सोनाली शुभम की सफल प्रेम कहानी
झारखंड की निरूपमा भले ही प्रेम में हार गई हो लेकिन बिहार की सोनाली शुभम अपने इम्तिहान में पास हो गयी . इन दोनों ने प्रेम किया था . लेकिन दोनों के परिणाम अलग अलग रहे. निरूपमा का प्रेम देश की राजधानी का प्रेम था. सोनाली की प्रेम कहानी राजस्थान की शैक्षणिक नगरी कोटा में परवान चढी. दोनों को देखा जाये तो सोनाली ने जो राह चुनी उसमें कांटे कहीं अधिक थे और आगे भी रहेगें . सोनाली की सफलता में उसके प्रेम की पवित्रता को सफल माने या फिर उसकी दृढता को. निरूपमा ने जो किया उसमें गलत क्या है? ये विश्लेषण का विषय हो सकता है.
कोटा की पहचान देश में कोचिंग सस्थानों से है. इंजीनियर हो या फिर डाक्टर बनना . देश के कोने कोने से विधार्थी कोटा आते है. इंजीनियर पिता की बेटी सोनाली शुभम भी पटना बिहार से ऐसे ही कुछ से सपने लेकर 2005 में कोटा आई. इंजीनियरिंग की कोचिंग करने के समय ही उसकी मुलाकात दिनेश नेमवानी से हुई. दिनेश उसका सहपाठी नहीं था. कोचिंग संस्थान के सामने ज्यूस की ढकेल लगाता था. शिक्षा में केवल सातवीं फेल की डिग्री उसके पास थी. उपर से उसका शरीर पोलियो से ग्रस्त. दिनेश का मेहनतकश भला मानुश होना सोनाली को भा गया. सोनाली ने दिनेश को पहले दोस्त बनाया और फिर अपना दिल भी उसे दे बैठी. दोनों एक दूसरे को मिलकर खुश थे.
सोनाली का पूरा ध्यान अपनी पढाई पर था. इसी के चलते पहले ही प्रयास में उसका चयन हो गया. और वो कम्प्यूटर इंजीनियरिंग की पढाई करने नागपुर महाराष्ट चली गई. दोनों का संवंध एक दूसरे से लगातार बना रहा. इस बीच एक ओर उम्र की बंदिशे थी, तो सोनाली को अपने कैरियर की भी चिंता थी. उसने अपना पूरा ध्यान उसी ओर लगाये रखा. बर्ष 2008 के नबम्वर महीने में जब दिनेश 21 और सोनाली 18 की बालिग उम्र से हो गई तो वह अकेले कोटा आई. दोनों ने आर्य समाज की सामान्य नीतियों को स्वीकारते हुये एक दूसरे का होना स्वीकार कर लिया. विवाह की इस रस्म के बाद सोनाली वापिस नागपुर लौट गई. अब दोनों एक दूसरे के हो चुके थे. सफल कैरियर की दौड में सोनाली ने अपना मन लगाये रखा .
सोनाली की मेहनत रंग लाई. पढाई पूरी होते ही कैंपस साक्षात्कार के दौरान ही उसका चयन हो गया. अब सोनाली पुणे की एक बडी कंपनी में कम्प्यूटर इंजीनियर हो गई. नौकरी संभालते ही उसने दिनेश को साथ रखने का ईरादा कर लिया. बीते दिनों सोनाली फिर नागपुर से कोटा आई. इस बार उसने अपने तरीके से माँ बाप को भी कोटा बुला लिया. कोटा पहुँचकर वो सीधे ही पुलिस उपाधीक्षक आदर्श चौधरी के कार्यालय गई. वहाँ माँ बाप की उपस्थिति में दिनेश से प्रेम विवाह कर लेने की पूरी कहानी सुनाई. साथ ही अब आगे की जिंदगी उसी के साथ गुजारने की दृढता भी.
होनहार इंजीनियर बेटी के फैसले ने माँ बाप को सकते में ला दिया. दोनों ने उसे समझाने की भरसक कोशिश की. वो सोनाली को अपना फैसला बदलने पर राजी नहीं कर पाये. माँ बाप ने पुलिस से गुहार की. पुलिस भी उसके ईरादों और कानून की बंदिशों के आगे कुछ नहीं कर पाई. दोनों बालिग थे. और अपना फैसला कर चुके थे. पुलिस ने दोनों को स्वतंत्र छोड दिया. सोनाली माता पिता का आशीर्वाद लेकर दिनेश के साथ नागपुर चली गई. इस पूरे मामले ने माता पिता को परेशानी में डाल दिया. उनके सब सपने अधूरे रह गये है. सोनाली की माँ का कहना है कि उसके लिए मुम्बई से एक इंजीनियर लडके का रिशता आया था. लेकिन बेटी ने प्रेम के रास्ते पर चलना चुना लिया. अब किया भी क्या जा सकता है. हम तो ये ही चाहेगें वो जीवन में सुखी रहे. माँ बाप को इस बात की परेशानी जरूर है कि बेटी ने उन्हें कुछ बताया नहीं.
अब कुछ सवाल है जो जबाब माँगते दिखाई पड रहे है. काश सोनाली ने अपने माता पिता को इस बारे में बताया होता तो क्या होता? अगर सोनाली भी निरूपमा की तरह बिन व्याही माँ बनने की स्थिति में होती तो क्या हमारे समाज में उसके इस कदम के चर्चे होते? दोनों के प्रेम और उसे परिणाम तक पहुँचाने के तरीकों में ऐसा क्या अलग और गलत रहा कि निरूपमा को जान से हाथ धोना पडा.
दोनों की पूरी कहानी सुनाने के बाद हमने 85 बर्षीय लक्ष्मी गुप्ता से जब पूछा तो उनका कहना था कि बेटी ने जो भी किया वो गलत था. लेकिन उसकी हत्या जिन्होंने भी की है वो उससे भी कहीं अधिक घृणित काम है. स्नातक प्रथम बर्ष कि छात्रा कविता गुप्ता को सोनाली शुभम के प्रेम में पवित्रता और दृढता दोनों नजर आ रहे है. उसका मानना है कि प्रियभांशु को निर्दोष मान लेना निरूपमा के साथ उसके दुनिया से चले जाने के बाद किया जाने वाला एक और बडा गुनाह होगा.
वर्षा जिंदल का कहना था,सोनाली और निरूपमा ही नहीं ऐसे प्रकरण समाज में आये दिन सामने आ रहे है. अपनी बंदिशों में बंधा हमारा समाज एक सीमा तक उन्हें मान भी रहा है तो पंचायतें फैसले भी कर रही है. समाज बदल भी रहा है तो उसकी स्थापित मर्यादाऐं उसे रोक के रखना भी चाहती है.
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लेकिन सवाल अब भी वहीँ है ! आज जो हम निरुपमा या सोनाली की कहानी देख रहे हैं ये उनका बेहद निजी जिंदगी का मामला है !
इन सबसे क्या उन्होंने देश एवं समाज का कोई भला किया - नहीं ! फिर हमारा मीडिया इन्हें इस तरह नायक एवं नायिका बनाकर क्यों प्रस्तुत करता है जैसे इन्होने कोई आदर्श स्थपित किया हो देश सेवा, समाज सेवा या चरित्र निर्माण के छेत्र में !
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