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प्यार की पंचायत पर कुर्बान हुआ परिवार

image बेबस आँसू बहाती दादी के पास बैठी ‘मोना’

रात के सन्नाटे को चीरती देहरादून एक्सप्रेस उसके ऊपर से गुजर गई. लेकिन दहशत के उन पलों में भी वो अपने परिवार की सलामती के बारे में ही सोचती रही. ऊपर से गाड़ी गुजर जाने के बाद उसने सबसे पहले अपने भाई रोहित को खोजा. उसके बाद मिले पिता, माँ बहिन और चाची के चिथड़ों ने उसे बदहवास कर दिया. सप्ताह भर बीत जाने के बाद भी उसके चेहरे पर अकेले रह जाने का खौफ साफ दिखाई दे रहा है. उसे चाची से कोई शिकायत नहीं. पंचों के फैसले को वो भले ही समझ नहीं पा रही है. लेकिन खुद के अकेले रह जाने के लिए वो उन्हें ही जिम्मेदार जरूर मान रही है.

राजस्थान के करौली जिले के बाजना गाँव में दूर के रिश्ते की चाची और भतीजे के बीच अवैध संबधों की बात पर एक पंचायत बैठी. दोनों ही बाल बच्चे वाले थे. ऊनके ऊपर आरोप था कि दोनों के बीच अवैध रिश्ता है. दो गाँवों की पंचायत ने मृतक गजेंन्द्र पर 71 हजार का जुर्माना कर दिया. लोगों की माने तो मौके पर ही उसने पंचों से कहा था कि उसके पास हर्जाना देने को कुछ भी नहीं  है. फिर भी उसने कहा कि पंच चाहें तो उसका खेत बेंचकर हर्जाने की भरपाई कर लें, वह गांव छोड़कर चला जाएगा. पंचों ने एक न सुनी. उल्टे सुना दिया एक और फैसला. हमारी बात नहीं मानी तो आगे 18 गाँवों की पंचायत होगी.

18 अप्रैल को गाँव के ही विद्यालय प्रांगण में हुई थी यह खूनी पंचायत जिसकी दहशत से 21 अप्रैल की रात को गजेन्द्र ने कर ली सपरिवार खुदकुशी. चाची कुंवरदेई तो 18 अप्रेल को ही गाँव छोड गई थी. गजेन्द्र ने 21 अप्रैल को दोपहर दो बेटियों, एक बेटे और पत्नी सहित गाँव छोडा. घर वालों और मोना की माने तो वो पहले अपने नाना के घर गये. इस बीच सवाल ये खडा हो रहा है कि कुंवरदेई उनके साथ कब हुई. उससे पहले वह कहाँ थी. क्या गजेन्द्र उसके संपर्क में था. अवैध संबधों को लेकर गाँव और घर वालों का अब कहना है कि उनका एक दूसरे के घर आना जाना था. चाचा लालाराम को लोग सीधा आदमी बता रहे है.

मोना की माने तो रात 9 बजे रेल की पटरी पर आ गये थे. पापा पे सभी को पटरी पर लिटा दिया. और खुद भी सो गये. रात को जब गाडी की सीटी बजी तो उसकी नींद खुल गई. उसे कुछ नहीं पता कि वो कैसे पटरी के बीच में आ गई. रेल उसके उपर से  होकर निकल रही थी तो उसकी आँखे बंद हो गई. उसके बाद उसने सबसे पहले अपने भाई रोहित को ढूंढा. फिर बहिन माँ बाप को. सबको कटा देख वो घर की ओर भागी. कुछ ही दूरी पर एक घर में गई और रोकर सबको बताया. आज भले ही मोना सबको अपनी दास्तान सुना रही हो. मगर सुनने वाले उसकी बातों को सुनते हुये अपनी आँखें नम कर ही लेते है.

गाँव के लोगों की माने तो गजेन्द्र बचपन से ही कम बोलता था. उसने पंचों के सामने भी दबी जबान में अपनी बेगुनाही बताई थी. लोग ये भी मान रहे है कि पंचों की धमकी से गजेंद्र सहमा हुआ था. उसे कहा गया कि इस पंचायत की बात नहीं मानी तो आगे अंजाम अच्छा नहीं होगा. उसे काला मुँह करके गधे की सवारी पर गाँव में घुमाया जायेगा. इस भविष्य के फैसले ने गजेंद्र को ये कदम उठाने को मजबूर कर दिया. आज दो मासूम बच्चे, उनके माता पिता और वो चाची इस दुनिया में नहीं हैं. केवल उनकी यादें और पंचों के फैसले की चर्चा चारों ओर है.

गाँव में इस समय पंच भी नहीं है. पंचों के फैसले का रजिस्टर और सुसाईड नोट पुलिस के पास है. अब चर्चा भी धीरे धीरे कम होती जा रही है. लेकिन सुलगते सवाल अभी भी ज्यों का त्यों बने हुये है. सामाजिक मर्यादाओं की दुहाई देने वाले निठठले, ठलुओं पंचों को किसने ये अधिकार दिया कि वो अपने फैसलों की दहशत से दूसरों से जीने के अधिकार को ही छीन लें. गजेंन्द्र की पत्नी हीरो को जब चाची कुंवरदेई से कोई शिकायत नहीं तो पंचों को क्या परेशानी थी. चाची भतीजे के बीच कहीं प्रेम का कोई रिश्ता था भी तो उससे कौनसी ऐसी कयामत आ रही थी.

उम्र के साथ बडी होती मोना को क्या ये पंचायतें परवरिश दे पाऐगी ? क्या मोना के दिलों दिमाग पर पडे सदमे को सहने और मिटाने में कोई उसकी मदद को आगे आयेगा ? शायद नहीं. आदमी की विपत्ति में पंचायतें भी उसके कहीं साथ दिखाई नहीं. अपनी शेष जिंदगी मोना  को इसी समाज के सुलगते सवालों के बीच पूरी करनी होगी. जिन पंचों के फैसले ने उसका सब कुछ छीन लिया, उनके बच्चे ही मोना को ताडना देते नजर आयेगें. आज भले ही सब की सहानभूति उसके साथ हो मगर कल किसने देखा है.

गाँव के बाहर खेत की रखवाली पर बैठे एक बुजुर्ग का सवाल भी पंचायतों को कठघरे में खडा करता नजर आता है.‘‘ गरीब की बीबी सबकी लुगाई होवें है. इन पंचों के घरों में क्या नहीं हो रहा ? अपने घरों की पंचायत करें तो हम जाने’’.पंचायतों के फैसले आज जिस प्रकार से विवादों के घेरे में आ रहे है,उससे तो लगता है कि जाति समाज की इन परम्परागत पंचायतों का अस्तित्व ही संकट में आ जायेगा. ऐसे में मुशी प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ की प्रासंगिता संदेह के घेरे में आ जाती है. जगकि वास्तविकता इससे कुछ अलग ही है. आज की ये पंचायतें अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए फैसले सुना रही है, न कि न्याय नीति और नियमों के अनुसार. परमेश्वर के रूप माने जाने वाले पाँच पंच भी अब बिक रहे है. कहीं न कहीं न्याय प्रभावित हो रहा है. यही कारण है कि पंचों को फैसले सुनाने के बाद भूमिगत होना पड रहा है. समय रहते पंचों ने अपने फैसले और उन्हें सुनाने के तरीके नहीं बदले जो जल्द ही पंचायतों का अस्तित्व खतरे में पड जायेगा. आज इस पंचायत को मोना के बारे में जरूर सोचना चाहिये.

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Krishna Baraskar on 29 April, 2010 11:19;39
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bahut badhiya reporting ki hai aapne.
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Mukesh Ray on 30 April, 2010 01:03;00
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बहुत ही अच्छा लेख लिखा है राजीव जी आपने. यह लेख एक बहुत बडे तथ्य तो दर्शाता है. यह कहानी विदेशी कानून और देसी कानून के बीच हो रहे टकराव तो उजागर कर रहा है. जहाँ विदेशी कानून में बहुत कुछ बदलने की जरुरत है वन्ही हमे अनपे देसी कानून के तरीके तो भी बदलने की जरुरत है. आज यह बहुत जरुरी ही गया है की अगर अपने देसी सभ्यता को बचाना है तो हमे इस पे अच्छी तरह से पुनर्विचार करना होगा.
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RAJ SINH on 30 April, 2010 17:14;42
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पंचायतों का भी तालिबानीकरण हो गया है .जहाँ इन्सान और इंसानियत के लिए जगह नहीं है.
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image राजीव शर्मा राजीव शर्मा राजस्थान में रहकर मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.इससे पूर्व कइ अखवारों के लिए रिपोटिंग कर चुके हें। राजनीति के अलावा पानी-पर्यावरण के मुद्दे पर संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए प्रयासरत। विस्फोट के लिए राजस्थान से नियमित लेखन और रिपोर्टिंग. rsmediaraj@gmail.com
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