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बाढ़ से ज्यादा राहत का कहर

image बाढ़ का सबसे बुरा असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ा है

बथनाहा रेलवे स्टेशन पर पनाह लिए बाढ पीडितों की सुरक्षा के इंतजामों का मुआयना करने गया वह अफसर नशे में था। बेसुध पडी एक महिला के शोर मचाने पर लोगों ने उसे मारपीट कर दूर तक खदेड दिया। घटना स्टेशन की थी, इसलिए थानेदार केके चौधरी को निलंबित कर गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन बिहार पुलिस के प्रवक्ता एडीजी अनिल सिन्हा ने पुलिस-मुख्यालय की तत्परता का उल्लेख करते हुए जो स्पष्टीकरण दिया और बाढ पीडित इलाके में कानून-व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए पुलिस मुख्यालय के पूरीतरह सचेत होने का जो दावा किया, उससे भी इलाके की हालत पर काफी रोशनी पडती है।

कोसी को बिहार का शोक ठहराकर अंग्रेजी दौर में जिस धरती को लाश में बदल दिया गया था, जिस सामाजिक पृष्ठभूमि पर फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यासों खासकर परती-परिकथा की रचना हुई थी, उसने आधुनिक विकास बनाम सामाजिक विनाश का एक लंबा चक्र पूरा कर लिया है। फिर सब कुछ वहीं पहुंच गया है, जहां से आजाद देश की नागरिक सरकार ने अपनी यात्रा का आरंभ किया था। कोसी की इस लहर ने सब साफ-साफकर दिया है।

छीना-झपट, लूटमार, छेड़खानी, दुष्कर्म के प्रयासों का कहर बाढ़ की उफनती लहरों के स्वाभाविक सवार नहीं होते। यह सब उस राजनीतिक संरचना की पैदाइश हैं जो सामाजिक तानाबाना को तार-तार करते आर्थिक कार्यकलापों से निकली हैं। बाजारवाद का नंगा खेल तो उसकी अगली कड़ी है जिसका नया ताजा दौर बिहार में देर से आरंभ हुआ है। लेकिन जिस धरती पर पप्पू यादव, आनंद मोहन जैसे नेता घास की तरह उगने लगे हों, उस धरती से ऐसी खबरों पर जगन्नाथ मिश्र की बौखलाहट समझ में आती है। जिस इलाके की संपन्नता के लिए कोसी तटबंधों को श्रेय देते हुए वे अभियान चलाते रहे हैं और शायद उन्हीं अभियानों की वजह से अपने बेटे नीतीश मिश्र को आपदा प्रबंधन जैसे दूधारू विभाग का मंत्री बनवा पाए जिस विभाग को मुख्यमंत्री के सीधे नियंत्रण में रखा जाता है। लेकिन आपदाओं के समय जिन औरतों और बच्चों को बचाने पर अधिक जोर होता है, बचाने वालों में उनका शिकार करने वालों के शामिल होने की जैसी खबरें छन-छनकर राज्य और देश की राजधानी में पहुंची हैं। वैसी खबरें किसी सुनामी या भूज के भूकंप या भोपाल-कांड में नहीं आईं।

इससे समझ में यही आता है कि जब पूरे क्षेत्र को सेना को सौंपने की दरकार थी, तब समूचे प्रशासन को लकवा मार गया था। जिसे भी होश आया, स्वयं को बचाने में लग गया। डीएम, एसपी, एमएलए, बीडीओ, दारोगा के अपनी जान बचाकर भागने की खबरें भी आई, पर अगर कार्यनस्थल से नहीं भागें तब भी दफ्तर के जरूरी कागजात बचाने का प्रयास पहले करना होगा। आम-जनता के बारे में सोचने और करने का अवसर उसके बाद ही मिल सकता है। कोसी कछार के इस क्षेत्र में भले ऐसी बातें नईं हैं, पर अन्य बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में भी प्रशासन पहले लाचार हो जाता है और अपने को बचाने की व्यस्तता में लोगों की सुध लेने की हालत नहीं रहती।

खगडिया जिले को नमूना मान सकते हैं। बिहार में कहीं भी बाढ आए, उसका पानी इस जिले से गुजरता है। बुढ़ी गंडक से कोसी के बीच किसी नदी का तटबंध टूटे। इस जिले के निवासियों को डूबना होता है। इस जिले में हर बाढ़ के समय जिलाधिकारी को अपना आवास छोड़ना पड़ता है। शहर के किसी होटल से सरकारी कामकाज का संचालन होने लगता है। बीते साल 2007 में बूढ़ी गंडक के बेगूसराय और बागमती-कमला-अधवारा की साझा-धारा करेह के तटबंध दरभंगा-समस्तीपुर जिले में टूटे और दोनों नदियों का साझा पानी करीब 15सौ वर्ग किलोमीटर में फैल गया। नतीजा हुआ कि जिले के सात में से पांच प्रखंड कार्यालय विस्थापित होकर जिला-मुख्यालय के होटलों में आ गए। परसाहा थाना के विस्थापित होने पर निकट के नेशनल हाईवे से सटे मंदिर में पनाह मिल गई थी, पर पुलिसकर्मी आमलोगों की राहत के लिए आए पोलिथिन को टांगने के बाद भी जूते और बेल्ट जैसे डियूटी की जरूरी चीजें बचाने में लगे थे। पास-पडोस में कुछ भी हो जाए, कुछ करने की स्थिति नहीं थी। वह थाना पूरे दो सप्ताह पंगु बना रहा। ऐसी खबरें और तस्वीरें छपने के बाद भी बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के थानों के लिए नावों की व्यवस्था करने की जरूरत सरकारी अमला को समझ में नहीं आई।

अचानक सैलाब के सामने बेबस हो गए लोगों के धन छीनने के साथ-साथ धर्म को नष्ट करने की वारदातों की आरंभिक घटनाएं अररिया जिले के बथनाहा से 17 किलोमीटर दूर फुलकाहा गांव के आसपास से आई। बचाने के एवज में मोटी रकम वसूलने की घटनाओं की अनदेखी की जा सकती है। पर जेवर उतरवा लेने, जबरन छीन लेने और आबरू पर हाथ डालने की खबरें पहले नहीं आई हैं। डूबती महिलाओं को बचाने में नावों पर कब्जेवार दबंगों ने क्या-क्या किया, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। मधेपुरा क्षेत्र में पानी के साथ-साथ इनका प्रच्छन्न प्रवेश हुआ। जान लेकर निकले लोगों के पानी में डूबे घरों के ताले तोडे जाने की  घटनाएं 22 अगस्त से 27-28 अगस्त तक खूब हुईं। 26 अगस्त को रेडियो पर पहली बार मुख्यमंत्री की अपील और सेना की टूकडियों के पहुंचने से अराजक अफवाहों से बदहवाश लोगों को तनिक राहत मिली। पर मुख्यमंत्री को फिर दसवें दिन चार सितंबर को फिर यही अपील करनी पड़ रही है कि घर का मोह छोड़कर पानी से निकलें। अफवाहों पर ध्यान मत दें। बाकी उनका गा-गे-गी राग है, जिसका बिहार की जनता को अभ्यास होता जा रहा है। इसमें शिविरों में ही ऐसी वारदातों की रपट लिखाने की सुविधा मुहैया कराना भी है। पर जब मंत्री-विधायक पीटे जाने लगे हों और धोती संभालते भागते नजर आने लगे हों, इन घोषणाओं को अमल में लाना कितना कठिन और कितना जरूरी होता है, इसका अंदाजा पटना में बैठे सत्ताधीशों को शायद नहीं।

दुष्कर्म के आरोप की धार को कमजोर करने में पुलिस मुख्यालय के एडीजी अनिल शर्मा ने बताया कि थानेदार केके चौधरी ने शिविर में रह रहे लोगों के साथ मारपीट की थी, इसी क्रम में उसपर छेड़खानी का आरोप लगा। एसपी को जांच के लिए कहा गया है, लेकिन यह नहीं बताया कि उसने मारपीट क्यों की थी। इस आला पुलिस अधिकारी की बातों पर यकीन करते हुए क्या यह मान लेना चाहिए कि हालत सचमुच ऐसी है जिसे संभालने के लिए कुछ गोलमोल बातें करनी पडे, लेकिन क्या ऐसी गोलमोल बातों से बीते दिनों हुई घटनाओं के दंश मिट जाएंगे। यह जरूर है कि इलाके की विधि-व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए अन्य जिलों से पुलिस, सैन्य पुलिस व होमगार्डों को तैनात किया गया है। लेकिन जब समाज का अपना राजनीतिक-व्यवस्थागत ढांचा ध्वस्त हो गया हो, तो पुलिस कैसी बन सकती है। सेना के जवान भी क्या कर सकते हैं जिनके आने के बाद कुछ इलाकों में हालत सुधरी, पर कथाकार गौरीनाथ की माने तो फौजी जवान भी पाकसाफ नजर नहीं आते।

अफवाहों पर ध्यान नहीं देने की अपील करते मुख्यमंत्री का अगला वाक्यइसलिए अधिक चौंकाता है। उनके शब्द हैं कि जब तक तटबंध को बांध नहीं दिया जाता, कोसी को पुरानी धार में धकेल नहीं दिया जाता़, डूबे इलाके में रहना खतरे से खेलना है। लोगों को निराश, हताश और लाचार होकर ऐसे घरों को वापस लौटने से रोकने के लिए तो यह अपील ठीक लगती है, जिन घरों में जीवन-धारण का कोई साधन उपलब्ध नहीं हो। पर तटबंध को बांधने की बात कटे पर नमक छिड़कने जैसा है क्योंकि लोगों को अब पता है कि कोसी के रास्ते इससे बड़ी आफत इससे अधिक अचानक नहीं आने वाली। तब तक नहीं आने वाली, जब तक फिर कोसी को फिर से बांधने-धकेलने की नाकाम साबित हो गई तकनीक को लेकर बेवकूफी भरा दंभी प्रयास नहीं होता। और मुख्यमंत्री उस दंभ का प्रदर्शन करने में तनिक भी परहेज नहीं कर रहे।

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sangita puri on 11 September, 2008 23:38;26
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शर्मनाक घटनाएं। सही कहना है आपका कि लेकिन जब समाज का अपना राजनीतिक-व्यवस्थागत ढांचा ध्वस्त हो गया हो, तो पुलिस कैसी बन सकती है।
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