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ग्वालियर बस अडडे से सुनें एमपी की कहानी

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शहर के बीचोंबीच ग्वालियर का बस अड्डा, जिले के अंदर एवं अन्य जिलों और राज्यों में जाने वाले यात्रियों की भारी भीड़ करीब झांसी ग्वालियार रोड के उपर ही खड़ी है। ऐसा इसलिए कि खस्ताहाल बस अडडे के बाहर मध्यप्रदेश परिवहन निगम जरूर लिखा है अंदर जाकर गाड़ियों को खड़ी करनी के लिए काफी बड़ा फील्ड भी है लेकिन दोपहर से लेकर रात नौ बजे तक उस फील्ड में एक भी बस खड़ी नही दिखती। स्थानीय लोग कहते हैं यह हाल पिछले तीन दिन से है। बसें तो जिस दिन से चुनाव की घोषणा हुई उसी दिन से सड़कों पर कम दिखाई देने लगी लेकिन जब से मतदान के दिन नजदीक आ रहे हैं बसें सड़कों से पूरी तरह गायब कर दी गई हैं।

पहले इन बसों को राजनैतिक दलों और सरकार ने अपने प्रचार में लगाया। उसके बाद चुनाव डयूटी के नाम पर जनता को पब्लिक ट्रान्सपोर्ट से पूरी तरह महरूम कर दिया गया। अब हालात यह है कि सड़कों पर दौड़ती बसों को नेताओं और चुनाव ड्यूटी के लिए प्रशासन को जब्त करना पड़ रहा है। सुनने में आया कि कुछ वर्ष पहले घाटे में चल रहे सरकारी बस बेड़े को सेवा मुक्त कर दिया गया था तब से मध्य प्रदेश की अपनी कोई परिवहन व्यवस्था नही है।

बसों में भीड़ एवं अफरातफरी के चलते ताज एक्सप्रैस छूट गई। ग्वालियर बस अड्डे पर दिल्ली आने वाली बस का सात घंटे इंतजार करने के बाद जब रात नौ बजे दिल्ली आने वाली एक बस मिली तो उसे मुरैना में रोक लिया गया। यह काम वहां पर एक दर्जन पुलिसवाले ही नही खुद एसडीएम मुरैना भी कर रहे थे। दिल्ली आने वाली उस बस को तमाम कारणों के चलते रोक दिया गया। बस में बैठे तमाम यात्रियों के अनुरोध को भी एसडीएम ने मानने से इन्कार कर दिया। शुरूआत में एसडीएम बस के स्टाफ को यही कहता रहा कि उसने मांगी गई बसें उन्हें उपलब्ध नही कराई हैं, लेकिन बस का ड्राइबर कहता रहा कि उनके पास जो नौ बसें थी उसमें से 6 बसें पहले प्रशासन को सौंप दी गई हैं। एसडीएम इतने भर से संतुष्ट नही हो रहा था। उसे शायद उस ट्रांसपोर्टर से सारी ही बसें चाहिए थी, इसलिए यात्रियों के अनुरोध को एसडीएम ने यह कहकर टाल दिया कि उस बस का परमिट ही नही है। इस पर यात्रियों ने दलील दी कि इस तरह की बस को जिसका परमिट नही है प्रशासन ने सड़क पर उतरने ही क्यों दिया? इसका कोई जवाब न तो उस एसडीएम के पास था और नहीं मध्यप्रदेश जैसे बड़े और पुराने राज्य में कई दशकों में परिवहन व्यवस्था के नाम पर इंसपैक्टर राज की लाठी भांज रहे उन स्वनामधन्य नेताओं को जो मध्यप्रदेश में घोटालों और भ्रष्टाचार की गंगा बहाकर तो धन के अंबार पर बैठ गए लेकिन परिवहन व्यवस्था के नाम पर राज्य में निजी परिवहन बेड़े के रूप में एक बस भी नहीं बचा पाये।

इसलिए पिछले चार दिन से पूरे दिन खड़े होकर हताश रात के नींद की तलाश में रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूमों का टिकट लेकर रात बिता रहे लोगों को देखकर लगेगा कि आंखिर नेताओं और चुनाव आयोग द्वारा दी जा रही इस आकस्मिक सजा के बाद फिर प्रजातंत्र के हवन में अपनी अंगुलियां क्यों काली की जायें? क्या दोबारा फिर इसी तरह का कोई शासन प्रशासन आयेगा और वह यात्रियों से भरी बसों से उन्हें बाहर धकेल कर सड़कों पर रात बिताने को मजबूर कर देगा। झांसी, डबरा, टेकनपुर और अन्य स्थानों से ग्वालियर आने जाने वाले लोग कोई आम या आये गए यात्री नही हैं। वे सरकार और पार्टियों के वोटर हैं। लेकिन उन्हें प्रशासन और राजनैजिक दलों की दादागिरी के बारें में सब पता है। वे कहते हैं यह तो यहां का रोज का हाल है। कोई भी चुनाव आये पहली मार राज्य के उस परिवहन तंत्र पर पड़ती है जिसमें सरकारी परिवहन तंत्र के नाम पर ग्वालियर की तरह उजड़े बस अडडे हैं। इन बस अड्डों के अंदर बने बंजर कमरों टिकट काउंटरों और इंतजार करने के तामझाम को देखकर यह तो किसी को भी लग सकता है कि जब बस अडडा बनाया गया होगा तब इस बात का ख्याल रखा गया था कि राज्य में परिवहन तंत्र के नाम पर बसों का बेड़ा भी होगा। लेकिन प्रशासनिक काहिली ने एक तंत्र को हमेशा के लिए मिटा दिया गया।

24 तारीख से सड़कों पर एक भी बस नही है। ग्वालियर सिंधिया राजघराने का शहर है। बस अडडे और रेलवे स्टेशन के आसपास से ही ग्वालियर का विशाल किला नजर आता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया इस बार गुना से लड रहे हैं लेकिन उन्हें भी शायद चुनाव के महाकुंभ से परिवहन व्यवस्था के नाम पर की गई जनता की इस दुर्गति का कोई अहसास शायद ही हो। कुछ यात्रियों द्वारा इस संबंध में एसडीएम के सामने उनका नाम लेने पर वह और भी आग बबूला हो गया। जिससे लोगों को यह भी अहसास हुआ कि वह मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार की तहे दिल से नौकरी कर रहे हैं, लेकिन इसे वह चुनाव आयोग के आदेश के रूप में किसी और बहाने से बताना चाहता है।  कुछ लोगों के इस बाबत चुनाव आयोग में शिकायत लगाने का जवाब तो उसने कुछ यों ही दिया कि उन्हें किसी शिकायत से कोई फर्क नही पड़ता। क्योंकि वे वही कर रहे हैं जो जरूरी है। एसडीएम मुरैना की तहरीरों से कोई भी भ्रमित हो सकता है क्योंकि वे जिस जब्ती को चुनाव का दायित्व बता रहे थे उसे जनता सरकार और राजनैतिक दलों की निजी सेवा बता रही थी। यों भी ग्वालियर जैसे आम जिले में चार दिन पहले मतदान के लिए कर्मचारियों की तैनाती के लिए इतनी बसों की आवश्यकता क्यों पड़ गई । एक बस आपरेटर ने बताया कि ग्वालियर में परिवहन विभाग के पास अपनी कोई भी बस नही है। प्रशासन ने निजी आपरेटरों को ही परमिट दिये हैं वे ही राज्य परिवहन का बोर्ड लगाकर यात्रियों को ले जाते हैं। इसी तरह प्राइबेट आपरेटरों को भी परमिट दिये गये हैं। लेकिन ये परमिट राज्य सरकार की मर्जी पर हैं।

चुनाव से ठीक आठ दस दिन पहले से मध्यप्रदेश में सत्ताधरी दल इसी शर्त का वीटो पावर के रूप में इस्तेमाल करते हैं। वे सारी बसों को अपने कब्जे में ले लेते हैं जो उनकी बात नही मानता उसके परमिट रद्द करने की ध्मकी दी जाती है। यह काम कुछ सरकारी गुंडागर्दी की ही शक्ल में होता है। यह सब देखने के बाद सवाल उठना लाजिमी है कि जनता को परिवहन से महरूम रखने वाली यह अराजकता शायद निखालिस भाजपा के राज्य की ही अराजकता और गुंडागर्दी नही होगी इससे पहले भी यह होता रहा होगा। यदि ऐसा नही होता तो चुनाव के समय एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए कोई भी कसर न छोड़ने वाली पार्टियां इस तरह दूसरे को इस कृत्य के लिए माफ क्यों कर देती। निश्चित तौर पर कांग्रेस के समय भी यह सब होता रहा होगा।

जो भी हो चुनाव के बाद भी बहुत जल्दी लोग यह गारंटी नही मानते कि स्थिति सामान्य हो जायेगी क्योंकि इन्हीं बसों पर फिर हार जीत के जश्न होंगे। इसलिए लु और गर्मी की सड़ांध से सराबोर ग्वालियर में परिवहन की टीस लंबे समय तक बनी रहेगी। ऐसा भी लगता है कि जब समाज राजनैतिक दलों द्वारा अंधेरे में थोप दी गई गुलामी को मजबूरी के नाम ढो रहे हैं तो वे एक सहज मानसिकता भी बना चुकी हैं कि चुनाव होगा तो उन्हें कुछ दिन असुविधा होगी ही क्योंकि उनके स्वाभाविक काम को जनतंत्र ताक पर रखने की अनुमति प्रशासकों और शासकों को अग्रेजी राज के समय ही दे चुका है, भले ही यह नियमों और आदेशों की शक्ल में उन्हें स्वतंत्र भारत में कानून के रूप में बाद में नजर आया हो।

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gwalior on 04 May, 2009 19:24;01
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सुनने में आया कि कुछ वर्ष पहले घाटे में चल रहे सरकारी बस बेड़े को सेवा मुक्त कर दिया गया था तब से मध्य प्रदेश की अपनी कोई परिवहन व्यवस्था नही है।
निश्चित तौर पर कांग्रेस के समय भी यह सब होता रहा होगा।

आपने ठीक सुना है ,यह अराजकता तभी से चली आ रही है ,परिवहन निगम को ताबूत में तभी डाला गया .उन दिनों सत्ताधारी दलों के नेताओं की बसे रास्ट्रीय राज मार्गों तक पर बिना परमिट चलतीं थी ,जिसके कारण जनता को सस्ता परिवहन सुलभ था . उन दिनों खनिज रोयल्टी भी भरना बहुत आवश्यक नहीं होताथा इसलिए भवन निर्माण सामग्री सस्ती मिलती थी .लेकिन तबमध्य प्रदेश की सड़कों की हालत इतनी शानदार थी कि व्यंग्य लेखकों को बिना प्रयास मसाला उपलब्ध रहता था .नर्सिग होम वाले डिलीवरी केसेस के लिए तरसते थे .चोरो कि मदद बिजली विभग को झख मार कर करना पडती थी.आज मध्य प्रदेश संकट में है क्यों कि रोयल्टी चोरी नहीं हो पा रही है बहू को डिलीवरी के लिए अस्पताल ले जाने से बचने का सास का बहाना "रस्ते में ही हो गई "अब चल नहीं पा रहा है .बिजली चोरी में कमी आने से किसनो को पानी फोकट में नही मिल पा रहा है .सो ग्वालियर से आपने मध्य प्रदेश का जो आकलन किया है वह बहुत सटीक है यहाँ का प्रशाशन इतना निकम्मा है कि पूरे लोकसभा चुनाव में एक भी री पोल नही हो पाया .कोई पोलिंग बूथ नहीं लुटा .सच खा आपने भैया हमारे ग्वालियर कि हालत बहुत खराब है
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cartoonist ABHISHEK on 04 May, 2009 19:39;37
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और शिवराज सिंह गला फाड़- फाड़ कर
चुनाव सभाओं में चिल्ला रहे हें की हमने
मध्यप्रदेश को चमन कर दिया है....
इस आँखों देखी हकीकत की बयानी के लिए
आपका शुक्रिया...

regards
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Satish Tripathi on 05 May, 2009 13:00;03
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चुनाव आयोग की सख्ती को प्रदेश सरकार की अराजकता और गुंडागर्दी नही माना जा सकता एक बस स्टैंड से एक यात्रा से एम पी की कहानी बात जमी नही
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parshuram (Fire on orkut) on 06 May, 2009 16:41;30
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cartoonist abhishek ji
that is all. good manner showing your frustration. only buses is the parameter to abuse shivraj ji.
your congress govt. has given him this bus department to bjp. they are just renovating the transport department.
same thing here in haryana where your faviourate congress govt. ruling and ruining the state.
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image नीरज जोशी नैनीताल समाचार से पत्राकारिता की शुरूआत नब्बे की शुरूआत तब से दिल्ली में कुछ अखबारों की चाकरी के साथ साथ लगातार अखबारों के लिए कलम घिसी अभी भी पहाड़ों के दर्द से सारोबार होकर उसमें डूबने की चाह हिमालय, नदी और समाज के लिए अनथक काम करने के अवसरों की तलास में हाल दिल्ली में रहकर लेखन एवे पत्राकारिता।
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