गूगल गणराज्य के १० साल
गूगल की सफलता की कहानी समझने के लिए उस दौर को समझना होगा जब वेब पन्ने इतने हो गये थे कि डायरेक्टरी की जरूरत महसूस होने लगी थी. यह काम गूगल ने नहीं किया. सबसे पहले यह काम याहू के संस्थापक डेविड फिलो और जेरी येंग ने किया था. वे भी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे. उन्होंने सबसे पहले अप्रैल १९९४ में जो डायरेक्टरी शुरू की उसका नाम रखा था- जेरीस गाईड टू द वर्डवाईड वेब. अकेले इसी साल एक मिलियन से ज्यादा हिट्स आये. १८ जनवरी १९९५ को याहू नाम रजिस्टर हुआ और यहां से याहू डायरेक्टरी युक्त पोर्टल में बदल गया.
याहू के इस स्वरूप को निवेशकों ने हाथो-हाथ लिया और पैसा भी लगाया. जब याहू के सफलता का यह अध्याय शुरू हो रहा था तो उनके सामने सबड़े समस्या थी कि अगर कंपनी को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाना है तो इसमें निवेशकों को विज्ञापन से होनेवाली आय का रास्ता दिखाना पड़ेगा. अब याहू के संस्थापकों के सामने बड़ी मुश्किल यह थी कि अगर वे अपनी वेबसाईट पर विज्ञापन देते हैं तो क्या इससे दर्शक आना बंद तो नहीं कर देंगे? लेकिन दूसरी ओर निवेशकों को अपनी पूंजी का रिटर्न भी चाहिए था. एक टीवी इंटरव्यू में जैरी यैंग ने माना था कि उन्होंने विज्ञापन लगाने का फैसला बहुत डरते हुए किया था. लेकिन विज्ञापन लगाने के बाद साईट पर आनेवाले लोगों ने कोई एतराज नहीं दिखाया. साईट पर आनेवालों की संख्या लगातार बढ़ती रही. बात बन गयी. उस समय निवेशकों ने यह महसूस किया कि इंटरनेट विज्ञापन का नया हथियार हो सकते हैं. अगर किसी एक जगह ढेर सारे लोग आते-जाते हों तो वहां विज्ञापन की अकूत संभावनाएं बन जाती हैं.
१९९७ आते-आते इंटरनेट इंटरनेट कमाई का बड़ा जरिया बन चुका था जिसमें सर्च की सुविधा देनेवाली कंपनियां सफलता का परचम लहरा रही थीं. इसमें याहू के अलावा लाईकास और एक्साईट जैसी कंपनियां भी थीं जो वेब पर डायरेक्टरी से आगे निकलकर सर्च की सुविधा मुहैया करा रही थीं. जिन दिनों यह सब हो रहा था उसी समय इसी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में दो छात्रों का संपर्क हुआ जो कि दोनों ही कंप्यूटर साईंस में पढ़ाई करने आये थे. यह १९९५ की बात है. लैरी पेज (२४) और सर्गेई ब्रिन (२३) मिले और उन्होंने भी इस बारे में काम करने के लिए बात की. जैसा कि गूगल वेबसाईट का कहना है दोनों में बात नहीं बनी लेकिन इन छात्रों ने आगे इस बारे में और बात करने और काम करने का निर्णय लिया. एक साल बाद इन छात्रों ने विश्वविद्यालय के ही सर्वर पर एक खोज इंजन का प्रयोग शुरू किया जिसका नाम रखा गया था ब्लैक रब. इस सर्च इंजन के कारण विश्वविद्यालय के बैंडविट्थ का खर्च इतना बढ़ गया था कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे बंद करने या यूनिवर्सिटी से बाहर ले जाने की सलाह दी.
१९९७ में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के ये दोनों छात्र सिलिकान वैली में आ गये जहां निवेशक डाटकाम के बूम में पैसा निवेश कर मोटी कमाई का इंतजाम कर रहे थे. अब तक सर्च इंजनों ने ईमेल और दूसरी ऐसी सेवाएं शुरू कर दी थी जो उपभोक्ता को नियमित आने के लिए बाध्य करती हों. आज गूगल को देखकर ऐसा लग सकता है कि जब उन्होंने gogool के जिस गणितिय सिद्धांत पर अपना सर्च इंजन विकसित किया था उसे हाथो-हाथ लिया गया होगा. लेकिन ऐसा नहीं था. लैरी और सर्गेई को सालभर धक्के खाने पड़े. इन्होंने जिस भी निवेशक को अपना विचार दिया सबने यही कहा कि अब एक और सर्च इंजन. पहले ही इतने सारे हैं जिससे लोगों का काम हो जाता है. लेकिन दोनों लड़कों ने हार नहीं मानी. हां, थोड़ा निराश जरूर हो रहे थे. इसी समय इन लड़कों ने सन माईक्रोसिस्टम के सह संस्थापक विनोद खोसला से मुलाकात की. विनोद खोसला तब सन माईक्रोसिस्टम छोड़कर निवेश बैंकर हो चुके थे और उन्होंने एक्साईट सर्च में पैसा लगा रखा था. उनको इन लड़कों का वह सिद्धांत पसंद आया जिसे इन्होंने गूगल नाम दिया था. उन्होंने तुरंत एक्साईट सर्च के एक पदाधिकारी ग्राहम स्पेंशर से इन लड़कों की एक रेस्तरां में मुलाकात करवाई. इन लड़कों ने अपने सर्च इंजन की खूबियों को बड़ी उम्मीद से बताया. उन्हें उम्मीद थी कि स्पेंशर प्रभावित होंगे तो एक्साईट कंपनी गूगल को खरीद लेगी. इसके लिए उन्होंने एक्साईट से १० लाख डालर की मांग की. एक्साईट के सीईओ ने इस सौदे से मना कर दिया जो आज मानते हैं कि यह उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. जिस गूगल को एक्साईट ने इस समय १० लाख डालर में नहीं खरीदा आज उसकी बाजार में कीमत १०० अरब डालर है.
लगातार ना-ना सुनते हुए भी लैरी और सर्गेई लोगों से मिलते रहे और अपने सर्च इंजन के बारे में बताते रहे. अगस्त १९९८ में सन माईक्रोसिस्टम्स के ही सह संस्थापक एन्डी बैकोसिम पहली बार उनसे मिलने उनके घर गये. उन्होंने उन लड़कों को सुना और तुंरत एक लाख डालर का चेक काटकर दे दिया. काम शुरू हो गया. गूगल का अस्तित्व विचार से निकलकर धरातल पर आकार लेने लगा था. शुरू होने के छह महीने के भीतर ही गूगल का सर्च इंजन टाप १०० साईटों में शुमार हो गया. यह गूगल के भविष्य की सुनहरी झलक थी. असल में इस समय तक वेब-पोर्टल पर चमक-दमक इतनी बढ़ गयी थी कि इन पोर्टल ने सर्च पर ध्यान देना छोड़ दिया था. सर्च परिणामों में महत्वपूर्ण जानकारियों से ज्यादा कंपनियों और प्रायोजित सामानों के विज्ञापन ज्यादा आते थे. जिस एक विचार से पोर्टल को पहली बार नयी जान मिली थी उन्होंने उस विचार का ही लगभग परित्याग कर दिया था. ऐसे में गूगल का पूरी तरह से सर्च पर केन्द्रित होना उसके लिए बड़े फायदे का सौदा होनेवाला था. गूगल के वेबसर्च का मूल सिद्धांत उसका इनकमिंग लिंक काउण्ट है जिससे वे पेजरैंक का निर्धारण करके वेब में मौजूद सामग्री को पाठकों तक पहुंचाते हैं. हालांकि समय के साथ गूगल ने बहुत सारी नयी बातें जोड़ी हैं लेकिन पेजरैंक का उनका पुराना सिद्धांत अचूक है.
क्या यह सुनकर आश्चर्य नहीं होता कि जिस गूगल के पीछे आज पूरी दुनियी दीवानी है उसे अपने शुरूआती दिनों में कोई निवेशक नहीं मिल रहा था. विनोद खोसला चाहते थे कि गूगल को एक्साईट खरीद ले. उन लड़कों ने इसके लिए दस लाख डालर मांगे थे लेकिन एक्साईट ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे सर्च का यह काम बहुत बेहतर कर रहे हैं. फिर किसी को १० लाख डालर क्यों दें? आज वही गूगल १०० बिलियन डालर की कंपनी है.
कुछ शुरूआती अड़चनों और दिक्कतों के बाद गूगल ने कभी पीछे लौटकर नहीं देखा. फरवरी १९९९ तक वे अपने गैरेज से ही काम करते रहे लेकिन अब उन्होंने गैरेज से निकलकर अपना आफिस लिया और आठ लोगों को नौकरी पर रखा. इसके बाद लगातार गूगल की सफलताओं की कहानी सार्वजनिक है. यह गूगल ही है जिसके कारण डूब चुकी डाटकाम इंडस्ट्री को नया जीवन मिला. गूगल ने बहुत सारे ऐसे काम किये जिसके कारण वेब/इंटरनेट लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन सके और लोगों ने सिर्फ सूचना लेने के काम से आगे निकलकर सूचना प्रदान करने की भूमिका निभानी शुरू कर दी. अब भी एक मुश्किल थी कि जो निवेशक पैसा लगा रहे हैं उनको रिटर्न कैसे मिलेगा? लैरी और सर्गेई दोनों ही इस बात के पक्षधर थे कि बैनर एड उनके लिए भी उसी तरह बाधा हो सकते हैं जैसे दूसरे सर्च इंजनों के लिए हैं और वे किसी भी कीमत पर सर्च के काम को कमतर नहीं करना चाहते थे. इसी समय इनकी नजर आईडिया लैब के उस प्रयोग पर गयी जो वेब पर आनलाईन यैलो-पेजेज का प्रयोग कर रहे थे. यह बहुत उत्तम विचार था. इससे यूजर को बिना कोई दिक्कत पहुंचाए ज्यादा सटीक विज्ञापन दिखाया जा सकता है जो उसके काम का हो सकता है. गूगल ने इस रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया. जब आईडिया लैब को इस बारे में पता चला तो उसने अदालत में गूगल पर मुकदमा कर दिया. बहरहाल गूगल आईडिया लैब के बीच अदालत के बाहर समझौता हो गया और एक रकम देकर दोनों ने साथ काम करना स्वीकार कर लिया.
गूगल की सफलता इंटरनेट को नये मायने देने का दूसरा नाम है. गूगल न होता तो शायद आज इंटरनेट हमारे सामने इस रूप में नहीं होता. यह गूगल ही था जिसने सबसे पहले इसे बहुभासी बनाया और इस रास्ते में जितनी रूकावटें थीं उन्हें दूर किया. सर्च इंजनों में यूनिकोड का सबसे पहले प्रयोग गूगल ने ही किया जिसके कारण वेब दुनिया की अधिकांश भाषाओं का माध्यम बन गया. लेकिन जैसा अब तक इतिहास में होता आया है, वह गूगल के साथ भी होगा. इतिहास में हर विचार की एक उम्र निर्धारित होती है. समय बीतने के साथ नये विचार उनको पीछे छोड़ देते हैं. आज दस बाद जब गूगल एक वेबसाईट कंपनी से बहुत आगे निकलकर एक गणराज्य की शक्ल ले चुका है जो भविष्य की आभासीय दुनिया में बहुत निर्णायक भूमिका अदा करनेवाला है. इस गणराज्य के केवल आर्थिक ही नहीं सांस्कृितक और सामाजिक परिणाम भी होगें. अगर पूरी दुनिया की सूचनाएं और गतिविधियां किसी एक या दो पोर्टल के सुपर कंप्यूटरों में दर्ज होगीं तो निश्चित रूप से खतरे का अंदेशा रहता ही है. आज के गूगल के स्वरूप से उस खतरे का आभास होने लगा है. लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि आखिरकार हर गणराज्य की एक सीमा होती है, और चक्रवर्ती सम्राट की एक उम्र. इसे एतिहासिक सत्य मानें तो गूगल के बारे में यह सीमा और उम्र क्या होगी?
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
Post your comment