सा विद्या ना विमुक्तये
शिक्षक गुरू है, मार्गदर्शक है, भगवान से भी श्रेष्ठ है वाली कहानियां सुनकर हम सब बड़े होते हैं. लेकिन हमारे देश में बच्चों को शिक्षित करने के लिए खुद शिक्षक क्या प्रशिक्षण ले रहे हैं वह इस रिपोर्ट से बखूबी पता चलता है. राजस्थान सरकार गर्मी की छुट्टियों का उपयोग शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए कर रही है. सरकार 1 जुलाई से प्रदेश में लहर नामक नयी शिक्षण पद्धति की शुरूआत कर रही है. जाहिर है नयी पद्धति बनाने जा रहे हैं तो नये प्रकार के शिक्षक भी चाहिए. लेकिन प्रशिक्षण शिविर में जो कुछ नजर आया उससे नहीं लगता कि राजस्थान सरकार इन शिक्षकों के भरोसे कोई लहर पैदा कर पायेगी.
राजस्थान में आगामी एक जुलाई से चुनिंदा 4735 प्राथमिक विद्यालयों में बाल केन्द्रित शिक्षण पद्धति´लहर´का शुभारम्भ किया जाना प्रस्तावित है जिसके लिए प्रति विधालय लगभग 25 हजार रूप्ये की शिक्षण सामग्री राज्य सरकार के स्तर पर तैयार कर विधालयों को प्रदान की जा रही है ।और इस पद्वति के अर्न्र्तगत शिक्षण कार्य कराने के लिए प्रति विधालय दो शिक्षकों को प्रशिक्षित भी किया जा रहा है जो बच्चों को शिक्षण कार्य कराऐगें ।जिसमें हिन्दी और पर्यावरण अध्ययन का प्रशिक्षण ले रहे शिक्षकों के एक दिन के प्रशिक्षण को देखने के बाद शिक्षक व्यवसाय और उसके करने वालों के बारे में सोचने पर मजबूर होने को मन करता है,क्योंकि जब शिक्षकों का कार्य व्यवहार ऐसा तो वो अपने यहॉ आने वाले बच्चों को कैसे आदर्श और शिक्षण प्रस्तुत करते होगें।जो खुद समय के पावंद और अनुशासित नहीं है वो किस प्रकार बच्चों को ऐसी चीजें सिखा पाऐगें।
शिविर का कागजों में समय सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक निर्धारित है।जबकि सुबह सात बजे प्रशिक्षण परिसर में एक भी शिक्षक और व्यवस्थापक दिखाई नहीं पड़ रहा था ।7. 30 पर इक्का दुक्का लोग नजर आने लगे और आठ बजे के लगभग उनकी संख्या 10 हो गई। 8 .30 पर शिक्षक और प्रशिक्षक कक्ष में पहुंचे तो प्रथम प्रार्थना सत्र की शुरूआत हुई।मॉ सरस्वती तेरे चरणों में हम शीश झुकाने आऐ है´।उसके बाद दोहा वाचन और प्रेरक प्रसंग चले जिसमें इक्का दुक्का शिक्षकों और प्रशिक्षक ने अपनी ओर से औपचारिकता पूरी कर दी। 9 बजे महिला शिक्षिकाओं का आना आरम्भ हुआ जो जाने के समय तक जारी रहा ।कुछ शिक्षक आऐ और आने और जाने के हस्ताक्षर कमरे के बाहर ही उपिस्थिति पंजिका में दर्शाकर चले गये।
इस प्रशिक्षण शिविर में 44 शिक्षकों के उपस्थित होने की बात अधिकारी बता रहे थे जबकि प्रशिक्षण कक्ष में कुल संख्या 30 से अधिक नहीं हो पाई ।अधिकांश शिक्षक बाहर से ही चले गये तो कुछ ने बाहर आना जाना जारी रखा। इस बीच मोबाईल की घंटिया लगातार बजती रही तो पीछे बैठी महिलाओं ने अपने मोबाईल पर गीतों का आनन्द लेना ही मुनासिब समझा, पुरुषों ने चुटकले, गजल,गीत,और शेरो शायरी करना आरम्भ कर दिया जो शिविर के अंत तक जारी रहा। एक ओर से ´आंधी में बुझते दीपक को अब और जलाकर क्या होगा´।की आवाज आई तो दूसरी ओर से रफता रफता वो मेरी हस्ती के शामा हो गऐ,पहले जॉ फिर जॉ से जॉ,फिर जॉ से जाना हो गऐ। इसी बीच एक प्रशिक्षक महोदय ने शिक्षकों को पर्यावरण अध्ययन के तहत यातायात के साधनों के बारे में बच्चों को कैसे पढ़ाया जाए इस पर चर्चा करने की असफल कोशिश की तो उन्हें बिठा दिया गया और उसके स्थान पर चुटकला सुनाने को कहा गया ।प्रशिक्षक ने एक चुटकला सुनाया तो फिर देखते ही देखते चारों ओर से चुटकलों की बौछार होने लग गई।इस बीच ध्यान देने लायक बात ये रही कि चुटकलों की विषय वस्तु शिक्षक ,बच्चे और पति पत्नी के रिश्तों तक ही रही और देखते ही देखते उसमें अभद्रता और अश्लीलता ने अपनी पैठ बना ली जिसके चलते महिला शिक्षिकाओं को बच्चो को संस्कारवान बनाने वाले शिक्षक समाज के बीच अपनी गर्दन नीची करके बैठने को मजबूर होना पड़ा।
उसके बाद अल्पाहार का एक दौर चला जिसमें समौसे और इमरती का चटकारा स्वाद लेते हुए शिक्षक संघों की राजनीति और अन्य देश विदेश की घटनाओं, क्रिकेट आदि पर समूहों में चर्चा होती रही और आने जाने वालों का दौर भी चलता रहा।अल्पाहार के बाद एक और सत्र होना था लेकिन तेज गर्मी का बहाना कर शिक्षकों ने घर जाने का सिलसिला बना दिया, उधर ये शिविर का अन्तिम दिन होने के कारण व्यवस्थापक लोग भी जल्दी कर रहे थे ।उसके बाद प्रति शिक्षक 300 रूप्ये का नगद भुगतान कर दिया गया।शिक्षकों ने अपने 6दिन शिविर में उपिस्थित रहने का प्रमाण पत्र लिया और चलते बने।12 .30 तक प्रशिक्षण स्थल एक बार फिर से सूना हो गया। एक शिक्षक ने यह कहकर पूरे प्रशिक्षण को कटघरे में खडा कर दिया कि आज अन्तिम दिन भुगतान होना था इसलिए इतने प्रशिक्षणार्थी दिखाई दिये अन्यथा और दिन तो? ऐसे में शिक्षकों का प्रशिक्षण ये संदेश देने के लिए काफी है कि अभिभावक अपने बच्चों को उनके भरोसे छोड़ कर निश्चिन्त रह तो सकते है मगर उनका भविष्य क्या होगा इसकी कोई गारंटी किसी के भी पास नहीं है।
सरकार बच्चों के लिए इसी प्रकार ´लहर´ जैसी कितनी ही योजनाएं बना ले जब तक शिक्षक वर्ग अपने दायित्व और कर्तव्य के प्रति जागरूक नही होंगे बच्चों के भविष्य के साथ इसी प्रकार खिलवाड होता रहेगा ।दिल्ली, जयपुर में बैठकर योजनाऐं तो बनती रहेंगी लेकिन जमीनी स्तर पर उनका ऐसा ही हश्र होता रहेगा जैसा लहर योजना के शिक्षक प्रशिक्षण के एक दिन में देखा गया।30 हजार के प्रत्यक्ष खर्चे का ये प्रशिक्षण बच्चों के लिए 3 रूपये का भी मूल्यकारी हो पायेगा इसमें पूरा संदेह है.
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