गुमनाम दिलवालों की अनोखी दिल्ली
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आजकल दिल्ली में एक एफ़.एम रेडियो चैनल पर दिल्ली के लोगों को अपने गरम कपडे का दान करके दरियादिली दिखाने के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है. इन गरम कपड़ों के बदले में आप उस रेडियो स्टेशन पर अपने नाम से एक गाना खरीद पाएंगे और ऍफ़.एम चैनल का रेडियो जौकी गाने से पहले उनका नाम दुनिया को बताइएगा और उनके द्वारा दान किये गए गरम कपडे दिल्ली की सर्दियों में सड़क पर रहने वाले लोगों की सर्दियों को 'चिल्लाक्स' करने में काम आयेंगे. इस कार्यक्रम को रोज़ सुनने वालों में से एक मैं भी हूँ, सोच कर हैरान होती हूँ कि क्या "दरियादिली" दिखाने के लिए दिल्लीवालों को 'रेडियो पर उनका नाम आने' का प्रलोभन देना ज़रूरी है?
देने कि भावना तो आखिर इंसान के अन्दर खुद पैदा होती है, कभी भी, कहीं भी. सच तो सिर्फ एक ही है...जब भी इंसान अगर किसी को कुछ देता है तो वह अपने लिए ही देता है, अपनी ज़रुरत, ख़ुशी या फिर आंतरिक तस्सली के लिए.. चाहे देने वाली चीज़ पैसा हो, प्यार हो या फिर गरम कपडे..अगर हम सही मायने में दिल्ली के दिलवालों के दर्शन करने की इच्छा रखते हैं तो शायद हम सबको अपने आस पड़ोस कि अनजान गलियों का रुख लेना चाहिए, इन्ही गलियों में कहीं छिपे हुए हैं दिल्ली शहर के अनजाने गुमनाम दरियादिल!
पिछले हफ्ते दिल्ली शहर के दरियागंज इलाके में घुमते-फिरते मेरी मुलाक़ात हुई इस शहर की ऐसी ही एक शक्सियत से- इनका नाम है बिरेन्दर और पेशे से यह गाड़ियों कि साफ़-सफाई और रखवाली करने वाले एक चौकीदार हैं. बिना किसी नाम और प्रलोभन की चेष्टा रखते हुए, पिछले चौदंह सालों से अपनी मामूली ढाई-तीन हज़ार रूपये की मासिक आय से ना केवल यह अपना पेट भरते हैं, बल्कि अपने बेटे बिनोद को भी पढ़ाते हैं और साथ ही साथ 20-25 गली के कुत्तों का ना केवल रोज़ पेट भरते हैं पर उनकी मरहम-पट्टी का खर्चा भी उठाते हैं. दरयागंज पुलिस थाने के बगल से जा रही भारत राम रोड से बिरेंदर का नाता 1995 से है.
आज से लगभग अठारह साल पहले बिरेंदर नेपाल से अपने परिवार समेत दिल्ली के दरियागंज इलाके में आए. इस शहर में अपने शुरुआती चार सालों में उन्हें दुकानों की चोकीदारी करने का काम मिला. फिर आखिरकार 1995 में उन्होंने दुकानदारों के चंगुल से बाहर निकलने का फैसला किया और भारत राम रोड पर आसपास के निवासियों की गाड़ियों की चोकीदारी और सफाई का काम शुरू किया. बिरेंदर बताते हैं, "और तबसे इन सुनसानी रातों में मुझे चौकीदारी करते मेरी मदद करी इस गली पर रहने वाले कुत्तों ने और तभी से मेरा इन सबसे एक अनजाना सा रिश्ता जुड़ गया है"...इस बीच उनकी बीवी का देहांत हो गया और उनके ऊपर अपने बेटे को पालने की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई. बिरेंदर के मुताबिक़, 'यह कुत्ते मेरा अकेलापन दूर करते हैं, जो कभी मुझे धिक्कारते नहीं ना ही मुझसे कोई सवाल पूछते हैं...इसलिए आज यह मेरे साथी हैं और मैं उनका'. अगर किसी दिन आप इस सड़क से निकलेंगे तो हर शाम लगभग 6 बजे के आसपास आपको बिरेंदर यहाँ आटा गूंदते नज़र आयेंगे और बगल में ही दिखेगा उनका एक मिट्टी के तेल से चलने वाला स्टोव.
बिरेंदर अपने बेटे और आवारा कुत्तों के लिए एकसाथ एक ही चौके पर रोटी बनाते हैं. कोई भेदभाव नहीं. कोई अपना पराया नहीं. बाप के इस नजरिये पर बेटे को भी कोई ऐतराज नहीं है. बिरेन्दर बताते हैं, "मैं हर दिन 1 किलो आटा गूंथता हूँ, जो मैं चक्की से लगभग 18 रूपये किलो के भाव पर खरीदता हूँ...और फिर अपने, अपने बेटे और इन सब कुत्तों के लिए रोटियां बनाता हूँ...पतली मोटी रोटी बनते बनते हम सबके हिस्से में लगभग 2-3 रोटियां तो आराम से आ ही जाती हैं".
इतने में ही मेरी मुलाकात हुई बिरेंदर के बेटे बिनोद से। वह बिरेंदर से अपनी शाम कि रोटी लेने आया था और साथ ही अपने दोनों के लिए बाज़ार से सब्जी लाने. बिनोद ने बताया कि, "माँ की मृत्यु हो जाने के बाद पिताजी ने मुझे अडिग साहस और परिश्रम से दिन-रात काम कर के उनको पाला-पोसा और खूब पढाया-लिखाया. उन्होंने कभी भी मुझसे बाल-मजदूरी नहीं कराई और हमेशा पढने-लिखने पर जोर दिया". इस साल बिनोद ने 68% प्रतिशत के साथ आर्या अनाथ विद्यालय से अपनी बारवीं के परीक्षा से पास कर अपने पिता की मेहनत को सफल किया. अब वो आगे पड़न चाहते हैं. बिनोद ने बोला कि, "इसलिए अब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओपन लीर्निंग से बी.ए कर रहा हूँ और साथ ही मैं जहांगीरपुरी स्तिथ 'इंडियन टेक्नीकल इंस्टिट्यूट' या आई.टी.आई से दो साल का तकनीकी डिप्लोमा भी कर रहा हूँ". पूछे जाने पर पता चला कि इस तकनीकी डिप्लोमा कोर्स की फीस कुल मिलाकर 4800 रूपये है (यानी कि हर 6 महीने के 1200 रूपये).
बिनोद दरियागंज से पंद्रह मिनट कि दूरी पर स्थित फिरोजशाह कोटला में एक कमरे में रहते हैं जिसका मासिक किराया 500 रूपये महीना है. बिरेंदर ने बताया कि, "पहले मैं अपने बेटे के साथ रहता था, लेकिन अब वो बड़ा हो गया है, इसलिए मैं यहाँ दरियागंज पर ही दिन काट लेता हूँ, यहाँ मेरे कई साथी हैं ". अब बारी थी बिरेंदर के साथियों से मुलाकात करने की, जिनमे से चार तो उनके स्टोव के आस पास बिची एक बोरी पर गुच्छी मार कर सो रहे थे. "आपने इनके नाम क्या-क्या रखे हैं?", मैंने पुछा...बिरेंदर ने कहा, "कुछ नहीं, यह वैसे ही मेरे पास आ जाते हैं, नाम की ज़रूरत महसूस नहीं होती"...इन बेज़ुबान जानवरों के लिए शायद बिरेंदर के प्यार की भाषा ही बहुत है. धीरे धीरे कर एक एक बाद एक कई कुत्ते आने लगे, इसमें से एक भूरे रंग के कुत्ते कि एक टांग नहीं थी, "एक गाडी इसके ऊपर से निकल गई, टांग का मॉस सड़-गल गया और एक दिन यह टांग अलग हो गई".. कभी सोच कर देखिए कि तेज़ गाडी चलाने की होड़ में, इस चूहे-बिल्ली की दौड़ में हर-रोज़ कितने ही जानवर सड़कों पर गाड़ियों के नीचे रोंदे जाते हैं, और कितने ही अपंग हो जाते हैं पर शायद ऐसे अपंग जानवर की सेवा करने के लिए हर जगह एक बिरेंदर नहीं मिलता!
फिर मिला मुझे बिरेंदर का एक दूसरा अपंग दोस्त, यह काले रंग का कुत्ता कुब निकाल के चल रहा था और साथ ही वो एक टांग से लंगड़ा भी था, बिरेंदर से पूछने पर पता चला, कि, "बगल के पार्क के चौकीदार ने एक दिन इस काले कुत्ते को जमा कर एक लात मारी, जिसके बाद यह चल-फिर भी नहीं पाता था..कई हफ़्तों तक हमने सुबह-शाम इसको Voveron नामक दवाई खिलाई और मरहम लगाया, आज यह कम से कम चल पा रहा है, इसी से मुझे ख़ुशी है." "जिस तन बीते, वो तन जाने" नामक कहावत तो आपने कभी न कभी सुनी ही होगी...इन सब कुत्तों कि मरहम-पट्टी करने में बिरेंदर के एक और साथी हैं, वह हैं सुनील जी, जो खुद पूरी तरह से विकलांग हैं और दरियागंज कि इस गली में ही एक टॉफी-सिगरेट-फोन बूथ का स्टाल चलाते हैं. सुनील जी भी अपने आप में एक खुद्दार और स्वावलम्बन की मिसाल हैं.
बचपन में पोलियो से पीड़ित होने के इलावा ये कद में भी नाटे हैं और हाथों से भी अपंग हैं, इसी वजह से यह अपनी टांगों की बजाए हाथों के सहारे चलते हैं. बीस साल कि उम्र में सुनील जी बिहार के मुज़फ्फरपुर से 1979 में रोज़गार ढूँढने दिल्ली आए. सुनील जी बताते हैं, "शुरूआती दस सालों में मैंने पूर्वी दिल्ली की गली खरूजी स्तिथ एक होटल में रसोइये का काम किया और फिर मैं 1989 दरियागंज आया और मुझे विकलांग लोगों के लिए सरकार द्वारा संचालित साइकिल योजना के तहत एक तिपहिया - साइकिल मिली जिस पर मैंने केले बेचना शुरू किया पर फिर मेरी विकलांगता के कारण रोज़ मंदी से केले लाना मेरे लिए थोडा मुश्किल कार्य हो गया था इसलिए मैंने यह रेहड़ी लगाई और तबसे इससे ही गुज़र बसर कर रहा हूँ". दरियागंज थाणे के साथ सटी हुई सुनील कुमार जी की इस रेहड़ी पर आने वालों में कई पुलिसकर्मी भी हैं, पर कोई भी सुनील जी को एक भी पैसा कम नहीं देता!
परिवार के बारे में पूछे जाने पर सुनील जी कहते हैं, "1-2 साल में एक आधी बार अपने गाँव का चक्कर लगा आता हूँ, भाई के बच्चों को ही अपना बच्चा समझता हूँ, मैंने अपनी विकलांगता के कारण कभी खुद का परिवार बढाने के बारे में सोचा भी नहीं"...बीस सालों से दरयागंज के इस नुक्कड़ पर सुनील जी का अपना एक परिवार बन गया है, बिरेंदर चौकीदार जैसे उनके कई साथी और शुभ-चिन्तक हैं. सुनील जी की दुकान पर टॉफियाँ पहुंचाने का काम पड़ोस में रहने वाले शर्मा जी करते हैं. "राजू भैया और गुप्ता जी नामक दरियागंज निवासियों ने मेरी इस रेहड़ी को हफ्ता-वसूली करने वालों से बचाने में मेरी जो मदद की है, उसके लिए मैं उनका जितना शुक्रगुजार रहूँ वो कम है" .
सुनील जी की खुद्दारी कि खुद रजत भाई यानी कि राजू भैय्या मिसाल देते हैं, वह बताते हैं, "इतने सालों में सुनील ने किसी से कभी कोई आर्थिक मदद नहीं मांगी और न ही कभी कोई चीज़". यह बात सुनते ही सुनील जी हस कर मेरा ध्यान अपनी कुर्सी की तरफ आकर्षित करते हैं और मुझे कहते हैं, "मेरा यह सिंघासन राजू भैया की देन है, इसमें मैं पूरा फिट आ जाता हूँ". बिरेंदर जी, इस गली के कुत्तों, सुनील जी और रजत जी के बीच के इस आपसी प्यार और इज्ज़त का यह रिश्ता देखते ही बनता है...इन लोगों से मिलकर, इनसे मिले अपनेपन को समेट कर मैं अपने घर की और जा रही थी मैंने एक अनजान महिला को देखा, जो मदर डेरी के बूथ पर आई और उन्होंने दूध कि 2 थैली खरीदीं. एक थैली काट कर उन्होंने दुकान के कोने में पड़ी सबसे ऊपर वाली प्लास्टिक की खाली क्रेट में डाली और एक नीचे पड़ी इकलौती क्रेट में...ऊपर वाली में 2 बिल्लियाँ दूध पीने आयीं और नीचे वालों में 2 कुत्ते...इस नज़ारे को निहारती हुई जब तक मैंने उन महिला को रोकने की कोशिश करती, वह भीड़ और अँधेरे में मेरी आँखों से ओझल हो गईं...
सही मायने में इन्ही अनजान लोगों और इनके बिना छल-कपट से सींचे जाने वाले इन बेशर्त वाले प्रेम के रिश्तों में ही कहीं छिपी है हमारी दिल्ली की दरियादिल्ली! संत कबीर ने सही लिखा है: "पोथी पढि-पढि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, जो पढ़े सो पंडित होए". अब यह बात दीगर है कि आजकल दिल्ली को जिस तरह से ऊंचे लोगों की पसंद का शहर बनाया जा रहा है उसमें ऐसे दरियादिल लोगों के लिए ही कोई जगह न बचे. कम से कम मुख्यमंत्री साहिबा तो यही चाहती हैं.
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- दलित उत्पीड़न को मिल रहा है दलित सत्ता का संरक्षण
- पटना निगल जाता है आधा बिहार
- दस्यु सरगनाओं की शरणस्थली में दलित पुजारी का मंदिर
- भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनाना चाहती है भाजपा
- बंगाल में सियासी सुनामी से आतंकित हैं वामपंथी
- जीएम फसलों पर जोरजबर्दस्ती
- संघ से डरने डराने वाले लोग
- नर्मदा के सौंदर्य पर जादू-टोने का अमावस
- उधर दौलत की बेटी के घर जश्न, इधर दलित की बेटी पर सितम
- जंतर मंतर पर लोकतंत्र जब्त



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great going keep it up!
बढ़िया लिखा..लिखती रहे. सादर शुभकामनाएं
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