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वर्धा विश्वविद्यालय का संकट

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पिछले कुछ दिनों से महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ख़बर कुछ ब्लॉग-वेबसाइटों पर सुर्खियां बटोरने का काम कर रही हैं। ख़बर पर लोग अपनी क्रिया-प्रतिक्रिया भी दे रहे है, ब्लॉग के माध्यम से अनिल चमड़िया व उनके साथीगण अपनी भड़ास निकालने की पूरी कोिशश में लग हुए हैं।

उन्होनें तो कुलपति महोदय पर ही इंजाम लगाया कि वो मेरे पीछे पड़े हैं। कहीं आप विश्व सुन्दरी या किसी पार्टी के जाने माने नेता या फिर चोर तो नहीं, जो वीएन राय उनके पीछे पड़े हैं। अनिल चमड़िया के पीछे पड़े रहने के अलावा शायद उनके पास और कोई काम नहीं है, चमड़िया जी को यह अवश्य ज्ञात होगा कि उनको विश्वविद्यालय में कुलपति महोदय ही लेकर आए थे, जब विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में अध्यापकों का अभाव था और उन्होने इस आस से उनकी नियुक्ति भी की थी कि वे छात्र-छात्राओं को पत्रकारिता के गुण सिखाएंगे, पर हुआ कुछ अलग। चमड़ियाजी अपनी कमेटी बनाते रहे, छात्रों को प्रशासन के खिलाफ भड़काने का काम करते रहे। उनके कुछ छात्र तो इतने अच्छे हैं जो कुलपति, प्रति-कुलपति, विभागाध्यक्ष, िशक्षकगण को गाली देने से भी नहीं चूकते। ये बात सभी के संज्ञान में है, पर कहने वाला कोई नहीं? शायद यही िशक्षा आपने छात्रों को दी है, दे भी रहे हैं कि अपने से बड़ों को गाली दें, उनका अनादर करें। बहुत अच्छा पाठ पढ़ाया है आपने।

अनिल चमड़िया जिस प्रकार का आरोप लगा रहे हैं, यदि उन पर गौर फरमाया जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी होने में जरा-सी देर भी नहीं लगेगी। आप वीएन राय पर आरोप लगा रहे हैं कि स्वजातीय लोगों की बातों में आकर आपकी नियुक्ति को निरस्त किया है। यदि ऐसा ही है तो आप इतने माह इस विश्वविद्यालय में कैसे और किस आधार पर टिके रहे? यदि जातिगत ही मामला है तो विश्वविद्यालय में आपको भी पता होगा कि दलित छात्रों की संख्या कितनी है। जहां तक पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग दोनों से तो ज्यादा है। और तो और कुछ विभाग तो ऐसे भी हैं जहां सामान्य वर्ग का एक भी छात्र नहीं है, तो इसको आप क्या कहेंगे- दलितवादी निर्णय? आप तो यहां तक भी कहते हैं कि यहां पढ़ रहे लड़कों के दबाव में आकर वीसी ने आपकी नियुक्ति की थी, कहीं ऐसा सुना है कि किसी विश्वविद्यालय के छात्रों के दबाव में आकर किसी की नियुक्ति हुई हो। तब तो छात्र यदि चाहेगें कि किसी आठ पास या पांचवी फेल को टीचर बना दिया जाए तो क्या वो टीचर बन जाएगा, चाहे उसने सम्बंधित फील्ड में कांट्रीव्यूशन क्यों न किया हो। विश्वविद्यालय में कर्मचारियों की नियुक्ति उसकी योग्यता के आधार पर वीसी या सम्बंधित प्रािधकारी तो नियुक्त कर सकते हैं, पर किसी प्रोफेसर/रीडर/लैक्चरर को नियुक्ति नहीं कर सकते। जब तक वह टीचर बनने की पूर्ण योग्यता नहीं रखता?

यदि आपको लगाता है कि आपको बिना डिग्री के आधार पर प्रोफेसर बनाये जाने चाहिए तो अपने मित्र और साथीगण जो अभी एम.ए. कर रहे हैं या फिर एम.फिल/पी-एचडी कर रहे हैं, उनको भी सलाह दें कि वे पढ़ाई छोड़ दें, तब भी वे प्रोफेसर बन जाएगें?? मेरा यहां दो बार? लगाने का तात्पर्य केवल इतना है कि सभी लोगों को पढ़ाई छोड़ देनी चाहिए । इसमें मैं भी शामिल हूं, क्योंकि मैंने भी बी.कॉम पास किया है, मुझे भी पी-एचडी नहीं करनी चाहिए क्योंकि पी-एचडी में पूरे-पूरे दो तीन साल के बाद, तब भी संभावना ही है कि टीचर बनूगां या नहीं, पर आप तो बिना डिग्री के पैमाना पूरा कर रहे हैं। रही बात अपनी बसी-बसाई गृहस्थी छोड़कर पराए शहर में आने की, यह तो धन का मोह ही है जब पैसे के खातिर इंसान अपना जिस्म, हत्या, चोरी-डकैती-लूटपाट, यहां तक की अपने मां-बाप को भी बेच देता है, तब आपनी बसी-बसाई घर-गृहस्थी को छोड़कर आना कौन सी बड़ी बात है।

जिस एक्जीक्यूटिव कमेटी (ईसी) की बात आप कहे रहे हैं, उसमें 18 सदस्य हैं और केवल 8 सदस्यों ने वीसी के कहने पर आपको निकाल दिया। यानि आपके कहने का मतलब यह भी है कि ईसी में जितने भी सदस्य हैं वो नासमझ/अज्ञानी हैं। सारा ज्ञान आप में कूट-कूटकर भरा हुआ है। आपका तो यहां तक कहना है कि  वीएन राय के कामकाज के तरीके के कारण विश्णु नागर ने ईसी से इस्तीफा दे दिया है, इसका तात्पर्य यह है कि कुलपति महोदय को आप से सीखना पडे़गा कि किस प्रकार काम किया जाता है तब तो वीएन राय जी को प्रोफेसर न बनाकर आपको अपनी जगह कुलपति बनाना चाहिए? रही बात विष्णु नागर जी के इस्तीफे की तो किस कारण से उन्होंने इसी से इस्तीफा दिया। ये तो उन से अच्छा और कोई नहीं बता सकता? विश्वविद्यालय में जिस प्रकार की गतिविधियां इस समय चल रही हैं, यदि प्रशासन ने जल्द ही कोई उचित कदम नहीं उठाए तो विश्वविद्यालय की गरिमा को धूमिल होने से कोई नहीं बचा सकता।

(वर्धा हिन्दी विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा लिखा गया.)

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sohrab on 04 February, 2010 12:30;24
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अच्छा है आप सही बातों को सामने लाने का प्रयास कर रहे है.यह अविनाश और यशवंतजी जैसे लोग तो वेब पत्रकारिता के नाम से घिनौना खेल खेल रहे हैं.
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sadhak ummed singh baid on 04 February, 2010 16:46;40
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खेल घिनौना पैसे का, यही दर्द है मूल.
शिक्षा और संस्कार सब, इसके आगे धूल.
इसके आगे धूल, फ़ांकते कई गुणी जन.
खुद विवाद में फ़ंसते जाते सभी गुणी जन.
कह साधक कोई विकल्प सोचो इस पैसे का!
दर्द सभी का मूल, घिनौना खेल पैसे का.!
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jagruk on 05 February, 2010 11:55;35
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aap ne sach samne lakar avinash jaise logo ko karara jawab diya hai jo ek tarfa patrakarita karte hai aap ka karya sarahniy hai aap ne sach samne lakar dikha diya ki aaj bhi sachhei patrakarita jinda hai aap ko salam
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चौबे कहो या छब्बे क्या फर्क पड़ता है on 05 February, 2010 12:41;53
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मैं इस पोस्ट के माध्यम से आपलोगों ( विस्फोट के पाठकों और विस्फोट ) को अविनाश और मोहल्ला की हकीकत बता रहा हूँ | मुझे ऐसा करने की जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि लगातार एक ही व्यक्ति पर मोहल्ला के केन्द्रित होने पर मुझे मोहल्ला के विश्वसनीयता पर शक हुआ और उस विश्वसनीयता को परखने की जरूरत महसूस हुई, जो आप सभी के सामने है |
अरे भाई अविनाशजी और मोहल्ला की विश्वशनीयता का पता इसी से चलता है कि मैंने चौबे जी के नाम पर गलत फोन करके अविनाश को यह बताया कि - अनिल चमड़‍िया के बारे में उन्‍होंने कहीं कोई बयान नहीं दिया है | इसी आधार पर मोहल्ला ने चौबे जी का खन्डन छाप दिया कि - वेबसाइट ने झूठ छापा, कृपा ने कहीं कोई बयान नहीं दिया|
इसकी तहकिकात करने की जरुरत भी नहीं समझी की फोन चौबेजी की थी या छब्बेजी की | जब मैं चौबेजी से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने बताया - मैं कैसे कह सकता हूँ कि अनिल चमड़िया शराब नही पीते | मैं कोई अकेला व्यक्ति तो हूँ नहीं जो इस सच को जानता हूँ कि वह शराब पीते हैं |वह खुद भी इस सच को स्विकार चुके हैं कि वह शराब पिते हैं जिसके लिए कुलपति मुझे मना करते हैं | अब आपलोग खुद समझ सकते हैं कि अविनाश अपने पोर्टल का इस्तेमाल कैसी घिनौनी राजनीति के लिए कर रहे हैं |
दोस्तों जरूरत है हमें अविनाश जैसे घटिया राजनीति करने वालों का विरोध करने और विस्फोट जैसे निष्पक्ष वेबसाइट का उत्साहवर्धन करने की|
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सार्थक on 05 February, 2010 13:16;16
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अरे यह अविनाश सिर्फ अनिल चमड़िया पर ही क्यों लिख रहा है - जैसे अनिल चमड़िया इसके पुरोधा लगते हों | अपने बलात्कारी होने के बारे में क्यों नहीं लिखता ? जो आरोप उस पर भोपाल में लगे थे और संजय तिवारी भी इस बारे में विस्फोट पर लिख चुके हैं | शायद इसी कारण भोपाल की अच्छी-खासी नौकरी भी उसे गवानी पड़ी थी | अरे भोपाल की घटना के आधार पर तो यही कहेंगे कि अविनाश आदमी के खाल में छिपा भेड़िया है और जो जैसा होता है उसे वैसे ही लोग पसंद आते हैं तथा वैसे ही लोगों की तरफदारी करता है | यह चमड़िया और अविनाश एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं | अरे यह अविनाश सिर्फ अनिल चमड़िया पर ही क्यों लिख रहा है - जैसे अनिल चमड़िया इसके पुरोधा लगते हों | अपने बलात्कारी होने के बारे में क्यों नहीं लिखता ? जो आरोप उस पर भोपाल में लगे थे और संजय तिवारी भी इस बारे में विस्फोट पर लिख चुके हैं | शायद इसी कारण भोपाल की अच्छी-खासी नौकरी भी उसे गवानी पड़ी थी | अरे भोपाल की घटना के आधार पर तो यही कहेंगे कि अविनाश आदमी के खाल में छिपा भेड़िया है और जो जैसा होता है उसे वैसे ही लोग पसंद आते हैं तथा वैसे ही लोगों की तरफदारी करता है | यह चमड़िया और अविनाश एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं|
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Jitendra puskar on 05 February, 2010 13:32;11
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portal aur blog par hakikat likhne ke liye thankx. Chamadiya ki gandi rajniti hi ghoshit karti hai ki wo kis layak hain. Ph-D entrance ki gadbadi ka Mastermind wo aadmi, Blacklisted hone par bhi Besharmi ki tarah gutbazi karne ke kam karta rha. Padhaya kya hai ek bar nishpach ladko se puchne ka sahas tak nahi hai Chamadiya mein.
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यह भी जान लिजिए on 05 February, 2010 20:16;42
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अरे जब अविनाश के चरित्र की बात निकल ही पड़ी है तो कोई इनके चरित्र के बारे में पी.पी.सिंह(माखन लाल चतुरबेदी पत्रकारिता महाविद्यालय) जी से जाकर पुछ ले,जिनके छात्रा के साथ इसने ऐसी घिनौनी हरकत(बलात्कार) की थी. अविनाश उस कतार का ही ऐसा चेहरा है जो बलात्कार और यौनशोषण को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं.पहले यौनशोषण किया अब विभूति नारायण राय को और प्रो.अनिल अंकित राय ब्लैकमेलिंग की कोशिश कर रहा है.
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poora padhe on 08 February, 2010 17:20;12
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मित्रों यहां जब अविनाश और यशवंत जैसे लोगों पर पाठक-प्रतिक्रियाओं के साथ छेड़छाड़ किए जाने के आरोप लग ही चुके हैं तो यहां प्रस्तुत है इन दोनों के साथ - साथ जनतंत्र तथा अन्य वेब-ब्लॉग के मोडरेटरों द्वारा मोडरेटरेट किए कुछ प्रतिक्रिया, जो सिर्फ नमूना है, जिसे मोडरेटरेट कर प्रतिक्रिया और खबर दोनों को एकतरफा बना दिया जाता है, ये सभी प्रतिक्रिया मैंने चमड़िया जी से जोड़कर चलाए जा रहे प्रकरण के बीच ही इकट्ठे किए हैं, जो शाम को तो दिखते थे पर सुबह गायब रहते थे, कुछ तो घंटे भर भी नहीं रह पाते थे . शुरू-शुरू में यह मेरे लिए बहुत आश्चर्यजनक था, फिर मैं इन प्रतिक्रियाओं को यही सोच कर इकट्ठा करने लगा कि वेब-ब्लॉग के निष्पक्षता के विरूद्ध लिखने के काम आएगा | चलिए यहां प्रतिक्रिया के रूप में ही सही, किसी के द्वारा लिखी गई प्रतिक्रिया लोगों के सामने तो आ रही हैं . मेरे द्वारा इकट्ठे किए गए सभी प्रतिक्रियायें निम्नलिखित हैं -
written by Ramesh Parashar, January 30, 2010
अनिल चमड़िया का ये कहना कि वे दलित हैं, 100 फीसदी झूठ है। श्री चमड़िया पत्रकारिता में मौका पाने के लिए स्वयं को दलित कहते हैं। इनका तथाकथित दलित प्रेम भी एक स्वांग है क्योंकि अनिल जी और इनके परिवार को दलितों से कोई लेनादेना नहीं है। अनिल चमड़िया न जाति से और न कर्म से दलित हैं। बल्कि वे जाति से मारवाड़ी बनिया और बड़े व्यवसायी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इनकी शिक्षा सासाराम में ही हुई है। अत: हर व्यक्ति इनके बारे में अच्छी तरह जानता है। इनका विवाह सासाराम शहर के बड़े वैश्य परिवार गिरीश चन्द्र जायसवाल की बेटी से हुआ है। जिनका शहर में दर्जनों मकान, मार्केट और व्यापार है। अन्य भाइयों और बहन की शादियां भी बड़े मारवाड़ी व्यापारी परिवार में हुई है। इनके परिवार के किसी भी दूर के रिश्तेदार का भी वैवाहिक सम्बंध किसी दलित परिवार से नहीं है। अनिल चमड़िया और उनके परिवार का एक संक्षिप्त परिचय-
अनिल चमड़िया, पिता स्व. राम गोपाल चमड़िया, निवासी -हरे कृष्ण कॉलोनी, कंपनी सराय, थाना- सासाराम, जिला-रोहतास, बिहार, अपने पांच भाई और एक बहन में सबसे बड़े हैं। इनके अन्य भाइयों का नाम सुनील चमड़िया पेशे से चार्टर्ड एकाउटेंट, आलोक चमड़िया और अमित चमड़िया पेशे से पत्रकार और अशोक चमड़िया पारिवारिक गल्ले के व्यवसाय में हैं। बहन प्रीती चमड़िया का विवाह हो गया है। इनके परिवार का लगभग 30-35 वर्षों से गल्ला के थोक दलाली का व्यवसाय है, जिसे पूर्व में इनके पिता और अब भाई संचालित करते हैं। ये लोग मूलत: मध्य प्रदेश के सागर शहर के निवासी हैं। जो बाद में व्यवसाय हेतु सासाराम आ गए थे। इनका परिवार सासाराम शहर के बड़े व्यवसायी मारवाड़ी परिवारों में शुमार होता है। अनिल चमड़िया के चचेरे चाचा श्री मनोहर लाल जी अपने ननिहाल के धन पर सागर से सासाराम आए। यहां आकर इन्होने अपनी सरनेम चमड़िया की जगह पोद्दार लिखना शुरू कर दिया, क्योंकि इनके ननिहाल का उपनाम पोद्दार था। मनोहर लाल जी चूंकि अपने ननिहाल के घर पर आए तो इन्होंने अपना उपनाम पोद्दार रख लिया। परन्तु अनिल चमड़िया के पिता ने अपना मूल मारवाड़ी उपनाम चमड़िया बरकरार रखा। जो आज तक चला आ रहा है। श्री अनिल चमड़िया के दादा का नाम महावीर प्रसाद चमड़िया था, जो म.प्र. के सागर शहर में व्यवसाय करते थे। बाद में सासाराम आने से पहले इनके पिता और चाचा ने वहां की संपति बेच दी। आज श्री चमड़िया के परिवार के पास शहर और उसके आसपास करोड़ों का व्यवसाय पत्रकारिता के धौंस पर बखूबी चलता है। इनके और इनके भाइयों के पत्रकारिता की धौंस हमेशा इन लोगों के व्यवसायिक हितों के काम आई है।
चमड़िया के सरनेम वाले श्री सीताराम चमड़िया कांग्रेस के जमाने में बिहार सरकार के मन्त्री हुआ करते थे। जो मारवाड़ी बनिया थे। अनिल जी शायद देश के पहले स्वघोषित दलित हैं, जिन्होंने दलित जुमले का इस्तेमाल अपने पत्रकारिता के करियर को चमकाने में किया है। लेकिन श्री चमड़िया पहले शख्स होंगे, जो गैर दलित होते हुए दलित के नाम पर सहानुभूति लेते हैं। मैं पत्रकारिता जगत से जुड़ा हुआ इनके तहसील का ही निवासी हूं। इसलिए इनसे जुड़ी हुई सारी जानकारी आप लोगों के सामने रख रहा हूं। इनके दलित होने और दलित प्रेम का खुलासा करना अभी बड़ा मौजूं था क्योंकि मैं भी बेसब्री से इस वक्त का इन्तजार कर रहा था। आशा है आपको यह तहकीकात अच्छी लगेगी।
रमेश पराशर
पत्रकार
rameshp125@rediffmail.comrameshp125@rediffmail.com


bebak:

भारतीय ब्लॉगिंग दुनिया के समस्त ब्लॉगरों से एक स्वतंत्र पत्रकार एवं नियमित ब्लॉग पाठक का विनम्र अपील-
संचार की नई विधा ब्लॉग अपनी बात कहने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है, परन्तु कुछ कुंठित ब्लॉगरों के कारण आज ब्लॉग व्यक्तिगत कुंठा निकालने का माध्यम बन कर रह गया है | अविनाश (मोहल्ला) एवं यशवंत (भड़ास 4 मीडिया) जैसे कुंठित
ब्लॉगर महज सस्ती लोकप्रियता हेतु इसका प्रयोग कर रहे हैं |बिना तथ्य खोजे अपने ब्लॉग या वेबसाइट पर खबरों को छापना उतना ही बड़ा अपराध है जितना कि बिना गवाही के सजा सुनाना | भाई अविनाश को मैं वर्षों से जानता हूँ - प्रभात खबर के जमाने से | उनकी अब तो आदत बन चुकी है गलत और अधुरी खबरों को अपने ब्लॉग पर पोस्ट करना | और, हो भी क्यूं न, भाई का ब्लॉग जाना भी इसीलिए जाता है|

कल कुछ ब्लॉगर मित्रों से बात चल रही थी कि अविनाश आलोचना सुनने की ताकत नहीं है, तभी तो अपनी व्यकतिगत कुंठा से प्रभावित खबरों पर आने वाली 'कटु प्रतिक्रिया' को मौडेरेट कर देता है | अविनाश जैसे लोग जिस तरह से ब्लॉग विधा का इस्तेमाल कर रहे हैं, निश्चय ही वह दिन दूर नहीं जब ब्लॉग पर भी 'कंटेंट कोड' लगाने की आवश्यकता पड़े | अतः तमाम वेब पत्रकारों से अपील है कि इस तरह की कुंठित मानसिकता वाले ब्लॉगरों तथा मोडरेटरों का बहिष्कार करें, तभी जाकर आम पाठकों का ब्लॉग या वेबसाइट आधारित खबरों पर विश्वास होगा |
मित्रों एक पुरानी कहावत से हम सभी तो अवगत हैं ही –
'एक सड़ी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है', उसी तरह अविनाश जैसे लोग इस पूरी विधा को गंदा कर रहे हैं |

डा.गोविन्द said...
इस लेख के लेखक जो कथादेश के मीडिया अंक के संपादक हैं इनकी कूपमंडूकता का सही चेहरा किसी से छुपा नहीं है.जिसके बारे में अनंत विजय साहब ने अपने ब्लौग पर लिखा है.जिसका लिंक है-
http://haahaakar.blogspot.com/
साथ में इस महोदय के चरित्र के बारे में कुछ मैं यहां बता दे रहा हूं.कथादेश के मीडिया अंक के अतिथि संपादक महोदय ने इस अंक में रद्दी के तरह के अपने कई लेख तो छापे ही हैं,साथ में अपने साथ शराब पीने वाले उन छात्रों का लेख भी छापा है जिनका ज्ञान दो कौड़ी के लाएक भी नहीं.उनके विश्वविद्यालय के सूत्रों के अनुसार-चूंकि विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या कम थी इसलिए उन्हें किसी तरह एम.ए.की परीक्षा में पास कर दिया गया,वे वैसे छात्रों को लेखक बनाने में जुटे हैं जिनका एम.फिल. में दाखिला भी प्रो.इलिना सेन की कृपा से हुआ.यह इलिना सेन हैं जो शायद उस विश्वविद्यालय को ढोंगी कम्युनिस्टों से भरने का जिम्मा उठाई थीं,जिन्होंने अपने ढोंगी कम्युनिस्ट छात्रों को,जो लिखित में 36 नम्बर पाए थे उन्हें 95 नम्बर देकर दाखिला दिलाया और फिर ढोंगी कम्युनिस्टों के लिय पी-एच.डी. का रास्ता भी खोल दिया. दिल्ली के हमारे मीडिया मित्रों को पता ही है कि अनिल चमड़िया जो खुद ढोंगी हैं,के ये प्रिय छात्र जिन्हें वे लेखक बनाने की कोशिश किए हैं उनका दाखिला पी-एच.डी.में कैसे हुआ ये किस्सा भी कम दिलचस्प नहीं.इसलिये इन महान लेखकों का पोल खोलने की कोशिश करें,अगर इन महान लेखकों के चरित्र को खंगालने के बाद इनके कचड़े लेखों पर प्रकाश डालना चाहें तो या आपके कोई और पाठक इन दो कौड़ी के लेखकों के बारे में और इस कथादेश के अतिथि संपादक के चरित्र के बारे में जानना चाहें तो इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं-
http://voiceofmedia.com/vom_voice
यहां अतिथि संपादक अनिल चमड़िया के प्रिय मगर नालायक और नाकाबिल छात्र,जो इस अंक में लेखक भी हैं(भले ही हाथी,घोड़े पर चार लाईन लिखने की काबिलियत भी ना रखते हों)को उस विश्वविद्यालय में बनाए रखने के लिए जहां वे किसी तरह शिक्षक बन गए हैं,किस तरह का जोड़-तोड़ किया गया और कैसे प्रतिकुलपति ने कुलपति के अनुपस्थित होने का फायदा उठा कर(कुलपति उस समय विदेश यात्रा पर थे) उस जोड़तोड़ की अगुआई की और अनिल चमड़िया के कहे अनुसार उनके प्यारे लेखक-छात्रों को हर हथकंडा अपनाते हुए पी-एच.डी.प्रवेश परीक्षा में उतीर्ण करवाया.जिसे लेकर बेवजह वहां के कुलपति महोदय की भी बदनामी हुई.विश्वविद्यालय सूत्र यह भी बताते हैं कि वैसे इसकी कोशिश पूर्व में हुए पी-एच.डी.प्रवेश परीक्षा,जिसमें चमड़ियाजी खुद विषेशज्ञ के रुप मे बैथे थे में भी चमड़ियाजी ने किया था,जिसका रिजल्ट कुलपति द्वारा कैंसिल कर दिया गया था.पर प्रतिकुलपति ने अपनी करनी से कुलपति के सारे किए-कराए पर पानी फेर दिया.मेरे ये सब लिखने का आशय इतना है कि अतिथि संपादक अनिल चमड़िया का वास्तविक चरित्र सामने आए और पता चले की कैसे-कैसों को लिखने का मौका अतिथि संपादक महोदय ने दिया है और खुद तथा लेखक-छात्रों से इसे मीडिया के हैण्डबुक के रुप में प्रचारित करवा रहे हैं.इसके सभी वे लेखक जो अतिथि संपादक के छात्र हैं मीडिया का एम तक नहीं जानते.बात इतनी तक रही होती तब भी ठीक था पर विश्ववस्त सूत्रों के अनुसार अपनी खोखली विद्वता दिखाने के लिए उन्होंने विश्वविविद्यालय में अपने पिटठूओं के माध्यम से कथादेश के इस अंक पर चर्चा का आयोजन भी करवाया.....

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written by rinkoo singh, January 30, 2010
anil chamadiya ki kundali ye sabit karne ke liye kafi hai ki dalit shabd ka kitna najayaj istemal kiya ja raha. anil ji se main ek baat puchna chahta hu ki mera ek bahut hi kabil dost hai accountency ki field me lekin wo keval b.com 3rd division hi pass. jis company me kam karta hai waha se hamesh prashasti patra pata rahta hai. wo iss field me 10 salo se hai. kya aap usko desh ke kisi college me commerce deptt. me accounts ka professor banwa sakte hain. nahi. to phir aap ko kyo professor banaya gaya tha.aapke dost kripa ji media teaching ke baare me badaavachan karte hain unko bhi iss per apni baat kahani chahiye.aap professor shayad iss liye banaye gaye ki jin naxlites ko desh ki sarkar atankvadi manti hai unhe aap bbc ka journalist bata kar class me introduce karwate the. khair ye kam to aap ke ghanishth mitra kripa shankar ji karne ke liye hain hai hi. aap ke baare me yahi kaha ja sakta hai ki MAAR PADI SHAMSHIRO KI TO MAHARAJ MAIN NAAI HOON.

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written by kanhaiya kumar, Guwahati, January 30, 2010
anil chamariya ka mahimamandan karne wale mere bhai. lagta hai ki app bhi chijo ko tor maror kar pesh karne mein mahir ho. apni galat bayani ka jariye hazaro student ki kismat se khilwar mat karo mere bhai. varna bhai vijay tumhare nam ki viprit log tumhare karm ke aadhar per parajay kahna shuru kar denge

• pragati said:
लगता है चामड़िया जी शौर्ट टर्म मेमोरी के शिकार हो गए है, प्रोफेशर पद से हटाए जाने के बाद अपनी पहली ही प्रतिक्रिया में लिखते हैं-मेरा दलित और दलितवादी होना भी वीएन राय को बुरा लगा. और इस लेख में लिखते हैं- “न किसी से जाति पूछता हूं, न किसी को जाति बताता हूं”. बताईए अपना ईलाज कराने के लिए कांके(रांची)जाएंगे या आगरा या गजनी के डा. से संपर्क किया जाए?
# 31 January 2010 at 6:49 pm

tota ram said:
are bahi jati kaise batyegel jab jati hi badl liye ho.
# 31 January 2010 at 6:52 pm
• bebak said:
इस लेखक महोदय
अनिल चामड़िया को मैं टीवी.-9 के जमाने से जानता हुँ और किस बड़े चैनल के दिग्गजों की बात आप कर रहे हैं?
टीवी.-9 में काम करने के समय भी उन्हे गंदी राजनीति और स्वहित के लिए दलित तथा दलितमुद्दों का दुरुपयोग करते देखा है.मुझे पुरा यकिन है कि वह लोगों को गुमराह करने के अलावे कुछ कर ही नहीं सकते|जिन शुरुआती दिनों की बात आप कर रहे हैं उन दिनों मैं उनका जुनियर था,बहुत अरमान लेकर मैं वहां ज्वाईन किया था कि चामड़िया जी से कुछ सिखुंगा,पर उनकी गंदी रजनीति से परेशान होकर चैनल मालिक ने चैनल ही बंद कर दिया|
उस सौदेबाजी में भी चामड़ियाजी ने बहुत कमाए पर हम जैसे मिडिया कर्मी जो सपने लेकर वहां गए और उनके बहकाबे में नहीं आए, उनकी आवाज वह कभी नहीं बने.
और जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल आप कर रहे हीं उससे स्पष्ट झलक रहा है कि आपको किस तरह की गंदी घुट्टी चामड़िया जी ने पिलाई है. अगर संभव है तो खुद को अभी भी बचा लिजिए.
# 30 January 2010 at 9:22 pm

bebak said:
आप दुसरों की लाईन छोटी कतने की क्यों सोचते हैं चामड़िया जी अपनी लाईन बड़ी कर लिजिए दुसरों की लाईन छोटी करने के चक्कर में तो आपकी लाईन ही मिटती जा रही है|
# 30 January 2010 at 9:29 pm

ritesh said:
चामड़ियाजी आपके अंदर जो कुंठा भरी है वह इतनी स्तरहीन होगी की विश्वविद्यालय छोड़ते ही सजातीय और विजातीय की बात करने लगेंगे ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था.वैसे तो दुसरे विभाग के शिक्षक होने के नाते मेरा आपसे मिलना-जुलना कम होता था पर आप इतने छिछले होंगे, ऐसा कभी सोचा भी नहीं था.खाशकर जब TBI के जमाने के आपके कारनामें जो अलग-अलग रुपों में आज तक जारी है, के बारे में पढा तो यही सोचने में आया कि अगर आपका जमीर तनिक भी खुद को शिक्षक मानता है या जब पहली बार ही आप शिक्षक बनना चाहे, उसी समय आपको एक चुल्लू पानी की तलाश करनी चाहिए थी, अब उस एक चुल्लू पानी में आपको क्या करना है यह बताने की जरुरत नहीं है.
# 30 January 2010 at 9:33 pm

vabhav said:
संज्ञान में आया है कि इस पूरे घटनाक्रम के पिछे उनके पूराने मित्र ‘चौबेजी’ हैं,जो शुरु से ही मौके की तलाश में थे,जैसा कि एक मानव स्वभाव माना जाता है कि अपनों-दोस्तों का आगे निकलना कुछ ज्यादा ही तकलिफदेह होता है,वैसे ही रिडर बने चौबे जी चामड़ियाजी का प्रो. बनना पचा नहीं पा रहे थे तथा मौका मिलते ही उनको विश्वविद्यलय से बाहर का रास्ता दिखलाने की कोशिश में लग गए और सुनने में आया है कि उनकी गिद्ध नजर तो उनकी पोस्ट पर अभी भी लगी है..
# 30 January 2010 at 9:36 pm

एक विश्वविद्यालय कर्मी said:
चुंकि मैं विश्वविद्यालय के लगभग प्रारम्भिक दौर से किसी न किसी रुप में जुड़ी हुई हूं,इसलिए विश्वविद्यालय को किसी ‘बक्से’ में बन्द करने,’वाद’ में संकुचित करने अथवा अनावश्यक विवाद खड़ा कर उसे बदनाम करने की साजिश रचने से बेहद आहत हूं.क्या अनिल चमड़िया इस बात की ओर गौर फरमाने की कोशिश करेंगे कि कक्षा में उनकी विषयगत अज्ञानता किसी भी छात्र से छुपी नहीं है और उनके गिने चुने शब्दों और उदाहरणों (जैसे-साधारण नमक कैसे आयोडिन नमक बना और जब मैं एक टेलीविजन चैनल में था तो मुझे कैसे ग्राहक के बदले कंज्यूमर लिखने के लिए कहा गया)को सुन-सुन कर छात़्रों के कान पक चुके हैं.जिसकी चर्चा करते उनके छात्र परिसर में इधर -उधर कहीं भी मिल जाते हैं.अब विषय की पढाई कर अपनी अज्ञानता कम कर खुद को अपडेट करने का उनके पास बेहतरीन मौका है, बेचारे अनिल चमड़िया मानसिक रुप से बिमार चल रहे हैं.इसलिए पहले अपनी बिमारी का इलाज करा लें जिससे उन्हे अपनी हकिकत का पता चल सके,संभव है उन्हें कभी अपनी गलती महसूस न हो और वह दूसरों पर ही किचड़ उछालते रहें और आप जैसे पत्रकार पत्रकारिता कम और इनकी चाटुकारिता अधिक करते रहें|पर अगर बिमारी ठिक हो जाए और अपनी गलतियों को महसूस कर सकें तो पहले एम.ए. कर लें,कहीं और से क्यों इसी विशवविद्यालय में आकर नमांकन करा लें|फिर प्रो. बनने का सोंचें|
# 30 January 2010 at 9:44 pm

एक विश्वविद्यालय कर्मी said:
शिखा चौधरी उर्फ चौबेजी, क्या करूं औरों को तो नहीं जानता पर ‘मैं’वर्तनी शोधक समिती में तो हूं नहीं. और, शायद आपको पता नहीं online typing की अपनी limitations होती है. सभी को आपकी तरह हिन्दी typing नहीं आती. आपका चरित्र भी कम संदेहास्पद नहीं है. विश्वविद्यालय में तो भिगी बिल्ली बने फिरते हैं पर चुपके से नाम बदल-बदल कर लेख/प्रतिक्रिया लिखने में भी लगे हुए हैं.वैसे चोर-चोर मौसेरे भाई होते ही हैं.लगे रहीए..
# 31 January 2010 at 6:44 pm
Ramesh Parashar said:
mr chamariaji lekh likhane se dunia nahi badalti. acharan se badalti hai .farji tarike se profesor banakar bina class liye 700000 wetan utha rahe the is par kabhi sharm nahi aai. 15 august ko jhandarohan me anupasthit hone ka jo gunah kiya, us par kabhi sochaa tha, aapko to turant usi smay terminet kar dena chahiye tha.aap to sukrira kahiye vc mahoday ka jo itne dino tak aapko maph karte rahe..
# 31 January 2010 at 7:01 pm
आनंद said:
कृपाशंकर चौबे पश्चिम बंगाल से अपनी “रिपोर्टों” में वहां के “दमित-शोषित और पीड़ित” जनता के दुखों को “सामने” लाने का “क्रांतिकारी” काम करते रहे हैं। क्या उन्हें वर्धा विश्वविद्यालय में हो रहा जातिवादी नंगा नाच नहीं दिखाई देता।
आवेश तिवारी के साथ बातचीत में वे कहते हैं कि वे पूरी तरह विभूतिनारायण सिंह के साथ है जिसने आरोप लगाया है कि अनिल चमड़िया छात्रों के साथ बैठ कर दारू पीते हैं।
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poora padhe-2 on 08 February, 2010 17:22;06
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विस्फोट पर छपे अपने वक्तव्य का खंडन नहीं करते और निजी रूप से मोहल्ला को कहते हैं कि वे पिछले पच्चीस सालों से अनिल चमड़िया के मित्र रहे हैं और वे जानते हैं कि अनिल चमड़िया शराब नहीं पीते।
अगर उनकी “बंगाल क्रांति” के नीचे जरा भी जमीर रहा हो, तो खुल कर सच के साथ आना चाहिए। पता चला है कि वे अब मोहल्ला को दिए गए बयान से पलट रहे हैं। खैर, पेंडुलमता और पर्दा के पार उनका चरित्र यही रहा है, इसलिए उनसे बहुत उम्मीद नहीं किया जाना चाहिए। वर्धा विश्वविद्यालय के दलित छात्र भी चौबे के सवर्णवादी बर्ताव की शिकायतें करते हैं।
# 3 February 2010 at 2:43 pm
aam admi said:
कृपाशंकर चौबे जी,
आप “क्रांति” करते-करते पलटबयानी की “पोलिटिक्स” भी करने लगे !
कोई बात नहीं. यह दौर ही कुछ ऐसा है कि ” मलाई” पलटबयानी की “पोलिटिक्स” से मिलती है, क्रांति से नहीं.
# 3 February 2010 at 4:34 pm
Sharad said...
चमाडिया जी जिन छात्रों को बेवकूफ़ बनाकर कम निकाल रहे है असल मे वे वैसे है नही. अस्तु अनिल मिस्र जो क्रन्तिकारी होने का दम्भ भरता है उसकि हैसियत प्यादे की है.एम फ़िल के लिखित परीक्षा मे ३६ नं और साकक्षातार मे ९० नं . यह है मानवाधिकार की लडाइ लड्ने वाले विनयक सेन कि पत्नी एलिना सेन का कमाल. यही नही अनुपस्थित क्षात्र को भी अंक दिया एलिना ने .पर क्म्युनिस्त कुल्पति ने दंड नही दिया. आपको बिना अर्हता के प्रोफ़ेसर बना दिया. ज्वाइन करते समय शर्म आइ कि नही. विवि मे क्लास नहि लेते पर दिल्ली मे जरूर क्लास लेने आयेंगे. शाबाश मिट्टी के शेर
अन्नू said...
प्रकाश जी,आपने एक कहावत सुनी होगी सड़े आम की संगत में बाकी आम भी सड़ जाते हैं.पर जब पेड़(अनिल चमड़िया) ही सड़ा हो तो उनसे निकले फल तो निश्चित ही सड़े होंगे.अब सड़े फल से अच्छे स्वाद की उम्मिद रखना तो हमारी बेवकुफी होगी ना....
अब गुरु अनिल चमड़िया जैसे शब्द सिखाएंगे उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल ना उनके प्रिय "यार-मित्र" करेंगे.अब आप सोचेंगे कि मैं "यार-मित्र" का प्रयोग किसलिए किया हूं तो.....
जब मिल बैठेंगे सब यार,हम तुम और बैगपाईपर....
अब आगे लिखने की जरुरत नहीं,आप सभी समझ गए होंगे,जब हम,तुम और बैगपाईपर तब छात्र कहना उचित नहीं,"यार-मित्र" कहना ज्यादा उचित है.अब नादानों को माफ भी कर दिजिए......
गुरुजी के साथ-साथ बेचारे को "यार-मित्र" कहिए या छात्र,यह भी नशे में हैं.
aam aadmi:
bebaak ji aap sahi kah rahe hai. is tarah ki kuntha na likhi jaye to achha hi hai.
par aap bhi bad me usi raste par chale gaye hai.
aap hi gabhir rahate .aap to sabakaa nam le rahe hai aur ek khas jati par aakraman theek nahi. koi ganda kam kar raha hai to karane de.kaun pochhata hai aisee chhijo ko.isase bloginging ka uddeshya poora nahi hoga
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ramesh parashar on 10 February, 2010 13:56;22
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pata nahi kaise kaise bevkuph log hain jo bina jane samjhe, anil chamadiya ko dalit bana rahe hain, are bhai logo apni jankari sudhar lo mai pahale hi uski puri history bata chuka huin ki vah dhongi dalit nahi suddh baniya hai,ise to bania samaj se bhi bahiskrit kar ,dhobo ka kutta na ghar ka na ghat ka bana dena chahiye.
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