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हमारी फिल्में अब लोरी नहीं गाती

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हिंदी फिल्मों के लोरी की एक समृद्ध परंपरा रही है। लेकिन पिछले एक दशक में रिलीज हुई शायद ही किसी फिल्म में लोरी के साथ किसी दृश्य का फिल्मांकन हुआ हो। लुप्त होती लोरी परंपरा को देखकर लगता है कि मासूम मुन्ने को सुलाने वाली लोरी अब खुद ही गहरी निंद्रा में सो गई है। पता नहीं इस अब नींद से जगाने की पहल कौन करेगा।

नये-नये प्रयोग करने वाली हिंदी सिनेमा का पता नहीं फिर इस ओर कभी ध्यान जाएगा भी या नहीं। जानकार लोग कहते हैं कि हिंदी फिल्मों में लोरी परंपरा को शुरू करने का श्रेय प्रसिद्ध स्वर सम्राट कुंदन लाल सहगल हो जाता है।  १९४० में रिलीज हुई फिल्म जिंदगी में उनकी गाई हुई लोरी सो जा राज कुमारी सो जा.... आज भी सुनने वाले के कानों में जादू-सा असर दिखाती है। उस जमाने में इस लोरी की धुन को सुनकर बच्चे ही नहीं, बड़े भी अपने सारे गम और तनाव भूल कर नींद के सागर में डूबकी लगा लेते थे।

कहते हैं कि हिंदी सिनेमा में साठ का दशक लोरी का स्वर्णकाल था। १९५१ में रिलीज हुई फिल्म अलबेला में  लता मंगेशकर ने तिलकर के साथ प्रसिद्ध लोरी धीरे से आ जा रही अंखियान में निंदिया आ जा रही... को स्वर दिया। इस लोरी में उभरते दर्द की टीस जैसे संगीत के बीच राजेंद्र कृष्ण के गीतों को सुनकर हर श्रोता मंत्रमुग्ध सा हो जाता था। इसी साल रिलीज हुई फिल्म सुजाता में मजरूह सुल्तानपुरी के शब्दों को सचिन दा ने अलग हटी हुई धुन में डाल कर नन्हीं परी सोने चली, हवा धीरे धीरे आना... के  रूप में जिस बेमिसाल लोरी को गया, उसे उस जमाने के संगीत प्रेमी आज भी याद करते हैं।  १९५३ में बनी फिल्म दो बीघा जमीन में शैलेंद्र और सलिल चौधरी की धुन पर आ जा नींदियां तू आ... को लता के स्वर ने तमाम श्रोताओं और फिल्म दर्शकों के बीच कर्णप्रिय बना दिया था। इसी साल फिल्म फुटपाथ की सो जा मेरे सो जा... लोरी और लोकप्रिय हुई थी। इसे ख्याम के संगीत निर्देशन पर आशा भोंसले ने स्वर दिया था जिसे अली सरदार जाफरी ने मजरुह सुल्ताना पुरी के साथ मिलकर गाया था।

लोरी की परंपरा को समृद्ध करने में कवि प्रदीप का भी योगदान रहा है। १९५४ में बनी फिल्म बाप-बेटी के लिए ले चल निंदिया ले चल... लोरी लिखी जो खासी लोकप्रिय हुई। इसी साल रिलीज हुई फिल्म शबाब में शकील बदायूं की लिखी लोरी बोल चंदन का पलना रेशम की डोरी, झूला झुलाऊं निंदिया... को नौशाद ने स्वर देकर दर्शकों के लिए अविस्मणीय बना दिया। १९५५ में बनी फिल्म बंदिश में हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन में लता की गाई लोरी रात सुहानी है ओ निंदिया रानी... को हर वर्ग के लोगों के खूब पसंद किया।

हिन्दी फिल्मों में गीतों की समृद्ध परंपरा रही है. उसी समृद्ध परंपार में लोरी भी आती थी. लेकिन नये जमाने के नाम पर फिल्मों में दिल और प्यार का इतना भीषण शोषण हुआ है कि अन्य सभी प्रकार के गीतों का पूरी तरह से लोप हो गया है. गीत के नाम पर अब सिर्फ बेतुकी तुकबंदी ही बची है

१९५७ में रिलीज हुई फिल्म दो आंखे बारह हाथ में बसंत देसाई की धुन पर मैं गाऊं तू चुप हो जा, मैं जागू तू सो जा...को लता मंगेशकर ने अपनी आवाज देकर मर्मस्पर्शी  बना दिया। इसके ही अगले ही साल फिल्म लाजवंती में सचिन देव बर्मन ने मजरूह सुल्तानपुरी के बोल चंदा रे छुपे रहना सोए मैरी मैना... को आशा भोंसले ने स्वर देकर एक आकर्षक लोरी पेश की। इसके बाद लता की ही आवाज में चिराग कहां रोशनी कहां में टिमटिम करते तारे ये कहते है... खासी लोकप्रिय हुई। इसलोरी को रवि ने धुन दी थी।

१९६४ में बनी फिल्म बेटा-बेटी में शंकर जयकिशन के संगीत निर्देशन में इस बार लता मंगेशकर ने मोहम्मद रफी के साथ आज कल में ढल गया दिन हुआ तमाम, तू भी सो जा सो गई रंग भरी ये शाम...एक लोरी गाई जिसे लोगों ने वर्र्षों तक गुनगुनाया। इसी साल शैलेंद्र की लिखी एक लोरी जो खासी लोकप्रिय हुई दूर गगन की छांव में इस लोरी को किशोर कुमार की धुन पर आशा भोंसले ने गाया। १९६४ में ही सांझ और सवेरा में हसरत जयपुरी की लिखी एक और लोरी बहुत ही लोकप्रिय हुई। इस लोरी को शंकर जयकिशन की धुन पर सुमन कल्याणपुर ने अपना स्वर देकर चर्चित कर दिया।

संगीत प्रेमियों को याद होगा कि १९६५ में प्रदर्शित खानदान फिल्म का गाना तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही मेरी पूजा, तुम्ही देवता हो....को कौन भुला सकता है। दरअसल यह गाना एक लोरी थी, जिन्होंने इस फिल्म को नहीं देखा हैं, वे इस गाने को सुनकर कह ही नहीं सकते कि यह लोरी है, क्योंकि आमतौर पर इस गाने की संवेदना प्रेमि-प्रमिका के बीच की मर्मस्पर्शी भावना को प्रदर्शित करती है। १९६७  में आई फिल्म आखिरी रात में कैफ़ी आजमी द्वारा लिखी एक लोरी लोगों को खूब भाई। लोरी के बोल थी, मेरे चंदा मेरे नन्हें तुझे अपने सीने से कैसे लगाऊं...। इस लोरी को खय्याम ने अपने धुनों से मर्मस्पर्शी बना दिया था।

१९६७ में शंकर जयकिशन ने फिल्म ब्रह्मïचारी में एक लोरी को संगीत दिया। संगीत के जानकारों का कहना है कि इस लोरी में बेहत तेज संगीत की वजह से शैलेंद्र द्वारा रचित इस लोरी को वह स्थान नहीं मिला जिसकी यह हकदार थी। १९७१ में बनी फिल्म मेरे अपने में फिर से एक मधुर लोरी की धुन सुनाई दी। कहते हैं कि इस लोरी को गुलजार ने लिखा था। लोरी के बोल थे रोज अकेली आए, रोज अकेली जाए चांद कटोरा लिए भिखारिन रात...। लता ने इसे अपना स्वर देकर विशिष्टï लोरियों की श्रेणी में जगह दिलवाई।

इसी साल की मन मंदिर फिल्म में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की धुन पर लता और मुकेश ने ऐ मेरी आंखें के पहले रंगीन सपने मासूम सपने... जैसी शानदार लोरी को अपने स्वर दिये। १९७२ में बनी फिल्म अनुराग में भी एक अच्छी लोरी मेरा राजा बैठा बूझे एक पहेली सोए जग जागे रात अकेली...। इसे सचिन देव बर्मन के संगीत निर्देशन में लता ने गाया था। १९७४ बनी फिल्म कुंवारा बाप में मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी और राजेश रोशन के संगीत में तैयार लोकप्रिय लोरी आ री आ निंदिया तू ले चल कहीं को ..., लता, किशोर और महमूद ने अपना स्वर दिया। १९७६ में लता ने खय्याम के संगीत निर्देशन में मेरे घर आई एक नन्हीं परी... गाया। फिल्म कभी-कभी की यह मधुर लोरी को आज भी संगीत प्रेमी बड़ी ही शिद्दत से याद करते हैं। सन् १९७७ राहुल देव बर्मन की धुन पर आनंद बक्सी के बोल लल्ला लल्ला लोरी दूध की कटोरी को लता ने एक बार फिर अपना स्वर दिया। १९८३ में येसुदास ने राजा की धुन पर सदमा फिल्म में सुरमई अंखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे... की खूबसूरत लोरी गाई थी। इसे भी संगीत पे्रमी आज भी चाव से सुनते हैं।

फिल्मकार सागत सरहदी ने १९७४ में लोरी फिल्म ही बना डाली। खय्याम की धुन पर लता की गाई लोरी आ जा निंदिया आ जा नैनन बीच समा जा...की लोकप्रियता स्थापित है। यश चोपड़ा की १९९१ में बनी फिल्म लम्हें में लोरी गुडिय़ा रानी निंदिया रानी आखिरी बार...शिवहरि के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर ने इसे गया। इसके बाद से फिल्मों में लोरी का चलन लगभग मंद सा पड़ गया।  क्योंकि लोरी आमतौर पर बच्चों के लिए मान ली गई। हालांकि बाद में एकाद फिल्मों में लोरी सुनाई तो दी, लेकिन वे उतनी लोकप्रियता नहीं हासिल कर पाई जितनी की पहले की लोरियों ने हासिल की थी।

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aman on 22 January, 2010 22:55;07
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बहुत ही सही बात लिखी. मेरे ख्याल में आज की फिल्मों में जीवन के उस पहलु का आभाव है जिसमें बच्चे को या किसी और किरदार को सोता हुआ दिखाया जा सके...ना सोने वाले रहे और ना ही सोते हुए को निहारने वाले - चौहदवीं का चाँद जैसे गीत अब कौन रचेगा?
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amit kumar shkukla on 23 January, 2010 23:45;31
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Sanjai je modern time hai kiske pass time hai. 1991 ke bad se he adhunikta ka effect hamare society par pada. Mahila ke adhikaron ke baat, reservation ke baat, jor shor se hone lage. Phir usakke baad nuclear family ke baat, usake fayade aur jude hue sabhe sarokar bhee samane anee lage. Money, money and every thing is money ke baat sabake jaban par aane lage.
Money pane ke Willingness ne logo ke beech ke doore ko badha diya. Kya hua Sanjai jee, abhe to loriyan he bhule hai. Sath he bahut kuch bhula diya.Hamne CHAND ko Nahe dekha, ASSMAN ko nihara nahe, baccho ke pyar ko Money se compare kar diya.Abhe bahut kuch sochana bake hai. Kam se kam apne utaya to sahe.
Apka bahut bahut SHUKRIYA jo is Topik ko uthaya.
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image संजय स्वदेश किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं। sanjayinmedia@rediffmail.com
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