सूचना न देने का अधिकार
प्राईस वाटरहाऊस कूपर्स एक रिपोर्ट तैयार कर रही है. रिपोर्ट का केन्द्रीय विषय है कि सूचना के अधिकार के "दुरूपयोग" को कैसे रोका जाए. देशभर में सूचना के अधिकार का उपयोग करके
सफलता की कहानियां कहनेवाले लोग कहते हैं कि अभी तो इस कानून को आंशिक तौर पर भी इस्तेमाल नहीं किया गया है. उनकी वे जानें. लेकिन सरकार यह मानने लगी है कि इस कानून का दुरूपयोग शुरू हो चुका है. इसलिए अब इस पर रोक लगाने की तैयारी है. कार्मिक मंत्रालय ने विदेशी सलाहकार कंपनी प्राईस वाटरहाउस कूपर्स (पीडब्लूसी) को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वे यह बताएं कि सूचना के अधिकार कानून का दुरूपयोग कैसे रोका जा सकता है. देशभर में सूचना के अधिकार का उपयोग करके सफलता की कहानियां कहनेवाले लोग कहते हैं कि अभी तो इस कानून को आंशिक तौर पर भी इस्तेमाल नहीं किया गया है. उनकी वे जानें. लेकिन सरकार यह मानने लगी है कि इस कानून का दुरूपयोग शुरू हो चुका है. इसलिए अब इस पर रोक लगाने की तैयारी है. कार्मिक मंत्रालय ने विदेशी सलाहकार कंपनी प्राईस वाटरहाउस कूपर्स (पीडब्लूसी) को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वे यह बताएं कि सूचना के अधिकार कानून का दुरूपयोग कैसे रोका जा सकता है.
और बातों के अलावा सबसे पहले यह जानते हैं कि पीडब्लूसी को ही यह काम क्यों सौंपा गया? सामान्य अर्थों में देखें तो कह सकते हैं कि सरकार को इस मसले पर सलाह लेनी थी इसलिए उसने किसी सलाहकार कंपनी को यह काम सौंप दिया. लेकिन बात इतनी सामान्य भी नहीं है. पीडब्लूसी इस बात के लिए बदनाम है कि वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विश्वबैंक के लिए दुनियाभर में रास्ता बनाने का काम करती है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण है 2005 में दिल्ली में पानी के निजीकरण पर उठा विवाद. पीडब्ल्यूसी का कहना था कि दिल्ली में पानी को निजी हाथों में सौंप देना चाहिए. जब प्राईसवाटरहाउस कूपर्स दिल्ली सरकार को यह सुझाव दे रहा था तब तक देश में सूचना का अधिकार जनता को दिया जा चुका था. उसी अधिकार के तहत कुछ लोगों ने पता किया कि आखिर इस तरह के विचार के मूल में कौन है. पता चला कि भारतीय नौकरशाही ने विश्वबैंक के इशारे पर पीडब्लूसी को यह काम सौंपा था. अगर ऐसा हो जाता तो पानी की बड़ी अमरीकी कंपनियों को यह ठेका मिलता और दिल्ली में पानी के हालात क्या होते, कह नहीं सकते. सूचना के अधिकार पर लगातार काम कर रहे अरविंद केजरीवाल कहते हैं" अगर जनता के पास सूचना का अधिकार न होता तो दिल्ली का पानी कब का अमरीकी कंपनी के हाथों गिरवी हो चुका होता."
प्राईस वाटरहाउस कूपर्स के सुझावः (1) सूचना के अधिकार अधिनियम में संशोधन करके वर्तमान शुल्क 10 रूपये को बढ़ाकर 100 रूपये कर दिया जाए. (2) एक आवेदन पर एक ही सवाल पूछा जाए. (3)गलत सवाल करनेवालों पर जुर्माना लगाया जाए. (4)गलत और गुमराह सवाल करनेवालों के विरूद्ध जांच और कार्रवाई का प्रावधना हो. (5)आवेदक यह स्पष्ट करे कि वह कोई सवाल क्यों पूछ रहा है. (6)समाजसेवक और मध्यमवर्ग को लोगों को सीमित सवाल करने की अनुमति हो. अब यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि पीडब्ल्यूसी सूचना के अधिकार की समीक्षा क्यों करना चाहता है.
यह पहली बार है कि जब सरकार किसी कानून की समीक्षा निजी (विदेशी) सलाहकार कंपनी से करवा रही है. 21 जून 2005 को अधिसूचित इस कानून में खामियों से ज्यादा खूबियां हैं और पहली बार जनता अपने हाथ में ताकतवर लगाम पाने का अहसास कर रही है. यह बात दीगर है कि जनता के लिए इतने उपयोगी कानून को प्रचारित करने के लिए केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक ने धेला खर्च नहीं किया है. बड़ी हीला-हवाली और अनमने तरीके से हर मंत्रालय और विभाग में एक सूचना देनेवाला अफसर जरूर नियुक्त हुआ है लेकिन वह सूचना देने से ज्यादा सूचना न देने के तरीकों में माहिर होता है. लोगों को शायद ही पता हो कि किस विभाग में कौन सा जन सूचना अधिकारी काम कर रहा है. ज्यादातर मामलों में आज भी प्रार्थनापत्र भरने के लिए धक्के खाने पड़ते है. कई मामलों में तो आवेदकों को धमका कर भगा दिया जाता है. कुछ मामले ऐसे भी प्रकाश में आये हैं जब सूचना मांगनेवाले व्यक्ति को प्रताड़ित भी किया गया है.
कहने को तो प्रावधान है कि सूचना न देने पर सूचना आयुक्त जिम्मेदार अधिकारियों पर जुर्माना लगा सकते हैं लेकिन यह भी शायद ही होता हो. अफसर की अफसरी बनी हुई है. इसी अफसरी को और पुख्ता करने के लिए भारतीय नौकरशाहों ने यह माहौल बना लिया है कि सूचना के अधिकार का दुरूपयोग हो रहा है. जबकि तीन साल के कामकाज की समीक्षा और इसकी सफलता के बारे में लोगों को बताने की जरूरत थी जिससे लोगों में आत्मविश्वास बढ़ता और वे इस कानून का बढ़-चढ़कर उपयोग करते. लेकिन सरकार ने बड़ी चालाकी से इस कानून की समीक्षा एक ऐसी कंपनी को दे दिया है जो पहले ही अमरीकी कंपनियों के लिए लाबिंग करने के लिए बदनाम है. पीडब्लूसी में सलाहकार के तौर पर काम कर रहे देवाशीष खतवानी इस बात की पुष्टि करते हैं कि "जो सुझाव दिये गये हैं वह जनसूचना अधिकारियों द्वारा दिये गये हैं." यानी साफ है कि अधिकारी नहीं चाहते कि जनता के हाथ में कोई हथियार हो जिससे वे भ्रष्ट नौकरशाही पर प्रहार कर सके. बहलहाल सूचना के अधिकार का पर कतरने के लिए पीडब्ल्यूसी का काम जारी है. उसके सुझावों को देखें तो साफ हो जाता है कि सूचना का अधिकार जल्द ही एक लूला-लंगड़ा कानून हो जाएगा जो सूचना न देने और अधिकारियों की दादागिरी साबित करनेवाला औजार बनकर रह जाएगा.
(सुशील राघव पत्रकार और सूचना अधिकार के कार्यकर्ता हैं)
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