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न्याय न मिलने का अन्याय

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भारत में न्याय प्रणाली पर आजादी के बाद से ही सवालिया निशान लगते रहे हैं. न्याय प्रणाली की परंपरागत पद्धतियों को गैर कानूनी घोषित करके खारिज तो कर दिया गया लेकिन ब्रिटिश उपनिवेश के आधार पर स्थापित की गयी न्याय प्रणाली को भी न्याय पाने के लिए ईमानदारी से लागू नहीं किया गया इसका परिणाम है कि देश में न्याय देनेवाली प्रणाली जनता को समय पर न्याय न देकर अन्याय कर रही है. सतीश सिंह का विश्लेषण-

न्याय मिलने में अगर देरी होती है तो वह न्याय नहीं मिलने के समान है। स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान स्वस्थ न्यायपालिका को माना जाता है, लेकिन हमारे देश की न्याय व्यवस्था इतनी लचर है कि दो-तीन पीढ़ियाँ गुजर जाती हैं, फिर भी उन्हें न्याय नहीं मिल पाता है। कायदे से बदतर हालत की जिम्मेदारी लेकर सरकार को शर्म से चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए, पर "चलता है" वाली मानसिकता उन पर पर हावी है। सरकार के सारे कल-पुर्जे बस खीसें निपोरने में ही मशगूल हैं।

हमारी लापरवाही और उदासीनता का ही नतीजा है कि आज की तारीख में सर्वोच्च न्यायलय में सैतालीस हजार याचिकाएँ लंबित हैं। उच्च न्यायलय भी इस बीमारी से अछूता नहीं है। वहाँ भी तीस लाख सत्तर हजार केस लंबित है। उसपर तुर्रा यह है कि इनमें से पाँच लाख तीस हजार याचिकाएँ तो दस सालों से लंबित हैं। निचली अदालतों में तो स्थिति और भी बेकाबू है। वहाँ तो लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में है। बजट का मौसम आया और चला भी गया, किंतु सरकार ने इस बार भी इस समस्या पर कोई खास तवज्जो नहीं दिया। जबकि जरुरत इस बात की थी कि न्याय देने की गति में इजाफा लाने के लिए सरकार द्वारा विशेष प्रयास किया जाता।
दरअसल कानूनी प्रक्रिया और कानून में बदलते परिवेश के अनुसार सुधार लाने की भी जरुरत थी। पुलिस कानून में परिवर्त्तन लाकर भी इस दिशा में बदलाव लाये जा सकते थे। सुधार कार्यक्रम को एक मुहिम की तरह चलाने के लिए सरकार द्वारा आगाज की आवश्यकता थी। यदि कानून के क्षेत्र में आधारभूत ढांचा को मजबूती प्रदान किया जाता है तो हालात अब भी बदल सकते हैं। सभी को बिना किसी देरी के बदस्तूर न्याय मिलता रहे इसके लिए आज बीस हजार नयी अदालतों के गठन की आवश्यकता है और इन अदालतों में काम करने के लिए साठ हजार न्यायधीशों की भी जरुरत है।
यह तभी संभव हो पायेगा जब सरकार इस कार्य को पूरा करने के लिए अस्सी हजार करोड़ रुपये व्यय करने के लिए तैयार हो जाएगी। फिर उसके बाद हर साल एक लाख साठ हजार करोड़ रुपयों की जरुरत भी सरकार को न्यायलयनीय कारवाईयों को पूरा करने के लिए होगी। हालांकि 13 वें वित्त आयोग ने 5000 करोड़ रुपयों का आवंटन देश के विविध राज्यों में चल रहे अदालतों में सालों से लंबित मामलों के तत्काल निष्पादन लिए किया है जोकि 2010 से 2015 के दरम्यान खर्च होना है। इस राशि का इस्तेमाल सुबह और शाम चलने वाली अदालतों के अलावा स्पेशल अदालतों में चल रहे लंबित केसों के निपटारे के लिए किया जाना है। एक अनुमान के अनुसार इस राशि से 113 मिलियन लंबित केसों का निपटारा 5 सालों के दौरान किया जा सकेगा।

इसके अलावा वैकल्पिक समस्या के समाधान के लिए 600 करोड़ रुपया दिया गया है। 100 करोड़ रुपयों का आवंटन लोक अदालतों के लिए किया गया है। 150 करोड़ रुपया वकीलों और विभिन्न न्यायालयों में काम करने वाले अधिकारियों को मुहैया करवाया गया है। 200 करोड़ रुपया कानूनी सहायता के लिए उपलब्ध करवाया गया है। 250 करोड़ रुपया न्यायधीशों के प्रशिक्षण पर खर्च किया जाएगा। 300 करोड़ रुपये जूडिशियल अकादमी को दिये जायेंगे। 150 करोड़ रुपये पी.पी.ओ को प्रशिक्षित करने में खर्च किये जायेंगे। 300 करोड़ रुपये अदालतों के प्रबंधको को दिया जाएगा, ताकि अदालती कारवाई सुचारु रुप से चलता रहे। 450 करोड़ रुपयों का प्रावधान अदालतों के रख-रखाव के लिए किया गया है।

पहले भी 11 वें वित्त आयोग ने 1734 फास्ट ट्रेक अदालतों में चल रहे लंबित मामलों के निष्पादन लिए वित्त पोषण किया था, पर पूरी राशि इन अदालतों को मुहैया ही नहीं करवाया गया और जो करवाया गया उसका भी उपयोग इन अदालतों द्वारा नहीं किया जा सका। अप्रैल 2007 में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने मुख्यमंत्री और उच्च न्यायलयों के न्यायधीशों को संबोधित करते हुए कहा था कि 11 वें वित्त आयोग द्वारा उपलब्ध करवायी गई राशि से फास्ट ट्रेक अदालतों ने 2000 से 2005 के दरम्यान आठ लाख लंबित याचिकाओं का निपटारा किया है। जबकि नियमानुसार उपलब्ध संसाधनों से उन्हें प्रतिवर्ष पाँच लाख केसों का निपटारा करना चाहिए था।

लोक अदालत तकरीबन 10 लाख केसों का निष्पादन प्रत्येक साल करता है, पर लंबित मामलों की तुलना में निष्पादन की यह गति निःसंदेह नाकाफी है। 13 वें वित्त आयोग का लक्ष्य तो है देश के अदालतों में चल रहे लंबित मामलों को 2012 तक समाप्त करने का, लेकिन लगता नहीं है वर्त्तमान प्रावधानों और उपलब्ध संसाधनों से लंबित मामलों का निपटारा आने वाले आगामी 15 सालों में भी हो पायेगा।  सच कहा जाए तो वित्त आयोग के प्रयास स्थिति को संभालने के लिए प्रर्याप्त नहीं है। वित्त आयोग मदद तो कर सकता है, किंतु आमूल-चूल परिवर्त्तन लाने के लिए योजना आयोग और सरकार के अलावा खुद निवर्त्तमान अदालतों की तरफ से भी दो कदम आगे आने की आवश्यकता है, तभी सभी को समय से न्याय मिल पायेगा। वैसे इस प्रक्रिया में निम्नवत् उपाय भी मुफीद हो सकते हैं-

  • राष्ट्रीय विवाद नीति बनाने की जरुरत है। इससे राजस्व और आपराधिक विवादों में फर्क स्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होगा। इसके लिए निश्चित अदालतों को भी रेखांकित किया जाना चाहिए।
  • राष्ट्रीय स्तर पर जूडिशियल सेवा की स्थापना की जाए।
  • वर्त्तमान न्यायधीशों के संख्याबल में 25 से 50 फीसदी तक इजाफा किया जाना चाहिए।
  • संविदा पर न्यायधीशों की नियुक्ति की जाए।
  • अवकाश प्राप्त न्यायधीशों की सेवा ली जाए।
  • न्यायधीशों की नियुक्ति में तेजी लाया जाए।
  • उच्च न्यायलयों के न्यायधीशों की सेवानिवृति की आयु को बढ़ाया जाए।
  • लंबित मामलों का प्रबंधन कुशल प्रबंधकों के हाथों में सौंपा जाए।
  • न्यायधीश की क्षमता तय की जाए। एक न्यायधीश एक दिन में कितने केसों का निष्पादन कर सकता है, यह सुनिश्चित किया जाए।

यह भी तय करने की जरुरत है कि न्यायधीश और जनसंख्या का अनुपात क्या है? इस कार्य को करने से हमें किस हद तक सुधार लाने की जरुरत होगी, इसका पता चल सकेगा। साथ ही इससे किस तरह के आधारभूत संरचना की जरुरत न्यायपालिका को है इसका भी हमें अंदाजा मिल जाएगा। बीमारी की पहचान के बाद ही सही ईलाज की तरफ हम अपने कदम को बढ़ा सकते हैं।

न्याय के मंदिर पर जितना भरोसा आम आदमी का बढ़ेगा केसों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ेगी और फिर उनके समाधान के लिए करोड़ों-अरबों रुपयों और कुशल प्रबंधन की जरुरत होगी। आर्थिक बदहाली और संसाधनों के संक्रमण के दौर में न्याय के कार्य को विकेन्द्रित करके लंबित मामलों में कुछ हद तक कमी लाई जा सकती है। इस दिशा में लोक अदालत, महिला अदालत, मोबाईल अदालत और फास्ट ट्रेक अदालत फायदेमंद हो सकते हैं।

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भारतीय नागरिक on 23 March, 2010 03:15;30
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न्यायधीशों के लिए यूनिट सिस्टम उसी प्रकार कार्य करता है जिस प्रकार मीडिया के लिए टीआरपी. छोटे मोटे मुकदमों को समझौते से निपटाने में यूनिट कम मिलता है. और सामान्य तरीके से निपटाने में अधिक. तो कैसे न्यायधीश तेजी से काम करें? उन्हे जवाब देना पड़ता है कि उनका यूनिट कितना आया. कुछ न्यायधीश तो ऐसे हैं जिनके क्षेत्र में बहुत कम मामले होते हैं परंतु यूनिट वो सर्वाधिक देते हैं.
मेरा सुझाव है कि यूनिट सिस्टम के बारे में भी विस्फ़ोट डाट काम में चर्चा की जाए.
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virender on 09 April, 2010 10:08;24
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apke vichar se me sahmat hoo lakin is disha me koi majboot kadam uthay aur usme humko bhi samil kare.
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pagalnath on 21 April, 2010 20:58;40
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shreeman ji likha to apne theek hi hai per soch Bharat sarkar ke natao wali hi hai.bimari ka karn janne ke bajaye ilag ki salah de dali.agar kanun sahi ban jaye to 60%se jayada meqdame.apne aap hi adalat se baher aa jayege. aur dowri98 de 95 se 98 % bahar honge chalege hai.jajo ki bharti ki jajurat nahi hai,aur n hi adalte banane ki jarurat hai.jarurat hai to bas andhe kanun ko ankhe lagane ki.jagag kam hai nahi to savidhan hi likh deta.jiske lagu hone per ramrajye to bhale na ata per apradh name ki cheej 1-2 % hi rahti. example.desh ki janta nayayadheesh va doctors ko baghwan manti hai. dono ke kam ek sal ke liye badal do .nayay samajh a jayega sath hi karan va niwarn dono hi mil jayege.jab tak kisi samssya ka karan nahi khojenge niwaran nahi ho sakega. hamare desh ke kanun ko wastwik nayay ki paribhasa hi pata nahi nayaye kaya khak hoga.80 % se jayada apradhi hamare kanun ne bana rakhe hai.jabki ve apradhi hai hi nahi.jo apradhi hai unhe kanun suraksha de raha hai. 60 % se jayada to law crime ke hi case hai.jish nayayadhish ke samne sareaam riswat leejati hai wo bhi desh ki har adalat me ,magar kursi per baithe bhagwan to andhe hai ankh per patti jo bandhi hai .vo nayaye karenge. deshwashiyo ko pahle nayaye ki paribhash seekhnee hogi tab nayaye cheena ja sakega. aur sardar bhagat singh or chandershekhar jaise nayayepriye kisi mard ke bacche ke hath me desh ki satta hogi tabhi ye sembhav hai.natao ka semaye to kursi bachane aur desh ko lootne ke firaq me nikal jata hai.jo bachta hai .jatiwad.dharamwad aadi wado ko badhawa dene me.jab aankh khule tahee savera.alkhniranjan.....................
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image सतीश सिंह लंबे समय तक मुख्यधारा की पत्रकारिता करने के सतीश सिंह पिछले एक साल से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन कर रहे हैं. दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान टाईम्स के लिए काम किया. वर्तमान समय में दिल्ली में कार्यरत.
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