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कोसी का घर कांधे पर और मुसीबत सिर पर

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दो महीने से भी कम में मानसून पुन: आ जाएगा। बिहार में पिछले मानसून में कोसी नदी में आई बाढ़ की क्षतिपूर्ति अभी तक नहीं हो पाई है। आज भी बाढ़ पीड़ितों को एक वर्ग राहत शिविरों एवं खुले आसमान के नीचे रहने को अभिशप्त है। कोसी क्षेत्र में एक कहावत प्रसिध्द है- 'कोसी का घर कांधे पर।' अर्थात् बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में रहने वाले यायावरों सी जिन्दगी जीने को विवश हैं। इस साल वे जहां रह रहे हैं, जरूरी नहीं कि अगले साल भी वे उसी जगह मिले।

कोसी की धार के साथ-साथ इनके घर भी बदलते हैं। बाढ़ का आकर इन लोगों का घर तोड़ती है और ये लोग पानी उतरने के बाद अपने घरों को फिर जोड़ लेते हैं। इस जोड़-तोड़ के खेल में जो नहीं टूटा है, वह है इस क्षेत्र में रहने वालों का हौसला।

सुपौल जिले के डूमरिया गांव के मोहम्मद मोहिनुद्दीन को 60 सालों की अपनी जिंदगी में 28 बार घर बदलना पड़ा है। जब-जब कोसी ने अपनी जगह बदली तब-तब मोहिनुद्दीन का कोसी के साथ इस तरह की आंख-मिचौली का खेल हुआ। जहां कल तक कोसी थी आज वहीं मोहिनुद्दीन का घर है। यह अकेली मोहिनुद्दीन की कहानी नहीं है। उन जैसे सैकड़ों हजारों लोगों का यह दर्द है। इस क्षेत्र में आपसी सहयोग की भावना ऐसी है कि कोई किसी की जमीन पर अपना घर बना ले तो जिसकी जमीन है उसे आपत्ति नहीं होती। लोग एक की जमीन से दूसरे की जमीन पर यायावरों की तरह इस उम्मीद में सफर कर रहे हैं, कि उनकी जो जमीन कोसी के गर्भ में है वह एक दिन बाहर आएगी। इतना कुछ गुजरने के बाद भी लोगों की नाराजगी कोसी से तनिक भी नहीं है। कोसी तो इस क्षेत्र की बेटी है और यहां रहने वालों के मन में उसके लिए 'मां' सा सम्मान है। लोगों की नाराजगी, उन लोगों से है जो प्राकृतिक नहीं 'सरकारी बाढ़' के लिए जिम्मेवार हैं। सबकी शिकायत सरकार, प्रशासन और व्यवस्था से है। जिनके लिए 'कोसी की बाढ़' रिलीफ फंड की गंगा है। यात्रा के दौरान एक भी ऐसा नहीं मिला जो कोसी को बिहार का शोक मानता हो। मोहम्मद मोहिनुद्दीन

हाल में ही (20 मार्च से 27 मार्च 2009) बाढ़ मुक्ति अभियान के संयोजक दिनेश कुमार मिश्र के सान्निध्य में उन क्षेत्रों में जाने का मौका मिला जहां बरसात के मौसम में जाया नहीं जा सकता। बाढ़ वास्तव में बिहार के लिए एक बार की समस्या नहीं है। यह हर साल आती है। उसके बावजूद अब तक इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सका। इसकी वजह है, बाढ़ के नाम पर आने वाला रिलीफ फंड। बाबू से लेकर अधिकारी तक ऐसा कौन है जिसने 'बाढ़ रिलीफ फंड' की गंगा से दो-चार बाल्टी पानी न निकाला हो? बाढ़ आने के साथ-साथ कुकुरमुत्ते की तरह एनजीओ उग आते हैं और बाढ़ खत्म होने के साथ-साथ खत्म भी हो जाते हैं। पता नहीं सरकार बाढ़ का स्थायी उपाय क्यों नहीं ढूंढती? बाढ़ प्रभावित जिलों में पंचायत स्तर पर नाव की व्यवस्था करवाना बहुत अधिक खर्चीला काम नहीं है। यात्रा के दौरान कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं से बातचीत के दौरान पता चला कि सरकार ने कुशहा में मरम्मत के समय कुछ लाख रुपया बचाने के लिए लाखों लोगों की जान दांव पर लगा दी और अरबों रुपयों का नुकसान उठाया। हमारी यात्रा जारी थी। यात्रा के क्रम में जब हम लोग नेपाल के सुनसरी जिले में आने वाले कुशहा तटबंध पर पहुंचे तो वहां काम जोरों पर था।

यह वही कुशहा थी, जहां 18 अगस्त 08 को तटबंध टूटने की वजह से बिहार को भीषण बाढ़ से जूझना पड़ा था। जिसकी वजह से बिहार के पांच जिलों के 35 प्रखंडों के 993 गांवों के 33.29 लाख लोग प्रभावित हुए थे। इससे 3.68 लाख हेक्टेयर जमीन बाढ़ की चपेट में आई और 2.37 लाख मकान क्षतिग्रस्त हुए। लगभग 600 लोगों के शव बरामद कर लिए गए हैं और उनकी पहचान हो गई है। उसके बाद भी अभी तक हजारों लोग लापता हैं। कुशहा में मौजूद इंजीनियरों ने आश्वस्त किया कि 20 अप्रैल 09 तक तटबंध की मरम्मत का काम पूरा हो जाएगा। परंतु इस बार फिर पानी का दबाव बढ़ने पर तटबंध नहीं टूटेगा इस बात की गारंटी लेने को कोई तैयार नहीं है। यह विश्वास जरूर दिलाया गया कि तटबंध उस जगह से नहीं टूटेगा, जहां पिछली दफा टूटा था। कुशहा के बाद हम लोग पहुंचे सुनसरी जिले के ही प्रकाशपुर के अंतर्गत राजाबास गांव में बने तटबंध पर।

यहां कोसी तटबंध के बिल्कुल पास पहुंच चुकी है और तटबंध की हालत खस्ता है। यदि केन्द्र और राज्य सरकारें नहीं जागीं तो कुशहा साबित न हो जाए। नेपाल में कुशहा और प्रकाशपुर तटबंधों की देखभाल का काम भारत के पास ही है। कुशहा का क्षेत्र नेपाल में सुरक्षित क्षेत्र घोषित होने की वजह से आम नेपाली व्यक्ति तटबंध तक नहीं जा सकता। पिछले साल जिन लोगों ने टूटने से पहले कुशहा तटबंध को देखा था, उनमें एक माओवादी नेता देवनाथ यादव भी थे। यादव के अनुसार उस वक्त तटबंध पर बिछाए गए पत्थर बालू में तब्दील हो गए थे। वहां इस्तेमाल की गई जाली भी सड़ गई थी। कमाल की बात तो यह है कि तटबंध टूटने से पहले वहां से जाली और बोल्डर हटा लिए गए थे। इसलिए इतना नुकसान हुआ। कुछ-कुछ ऐसे ही हालात इस वक्त प्रकाशपुर में हैं। आने वाले समय में कोसी की धार किस रास्ते मुड़ेगी कोई नहीं जानता। इसलिए हमें सतर्क हो जाना चाहिए। जानकारों के अनुसार इस बार प्रकाशपुर का बांध टूटा तो पूर्णिया को बचा पाना भी मुश्किल होगा।

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Sanjay Swadesh on 01 May, 2009 20:10;29
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Anshu ji.
bahuch achhi report hai. visfot par bihar ki report ki hi kami khal rahi thi.
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image आशीष कुमार बेतिया से पढ़ना शुरू किया और दिल्ली आकर पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ ली. दसवीं कक्षा पहुंचने तक आधा दर्जन स्कूलों को नाप चुके आशीष कुमार 'अंशु' आजकल एक घुमंतू पत्रकार के तौर पर देश को नाप रहे हैं. लिखते-पढ़ते स्कूली छात्रों के साथ मिलकर मीडिया स्कैन भी निकालते हैं और सोपानस्टेप के लिए घूमते-फिरते कार्यरत भी हैं.
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