विस्थापित हुए तो बिखर जाएंगे ख्वाब
अब खबर आई है कि अफ्रीकी चीते को बसाने के लिए मध्यप्रदेश के नौरादेही अभयारण्य से २३ गांवों को उजाड़े जाने की पूरी तैयारी हो गई है। हालांकि यह कोई पहला गांव नहीं होगा जब जंगली जानवरों को बचाने के नाम पर इंसानों का घर उजाड़ा जाएगा। सरकार और उनके अधिकारियों का यह तर्क है कि जानवरों को बचाना जरूरी है। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है कि किसकी कीमत पर तो सामने एक लंबी खामोशी छा जाती है।
अपने शोध कार्यों के लिए मध्य प्रदेश के जंगलों में घूमने का काफी अवसर मिला। जंगलों के अंदर कई किलोमीटर दूर बसे इन गांवों में न सिर्फ जंगली जानवरों का आतंक है बल्कि वन विभाग के भी आतंक से ये भोले-भाले आदिवासी-गांववाले पूरी तरह से त्रस्त हैं। जंगल में न स्कूल है, न अस्पताल। सरकार वहां तक पहुंच नहीं पा रही है। ऐसे में ये ग्रामीण जंगलों पर ही पूरी तरह निर्भर हैं लेकिन जैसे ही उन्हें अपने पूर्वजों के गांव से उजाडऩे की बात की जाती है तो वे आक्रोशित हो जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो पैसों के लालच और वन विभाग के आंतक के कारण जंगल छोडऩा चाहते हैं। कुछ गांव तो ऐसे हैं जो आतंक से पस्त होने के बाद अब खुलकर नक्सली बनने की बात कर रहे हैं।
अब ऐसे में जंगल में बसे गांवों को उजाड़े जाने के बाद यहां की महिलाओं और बच्चों का क्या होगा, इसकी चिंता शायद ही अभी किसी को है। वैसे भी हमारे यहां औरतों और बच्चों को इंसान की श्रेणी में देखा ही नहीं जाता। उधर दूसरी तरफ हमारी सरकारी योजनाओं में इनके लिए काफी जगह है। लेकिन अफसोस जंगल के अंदर आते-आते सरकार की तरह ये सभी योजनाएं भी दम तोड़ देती हैं। बांधवगढ़ नेशनल पार्क के अंदर बसे गांव हों या फिर कान्हा नेशनल पार्क से विस्थापित गांव। कान्हा से जब गांव विस्थापित किए गए तो सरकार ने वादों की झड़ी लगा दी लेकिन जब गांव वाले यहां से विस्थापित किए गए तो इन्होंने अपने आपको छला ही महसूस किया। अब ऐसे ही कुछ हालात बांधवगढ़ नेशनल पार्क, सतपुड़ा नेशनल पार्क और नौरादेही अभयारण्य में बन रहे हैं।
बांधवगढ़ नेशनल पार्क के कल्लावाह गांव के नौ साल के लड़के मातादीन से जब मैंने पूछा कि गांव छोडऩे की तकलीफ होगी, तो उसकी आंखों में एक उम्मीद थी। उम्मीद इस बात की कि वह चमक-धमक वाले शहर में जाएगा। लेकिन शायद उसे पता नहीं कि जिस शहर में आने के ख्वाब उसकी आंखे देख रही हैं, उसी शहर में उसके पिता अपने परिवार का पेट पालने के लिए मजूदरी करेंगे और मां किसी के यहां बर्तन धुलकर अपने लाड़ले के ख्वाब को पूरा करेगी। जबकि गांव में उनके पास खेती की जमीन है। पीने के लिए पास में नदी बह रही है, साथ ही यहां पर जानवरों को चराने के लिए चारे की जमीन की कोई कमी नहीं है।
गांव के ही खगेंद्र कहते हैं कि इस जंगल की जमीन को हमारे पूर्वजों ने अपने खून-पसीने से रहने के लायक बनाया। लेकिन आज हमें ही हमारे घर से निकाला जा रहा है। हम कहां जाएंगे, इसका जवाब न तो सरकार दे रही है और न वन विभाग। खगेंद्र मुआवजे के नाम पर कहता है कि साहब क्या आपको कोई अपने घर से निकालने के लिए पैसे दे तो क्या आप घर छोड़ देंगे? मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। अधूरे जवाब के साथ मैं भोपाल के लिए निकल पड़ा लेकिन दिमाग में खगेंद्र का सवाल गूंजता रहा।
(लेखक विकास संवाद केंद्र के फैलो और दैनिक भास्कर में कार्यरत हैं।)
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