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मण्डप में कन्डोम गान

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टीवी का विज्ञापन सबने देखा होगा जिसमें शादी के मण्डप में एक मोबाईल पर वह शाश्वत तराना गूंजता है जो आज के इस भोगवादी युग में प्राणरक्षा का एकमात्र उपाय बन गया है. तरह-तरह की मुरकी और फिरकी मारते हुए रूपर्ट फर्नांडीज की धुन पर गायक विजय प्रकाश बार-बार कण्डोम शब्द को आपकी रगों में उतार देने की कोशिश करते हैं.

हो सकता है मैं अविद्याग्रस्त प्राणी हूं इसलिए मुझे एक भरे-पुरे परिवार के साथ यह विज्ञापन भी देखना गवारा नहीं, लेकिन जिन्होंने बनाया है वे अविद्याग्रस्त लोग नहीं है. बहुत सोच-समझकर यह विज्ञापन बनाया गया है जिसका इरादा है कि हमारे जैसे 'अविद्याग्रस्त' भारतीयों को कण्डोम का बहुत जरूरी महत्व समझाया जाए. टीवी पर आनेवाला यह विज्ञापन बहुत मंहगा सौदा है. यह रणनीति के दूसरे चरण का हिस्सा है. पहले चरण में देश के दक्षिणी राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में आउटडोर और रेडियो के जरिए कण्डोम का महिमा गान किया गया था. दूसरे चरण की शुरूआत दिसंबर २००७ में हुई और इसमें टीवी पर विज्ञापन का बड़ा अभियान और हर मोबाईल में कण्डोम का रिंगटोन शामिल है. यह सारा प्रचार अभियान ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन (बीबीसी) की सामाजिक इकाई बीबीसी विश्व सेवा ट्रस्ट की ओर से संचालित किया जा रहा है और इस मंहगे अभियान में पैसा लगा रहा है बिल एण्ड मिलिण्डा गेट्स फाउण्डेशन. 

अब तक यह बात लोगों के दिमाग में बैठायी जा चुकी है कि एड्स भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है. दुनिया की अधिकांश स्वास्थ्य सेवा प्रदान करनेवाली कंपनियां सीधे और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मार्फत इतना पैसा झोंक चुकी हैं कि आज भारत सचमुच एड्सग्रस्त लगने लगा है. बीबीसी की सामाजिक ईकाई ही दावा कर रही है कि भारत में २५ लाख लोग एचआईवी के शिकार हो चुके हैं. इसमें में भी सर्वाधिक आपदाग्रस्त वे राज्य हैं जिनका यौन व्यवहार बहुत असंतुलित है. वे दक्षिण के राज्य हैं. इसलिए एड्सरोधी प्रचार के दौरान दक्षिण को सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया है. लेकिन उत्तर के लोग भी बहुत साफ नहीं है. भोग और अज्ञान तो यहां भी पसरा है. फिर क्या किया जाए? 

शादी के मण्डप में कन्डोम गान गाया जाए. यह ऐसा मौका होता है जब बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी मौजूद होते हैं. यही वह मौका हो सकता है जब एक नवविवाहित जोड़े को यह अहसास कराया जाए कि वह जिस नये जीवन में प्रवेश करने जा रहा है वह एड्स की संभावनाओं से भरा हुआ है. और फिर उसे ही क्यों? सारे परिवार को कण्डोम के बारे में बताया जाए. सारे समाज को कण्डोम के बारे में बताया जाए. निश्चित रूप से जब इस विज्ञापन को बनाने के लिए क्रियेटिव टीम की मीटिंग हुई होगी तो ऐसी ही चर्चाएं हुई होंगी. अब जरा सात जन्मों का साथ, सात फेरे और मंत्रों के उच्चारण को भूल जाईये. यह सब अविद्याग्रस्त लोगों के कर्मकाण्ड थे. अब तो बैण्डबाजे से लेकर पण्डित जी तक सभी को कण्डोम का ही सस्वर पाठ करना चाहिए.

यह सस्वर पाठ का आह्वान यह मानता है कि भारतीय असभ्य हैं. जाहिल हैं और उन्हें सामान्य यौन संबंध भी स्थापित करने नहीं आता. सवाल तो यह है कि अगर भारतीय यौन संबंध में असभ्य और जाहिल हैं तो पश्चिमी देशो को इतनी चिंता क्यों है? नेशनल मेडिकल फोरम के अध्यक्ष डाक्टर प्रेम अग्रवाल कहते हैं कि आज आप जो एड्स के खिलाफ जो अभियान देख रहे हैं यह कुछ और नहीं, बाहर से जो पैसा आ रहा है उसे खर्च करने की मजबूरी है. आज स्वास्थ्य के क्षेत्र में बाहर से सबसे ज्यादा पैसा एड्स से बचने के नाम पर आता है और एड्स के खिलाफ जागरूकता पैदा करने के लिए कुकुरमुत्ते की तरह गैर सरकारी संस्थाएं खुल आयी हैं जो एड्स के इस खतरे से पैसा कमाना चाहती हैं. इस बारे में कोई निश्चित आंकड़ा कह पाना मुश्किल है लेकिन अनुमान है कि एड्स के खिलाफ जागरूकता फैलाने के नाम पर ही हर साल कोई ५ से ६ हजार करोड़ रूपया भारत आ रहा है. यह सारा पैसा विभिन्न गैर-सरकारी संस्थाओं के जरिए खर्च किया जाता है. इन गैर सरकारी संस्थाओं की नोडल एजंसी के रूप में नाको काम करती है.

एड्स के खिलाफ प्रचार अभियान इतना व्यापक है कि हम असभ्यों के चारों और कण्डोम का प्रभुत्व कायम किया जा रहा है. उत्तर दक्षिण पूरब और पश्चिम सब ओर से एक ही आवाज आ रही है कण्डोम का उपयोग करो. दिल बैठ जाता हैं. दिमाग की नसें सुन्न हो जाती हैं. संतति के मूल यौन व्यवहार को बाजार की कमोडिटी बना देनेवाला पश्चिम हमें समझा रहा है अपनी बहन बेटी के सामने भी कण्डोम के बारे में बात करो और हम इतने गलित-पतित हो गये हैं कि विरोध का एक स्वर भी नहीं निकाल पाते.  

तो क्या एड्स का खतरा उतना बड़ा है जितना हल्ला मचाया जा रहा है या निशाना कहीं और है? जैक इण्डिया के निदेशक पुरूषोत्तमन मुल्लोली कहते हैं "आप जाकर देखिए धार्मिक स्थानों, नवरात्र के पाण्डालों और पूजाघरों में कण्डोम बंट रहा है. यह स्वास्थ्य रक्षा के बहाने भारतीय संस्कृति पर हमला है. लेकिन कोई हिन्दूवादी संगठन इसके खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोल रहा है." पुरूषोत्तमन मुलोली पिछले पांच सालों से सुप्रीम कोर्ट में संविधान की धारा ३७७ को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. कुछ एड्सवादी और समलैंगिक समर्थक संस्थाओं ने सुप्रीम कोर्ट में एक केस कर रखा है कि वे धारा ३७७ को खत्म करने के लिए सरकार को निर्देश दें. इस धारा के कारण ही भारत में समलैंगिक संबंध बनाना या विवाह करना कानूनन अपराध माना जाता है. नाज फाउण्डेशन की अगुवाई में पूरी एड्सवादी लाबी इस कानून को खत्म करवाने पर आमादा है.

डा. प्रेम अग्रवाल कहते हैं कि भारत में यौन संबंधों के कारण एड्स का उतना खतरा नहीं है जितना संक्रमित खून चढ़ाने से. लेकिन आप एड्स के खिलाफ चल रहे पूरे अभियान को देखेंगे तो यहां सारा जोर सुरक्षित यौन संबंध बनाने पर ही है. डाक्टर अग्रवाल का मानना है कि विदेश से पैसा इसलिए आ रहा है क्योंकि उन्हें हमारी स्वास्थ्य समास्याओं से कुछ लेना-देना नहीं है. उन्हें सिर्फ अपने स्वास्थ्य की चिंता है. आज भूमंडलीकरण के इस दौर में जब मेल-जोल की संभावनाएं बहुत बढ़ गयी हैं तो उन्हें यह खतरा है कि कहीं यह रोग उनके यहां निर्यात न होने लगे. इसलिए वे अफ्रीका से लेकर भारत तक भारी पैसा निवेश कर इस रोग की रोकथाम करना चाहते हैं. डाक्टर अग्रवाल जिस एक पहलू का जिक्र कर रहे हैं उसके अलावा भी एड्स को लेकर कई सारे कोण हैं जिनके उत्तर खोजने होंगे. पश्चिम ऐसा मानता है कि यौन व्यवहार के मामले में भारत एक बंद डिब्बा है जिसे खोलने की जरूरत है ताकि इसके अंदर की सड़ांध बाहर निकल सके. कुछ हद तक यह बात दिखती भी है कि भारत के पारिवारिक ढांचे में सड़ांध आयी है. लेकिन मूल में वह एक श्रेष्ठ व्यवस्था है जिसे नकारा नहीं जा सकता. लेकिन जब तक भारत की परिवार और सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न नहीं होती तब तक बाजार हावी नहीं होगा. एड्स ने पश्चिम को यह मौका दे दिया है. इसलिए आपके शादियों के मण्डप में कण्डोम गान होगा और आप सीने पर पत्थर रखकर विवश होकर देखते रह जाएंगे. 

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दीपक on 07 October, 2008 14:50;21
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उभरते हुये सवाल पर सही दृष्टीपात किया है आपने! सटीक विश्लेषण!!
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raj singh on 08 October, 2008 03:26;09
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aapkee bat sahee hai.prachar ka tareeka behad bhaunda aur foohad hai par jaroorat ko kam na anken.aids ke prasar se yuddha star par ladna hoga.sthiti bhayavah hai.
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visfot .com on 08 October, 2008 09:40;53
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रोग से लड़ना बुरा नहीं है लेकिन रोग का दुरूपयोग अन्य कामों के लिए करना बुरा है. एड्स आज साम्राज्यवाद का हथियार हो गया है. आगे आनेवाली कड़ियों में हम इसको और व्यवस्थित रूप से समझने की कोशिश करेंगे.
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Sadashiv Tripathi on 08 October, 2008 12:42;13
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Aids ko lekar bharat ki jo tasbeer dikhai ja rahi uske piichhe bhi videshio ka ek sunivojit shdyantra nazar aata hai. Mujhe to lagta hai ki bhartiya sanskrit, sabhyata ko tahas nahas kane ka kuchakra chal raha hai.bhogvadi sanskrit ka vistar andhere ki aor le ja rha hai. Sajag Patrakar ke roop me sanjay ji ne jo swar uthaya hai use aour mukhrit kiya jana chahie.
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y on 08 October, 2008 16:55;03
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lalach ki aandhi me dube indian bhopu kya is lekh ko sunna samajhna chhenge .maine kuchh aids workers se baat ki .unka itna brain wash kar diya gaya hai ki we ise pundy karya mante hain.
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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