Home | जन-जीवन | गुमनाम दिलवालों की अनोखी दिल्ली

गुमनाम दिलवालों की अनोखी दिल्ली

Font size: Decrease font Enlarge font 735
image चौकीदार बिरेन्दर

आजकल दिल्ली में एक एफ़.एम रेडियो चैनल पर दिल्ली के लोगों को अपने गरम कपडे का दान करके दरियादिली दिखाने के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है. इन गरम कपड़ों के बदले में आप उस रेडियो स्टेशन पर अपने नाम से एक गाना खरीद पाएंगे और ऍफ़.एम चैनल का रेडियो जौकी गाने से पहले उनका नाम दुनिया को बताइएगा और उनके द्वारा दान किये गए गरम कपडे दिल्ली की सर्दियों में सड़क पर रहने वाले लोगों की सर्दियों को 'चिल्लाक्स' करने में काम आयेंगे. इस कार्यक्रम को रोज़ सुनने वालों में से एक मैं भी हूँ, सोच कर हैरान होती हूँ कि क्या "दरियादिली" दिखाने के लिए दिल्लीवालों को 'रेडियो पर उनका नाम आने' का प्रलोभन देना ज़रूरी है?

देने कि भावना तो आखिर इंसान के अन्दर खुद पैदा होती है, कभी भी, कहीं भी. सच तो सिर्फ एक ही है...जब भी इंसान अगर किसी को कुछ देता है तो वह अपने लिए ही देता है, अपनी ज़रुरत, ख़ुशी या फिर आंतरिक तस्सली के लिए.. चाहे देने वाली चीज़ पैसा हो, प्यार हो या फिर गरम कपडे..अगर हम सही मायने में दिल्ली के दिलवालों के दर्शन करने की इच्छा रखते हैं तो शायद हम सबको अपने आस पड़ोस कि अनजान गलियों का रुख लेना चाहिए, इन्ही गलियों में कहीं छिपे हुए हैं दिल्ली शहर के अनजाने गुमनाम दरियादिल!

पिछले हफ्ते दिल्ली शहर के दरियागंज इलाके में घुमते-फिरते मेरी मुलाक़ात हुई इस शहर की ऐसी ही एक शक्सियत से- इनका नाम है बिरेन्दर और पेशे से यह गाड़ियों कि साफ़-सफाई और रखवाली करने वाले एक चौकीदार हैं. बिना किसी नाम और प्रलोभन की चेष्टा रखते हुए, पिछले चौदंह सालों से अपनी मामूली ढाई-तीन हज़ार रूपये की मासिक आय से ना केवल यह अपना पेट भरते हैं, बल्कि अपने बेटे बिनोद को भी पढ़ाते हैं और साथ ही साथ 20-25 गली के कुत्तों का ना केवल रोज़ पेट भरते हैं पर उनकी मरहम-पट्टी का खर्चा भी उठाते हैं. दरयागंज पुलिस थाने के बगल से जा रही भारत राम रोड से बिरेंदर का नाता 1995 से है.

आज से लगभग अठारह साल पहले बिरेंदर नेपाल से अपने परिवार समेत दिल्ली के दरियागंज इलाके में आए. इस शहर में अपने शुरुआती चार सालों में उन्हें दुकानों की चोकीदारी करने का काम मिला. फिर आखिरकार 1995 में उन्होंने  दुकानदारों के चंगुल से बाहर निकलने का फैसला किया और भारत राम रोड पर आसपास के निवासियों की गाड़ियों की चोकीदारी और सफाई का काम शुरू किया. बिरेंदर बताते हैं, "और तबसे इन सुनसानी रातों में मुझे चौकीदारी करते मेरी मदद करी इस गली पर रहने वाले कुत्तों ने और तभी से मेरा इन सबसे एक अनजाना सा रिश्ता जुड़ गया है"...इस बीच उनकी बीवी का देहांत हो गया और उनके ऊपर अपने बेटे को पालने की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई. बिरेंदर के मुताबिक़, 'यह कुत्ते मेरा अकेलापन दूर करते हैं, जो कभी मुझे धिक्कारते नहीं ना ही मुझसे कोई सवाल पूछते हैं...इसलिए आज यह मेरे साथी हैं और मैं उनका'. अगर किसी दिन आप इस सड़क से निकलेंगे तो हर शाम लगभग 6 बजे के आसपास आपको बिरेंदर यहाँ आटा गूंदते नज़र आयेंगे और बगल में ही दिखेगा उनका एक मिट्टी के तेल से चलने वाला स्टोव.

बिरेंदर अपने बेटे और आवारा कुत्तों के लिए एकसाथ एक ही चौके पर रोटी बनाते हैं. कोई भेदभाव नहीं. कोई अपना पराया नहीं. बाप के इस नजरिये पर बेटे को भी कोई ऐतराज नहीं है. बिरेन्दर बताते हैं, "मैं हर दिन 1 किलो आटा गूंथता हूँ, जो मैं चक्की से लगभग 18 रूपये किलो के भाव पर खरीदता हूँ...और फिर अपने, अपने बेटे और इन सब कुत्तों के लिए रोटियां बनाता हूँ...पतली मोटी रोटी बनते बनते हम सबके हिस्से में लगभग 2-3 रोटियां तो आराम से आ ही जाती हैं".

इतने में ही मेरी मुलाकात हुई बिरेंदर के बेटे बिनोद से। वह बिरेंदर से अपनी शाम कि रोटी लेने आया था और साथ ही अपने दोनों के लिए बाज़ार से सब्जी लाने. बिनोद ने बताया कि, "माँ की मृत्यु हो जाने के बाद पिताजी ने मुझे अडिग साहस और परिश्रम से दिन-रात काम कर के उनको पाला-पोसा और खूब पढाया-लिखाया. उन्होंने कभी भी मुझसे बाल-मजदूरी नहीं कराई और हमेशा पढने-लिखने पर जोर दिया". इस साल बिनोद ने 68% प्रतिशत के साथ आर्या अनाथ विद्यालय से अपनी बारवीं के परीक्षा से पास कर अपने पिता की मेहनत को सफल किया. अब वो आगे पड़न चाहते हैं. बिनोद ने बोला कि, "इसलिए अब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओपन लीर्निंग से बी.ए कर रहा हूँ और साथ ही मैं जहांगीरपुरी स्तिथ 'इंडियन टेक्नीकल इंस्टिट्यूट' या आई.टी.आई से दो साल का तकनीकी डिप्लोमा भी कर रहा हूँ". पूछे जाने पर पता चला कि इस तकनीकी डिप्लोमा कोर्स की फीस कुल मिलाकर 4800 रूपये है (यानी कि हर 6 महीने के 1200 रूपये).

बिनोद दरियागंज से पंद्रह मिनट कि दूरी पर स्थित फिरोजशाह कोटला में एक कमरे में रहते हैं जिसका मासिक किराया 500 रूपये महीना है. बिरेंदर ने बताया कि, "पहले मैं अपने बेटे के साथ रहता था, लेकिन अब वो बड़ा हो गया है, इसलिए मैं यहाँ दरियागंज पर ही दिन काट लेता हूँ, यहाँ मेरे कई साथी हैं ". अब बारी थी बिरेंदर के साथियों से मुलाकात करने की, जिनमे से चार तो उनके स्टोव के आस पास बिची एक बोरी पर गुच्छी मार कर सो रहे थे. "आपने इनके नाम क्या-क्या रखे हैं?", मैंने पुछा...बिरेंदर ने कहा, "कुछ नहीं, यह वैसे ही मेरे पास आ जाते हैं, नाम की ज़रूरत महसूस नहीं होती"...इन बेज़ुबान जानवरों के लिए शायद बिरेंदर के प्यार की भाषा ही बहुत है. धीरे धीरे कर एक एक बाद एक कई कुत्ते आने लगे, इसमें से एक भूरे रंग के कुत्ते कि एक टांग नहीं थी, "एक गाडी इसके ऊपर से निकल गई, टांग का मॉस सड़-गल गया और एक दिन यह टांग अलग हो गई".. कभी सोच कर देखिए कि तेज़ गाडी चलाने की होड़ में, इस चूहे-बिल्ली की दौड़ में हर-रोज़ कितने ही जानवर सड़कों पर गाड़ियों के नीचे रोंदे जाते हैं, और कितने ही अपंग हो जाते हैं पर शायद ऐसे अपंग जानवर की सेवा करने के लिए हर जगह एक बिरेंदर नहीं मिलता!

फिर मिला मुझे बिरेंदर का एक दूसरा अपंग दोस्त, यह काले रंग का कुत्ता कुब निकाल के चल रहा था और साथ ही वो एक टांग से लंगड़ा भी था, बिरेंदर से पूछने पर पता चला, कि, "बगल के पार्क के चौकीदार ने एक दिन इस काले कुत्ते को जमा कर एक लात मारी, जिसके बाद यह चल-फिर भी नहीं पाता था..कई हफ़्तों तक हमने सुबह-शाम इसको Voveron नामक दवाई खिलाई और मरहम लगाया, आज यह कम से कम चल पा रहा है, इसी से मुझे ख़ुशी है." "जिस तन बीते, वो तन जाने" नामक कहावत तो आपने कभी न कभी सुनी ही होगी...इन सब कुत्तों कि मरहम-पट्टी करने में बिरेंदर के एक और साथी हैं, वह हैं सुनील जी, जो खुद पूरी तरह से विकलांग हैं और दरियागंज कि इस गली में ही एक टॉफी-सिगरेट-फोन बूथ का स्टाल चलाते हैं. सुनील जी भी अपने आप में एक खुद्दार और स्वावलम्बन की मिसाल हैं.

बचपन में पोलियो से पीड़ित होने के इलावा ये कद में भी नाटे हैं और हाथों से भी अपंग हैं, इसी वजह से यह अपनी टांगों की बजाए हाथों के सहारे चलते हैं. बीस साल कि उम्र में सुनील जी बिहार के मुज़फ्फरपुर से 1979 में रोज़गार ढूँढने दिल्ली आए. सुनील जी बताते हैं, "शुरूआती दस सालों में मैंने पूर्वी दिल्ली की गली खरूजी स्तिथ एक होटल में रसोइये का काम किया और फिर मैं 1989 दरियागंज आया और मुझे विकलांग लोगों के लिए सरकार द्वारा संचालित साइकिल योजना के तहत एक तिपहिया - साइकिल मिली जिस पर मैंने केले बेचना शुरू किया पर फिर मेरी विकलांगता के कारण रोज़ मंदी से केले लाना मेरे लिए थोडा मुश्किल कार्य हो गया था इसलिए मैंने यह रेहड़ी लगाई और तबसे इससे ही गुज़र बसर कर रहा हूँ". दरियागंज थाणे के साथ सटी हुई सुनील कुमार जी की इस रेहड़ी पर आने वालों में कई पुलिसकर्मी भी हैं, पर कोई भी सुनील जी को एक भी पैसा कम नहीं देता!

परिवार के बारे में पूछे जाने पर सुनील जी कहते हैं, "1-2 साल में एक आधी बार अपने गाँव का चक्कर लगा आता हूँ, भाई के बच्चों को ही अपना बच्चा समझता हूँ, मैंने अपनी विकलांगता के कारण कभी खुद का परिवार बढाने के बारे में सोचा भी नहीं"...बीस सालों से दरयागंज के इस नुक्कड़ पर सुनील जी का अपना एक परिवार बन गया है, बिरेंदर चौकीदार जैसे उनके कई साथी और शुभ-चिन्तक हैं. सुनील जी की दुकान पर टॉफियाँ पहुंचाने का काम पड़ोस में रहने वाले शर्मा जी करते हैं. "राजू भैया और गुप्ता जी नामक दरियागंज निवासियों ने मेरी इस रेहड़ी को हफ्ता-वसूली करने वालों से बचाने में मेरी जो मदद की है, उसके लिए मैं उनका जितना शुक्रगुजार रहूँ वो कम है" .

सुनील जी की खुद्दारी कि खुद रजत भाई यानी कि राजू भैय्या मिसाल देते हैं, वह बताते हैं, "इतने सालों में सुनील ने किसी से कभी कोई आर्थिक मदद नहीं मांगी और न ही कभी कोई चीज़". यह बात सुनते ही सुनील जी हस कर मेरा ध्यान अपनी कुर्सी की तरफ आकर्षित करते हैं और मुझे कहते हैं, "मेरा यह सिंघासन राजू भैया की देन है, इसमें मैं पूरा फिट आ जाता हूँ". बिरेंदर जी, इस गली के कुत्तों, सुनील जी और रजत जी के बीच के इस आपसी प्यार और इज्ज़त का यह रिश्ता देखते ही बनता है...इन लोगों से मिलकर, इनसे मिले अपनेपन को समेट कर मैं अपने घर की और जा रही थी मैंने एक अनजान महिला को देखा, जो मदर डेरी के बूथ पर आई और उन्होंने दूध कि 2 थैली खरीदीं. एक थैली काट कर उन्होंने दुकान के कोने में पड़ी सबसे ऊपर वाली प्लास्टिक की खाली क्रेट में डाली और एक नीचे पड़ी इकलौती क्रेट में...ऊपर वाली में 2 बिल्लियाँ दूध पीने आयीं और नीचे वालों में 2 कुत्ते...इस नज़ारे को निहारती हुई जब तक मैंने उन महिला को रोकने की कोशिश करती, वह भीड़ और अँधेरे में मेरी आँखों से ओझल हो गईं...

सही मायने में इन्ही अनजान लोगों और इनके बिना छल-कपट से सींचे जाने वाले इन बेशर्त वाले प्रेम के रिश्तों में ही कहीं छिपी है हमारी दिल्ली की दरियादिल्ली! संत कबीर ने सही लिखा है: "पोथी पढि-पढि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, जो पढ़े सो पंडित होए". अब यह बात दीगर है कि आजकल दिल्ली को जिस तरह से ऊंचे लोगों की पसंद का शहर बनाया जा रहा है उसमें ऐसे दरियादिल लोगों के लिए ही कोई जगह न बचे. कम से कम मुख्यमंत्री साहिबा तो यही चाहती हैं.

Subscribe to comments feed Comments (6 posted):

अजय कुमार झा on 20 November, 2009 23:40;09
avatar
क्या कहूं आपकी पोस्ट को अब तक दो बार पढ चुका हूं ....स्तब्ध हूं और कलम अवाक है ..फ़िर पढूंगा एक बार
Thumbs Up Thumbs Down
4
Manwendra gautam on 21 November, 2009 01:52;30
avatar
when i was a child ,i was taught" Man's behaviour towards man is true test of civilization", but i think it should be modified as" Man,s behaviour towards nature is true test of civilization".
great going keep it up!
Thumbs Up Thumbs Down
1
Jeet Bhargava on 21 November, 2009 03:29;29
avatar
"यह बात दीगर है कि आजकल दिल्ली को जिस तरह से ऊंचे लोगों की पसंद का शहर बनाया जा रहा है उसमें ऐसे दरियादिल लोगों के लिए ही कोई जगह न बचे. कम से कम मुख्यमंत्री साहिबा तो यही चाहती हैं."

बढ़िया लिखा..लिखती रहे. सादर शुभकामनाएं
Thumbs Up Thumbs Down
1
LIMTY KHARE on 21 November, 2009 13:41;43
avatar
bahut badiya vasudha jee padhkar aanand aa gaya. keep it up mam
Thumbs Up Thumbs Down
1
Vasudha Mehta on 21 November, 2009 20:57;45
avatar
आप सबके पुरोत्साहन के लिए आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद.
Thumbs Up Thumbs Down
1
tribhuvan on 17 December, 2009 21:55;33
avatar
aapke shabd batate hain ki aapmen samvendalsheelta aur insaniyat kitani hai. Sadhuwad.
Thumbs Up Thumbs Down
1
total: 6 | displaying: 1 - 6

Post your comment comment

Please enter the code you see in the image:

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image Vasudha Mehta A Post Graduate in Plant Molecular Biology from University of Delhi, she has pursued diploma courses in Environmental Law and then Journalism. After finishing studies, determined to realise her dream to contribute towards the cause of animal welfare and nature conservation, she has been working over the past three years with Wildlife and Environmental Groups in a multi-tasking capacity of a 'Communication, Resource Mobilization and Outreach professional'. (vasudha1907@gmail.com)
Rate this article
4.25
More from जन-जीवन
Previous
image
सुखाड़ का शिकार हो गया बिहार
उत्तरी बिहार के कुछ इलाकों में आए बाढ़ के बारे में टीवी चैनल पर खबर देखने या फिर किसी सामाचार पत्र में खबर पढ़ कर यह अंदाजा मत लगाइए कि बिहार में इस साल भी खूब बारिश हो रही है। दरअसल बिहार के कुछ इलाकों में आई बाढ़, नेपाल की नदियों से बहकर आया पानी है जिसकी वजह से कुछ क्षेत्र जलमग्न हो गए हैं। लेकिन इस पानी से किसानों का भला नहीं होने वाला है।...
image
बाढ़ के बाद पाकिस्तान पर मंहगाई की मार
बाढ़ के कहर के बाद बढ़ी महंगाई ने पाकिस्तानी जनता की कमर तोड़ दी है। रमजान के महीनें में महंगाई ने पाकिस्तानी जनता को भारी परेशानी में डाल दिया है। बाढ़ के कारण सब्जियों की फसल तबाह हो गई है। आलू, टमाटर और मटर की कीमतें आसमान छू रही है। शहरों में टमाटर जहां १३० रुपये किलो बिक रहा है, वहीं आलू की कीमत भी चालीस से पचास रुपये किलो तक पहुंच चुकी है। मजबूरी में पाकिस्तानी व्यापारियों ने अमृतसर से आलू, प्याज और टमाटर का आयात शुरू कर दिया है। उधर आम लोगों के पास अब इस बढ़ती महंगाई के कारण टमाटर और आलू खरीदने के लिए भी पैसे नहीं है।...
image
हिन्दुओं ने खोल दिए दिल के दरवाजे
पिछले एक सदी के भयंकर बाढ़ से जूझ रहे पाकिस्तान ने भले ही भारत की पांच मिलियन डॉलर की सहायता लेने में आनाकानी की हो लेकिन यहां के हिंदू समुदाय ने संकट की इस घड़ी में मुसलमान भाइयों की ऐसी मदद की है जिसने नफरत की राजनीति करनेवाले पाकिस्तान के हुक्मरानों की आंखें खोल दी है। बाढ़ प्रभावित इलाके में हिंदू समुदाय के लोग जहां आर्थिक सहायता दे रहे है, वहीं रमजान के महीनें में लोगों को सहरी और रोजा खोलने के वक्त खाना बनाकर भी ला रहे है। हिंदुओं के इस भावना से पाकिस्तान के दछिणपंथी राजनीति करने वाले नवाज शरीफ भी खासे प्रभावित हो गए है। वे अपने भाषणों में हिंदुओं की जोरदार तारीफ कर रहे है।...
image
विस्थापित हुए तो बिखर जाएंगे ख्वाब
अब खबर आई है कि अफ्रीकी चीते को बसाने के लिए मध्यप्रदेश के नौरादेही अभयारण्य से २३ गांवों को उजाड़े जाने की पूरी तैयारी हो गई है। हालांकि यह कोई पहला गांव नहीं होगा जब जंगली जानवरों को बचाने के नाम पर इंसानों का घर उजाड़ा जाएगा। सरकार और उनके अधिकारियों का यह तर्क है कि जानवरों को बचाना जरूरी है। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है कि किसकी कीमत पर तो सामने एक लंबी खामोशी छा जाती है। ...
image
ससुराल गेंदा फूल के बाद अब चोला माटी के राम
छत्तीसगढ़ के लोक-गीत अब बालीवुड के रास्ते दुनिया भर में धूम मचा रहे हैं. दूरदर्शन में समृध्द लोक नाटकों, प्रहसनों का और आकाशवाणी में इस तरह की गीतों का खज़ाना भरा पड़ा है. वक्त आ गया है कि अब इन महान रचनाओं को लोगों को सामने लाने के लिए प्रसार-भारती अपना व्यावसायिक दायित्व निभाए, वरना भद्दे वीडियो एलबम और बेतुके छत्तीसगढ़ी फिल्म, यहां के महान कलाकारों का योगदान धूल-धुरसित करके रख देंगे....
image
आधी लड़कियों के लिए राइट विदाउट एजुकेशन
भारत में 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए ‘राईट टू एजुकेशन’ है, मगर 6 से 14 साल की कुल लड़कियों में से 50 प्रतिशत लड़कियां तो स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाती हैं। यह आकड़ा मौटे तौर पर दो सवाल पैदा करता है, अव्वल तो यह कि इस आयुवर्ग की आधी लड़कियां स्कूल से ड्राप-आऊट क्यों हो जाती हैं, दूसरा यह कि इस आयुवर्ग की आधी लड़कियां अगर स्कूल से ड्राप-आऊट हो जाती हैं तो एक बड़े परिदृश्य में ‘राईट टू एजुकेशन’ का क्या अर्थ रह जाता है ?...
image
बाल मजदूर अभी भी मजबूर
बाल अधिकारों से जुड़ी लगभग सभी संधियों पर दस्तखत करने के बावजूद भारत बाल मजदूरों का सबसे बड़ा घर क्यों बन चुका है, और इसी से जुड़ा यह सवाल भी सोचने लायक है कि बाल श्रम निषेध एवं नियंत्रण कानून, 1986 के बावजूद हर बार जनगणना में बाल मजदूरों की तादाद पहले से कहीं बहुत ज्यादा क्यों निकल आया करती है ? मगर हकीकत इससे कहीं भयानक है। दरअसल बाल मजदूरी में फसे केवल 15% बच्चे ही कानून के सुरक्षा घेरे में हैं।...
image
शासन, प्रशासन को चुनौती देती प्रलयंकारी बाढ़
हरियाणा व पंजाब में गत् दिनों मॉनसून की शुरुआत में ही आई भारी बारिश तथा इसके बाद उत्पन्न हुई बाढ़ जैसी स्थिति के लिए एक बार फिर यही बताया गया कि घग्गर व टांगरी जैसी पहाड़ी नदियों तथा एस वाई एल नहर पर बने बांध में पड़ी दरार ने बारिश के पानी के साथ मिलकर बाढ़ जैसी स्थिति बना दी। जिसके कारण अंबाला, कुरुक्षेत्र तथा पटियाला जिलों का काफी बड़ा भाग जल प्रलय जैसे माहौल का सामना करने के लिए मजबूर हो गया। सवाल यह है कि इन नदियों के बांध आखिर प्राय: क्योंकर टूट जाते हैं?...
image
कब रुकेगी इज्जत की खातिर मौत?
इज्जत के खातिर मौत देने का सिलसिला आखिर कब रुकेगा? आखिर कब तक मान सम्मान के नाम पर युवाओं की हत्या होती रहेगी ? कौन है ! जो इस जघन्य कृत्य को चुनौती देने की हिम्मत करेगा ? इसका जवाब कानून नहीं है, इसका जवाब हम सभी को अपने आप से पूछना है, इस समाज से पूछना है, जिसके बीच हम रहते है।...
image
शिक्षा के बाजार में बेजार होता बचपन
शिक्षा का नया सत्र शुरू होने जा रहा है. सरकार शिक्षा के अधिकार के कानून की प्रक्रिया में है. महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में सरकारें माध्यमिक कक्षाओं तक विद्यार्थियों को अनुत्तीर्ण करने पर प्रतिबन्ध लाने के कानून बना रही हैं. एस.एस.सी.के विद्यार्थियों के लिए 'बेस्ट ऑफ़ फाइव"फ़ॉर्मूला लागू कर दिए जाने से विद्यार्थिओं के अंकों के प्रतिशत में जबरदस्त वृद्धि हुई है,जिसके चलते महाविद्यालयों में प्रवेश का संकट पैदा हो गया है....
image
क्या धरती एलियंस के निशाने पर है?
ब्रीफ हिस्टरी ऑफ टाइम के विख्यात लेखक और एस्ट्रो-फिजिक्स से जुड़े विषयों पर विश्व के सर्वाधिक प्रामाणिक और अधिकार-संपन्न वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, विश्लेषक और चिंतक स्टीफन हाकिंग की बातों को गंभीरता से न लेने का कोई कारण नहीं है। उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय को झकझोर दिया है। उनके बयान ने वैश्विक स्तर पर एक आशंका भरी बहस को भी जन्म दिया है- क्या धरती एलियंस के निशाने पर आ सकती है?...
image
शैतानों के हवाले स्वास्थ्य सुरक्षा
हाल ही में रूस में जीएम सोयाबीन के चूहों पर हुए प्रयोगों की रिपोर्ट आई है। रिपोर्ट बताती है कि जीएम फसलें मनुष्यों के खाने के लिए कतई सुरक्षित नहीं हैं। यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आयी है जब भारत में जीएम फसलों को जनता पर जबरदस्ती थोपने की भरसक कोशिश की जा रही है। यह प्रयास करने वालों में सरकार के कुछ मंत्रालय, जीएम बीज उत्पादक कम्पनियां, कृषि वैज्ञानिक, नौकरशाह और देश की भूख मिटाने की नौटंकी में शामिल योजनाकार और अर्थशास्त्रियों तथा मीडिया के एक खासवर्ग के शतुरमुर्ग शामिल है।...
image
बुनियादी समस्या तो खुद पीडीएस ही है
पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम जिसे हिंदी में सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहते हैं व संक्षिप्त में पीडीएस कहा जाता है। इस व्यवस्था के तहत केंद्र सरकार द्वारा गरीबी रेखा से नीचे जीने वाले नागरिकों को सस्ता राशन उपलब्ध करवाया जाता है। यह व्यवस्था कितने लोगों के स्विस बैंक लबालब भर सकती है या भर रही है इसका अंदाज़ा लगाने के लिए कुछ आंकड़ों पर दृष्टिपात करते हैं। ...
image
सोनाली शुभम की सफल प्रेम कहानी
झारखंड की निरूपमा भले ही प्रेम में हार गई हो लेकिन बिहार की सोनाली शुभम अपने इम्तिहान में पास हो गयी . इन दोनों ने प्रेम किया था . लेकिन दोनों के परिणाम अलग अलग रहे. निरूपमा का प्रेम देश की राजधानी का प्रेम था. सोनाली की प्रेम कहानी राजस्थान की शैक्षणिक नगरी कोटा में परवान चढी. दोनों को देखा जाये तो सोनाली ने जो राह चुनी उसमें कांटे कहीं अधिक थे और आगे भी रहेगें . सोनाली की सफलता में उसके प्रेम की पवित्रता को सफल माने या फिर उसकी दृढता को. निरूपमा ने जो किया उसमें गलत क्या है? ये विश्लेषण का विषय हो सकता है. ...
image
सूचना अधिकार पर नौकरशाही की नकेल
आजादी के बाद इस देश में तमाम तरीके के कायदे कानून बनाये गये जिनका उद्देश्य जनहित था । कौन सा कानून अपने उद्देश्य में कितना सफल है, उस पैमाने पर यदि सूचना के अधिकार अधिनियम का आंकलन किया जाये तो यह अधिनियम अच्छे के उद्देश्य के बाद भी अच्छे क्रियान्वयन की बाट जोह रहा है।...
image
दहेज के मुकदमों में बिक रहे हैं थाने
भारतीय दण्ड संहिता (आई.पी.सी.) 1860 की कुल 511 धाराओं में से एक भी धारा ऐसी नहीं है जो किसी निरपराध व्यक्ति को सामाजिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करने या फिर दण्डित करने की पक्षधर हो, बावजूद इसके इन्हीं आपराधिक धाराओं की आड़ में हमारे देश के खाकी वर्दीधारी पुलिसिया रणबांकुरे जवानों ने ऐसे-ऐसे हथकंडों को अपना कर अपने जौहर का प्रदर्शन किया है कि आई.पी.सी. की इन्हीं आपराधिक धाराओं के तहत देश के लाखों निरपराध - बे-कसूर न सिर्फ सामाजिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं, बल्कि लाखों लोग सालों-साल से जेल के सीखचों के भीतर यातना का दंश भी झेल रहे हैं। कारण सिर्फ एक, इसी भारतीय दण्ड संहिता की आपराधिक धारा एवं पुलिसिया जौहर का नापाक प्रदर्शन!...
image
प्यार की पंचायत पर कुर्बान हुआ परिवार
रात के सन्नाटे को चीरती देहरादून एक्सप्रेस उसके ऊपर से गुजर गई. लेकिन दहशत के उन पलों में भी वो अपने परिवार की सलामती के बारे में ही सोचती रही. ऊपर से गाड़ी गुजर जाने के बाद उसने सबसे पहले अपने भाई रोहित को खोजा. उसके बाद मिले पिता, माँ बहिन और चाची के चिथड़ों ने उसे बदहवास कर दिया. सप्ताह भर बीत जाने के बाद भी उसके चेहरे पर अकेले रह जाने का खौफ साफ दिखाई दे रहा है. उसे चाची से कोई शिकायत नहीं. पंचों के फैसले को वो भले ही समझ नहीं पा रही है. लेकिन खुद के अकेले रह जाने के लिए वो उन्हें ही जिम्मेदार जरूर मान रही है. ...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम कॉपीराइट के सभी प्रकार के दावों और दायरों से मुक्त है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2