जान दे रहे हैं, जमीन नहीं देंगे
यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे प्रस्तावित शहरों को बसाने के लिए मायावती सरकार ने किसानों को मुआवजा देने के लिए जो फार्मूला निकाला है उसे किसानों ने खारिज कर दिया है. मायावती ने फार्मूला निकाला है कि या तो किसान अगले 33 साल तक 20 हजार रूपये प्रति एकड़ के हिसाब से हर साल भुगतान ले लें या फिर एकमुश्त 2 लाख 40 हजार प्रति एकड़ के हिसाब से भुगतान लेकर जमीन जेपी समूह को सौंप दें.
किसानों ने इस फार्मूले को खारिज कर दिया है और नोएडा तथा ग्रेटर नोएडा के बराबर मुआवजे की मांग कर रहे हैं. मुआवजे के साथ किसानों की मांग की फेहरिस्त भी बढ़ गई है। किसानों पर फायरिंग के लिए प्रदेश सरकार को बर्खास्त करने, टाउनशिप के लिए एक इंच जमीन न देने और भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने का मुद्दा भी अब उनकी मांग में शामिल हो गया है
अलीगढ़ में 14 अगस्त की शाम यमुना एक्सप्रेस-वे के लिए जमीन के बदले उचित मुआवजे की मांग कर रहे किसानों पर पुलिस फायरिंग के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों का गुस्सा उबाल पर है। अब मुआवजे के साथ किसानों की मांग की फेहरिस्त भी बढ़ गई है। 14 अगस्त की शाम किसानों पर फायरिंग के लिए प्रदेश सरकार को बर्खास्त करने, टाउनशिप के लिए एक इंच जमीन न देने और भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने का मुद्दा भी मांग में शामिल हो गया है।
यमुना एक्सप्रेस-वे में जीमन खो चुके किसान टाउनशिप के लिए जमीन न देने के संकल्प के साथ नारे लगा रहे हैं, ‘‘जान देंगे, पर जमींन नहीं देंगे।’’ आंदोलन की आग में जहां उ.प्र. की बसपा सरकार झुलसती नजर आ रही है, वहीं विपक्षी दलों को एकजुट होने का मौका मिल गया है। यह मुद्दे की नजाकत का ही परिणाम है कि कोई खास सक्षम नेतृत्व न होने के बावजूद ‘किसान संघर्ष समिति’ बनाकर किसान लामबंद हैं। उनकी एकजुटता के आगे सरकार ही नहीं विपक्षी दल भी नतमस्तक है।
14 अगस्त की शाम अलीगढ़ के टप्पल में जो हुआ उसे रोका जा सकता था। यमुना एक्सप्रेस-वे के साथ बनाए जाने वाले टाउनशिप के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसान गत सात जुलाई से ही टप्पल के नजदीक जिकटपुर के पास हाई-वे पर धरना दे रहे थे। 10 अगस्त से 11 किसान यहां क्रमिक अनशन कर रहे थे। किसानों की मांग थी कि टाउनशिप और एक्सप्रेस-वे के लिए जो जमीन ली जा रही है उसका मुआवजा नोएडा के किसानों को मिले मुआवजे के बराबर मिले। लेकिन हनक के घोड़े पर सवार उ0प्र0 की मुख्यमंत्री मायावती के सिपाहियों ने किसानों की ताकत और पिछले आंदोलन को भूलकर उन्हें दबाने का रास्ता आख्तियार किया।
गत14 की शाम किसानों के नेता रामबाबू कटेलिया किसानों से बात कर, घोषणा की कि यमुना एक्सप्रेस-वे के लिए जो जमीन सरकार को दी गई है 15 अगस्त को छीन ली जाएगी। जिकरपुर की ओर जा रहे थे, तभी सादी वर्दी में आए पुलिसकर्मी उन्हें जबर्दस्ती गिरफ्तार कर फायरिंग करते हुए भाग निकले। जमीन छीनने के लिए कटेलिया ने किसानों से अगले दिन ट्रैक्टर-ट्राली लेकर आने को कहा था, ताकि जमीन पर ट्रैक्टर चला कर अपना हक जता सकें। अपने नेता कल्लू बघेल की गिरफ्तारी से पहले ही आक्रोशित किसान कटेलिया की गिरफ्तारी से आपा खो बैठे। फिर जो हुआ और हो रहा है वह सामने है। बता दें कि 27 जुलाई को धरना शुरू होने के बाद 30 जुलाई को ही पुलिस ने कल्लू बघेल को गिरफ्तार कर लिया था। जो अब भी जेल में है। उनकी गिरफ्तारी के बाद ही मथुरा के किसान नेता रामबाबू कटेलिया ने कमान संभाली थी। फिलहाल रिहा होने और दबाव में आने के बाद कटेलिया आंदोलन से बाहर है। अब किसानों ने ‘किसान संघर्ष समिति’ बना ली है, जिसके अध्यक्ष मनजीत सिंह वति हैं।
अलीगढ़ की आग जल्द ही मथुरा, आगरा, मेरठ और फिरोजाबाद तक पहुंच गई। अलीगढ़ की घटना से सबक लेने की बजाए 17 अगस्त को आगरा के एल्भादपुर थाना क्षेत्र में पुलिस ने एक बार फिर किसानों पर लाठी भांजी। एल्मादपुर क्षेत्र के गांवो - कुआंखेड़ा, मदरा, मरौली, बुढ़ाना और चौगाना आदि के किसान भी अधिक मुआवजे की मांग कर रहे थे। आगरा के छलेसर में किसानों का आंदोलन जारी है।
गौरतलब है कि यमुना एक्सप्रेस-वे के लिए जे.पी. समूह को ठेका दिया गया है। समाजवादी पार्टी, भाजपा और रालोद ने खुला आरोप लगाया है कि जे.पी. समूह के साथ मुख्यमंत्री की व्यापारिक ‘डील’ है। सपा विधानमंडल दल के नेता शिवपाल सिंह यादव ने बताया कि जे.पी. समूह को इलाहाबाद में भी 75 लाख बीघा जमीन दी गई है। गंगा एक्सप्रेस-वे के लिए निर्माण का ठेका भी जे.पी. समूह को दिया गया था, जो उच्च-न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद रुका हुआ है। मुख्यमंत्री बनने के साथ ही मायावती ने उ.प्र. के विकास की नीति घोषित करते हुए ‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप’ (पीपीपी) मॉडल पर चलने की बात कही थी। विपक्षी दलों का आरोप है कि पीपीपी मॉडल के बहाने बसपा सुप्रीमों सभी परियोजनाएं जे.पी. समूह को दे रही हैं। किसान संघर्ष समिति ने घोषणा कर दी है कि उनका विरोध एक्सप्रेस-वे के निर्माण के खिलाफ नहीं है। विरोध एक्सप्रेस-वे के साथ बनाए जाने वाले टाउनशिप को लेकर है। किसानों से औने-पौने दाम पर जमींन लेकर किसी को मुनाफा नहीं कमाने दिया जाएगा।
बहरहाल किसानों के आंदोलन में ‘भारतीय किसान यूनियन’ और पश्चिमी उ.प्र. में खास दखल रखने वाले राष्ट्रीय लोकदल के कूद पड़ने से आंदोलन में ताकत तो आ गई है लेकिन राजनैतिक नफा-नुकसान का खेल भी शुरू हो गया है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के पहंुचने पर किसानों में और जोश आया। मांग शुरू हो गई कि 1894 का भूमिअधिग्रहण कानून बदला जाए। इसके लिए 26 अगस्त को संसद घेरने की योजना है। लेकिन सवाल है कि उ.प्र. में किसानों के साथ खड़ी कांग्रेस देश के दूसरे हिस्से में उनका हक क्यों नहीं दे रही है?
2006 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने गाजियाबाद के दादरी में अपने मित्र अनिल अंबानी की रिलायंस कंपनी को पॉवर प्रोजेक्ट का ठेका दिया। प्रोजेक्ट के खिलाफ किसानों का जो आंदोलन उठा उससे पूरे प्रदेश में मुलायम सरकार के खिलाफ माहौल बन गया। अब, मायावती सरकार के खिलाफ भी अलीगढ़ आंदोलन के बाद पूरे प्रदेश में वैसा ही वातावरण बनता दिखाई दे रहा है। देखना है कि इस आग की आंच में माया सरकार बच पाती है या नहीं।
उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलन तारीखों में
1. दादरी किसान आंदोलन वर्ष 2006
2. बादलपुर किसान आंदोलन 2007-08
3.घोड़ी बछेड़ा आंदोलन 2007-08
4. साकीपुर आंदोलन 2007-08
5.बिसरख आंदोलन 2008 से जारी
6. हाईटेक सिटी आंदोलन 2008 से जारी
7. यमुना एक्सप्रेस-वे जनवरी 2009 से जारी
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