गह्वर में गंगा
गंगा गहरे तक भारत के मानस में समायी हुई है. इस बार जब बनारस पहुंचे और जिनसे भी मिले वे सब गंगा की मरणासन्न अवस्था पर चिंतित दिखे.
हर किसी ने यही दुख व्यक्त किया कि गंगा परनाला हो गयी है. काशीवासी मानते हैं कि गंगा का प्रवाह वहां से बहुत दूर टिहरी में बाधित हो गया है. लेकिन गंगा को लेकर काशी का यह दुख अकेला नहीं है. गंगा के किनारे सनातन संस्कृति के जो भी शहर हैं सब जगह गंगा को लेकर चिंता है. हरिद्वार से लेकर बैजनाथ धाम तक तब जगह गंगा के छीजते स्रोत को लेकर चिंता साफ देखी जा सकती है.गंगा की इस मरणासन्न अवस्था पर न केवल दुख है बल्कि बातचीत में यह दुख क्षोभ के रूप में दिखाई भी पड़ता है. राज ठाकरे की मुंबई में छठ पूजा के विवाद को पीछे छोड़ दें तो असल चिंता तो अब यह है कि गंगा का यही हाल रहा तो क्या गंगा के किनारे पटना में छठपूजा हो पायेगी?
मैं राजेन्द्र प्रसाद घाट पर खड़ा हूं. उपेन्द्र भट्ट विट्ठल-विट्ठल गा रहे हैं. मधुर संगीत में समग्र चिंता को तिरोहित करने की शक्ति है. बावजूद इसके मैं सिसकती गंगा की चिंता से मुक्त नहीं हो पा रहा हूं.थोड़े दिनों पहले पुणे में आयोजित वर्ल्ड इंस्टीट्यूट आफ सस्टेनबल एनर्जी में जलवायु परिवर्तन से संबंधित प्रस्तुत तमाम दस्तावेजों में प्रस्तुत आंकड़ें मेरे सामने घूम रहे हैं. आज जिस गंगा को मैं देख रहा हूं उससे वे आंकड़े सिर्फ आंकड़ेबाजी भर नहीं लगते. अगर प्रत्यक्ष में गंगा की काशी में यह दशा है तो हिमालय में हो व्यापक फेरबदल के संभावित असर की कल्पना की जा सकती है. हिमालय के 35 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लगभग 9000 हिमनद (ग्लेशियर) हैं. ध्रुव प्रदेशों के अतिरिक्त दुनिया में यह सबसे विशाल जल भंडारण का प्राकृतिक प्रबंध है. ग्लेशियरों के पिघलने और नये ग्लेशियर बनने की एक प्राकृतिक प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है. लेकिन अब बढ़ते तापमान के चलते ग्लेशियर पिघल तो रहे हैं लेकिन नये बनने कम हो गये हैं. इसरो की एक हालिया रिपोर्ट भी कहती है कि चिनाब, बस्पा और परबती घाटियों के 466 ग्लेशियर सिकुड़ गये जिसके कारण 1962 में इनका कुल क्षेत्रफल 2077 वर्गकिलोमीटर से घटकर अब 1628 वर्गकिलोमीटर रह गया है. अंतरराष्ट्रीय बर्फ कमीशन का अनुमान है कि आगामी चालीस सालों में सारे ग्लेशियर सिकुड़ कर दुबक जाएंगे.
अगर इन आशंकाओं को सही मान लें जिसके कि लक्षण यहां-वहां दिखाई देने लगे हैं कुछ परिस्थितियों की भी कल्पना ही नहीं हकीकत से रूबरू होने के लिए तैयारी करनी होगी. भारत की सर्वाधिक आबादी इन ग्लेशियरों के उद्गम से निकली गंगा, ब्रह्मपुत्र और अन्य नदियों के किनारे बसती है. गेहूं और चावल की फसलों का अधिकांश हिस्सा इन्हीं नदियों के पानी पर निर्भर है. अगर ऐसी आशंकाएं सच निकलती हैं तो प्रकृति बहुत बेढब व्यवहार शुरू कर देगी. अचनाक बाढ़ का प्रकोप बढ़ जाएगा. ग्लेशियरों के सहारे जो नदियां सालभर अपने सिंचित इलाकों को तर रखती हैं वे थोड़े ही समय में सारा पानी बहाकर समुद्र तक पहुंचा देंगी. कुछ सालों की यह अप्राकृतिक बाढ़ बड़े पैमाने पर विस्थापन को जन्म देगी. इस बाढ़ से जो विस्थापन होगा उसे रोकने के लिए किसी राज ठाकरे का कोई भड़काऊ बयान और आंदोलन काम नहीं आयेगा. फिर अप्राकृतिक बारिश और अतिवृष्टि का भी अंतहीन दौर शुरू हो सकता है. एक तरफ यह सब होगा तो दूसरी ओर सूखे का भी प्रभाव बढ़ेगा. 2005 में कुछ इलाकों में जैसी अतिवृष्टि हमने देखी थी वह कुछ हिस्सों की ही बात नहीं होगी बल्कि साल-दर-साल की हकीकत हो जाएगी.
नासा के चित्र भी यही बताते हैं कि गंगोत्री ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहा है. जब गंगोत्री ग्लेशियर ही नहीं होगा तो उस बहुप्रचारित टिहरी बांध में पानी कहां से आयेगा जिसे बनाने के लिए तमाम आंदोलनों को दरकिनार करके सरकार ने कोई 20 हजार करोड़ रूपये फूंक दिये और गंगा की अविरल धारा को रोक दिया. दावा किया गया था कि इस बांध से 24 सौ मेगावाट बिजली पैदा की जाएगी. लेकिन अभी तक 250-300 मेगावाट से ज्यादा बिजली नहीं पैदा की जा सकी है. अगर टिहरी में ही पानी नहीं पहुंचेगा तो दिल्ली को 200 क्यूसेक और उत्तर प्रदेश को 300 क्यूसेक पानी कहां से मिलेगा? फिर आखिरी चिंता तो सबके मन में है ही. अगर 1991 की तरह कोई ऐसा भूकंप आता है जो सरकार के दावों से बड़ा हुआ तो क्या होगा? ऐसा अनुमान है कि 200 मीटर ऊंचाईवाले इस बांध के दरकने से कानपुर तक के गंगा के किनारे बसे शहर और इलाके पूरी तरह से डूब जाएंगे, और असर तो शायद काशी तक हो. टिहरी में गंगा के बांधने से गंगा के किनारे बसे हर धाम चिंतित हैं. बीसवीं सदी के शुरूआत में अंग्रेजों ने ऐसे बांध की कल्पना की थी. उस समय महामना मदनमोहन मालवीय ने बांध की योजना का विरोध किया था. देशभर में आंदोलन चला. आंदोलन के आगे झुकते हुए अंग्रेज हुकूमत ने 1916 में गंगा भक्तों के साथ एक समझौता किया कि गंगा का प्रवाह कभी रोका नहीं जाएगा. अंग्रेज हुकूमत के साथ मालवीय जी के इस समझौते को संविधान की धारा 363 के तहत आज भी भंग नहीं किया जा सकता. लेकिन व्यवहार में वह भंग हुआ. गंगा की अविरल धारा रूकी. टिहरी में गंगा को रोका गया जिसका परिणाम यह है कि गंगा के किनारे बसे तीर्थ और धाम बीमार पड़े हुए हैं.
इसी तरह गंगा को बचाने के लिए गंगा एक्शन प्लान जैसी लपूझन्ना योजनाएं इस चिंता को कम नहीं कर सकतीं. गंगा एक्शन प्लान बना जरूर लेकिन उससे गंगा साफ नहीं हुई. एक तरह से वह सरकारी विभागों द्वारा अपनी सफाई का प्लान बनकर रह गया. गंगा तो लगातार क्षीण हुई, मैली हुई. संसद की लोकलेखा समिति ने भी गंगा एक्शन प्लान को नाकाफी बताया है. इस तथाकथित एक्शन प्लान का पहला चरण आज से बहुत पहले 1990 में ही पूरा होना था लेकिन यह अब 2008 तक बढ़ा दिया गया है. तकनीकि रूप से यह दूसरा चरण है लेकिन गंगा एक्शन प्लान के तहत उत्तर प्रदेश और बिहार में पहले चरण की ही 149 परियोजनाएं अधूरी पड़ी हुई हैं. दूरसे चरण में 270 योजनाएं बनायी गयीं जिसमें काम की शुरूआत ही सिर्फ 111 योजनाओं पर हुआ. 1985 में गंगा जितनी मैली थी आज उससे ज्यादा मैली हो गयी हैं.
राजेन्द्र प्रसाद घाट पर मैं जहां खड़ा हूं वहीं से मणिकर्णिका घाट दिखाई दे रहा है. मैं यह भी देख रहा हूं कि पार्थिव शरीरों का यहां अंतिम संस्कार हो रहा है और उस पार्थिव शरीर को आखिरी बार गंगा के पवित्र जल से तिरोहित किया जा रहा है. मेरी कल्पना में यह बात आते ही कांप जाता हूं कि आज जिस पार्थिव शरीर को पवित्र जल के स्पर्श से मुक्ति का मार्ग दिखाया जा रहा है कल को गंगा ने अपना स्वभाव छोड़ दिया तो मुक्ति के लिए पार्थिव होने की जरूरत नहीं रह जाएगी. मन ही मन उस मां से ऐसे किसी संभावित प्रलय से रक्षा करने की प्रार्थना करता हूं. आखिर और कौन है जिससे अपनी आस्था और श्रद्धा की रक्षा की प्रार्थना कर सकते हैं? उसी गंगा की शरण में जाना पड़ेगा जो सनातन संस्कृति की तारण-हारण का मूल मंत्र देती है. घाट से उठते हुए मन ही मन मैं यही प्रार्थना कर रहा हूं कि "हे भगीरथ, फिर से इक्ष्वाकु के वंश में जन्मों और सबका उद्धार करनेवाली मां गंगा को अविरल करो."
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