पढ़ें तो तब जब पढ़ानेवाले हों
एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जे एस राजपूत मानते हैं कि भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है लेकिन वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों की कमी शिक्षा जगत के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है. दिल्ली सहित पूरा देश शिक्षकों की कमी झेल रहा है.
दिल्ली सरकार के स्कूलों में 5302 से अधिक अध्यापकों के पद खाली है। 216 प्राचार्य तथा 145 उप-प्राचार्य क पद भी रिक्त है। एक प्रकरण में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर चिन्ता व्यक्त की है। इसमें नया कुछ भी नही है। इसके कई दिन पहले एक छोटी सी खबर आई कि देहरादून में 22 स्कूल अध्यापकों की कमी के कारण बन्द कर दिये गये। खबरें इस सम्बन्ध में लगातार आती रहती है। 2009 में संसद में पारित शिक्षा के मूलभूत अधिकार अधिनियम को लागू करना बड़ी टेढ़ी खीर है। 12 लाख से अधिक अध्यापकों की अतिरिक्त नियुक्तियां करनी होगी। यहीं नहीं 7 लाख से अधिक अध्यापक देश के स्कूलों में पढ़ा रहे हैं जो वेतन के स्थान पर नाम मात्र का `मानदेय´ प्राप्त करते हें जिन्हें कभी भी निकाला जा सकता है। यह मानदेय नौकर शाही का वह नायाब नवाचार है जो नेताओं को सरकारी कोष पर बोझ घटाने का सबसे आसान जरिया नज़र आता है। सामान्य वेतन के स्थान पर अनिश्चितता की तलवार के नीचे काम करने वाले इन शिक्षा कर्मी/ गुरूजी/ मानद शिक्षक शिक्षा सहायक के पदनाम से जानेवाले यह `अध्यापक´ उत्तरदायित्व के नाम पर वह सब स्वीकार करने को बाध्य है जो नियमित अध्यापकों से अपेक्षित है। जो वातावरण इन परिस्थितियों में स्कूलों में निर्मित होता है उससे समाज परिचित है। इसके अन्तर्गत सबके लिये प्रारिम्भक शिक्षा के मूलभूत अधिकार का सपना निकट भविष्य में वास्तविकता में कैसे पूरा होगा इसका भावी परिदृश्य अनुमान से परे ही लगता है।
शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियां अनेक हैं और दिखाई देती हैं। 1950 में 20 प्रतिशत के लगभग की साक्षरता दर से प्रारम्भ होकर 68-70 के आसपास पहुंचना तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब यह ध्यान में रखा जाय कि इसी बीच अवादी तीन गुने से अधिक बढ़ी है। संख्या वृद्धि हर तरफ दिखाई जा सकती है। लेकिन गुणवत्ता में कमी तथा समान्य जन के मानस में `व्यवस्था´ की जो साख और स्वीकार्यता लगातार घटी है उसे किसी भी अवस्था में दरकिनार करना घातक होगा। 1950 के आसपास समाज के बड़े वर्ग को शिक्षा का महत्व समझाना दुरूह कार्य था। सामाजिक तथा परम्परागत कारणों तथा रूढीवादी विश्वासों की वजह से लड़कियों की बड़े संख्या शिक्षा से वंचित रह जाती थी। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। हर परिवार अब न केवल हर लड़के तथा लड़को को शिक्षा देना चाहता है वरन वह उन्हें अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा( जो कौशल भी सिखायें, दिलाने के लिये हर सम्भव प्रयास करने को उद्धत है। इस इच्छा को पूरा कर पाने की सामथ्र्य सरकारी व्यवस्था नहीं कर पा रही है और परिणामस्वरूप जो निजी व्यवस्था तेजी से पनपी है उसे एक प्रकार से मनमानी करने की खुली छूट मिल गई है। वह शिक्षा को उद्योग में बदल चुकी हैं जिसमें उसे निवेश करना है और जो उसे अधिक से अधिक ``डिवीडेंण्ट´´दे सकती है।
शिक्षा क्षेत्र आज ``सुनिश्चित लाभांश के लिये श्रेष्ठ सुरक्षित क्षेत्र´´ माना जाता है ``प्रायवेट इंगलिश मीडियम पब्लिक स्कूल´´! छोटे-छोटे गांवों में अंग्रेजी माध्यम से पढाने के वायदा करने वाले निजी स्कूल सरकारी स्कूलों पर भारी पड़ रहे हैं। स्रकारी स्कूलों की स्थिति की जिम्मेदारी निश्चित रूप से राज्य सरकारों की रही है और इसमें राजनीतिक बदलावों का कोई ज्यादा असर नहीं पड़ा है। असम, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल में 55 प्रतिशत से 30 प्रतिशत के बीच अप्रशिक्षित है स्कूल अध्यापक । इन राज्यों ने शिक्षक प्रशिक्षण को पूरी तरह नकार दिया तथा जो संस्थान पहले से उपलब्ध थे, अच्छा कार्य कर रहे थे उनमे प्राध्यापकों की नियमित न कर उन्हें निर्बल तथा प्रभावहीन बना दिया। एक तरफ देश में लाखों-करोड़ो युवा अध्यापक, तथा शिक्षक प्रशिक्षक बनने को तैयार हैं, दूसरी तरफ सरकारें अपने संस्थानों को नियमित ढंग चलाने को तैयार नहीं है। निजी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान इस स्थिति का पूर्ण फायदा उठा रहे हैं। राष्ट्रीय
अध्यापक शिक्षा परिषद (एन.सी.टी.ई) के हवाले से कहा गया है कि उसने 800 शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की मान्यता रद्द की है- यानी बड़ा प्रशंसनीय कार्य किया है। प्रश्न यह उठता है कि क्या इन्हें मान्यता देने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही हुई? क्या उन समितियों के सदस्यों को परिषद ने काली-सूची में डाला जिन्होंने इन संस्थानों की मान्यता के लिये वहां जाकर, निरीक्षण कर संस्तुति की थी? ऐसा न कुछ हुआ है और न होगा। यदि शिक्षक प्रशिक्षण का यह हाल है तो स्कूलों में गुणवत्ता का कया होगा- इसे समझ पाना या उसका अनुमान लगाना किसी के लिये कठिन नहीं होगा। केन्द्र सरकार की सुविचारित योजनायें तथा कार्यक्रम राज्यों में जाकर इस प्रकार के माहौल में प्राय: ही विखर जाते हैं।
अध्यापकों को नियुक्ति की प्रक्रियायें हर तरफ रूढ़िवादिता से ग्रस्ति है। जब भी बड़ी संख्या में अध्यापकों की नियुक्तियां किसी राज्य में होती हैं, अनियमितताओं को शिकायतें बड़ी संख्या में उठाई जाती है। सामान्य जन में इन प्रक्रियाओं के प्रति घेर अविश्वास है। यह लगभग हर जगह सूना जाता है कि अमुक राज्य में अमुक स्तर का अध्यापक बनने में कितने का `रेट´ चल रहा है। इस प्रकार की चर्चाये जब लगातर, दशकों तक चलती है तब लोगों को लगता है कि दाल में कुछ काला जरुर है। अनेक उदाहरणों घोटालों, तथा पुलिस के छापों में इनकी पुष्टि होती है। समस्या यह है कि स्थिति विश्वविद्यालयों तथा राष्ट्रीय स्तर के शैक्षिक संस्थानों के सर्वोच्च पदों पर होने वाली नियुक्तियों तक भी चिन्ताजक ही है। यहां भी सालों साल नियमित नियुक्तियां नहीं हो पाती है। नियुक्ति प्रक्रियाओं को केन्द्र तथा राज्यों के स्तर पर तुरन्त परिवर्तित कर समयानुकूल बनाना आवश्यक है।
यदि सरकारी स्कूल, विश्वविद्यालय तथा व्यवसायिक प्रशिक्षण संस्थान अध्यापकों/प्राध्यापकों की समुचित संख्या में नियुक्ति किये बिना कार्य कर सकते हैं तो निजी संस्थानो में विद्यार्थी-अध्यापक के अनुपात के नियम कैसे पालन कराये जा सकते है? यदि केन्द्रीय विद्यालय तथा नवोदय विद्यालयों में अध्यापकों की जगहें खाली रहती हैं तो अन्य को सरकारी नियामक गलत कैसे ठहरा सकते है? इस प्रकार की स्थिति को पटरी पर लाना हर स्तर पर आवश्यक है इस समय जब शिक्षा के मूलभूत अधिकार में हर बालक बालिका तक पहुंचाने का वायदा संसद ने देश से किया है, उसके सम्मान तथा क्रियान्वयन के लिये हर सम्भव प्रयास करना शिक्षा से जुड़े हर व्यक्ति तथा संस्थान का कर्तव्य है। इसके लिये वातावरण निर्माण करना सरकारों का उत्तरदायित्व है। सरकार की समस्या के अनेक पहलू है। जो लोग निजी शिक्षण संस्थायें चलाते समय सरकार, नियामक संस्थाओं तथा नयायालयों के निर्णयों को खुलेआम खिल्ली उड़ाते हैं वे ही उसकी नीति निर्धारक प्रक्रिया के प्रभावशाली अंग बन जाते हैं। सरकार के अपने स्कूलों के अध्यापकों, प्राध्यापकों को इस योग्य नहीं पाया जाता है।
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