
bt stilllll vichaaron k flow ko jaese jay maintain karte hain........... isi se unki rachnatmakta dikhti hai.
baki unke is lekh pe TIPPAni karna mere liye mushkil hi hoga
mujhe yaad hain kuch saal pehele main PWG ke upar ek documentary dekha tha.I've seen lots of interesing things one of these is their food habit.......ap yakin nahin karenge un logoko khane ke liye sirf chitya thi.agar unke pas videshi paise hote to kaya yeh haal hota?Agar adhunik hathyar hota to kaya zarurat parti police chowki main daka dal ke old fashioned riffle uthane ki?Aur kaya apko lagta hain khud Mao ka rasta chornevaale china Maoist-oke saath degi?
एक´सत्य`और इमानदारी के सिवाय सबकुछ तो है नक्सलियों के पास।
Is vishay main apka ray jaan na chahunga....yeh 'satya' kaya hai?Main apke ray ki apeksha me hun
Is line me ek baat mere samajh se bahar hain ek hi saath naxaliyo ko sapno ka saudagar aur unke dikhay sapno ko raktim chungal kiyon kaha gaya?Ek baat to nishchit hain lekhak bhi maan rahe hain ke waha ke log shoshit hain to fir unke hak liye larna kaya apradh hain ya unka sapna dikhna?
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