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पोप पोषित मिशनरियों के पाप

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image धर्मांतरण की प्रक्रिया पूरी करता एक ईसाई धर्म प्रचारक

चर्च पर हिन्दू चरमपंथियों द्वारा हमला तो खबर बनती है लेकिन यह खबर कभी क्यों नहीं बनती कि चर्च के अंदर कितना शोषण, अत्याचार और दमन हो रहा है. चर्च संगठन अपने ही कर्मचारियों का शोषण करते हैं, नन्स और पादरी की संदेहास्पद हत्याओं के मामले भी प्रकाश में आये हैं, जिनमें चर्च प्रशासन से जुड़े लोग ही शामिल पाये गये हैं, फिर भी हमारा प्रबुद्ध समाज चर्च संगठनों के बीच फैली इन कुरीतियों के बारे में कभी अपनी जबान नहीं खोलता.

पिछले दिनों चर्चों से जुड़ी ऐसी कई घटनांए सामने आई हैं जिन्हें साप्रदायिकता की श्रेणी में रखा जा रहा है। अभी हाल ही में रतलाम (मध्य प्रदेश) की रेलवे कंलोनी में स्थित 85 वर्ष पुराने चर्च में आग लगा दी गई। इस घटना को सीधे हिन्दु संगठनों से जोड़ा गया। मामला तुंरत अतंराष्ट्रीय स्तर तक पंहुचाया गया। चर्च अधिकारियों और उनके विदेशी आकाओं की भकुटियां तन गई। बाद में पता चला कि उक्त घटना की तह में था उसी चर्च का चौकीदार था- नोयल पारे. नोयल पारे ने आक्रोशवश ही चर्च में आग लगाई थी।

चर्च की 86वीं वशZगांठ मनाई जाने वाली थी। बड़े समारोह की तैयारियॉ थी। किंतु उस चर्च के चौकीदार पर आठ हजार का कर्ज था। कर्ज था बनियों का। जिनसे वह पेट भरने के लिये जरुरी नून-तेल उधार लेता था। चर्च प्रशासन उसे मात्र 1000 रुपए मासिक वेतन देता था। कितना बड़ा अंतर है सरकारी नियमों में न्यूनतम मजदूरी को लेकर और चर्च प्रषासन द्वारा दी जाने वाली मजदूरी के बीच. देश की राजधानी दिल्ली में ही चर्च द्वारा चलाये जाने वाले अधिक्तर संस्थानों में भी ऐसा ही हाल है, सरकारी आदेश पोप पोषित धर्मराज्य के प्रशासकों के ठेंगे पर होते है। चर्च का गुलाम कर्मचारी 24 घंटे काम करके एक हजार रुपए महीना अर्थात 33 रुपए प्रतिदिन, ऐसी स्थिति में -क्रिया की प्रतिक्रिया - शोषण का परिणाम आक्रोश तो होगा ही. आक्रोशवश ऐसा कर्मचारी कुछ भी कर सकता है। हत्या या आत्महत्या या फिर तोड़फोड़ मारपीट अगजनी इत्यादि या चोरी चकारी, लूटपाट कुछ भी।

कुछ वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के ही झाबुआ में कान्वेंट की ननों (धर्म-बहनों) पर सामूहिक हमला व बलात्कार का मामला भी खूब उछाला गया। लेकिन उस समय भी बात वहीं थी बंदर की बला तबेले के सिर. हिन्दू संगठन ही बदनाम किये गये। इस मामले में भी झाबुआ के धर्मांतरित ईसाइयों का आक्रोश ही था। मलयाली-दक्षिण भारतीय ननें बनाम आदिवासी ईसाई. यहां रतलाम में चर्च जलाने की जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है उसके मूल में भी मलयाली चर्च प्रशासन पादरी जोस मैथ्यू (मलयाली) बनाम नोयल पारे (स्थानीय मराठी मूल का आदिवासी) है. हाल ही में बिजनौर -उतर प्रदेश की एक स्थानीय अदालत ने `संत मेरी स्कूल´ की नन प्रमिला की 5 नवंबर 2007 को हुई हत्या के मामले में स्कूल के चौकीदार जॉन को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कुछ दिन पूर्व उतराखंड के रामपुर में एक कैथोलिक पादरी एवं उसकी नौकरानी की हत्या के मामले में भी उक्त आश्रम से जुड़े कुछ लोग पकड़े गये है। आजकल उड़ीसा में एक नन के साथ हुये बलात्कार का मामला राष्ट्रीय एवं अतंरराष्ट्रीय समाचार पत्रों में छाया हुआ है.उड़ीसा पुलिस ने संदेह के आधार पर चार लोगों को हिरासत में लिया है. पीड़ित नन चर्च अधिकारियों के संरक्षण में अज्ञातवास में चली गई है. चर्च अधिकारियों के मुताबिक पीड़िता को सही समय पर सामने लाया जायेगा। किसी भी महिला के साथ बलात्कार एक घिनौना अपराध है. बलात्कारी शरीर ही नहीं पीड़िता की आत्मा की भी हत्या कर देता है. ऐसा अपराधी कोई भी हो उसे क्षमा नहीं किया जाना चाहिए परन्तु उड़ीसा मामले को लेकर कुछ चर्च अधिकारियों पर ही अगुंली उठ रही है. ऐसे में यह जरूरी है कि सच लोगों के सामने लाया जाना चाहिए।


मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है.यहीं नहीं उड़ीसा में जो हो रहा है उसमें भी मलयाली मिशनरियों का बड़ा हाथ है। कटक के आर्च बिशप राइट रेव्हण रिफेल चीनथ भी मलयाली ही है। वहां इनकी गलतियों  की सजा गरीब एवं सीधे साधे धर्मांतरित वंचितों को मिली। छल, फरेब, धोखाधड़ी के बलबूते अपने साम्राज्य का विस्तार करते `पोप पोषित´ यह मिशनरी हिन्दू दलितों को मतांतरित करने के बाद भी सरकारी दस्तावेजों में हिन्दू रहने के लिए प्रेरित करते है, ताकि वह इन से नहीं सरकार से अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे और इनकी धर्मांतरण की दुकान बिना किसी रोक-टोक के चलती रहे।

इन्हें वंचितों एवं आदिवासियों के प्रति कितनी सहनाभूति है यह उड़ीसा के कंधमाल और कर्नाटक में हुए कुछ चर्चों पर हमलों के दौरान विरोध करने के तरीके से भी समझा जा सकता है। जहां उड़ीसा के मामले में कैथोलिक चर्च अधिकारी एक औपचारिकता निभाते दिखाई दिये वहीं मंगलूर में हुई घटनाओं के बाद उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया। अंग्रेंजी अखबारों में दो-दो पेज तक की खबरे आनी शुरू हुई। चर्च अधिकारी और उनके राजनीतिक समर्थक ऐसे सक्रिय हुए मानों कर्नाटक में `ईसाइयत´ समाप्त होने को हो। चर्च अधिकारियों की सक्रियता और उग्र तेवरों को देखते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री तुरंत मंगलूर डायसिस के बिषप के यहां सफाई देने वैसे ही पुहचें जैसे राजग के शासनकाल में केन्द्र सरकार अपनी सफाई देती थी। मंगलूर की घटनाओं के बाद चर्च अधिकारियों का उग्र होना स्भाविक था क्योंकि एक तरह से वह चर्च का मिनी वैटिकन जो ठहरा। यदि मराठियों,असामियों, बगालियों, पंजाबियों आदि को अपने अस्तित्व की चिन्ता सता सकती है तो उड़ीसा के मूल निवासियों को भी अपने अस्तित्व की रक्षा की चिन्ता होना स्भाविक है।

मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है। यह दक्षिण भारतीय पादरी - बिशप विदेशी मिशनरियों द्वारा छोड़ी गई अकूत सम्पति को अपने हाथ से निकलने न देने की फिराक में नित नयें हथकंडे अपनाते रहते है। यहां एक तथ्य और भी उल्लेखनीय है कि वास्कोडिगामा द्वारा छोड़े गये पुर्तगाली मूल के मिशनरियों के वंशज अब भी मंगलोरियन -गोअन - के रुप में उपस्थित है। उतर प्रदेश के नौ कैथोलिक डायसिसों आगरा, मेरठ, झॉसी, बिजनौर, इलाहाबाद, लखनाऊ, बनारस, गोरखपुर, बरेली - के बिशपों में से छ: बिशप पुर्तगाली मूल के है - शेष मलयाली (केरल) के है। अभी कुछ माह पूर्व केरल के आर्च बिशप ने केरल के ईसाइयों के नाम एक परिपत्र (फतवा) जारी किया था ``यह कि प्रत्येक दम्पती को चाहिये कि वे `अधिक से अधिक´ संतान उत्पन्न करें. आशय यही था कि चर्च संपदा को हथियाये रखने के लिए केरल के कर्णधारों की अवश्यकता है।

चर्च अधिकारी आज विभिन्न तरीकों से अथाह दौलत कमा रहे हैं. उनका पूरा व्यावसाय इस देश के करोड़ों वंचितों के नाम पर चल रहा है। भारत सरकार का वार्षिक बजट तो आय-व्याय के साथ घाटे के बजट के रुप में जुड़ा होता है मगर इनके घाटे का तो सवाल ही नहीं और साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के हित्तों की रक्षा का भार भारत की सरकार पर जिसके तहत इटली की सरकार और वैटिकन भारत के राजदूत को बुलाकर डांट लगाती है। यहीं कारण है कि चर्च अधिकारियों द्वारा शोषित आम ईसाई अनाथ सा विक्षिप्तावस्था में जा पहुंचा है जिसका भविष्य आक्रोश और विरोध की नींव पर खड़ा है.

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tulsisinghbisht@gmail.com on 13 October, 2008 19:35;15
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देखा जाए धर्मांतरण जिस राज्य में होता है उसके लिए दोष इन पादरियों के साथ-साथ राज्य सरकार प्रशासन को भी जाता है, जिससे पता चलता है कि वहां की सरकार कितनी लापरवाह है जो ये सब होने देती है।
हमें याद रखना चाहिए कि भारत देश धर्मनिरपेक्ष देश है। जहां सभी धर्मों को माना जाता है तो फिर किसी के धर्म को बदलकर उन्हें ईसाई बनना कहां की नीति है? इसमें सारा दोष राज्य सरकार पर भी लगाना चाहिए जो इन गरीब लोगों को सुविधा प्रदान नहीं कर सकती, जिसके कारण ये लोग थोड़े पैसों के लालच में अपनी संस्कृति को भूलकर दूसरे धर्म की संस्कृति अपना रहे हैं - कितनी शर्म की बात है। लेख अच्छा है आगे भी लिखते रहें।
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ajaykumarjha on 13 October, 2008 19:48;06
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bahut hee sahee likhaa hai aapne, mere khyaal se yadi aapkaa maksad dharm kaa prachaar aur prasaar hai to fir uske liye alag raaste kyon . yadi vivaad utpann ho jaaye to wahee se sab kuchh shankit hone lagtaa hai. kyaa ye sab koi kisi anya desh mein kar saktaa hai, shaayad nahin.
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ambrish kumar on 13 October, 2008 22:20;55
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per ye sampark karne per bhi javab nahi dete hai.kuch ego ka mamla lagta hai
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parshuram on 14 October, 2008 12:01;27
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श्रीमान तुलना के लिए क्षमा चाहूँगा पर बोलना तो पडेगा ही
कुत्ते ने आदमी को काटा ख़बर नही है परन्तु आदमी ने कुत्ते को काटा ख़बर हैं
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Rajneesh K Jha on 16 October, 2008 17:27;40
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मित्र,
जितने भी धार्मिक संस्था है सभी जगह का ये ही हाल है आपने पॉप को पाप कहा ठीक मगर मुल्लों के पाप को उजागर नही किया और हिन्दुओं के मठाधीशों का क्या जो बाल ब्रह्मचारी होने का जामा पहन कर कितनो को गर्भवती करते हैं.
धर्म आस्था का प्रतीक है और लोगों को स्वतन्त्रता की वो कोन सा धर्म चुनता है, हाल ही में दुर्गा पूजा का अवसर, दुसाध जाती के लोग को माता का आशीर्वाद लेने नही दिया और गोलियाँ चला दी धार्मिक ठेकेदारों ने, तो ये क्योँ न अपना धर्म बदलें जहाँ इन्हें सम्मान मिले,
लेख में मानविय पहलु को नही अपितु अपने व्यक्तिगत दर्शन दिए गए हैं.
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arbind Pandey on 18 October, 2008 12:12;36
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Excellant & informative Article. It is high time to launch compaign aginst these anti social & anti National forces who are trying to widen gaps among our nationalistic society by using various means. Also we should focus on strengthening our society by educating our people regarding the nexus of anti national forces whether it is church/christian missionaries or so called human rights groups or several other groups patronising terrorist activities directly or indirectly.
Arbind Pandey
Uttistha Bharat Foundation
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meenu khare on 10 January, 2009 20:59;58
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Excellant & informative Article
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image आरएल फ्रांसिस पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मुवमेन्ट के अध्यक्ष आर एल फ्रांसिस ईसाई मिशनरियों के बीच व्याप्त भेदभाव और कटुता के खिलाफ लगातार अपनी आवाज बुलंद किये हुए हैं. आप उन्हें pclmfrancis@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.
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