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बीटी बैंगन यानि खाने की थाली में जहर

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आजकल जीन संशोधित फसलेें चर्चा में हैं।इनके प्रसंसक ऐसा प्रभाव बना रहे हैं कि पश्चिमी देशों में इन फसलों ने किसानों को मालामाल कर दिया है। किसानों की हर समस्या का समाधान इन्हीं में है।यदि हमने इन्हें नहीं अपनाया तो हम न केवल पिछड़ जाएंगे बल्कि बरबाद हो जाएंगे एवं विश्व व्यापार में अपना अस्तित्व खो देगें। इसी के चलते बीटी काटन के बाद अब कुछ ही महीनों में बीटी बैंगन हमारी रसोई में से होता हुआ हमारे खाने की थाली में आने वाला है।

महीको ने इसको लेकर सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। ऐसा होने की सूरत में बीटी वाली किसी खाद्य फसल को मान्यता देने वाला भारत दुनिया का पहला देश होगा।दूसरी ओर जीएम फसलों का विरोध करने वाले स्वतंत्र वैज्ञानिकों, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की चिंता करने वाले संगठनों ने इस बीटी बैंगन की आमद के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

यहां सोचने की बात है कि क्या वास्तव में जीएम (बीटी) फसलें करिशमयी हैं। हमारे यहां पिछले कुछ सालों से बीटी काटन की खेती हो रही है। किसानों का कहना है कि तीन सालों में बीटी का उत्पादन कम हो जाता है।इन पर कीटनाशकों के छिड़काव भी उतनेे ही करने पड़ रहे हैं। दुसरी ओर स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की दृष्टि से इन फसलों के काफी नुक्सान हैं। मालवा क्षेत्र में बीटी नरमा/कपास से होने वाली अलर्जी पर एक स्टडी हो रही है जिसके प्रांरभिक संकेत हैं कि बीटी कपास से लोगों में खारिश के मामले बढ़े हैं।

अमेरिका के प्रतिष्ठ वैज्ञानिक डा. जोहन फेगन ने गत दिनों अपने पंजाब भ्रमण के दौरान जो तथ्य पेश किए उनके मुताबिक जीएम फसलेें स्वास्थ्य, पर्यावरण पर को प्रतिकूल असर डालती ही हैं बल्कि आर्थिक तौर पर लाभकारी नहीं हैं।उनके शब्दो में जेनटिक इंजीनियरिंग एक बेतरतीब, अकुश्ल एवं पुरानी पड़ चुकी तकनीक है। जिसके पश्चिम में किसानों ने बुरी तरह नकार दिया है और कंपनियां अब इस कूडे को भारत जैसे देशों में डाल रही हैं।

प्रयोगशालाओं में बीटी फसलों के टैस्ट के दौरान जानवरों पर बुरा असर सामने आया लेकिन ऐसे नतीजों को कंपनियां दबा लेेती हैं। कुछ ऊदाहरण देखे जा सकते हैं- पायनीर हाईब्रिड इंट्रनेशनल  कंपनी द्वारा सोयाबीन की पौषटिकता बढ़ाने के लिए ब्राजीलनट का जीन डाला गया। इससे सोयाबीन की पौषटिकता तो नहीं बढ़ी लेकिन जिन लोगों को ब्राजीलनट से अलर्जी थी उन्हेेंं यह सोयाखोने से अलर्जी हो गई। इसी तरह बीटी आलू का जब गर्भवती मादा चूहों प्रयोग किया गया तो उनके बच्चों का भार कम था और उनमें से अधिकांश मर गए।अमेरिका के कृषि विभाग ने यह भी पाया है कि राऊंडअप रेडी सोयाबीन में केंसररोधक तत्वों में 12 से 14 प्रतिशत तक कमी पाई गई.

डा. फेगन का कहना है कि जीएम फसले मिट्टी के उपजाऊपन को कम करती हैं। पर्यावरण एवं कृषि के लिए लाभदायक कीटों की प्रजातियों को नुकसान पहुंचाती हैं। इनकी आमद से पौधों अनेकों और बिमारियां, नुकसानदायक कीटों की प्रजातियां अस्तित्व में आ गई हैं। ऐसे भी उदाहरण हैं कि बीटी कपास के प्रति अमेरिकन सुंडी ने प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर ली है।

अमेरिका के किसानोें ने जीएम फसलों को सिरे से खारिज कर दिया है। इसके दो कारण थे। पहला जीएम मक्की एवं सोयाबीन के कारण अमेरिका से इन फसलों के निर्यात का भारी नुकसान हुआ और किसान नहंी चाहते कि अन्य फसलों के व्यपार का भी वही हाल हो। ज्ञात हो कि 1997 से पहले अमेरिका से युरोप को प्रतिवर्ष करीब 300 मिलीयन डालर की मक्की निर्यात होती थी। लेकिन जीएम मक्की की आमद से यह निर्यात मात्र एक प्रतिश्त रह गया। 1996 से लेकर अब तक यूरोप में सोयाबीन व इससे बने उत्पादों के आयात में भारी वृद्धि हुई है- लेकिन अमेरिका का बीटी सोयाबीन वहां नहीं बिक सका लिहाजा पूरे यूरोपीय बाजार पर ब्राजील के गैर जीएम सोयाबीन का कब्जा जम चुका है। इसी तरह बीटी नरमे की आमद से नरमे के बिनौलों से बने खाद्य तेल से बनी वस्तुओं की बिकरी भी प्रभावित हुई है। यहीं बस नहीं आज से करीब आठ साल पूर्व अमेरिकी सरकार ने जीएम गेहूं के व्यापारिक इस्तेमाल की अनुमति दी थी लेकिन आठ साल बाद तक भी किसानों ने उनके स्वीकार नहीं किया है। क्योंकि उन्हें डर है कि जीएम गेहूं की वजह से कहीं वह मक्की और सोयाबीन की तहर अपना विदेशी बाजार न खो देें। इसी तरह वहां जीए धान को भी सन् 2002 में मंजूरी मिल गई थी लेकिन आज तक किसानोें ने उसे नहीं अपनाया। क्योंकि वर्ष 2006 जब जीएम धान गैर जीएम धान में मिक्स हो गया था तो इसको अलग करने में कडी मशक्कत करनी पडी थी और इसपर कोई 150 मिलियन डालर खर्च आया था। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं।

ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि क्यों हमारी सरकार, कृषि संस्थान एवं वैज्ञानिक जीएम फसलों को लाने के लिए इतने आतुर हैं? बात को फिर से बीटी बैंगन पर लाते हैं। हम जानते हैं कि बीटी फसलों के पौधों में जहर पैदा करने वाले जीन स्थापित किए जाते हैं ताकि उन्हें खाकर कीट एवं सुंडियां मर जाएं। यह जहर बीटी के स्प्रे से 1000 गुणा ज्यादा जहरीला होता है। ऐसे में माहिको के इस दावे पर कैसे विश्वास किया जा सकता है कि उसका यह बीटी बैंगन मनुष्यों के लिए हानिकारक नहीं है। जबकि आलम यह है कि बीटी फसलों के भारत में परीक्षण किए ही नहीं जाते। बीटी नरमे को लेकर ऐसा ही हुआ। अमेरिका में जो तजरबे हुए उन्हें के आधार पर ही उसे भारत में अनुमति दे दी गई। लेकिन अमेरिका में नरमा खाद्य पदार्थ नहीं है। वहों पशु भी खेतों में चराने के लिए नहीं जाते। लेकिन हमारे यहां यह स्थिति एकदम उलट है। आंध्र प्रदेश में पिछले वर्ष बीटी नरमे के खेतों में चरने वाली भेड़ोें के मरने के सैंकडों मामले सामने आए।

बडी बात यह कि जब यह बैंगन बाजार में आ जाएगा तो हम सब न चाहते हुए भी इस जहर को खाने के लिए बाध्य होेंगे क्योकि बैंगन पर यह तो लिखा नहीं होगा कि यह बीटी है या गैर बीटी। हमारे पास चुनाव का भी अधिकार नहीं रहेगा। ऐसे में सरकार क्या सोचकर लोगों की खाने की थाली में जहर परोसने की अनुमति दे रही है समझ में नहीं आता।

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Psudo on 20 November, 2009 10:59;40
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Inspite of all the health hazards for some money our SHAMELESS govt is ready to feed poison to country.
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Jeet Bhargava on 21 November, 2009 03:24;24
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सरकारे अगर जनता के हित के बारे में सोचकर कंपनियों का 'भला' नहीं करेंगी तो संसद में सांसद कैसे खरीद पाएंगी. बात- बेबात पर बवाल करने वाला मुख्यधारा का मीडिया इस विषय में सरकार को कठगरे में क्यों नहीं खडा कर रही है. शायद बीटी से सरकार को ही नहीं मीडिया को भी पेटी मिल रही है!
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