Home | परत-दर-परत | गूगल गणराज्य के १० साल

गूगल गणराज्य के १० साल

image गूगल के संस्थापक लैरी और सर्गेई (१९९५)

गूगल की सफलता की कहानी समझने के लिए उस दौर को समझना होगा जब वेब पन्ने इतने हो गये थे कि डायरेक्टरी की जरूरत महसूस होने लगी थी. यह काम गूगल ने नहीं किया. सबसे पहले यह काम याहू के संस्थापक डेविड फिलो और जेरी येंग ने किया था. वे भी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे. उन्होंने सबसे पहले अप्रैल १९९४ में जो डायरेक्टरी शुरू की उसका नाम रखा था- जेरीस गाईड टू द वर्डवाईड वेब. अकेले इसी साल एक मिलियन से ज्यादा हिट्स आये. १८ जनवरी १९९५ को याहू नाम रजिस्टर हुआ और यहां से याहू डायरेक्टरी युक्त पोर्टल में बदल गया.

याहू के इस स्वरूप को निवेशकों ने हाथो-हाथ लिया और पैसा भी लगाया. जब याहू के सफलता का यह अध्याय शुरू हो रहा था तो उनके सामने सबड़े समस्या थी कि अगर कंपनी को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाना है तो इसमें निवेशकों को विज्ञापन से होनेवाली आय का रास्ता दिखाना पड़ेगा. अब याहू के संस्थापकों के सामने बड़ी मुश्किल यह थी कि अगर वे अपनी वेबसाईट पर विज्ञापन देते हैं तो क्या इससे दर्शक आना बंद तो नहीं कर देंगे? लेकिन दूसरी ओर निवेशकों को अपनी पूंजी का रिटर्न भी चाहिए था. एक टीवी इंटरव्यू में जैरी यैंग ने माना था कि उन्होंने विज्ञापन लगाने का फैसला बहुत डरते हुए किया था. लेकिन विज्ञापन लगाने के बाद साईट पर आनेवाले लोगों ने कोई एतराज नहीं दिखाया. साईट पर आनेवालों की संख्या लगातार बढ़ती रही. बात बन गयी. उस समय निवेशकों ने यह महसूस किया कि इंटरनेट विज्ञापन का नया हथियार हो सकते हैं. अगर किसी एक जगह ढेर सारे लोग आते-जाते हों तो वहां विज्ञापन की अकूत संभावनाएं बन जाती हैं.

१९९७ आते-आते इंटरनेट इंटरनेट कमाई का बड़ा जरिया बन चुका था जिसमें सर्च की सुविधा देनेवाली कंपनियां सफलता का परचम लहरा रही थीं. इसमें याहू के अलावा लाईकास और एक्साईट जैसी कंपनियां भी थीं जो वेब पर डायरेक्टरी से आगे निकलकर सर्च की सुविधा मुहैया करा रही थीं. जिन दिनों यह सब हो रहा था उसी समय इसी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में दो छात्रों का संपर्क हुआ जो कि दोनों ही कंप्यूटर साईंस में पढ़ाई करने आये थे. यह १९९५ की बात है. लैरी पेज (२४) और सर्गेई ब्रिन (२३) मिले और उन्होंने भी इस बारे में काम करने के लिए बात की. जैसा कि गूगल वेबसाईट का कहना है दोनों में बात नहीं बनी लेकिन इन छात्रों ने आगे इस बारे में और बात करने और काम करने का निर्णय लिया. एक साल बाद इन छात्रों ने विश्वविद्यालय के ही सर्वर पर एक खोज इंजन का प्रयोग शुरू किया जिसका नाम रखा गया था ब्लैक रब. इस सर्च इंजन के कारण विश्वविद्यालय के बैंडविट्थ का खर्च इतना बढ़ गया था कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे बंद करने या यूनिवर्सिटी से बाहर ले जाने की सलाह दी.

१९९७ में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के ये दोनों छात्र सिलिकान वैली में आ गये जहां निवेशक डाटकाम के बूम में पैसा निवेश कर मोटी कमाई का इंतजाम कर रहे थे. अब तक सर्च इंजनों ने ईमेल और दूसरी ऐसी सेवाएं शुरू कर दी थी जो उपभोक्ता को नियमित आने के लिए बाध्य करती हों. आज गूगल को देखकर ऐसा लग सकता है कि जब उन्होंने gogool के जिस गणितिय सिद्धांत पर अपना सर्च इंजन विकसित किया था उसे हाथो-हाथ लिया गया होगा. लेकिन ऐसा नहीं था. लैरी और सर्गेई को सालभर धक्के खाने पड़े. इन्होंने जिस भी निवेशक को अपना विचार दिया सबने यही कहा कि अब एक और सर्च इंजन. पहले ही इतने सारे हैं जिससे लोगों का काम हो जाता है. लेकिन दोनों लड़कों ने हार नहीं मानी. हां, थोड़ा निराश जरूर हो रहे थे. इसी समय इन लड़कों ने सन माईक्रोसिस्टम के सह संस्थापक विनोद खोसला से मुलाकात की. विनोद खोसला तब सन माईक्रोसिस्टम छोड़कर निवेश बैंकर हो चुके थे और उन्होंने एक्साईट सर्च में पैसा लगा रखा था. उनको इन लड़कों का वह सिद्धांत पसंद आया जिसे इन्होंने गूगल नाम दिया था. उन्होंने तुरंत एक्साईट सर्च के एक पदाधिकारी ग्राहम स्पेंशर से इन लड़कों की एक रेस्तरां में मुलाकात करवाई. इन लड़कों ने अपने सर्च इंजन की खूबियों को बड़ी उम्मीद से बताया. उन्हें उम्मीद थी कि स्पेंशर प्रभावित होंगे तो एक्साईट कंपनी गूगल को खरीद लेगी. इसके लिए उन्होंने एक्साईट से १० लाख डालर की मांग की. एक्साईट के सीईओ ने इस सौदे से मना कर दिया जो आज मानते हैं कि यह उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. जिस गूगल को एक्साईट ने इस समय १० लाख डालर में नहीं खरीदा आज उसकी बाजार में कीमत १०० अरब डालर है.

लगातार ना-ना सुनते हुए भी लैरी और सर्गेई लोगों से मिलते रहे और अपने सर्च इंजन के बारे में बताते रहे. अगस्त १९९८ में सन माईक्रोसिस्टम्स के ही सह संस्थापक एन्डी बैकोसिम पहली बार उनसे मिलने उनके घर गये. उन्होंने उन लड़कों को सुना और तुंरत एक लाख डालर का चेक काटकर दे दिया. काम शुरू हो गया. गूगल का अस्तित्व विचार से निकलकर धरातल पर आकार लेने लगा था. शुरू होने के छह महीने के भीतर ही गूगल का सर्च इंजन टाप १०० साईटों में शुमार हो गया. यह गूगल के भविष्य की सुनहरी झलक थी. असल में इस समय तक वेब-पोर्टल पर चमक-दमक इतनी बढ़ गयी थी कि इन पोर्टल ने सर्च पर ध्यान देना छोड़ दिया था. सर्च परिणामों में महत्वपूर्ण जानकारियों से ज्यादा कंपनियों और प्रायोजित सामानों के विज्ञापन ज्यादा आते थे. जिस एक विचार से पोर्टल को पहली बार नयी जान मिली थी उन्होंने उस विचार का ही लगभग परित्याग कर दिया था. ऐसे में गूगल का पूरी तरह से सर्च पर केन्द्रित होना उसके लिए बड़े फायदे का सौदा होनेवाला था. गूगल के वेबसर्च का मूल सिद्धांत उसका इनकमिंग लिंक काउण्ट है जिससे वे पेजरैंक का निर्धारण करके वेब में मौजूद सामग्री को पाठकों तक पहुंचाते हैं. हालांकि समय के साथ गूगल ने बहुत सारी नयी बातें जोड़ी हैं लेकिन पेजरैंक का उनका पुराना सिद्धांत अचूक है.

क्या यह सुनकर आश्चर्य नहीं होता कि जिस गूगल के पीछे आज पूरी दुनियी दीवानी है उसे अपने शुरूआती दिनों में कोई निवेशक नहीं मिल रहा था. विनोद खोसला चाहते थे कि गूगल को एक्साईट खरीद ले. उन लड़कों ने इसके लिए दस लाख डालर मांगे थे लेकिन एक्साईट ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे सर्च का यह काम बहुत बेहतर कर रहे हैं. फिर किसी को १० लाख डालर क्यों दें? आज वही गूगल १०० बिलियन डालर की कंपनी है.

कुछ शुरूआती अड़चनों और दिक्कतों के बाद गूगल ने कभी पीछे लौटकर नहीं देखा. फरवरी १९९९ तक वे अपने गैरेज से ही काम करते रहे लेकिन अब उन्होंने गैरेज से निकलकर अपना आफिस लिया और आठ लोगों को नौकरी पर रखा. इसके बाद लगातार गूगल की सफलताओं की कहानी सार्वजनिक है. यह गूगल ही है जिसके कारण डूब चुकी डाटकाम इंडस्ट्री को नया जीवन मिला. गूगल ने बहुत सारे ऐसे काम किये जिसके कारण वेब/इंटरनेट लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन सके और लोगों ने सिर्फ सूचना लेने के काम से आगे निकलकर सूचना प्रदान करने की भूमिका निभानी शुरू कर दी. अब भी एक मुश्किल थी कि जो निवेशक पैसा लगा रहे हैं उनको रिटर्न कैसे मिलेगा? लैरी और सर्गेई दोनों ही इस बात के पक्षधर थे कि बैनर एड उनके लिए भी उसी तरह बाधा हो सकते हैं जैसे दूसरे सर्च इंजनों के लिए हैं और वे किसी भी कीमत पर सर्च के काम को कमतर नहीं करना चाहते थे. इसी समय इनकी नजर आईडिया लैब के उस प्रयोग पर गयी जो वेब पर आनलाईन यैलो-पेजेज का प्रयोग कर रहे थे. यह बहुत उत्तम विचार था. इससे यूजर को बिना कोई दिक्कत पहुंचाए ज्यादा सटीक विज्ञापन दिखाया जा सकता है जो उसके काम का हो सकता है. गूगल ने इस रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया. जब आईडिया लैब को इस बारे में पता चला तो उसने अदालत में गूगल पर मुकदमा कर दिया. बहरहाल गूगल आईडिया लैब के बीच अदालत के बाहर समझौता हो गया और एक रकम देकर दोनों ने साथ काम करना स्वीकार कर लिया.

गूगल की सफलता इंटरनेट को नये मायने देने का दूसरा नाम है. गूगल न होता तो शायद आज इंटरनेट हमारे सामने इस रूप में नहीं होता. यह गूगल ही था जिसने सबसे पहले इसे बहुभासी बनाया और इस रास्ते में जितनी रूकावटें थीं उन्हें दूर किया. सर्च इंजनों में यूनिकोड का सबसे पहले प्रयोग गूगल ने ही किया जिसके कारण वेब दुनिया की अधिकांश भाषाओं का माध्यम बन गया. लेकिन जैसा अब तक इतिहास में होता आया है, वह गूगल के साथ भी होगा. इतिहास में हर विचार की एक उम्र निर्धारित होती है. समय बीतने के साथ नये विचार उनको पीछे छोड़ देते हैं. आज दस बाद जब गूगल एक वेबसाईट कंपनी से बहुत आगे निकलकर एक गणराज्य की शक्ल ले चुका है जो भविष्य की आभासीय दुनिया में बहुत निर्णायक भूमिका अदा करनेवाला है. इस गणराज्य के केवल आर्थिक ही नहीं सांस्कृितक और सामाजिक परिणाम भी होगें. अगर पूरी दुनिया की सूचनाएं और गतिविधियां किसी एक या दो पोर्टल के सुपर कंप्यूटरों में दर्ज होगीं तो निश्चित रूप से खतरे का अंदेशा रहता ही है. आज के गूगल के स्वरूप से उस खतरे का आभास होने लगा है. लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि आखिरकार हर गणराज्य की एक सीमा होती है, और चक्रवर्ती सम्राट की एक उम्र. इसे एतिहासिक सत्य मानें तो गूगल के बारे में यह सीमा और उम्र क्या होगी?

Subscribe to comments feed Comments (0 posted):

total: | displaying:

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
Rate this article
5.00
More from परत-दर-परत
Previous
image
इस्लामी रणनीति है हिन्दू आतंकवाद का हौव्वा
क्या देश में हिन्दू आतंकवाद पूरी तरह पैर पसार चुका है जो उतना ही खतरनाक है जितना कि अरब के पैसे से पलनेवाला बहावी आतंकवाद? भारत में कुछ छुटपुट ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्हें न केवल आतंकी घटनाओं के समान बनाकर पेश किया गया बल्कि उनका हिन्दू कनेक्शन भी साबित करने की कोशिश की गयी. प्रेम शुक्ल की पड़ताल है कि भारत में हिन्दू आतंकवाद का हौव्वा भी इस्लामिक चमपंथी विचारकों और रणनीतिकारों की "फेश सेविंग एक्सरसाइज" है िजसमें उन्हें मुस्लिम वोट की लालची सरकार का संरक्षण मिला हुआ है. ...
image
कंधमाल: सांप्रदायिक धुव्रीकरण नई चुनौती
कंधमाल की आग उड़ीसा से अधिक अब राजधानी दिल्ली में धधक रही है. पिछले महीने 22 से 24 अगस्त के बीच दिल्ली में चर्च संगठनों द्वारा एक जनसुनवाई करके यह साबित करने की कोशिश की गयी कि कंधमाल में दंगा पीड़ितों का पुनर्वास नहीं हो रहा है. इस जन-सुनवाई के संयाजकों में जॉन दयालॅ, कटक-भुवनेश्वर के बिशप रिफेल चैनथ एवं वामपंथी विचाराधरा सहमत की माला हाशमी प्रमुख थी....
image
सुलझी हुई समस्या को उलझाने पर आमादा
आज जो लोग भी कश्मीर की समस्या निपटाने निकले हैं सवाल पैदा होता है क्या उन्हें कश्मीर की समस्या का ओर-छोर भी पता है? क्या राहुल गांधी और ओमर अब्दुल्ला की नयी पीढी १९४७ से २०१० के बीच कश्मीर में क्या हुआ है उसकी प्रामाणिक जानकारी से लैस भी है? यदि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार कश्मीर की स्थिति को ठीक से समझ ही रही होती तो क्या पिछले ६ वर्षों के शासनकाल में उसने एक सुलझ चुकी समस्या को उलझा लेने की मूर्खता की होती?...
image
छत्तीस हुआ तिरसठ का आंकड़ा
सोनिया गांधी बीते शुक्रवार को चौथी बार कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयी .उनके इस चयन के साथ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में सत्ता परिवर्तन का निर्णायक दौर शुरू हो जाएगा. सोनिया गांधी अपने पति राजीव गांधी की १९९१ में हत्या के बाद राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखने के लिए जिस अंदाज में १०,जनपथ से कांग्रेस की राजनीति का नियंत्रण रखने का परोक्ष-अपरोक्ष प्रयास करती रही हैं उसका एकमेव उद्देश्य रहा है अपने पुत्र राहुल गांधी को एक दिन इस देश का प्रधानमंत्री बनाना....
image
चीन के सामने दीन हीन
पिछले कुछ वर्षों से चीन हिन्दुस्तान को पूर्वोत्तर तथा जम्मू एवं कश्मीर के मसले में अनावश्यक आँख तरेरने लगा है. चीन के इस दुस्साहस के लिए हिन्दुस्तान सरकार की अनावश्यक मिमियाहट जिम्मेदार है. जुलाई के महीने में चीन ने हिंदुस्तानी सेना के उत्तरी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बी.एस.जसवाल को बीजिंग का वीजा यह कह कर नकार दिया कि वे विवादास्पद क्षेत्र के सैन्य प्रमुख हैं. लेफ्टिनेंट जनरल जसवाल का वीजा मध्य जुलाई माह में नकारा गया। इसके बाद ११ अगस्त को निर्वासित तिब्बतियों की सरकार के प्रमुख दलाई लामा हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह से मिले तो इस पर चीनी राजनायिक इतने गरम हो गए कि हिन्दुस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान चीन के समक्ष याचना वाली मुद्रा में खड़ा हो गया....
image
संसद का हाल: सांसद को पसंद केवल बवाल
पंद्रहवीं लोकसभा ने एक साल पूरे कर लिये हैं. यह साल वैसे तो कामकाज के लिहाज से ऐसी किसी खास उपलब्धि का नहीं रहा है जिसके लिए संसद का पिछला एक साल याद किया जाए लेकिन क्या पूरे साल सांसदों ने उस 'बिजनेस' में हिस्सा लिया जिसके लिए जनता ने उन्हें चुनकर सदन तक पहुंचाया है? संसद के कामकाज के बारे में आम धारणा यही है कि संसद में जनता के अपेक्षाओं के अनुरूप काम काज नहीं होता. संसद जितनी चलती है उससे अधिक ठप रहती है. अब वेतनवृद्धि के बाद एक नयी तोहमत और लग गयी है कि देश की जनता मंहगाई से परेशान है और सरकार ने जनप्रतिनिधियों का वेतन चार गुना बढ़ा दिया. सवाल है कि क्या हमारे सांसद सचमुच जनता की उम्मीदों और अपेक्षाओं पर पानी फेर रहे हैं?...
image
गांधी का स्वराज बनाम जिन्ना जवाहर का कुराज
देश का ६४ वां स्वतन्त्रता दिवस बीत गया. कुछ सरकारी-अर्ध सरकारी, निजी, राजनीतिक समारोहों की औपचारिकता के अलावा अब १५ अगस्त का दिन एक सार्वजनिक अवकाश के सिवा शायद ही किसी अन्य महत्त्व का शेष रह गया हो. साल दर साल आजादी के गौरव के प्रति आम आदमी उसी तरह अनभिज्ञ होता जा रहा है जिस तरह राही मासूम रजा के उपन्यास की एक स्त्री पात्र पाकिस्तान को नजदीकी शहर में बनने वाली कोई मस्जिद समझ रही थी. ऐसा क्यों? क्योंकि ६३ साल पहले इस देश को आज़ादी के नाम पर एक सत्तान्तारण जरूर मिल गया था पर जिस स्वराज की परिकल्पना लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी कर रहे थे, वह स्वराज हिन्दुस्तान को आज दिन तक नसीब नहीं है....
image
हिंदू धर्म और हिंदुत्व में फर्क
हिंदू धर्म भारत का प्राचीन धर्म है। इसमें बहुत सारे संप्रदाय हैं। संप्रदायों को मानने वाला व्यक्ति अपने आपको हिंदू कहता है लेकिन हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है जिसका प्रतिपादन 1924 में वीडी सावरकर ने अपनी किताब 'हिंदुत्व में किया था। सावरकर इटली के उदार राष्ट्रवादी चिंतक माजिनी से बहुत प्रभावित हुए थे। उनके विचारों से प्रभावित होकर ही उन्होंने हिंदुत्व का राजनीतिक अभियान का मंच बनाने की कोशिश की थी।...
image
जरूरी है जाति की जनगणना
जाति आधारित जनगणना आखिरी बार 1931 में हुई थी। 1941 में सरकार का पूरा ध्यान दूसरे विश्व युद्ध पर था जिसके चलते जनगणना नहीं हो पाई। आजादी के बाद जब 1951 में पहली जनगणना शुरू हुई तो जाति का मसला उठाया गया। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा कि जाति आधारित जनगणना से सामाजिक ताना-बाना बिखर जाएगा। उन्होंने इसे राष्ट्रभंजक मांग बताते हुए अस्वीकार कर दिया था।...
image
सारे जहां में धूम हमारे ज़बां की है
कभी उर्दू की धूम सारे जहां में हुआ करती थी, दक्षिण एशिया का बेहतरीन साहित्य इसी भाषा में लिखा जाता था और उर्दू जानना पढ़े लिखे होने का सबूत माना जाता था। अब वह बात नही है। राजनीति के थपेड़ों को बरदाश्त करती भारत की यह भाषा आजकल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। वह उर्दू जो आज़ादी की ख्वाहिश के इज़हार का ज़रिया बनी आज एक धर्म विशेष के लोगों की जबान बताई जा रही है।...
image
लालू की करनी पर नीतीश की भरनी
हाल में ही बिहार की विधानसभा में जो कुछ हुआ उसने लोकतन्त्र को शर्मिन्दा तो किया ही है, लेकिन लोकतन्त्र भी अब ऐसी शर्मिन्दगी बार-बार झेलने को अभिशप्त है, और हम सब इसके आदी हो चुके हैं। बिहार विधानसभा में लालूप्रसाद और कांग्रेस ने जो हंगामा और तोड़फ़ोड़ की उसके पीछे कारण यह दिया गया कि महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि सन् 2002 से 2007 के बीच शासकीय कोषालय से करोड़ों रुपये निकाले गये और उनका बिल प्रस्तुत नहीं किया गया।...
image
पूर्वोत्तर की आत्मघाती उपेक्षा
देश के पूरबी छोर पर स्थित प्रदेश मणिपुर को देश के अन्य हिस्सों से जोडने वाले राजमार्गो पर करीब दो महीने तक चली नाकेबंदियों की वजह से आवाजाही बंद रही। पूरे प्रदेश में खाने-पीने की चीजों, जीवनरक्षक दवाओं और पेट्रोलियम पदार्थों की घोर किल्लत उत्पन्न हो गई। सेना के विमानों की सहायता से अत्यावश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने की व्यवस्था हुई, पर ऐसी व्यवस्थाओं की अपनी सीमाएं होती है और इनसे जनजीवन को सामान्य तरीके से संचालित नहीं किया जा सकता। हालत आज भी कोई सुधरे नहीं है क्योंकि समस्या की जड़ें उसी तरह मजबूती से गड़ी हुई हैं....
image
कश्मीर की विरासत है आजादी
कश्मीर में एक बार परिस्थितियां इतनी बिगड़ी कि केन्द्रीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ गयी. घाटी के मुहाने पर एक बार फिर सेना को बैठाना पड़ा. हालांकि अब घाटी में फौरी तौर पर शांति है लेकिन क्या कश्मीर में समस्या का समाधान सिर्फ केन्द्र सरकार का हस्तक्षेप है. शेष नारायण सिंह मानते हैं कि कश्मीर में अशांति के कारण गहरे हैं. कश्मीर पर पाकिस्तान का बेजा दावा और भारत का 'अनावश्यक' हस्तक्षेप समस्या का मूल कारण बन गया है. इसका निदान किये बिना कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है. ...
image
कितना कामयाब होगा मुलायम का माफीनामा
जैसे तलाक देने के लिये तलाक को तीन बार बोला जाता है बिल्कुल इसी अंदाज मे सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह से अपने संबधो को लेकर माफी मांग कर मुसलमानो को रिझाने के लिये फिर से ट्रांपकार्ड फेंका है। अब देखना है कि मुलायम का यह ट्रांपकार्ड क्या हकीकत मे मुसलमानो को रिझाने मे कामयाब होगा।...
image
शिवाजी के शौर्य को कलंकित करने का षण्यंत्र
छत्रपति शिवाजी के अपमान के मुद्दे पर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर गरम है. संभाजी ब्रिगेड जिसने पिछली बार भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बोरी) की तोड़-फोड़ की थी. इस बार महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल पर हमले का षण्यंत्र रचा था जिससे वे शनिवार को बाल बाल बच गये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जेम्स लेन की विवादास्पद पुस्तक "शिवाजी- द हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया" की बिक्री के लिए जिस अंदाज में छूट मिली है, उस पर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कई संगठन आंदोलनरत हैं. लेकिन हम पहले यह समझ लें कि यह जेम्स लेन महाशय हैं कौन और उन्होंने किताब आखिर किस इरादे से लिखी है?...
image
बेमतलब हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस
हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है जो 1987 से हर साल 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विश्व की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं।...
image
रमन सिंह की दमनकारी औद्योगिक नीति
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह नक्सली आंदोलन के खिलाफ चलनेवाले अभियान के अगुआ मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन रमण सिंह इस आंदोनल को किसके इशारे पर कुचल रहे हैं? क्या वे आम आदमी और आदिवासियों के हित में नक्सली आंदोलन को कुचलने का दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं या फिर उनका एजेण्डा कुछ और है. हाल में ही छत्तीसगढ़ की नयी औद्योगिक नीति की समीक्षा करें तो साफ हो जाता है कि असल में यह संघर्ष वे किसके लिए कर रहे हैं. ...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2