डबल इन्कम नो किड्स
म्याऊं बिल्लियों की बोली ही नहीं दिल्ली के एक रेडियो स्टेशन का भी नाम है. यह रेडियो स्टेशन महिलाओं को समर्पित है और संभवतः मानता है कि
महिलाओं का स्वभाव बिल्लियों जैसा होना चाहिए इसलिए उसने महिलाओं के लिए बने इस रेडियों स्टेशन का नाम ही म्याऊं रख दिया. संभवतः यह नव नारी जागरण है जो यह संदेश देता है कि महिलाओं को गाय की संज्ञा और उपमा देना बंद करो. वह बिल्ली की तरह तेज-तर्रार और घातक होने की ओर अग्रसर है. हो सकता है अभियान सफल हो तो आनेवाले दिनों में लोमड़ी या ऐसा ही कोई टीवी स्टेशन आ जाए जो महिलाओं को समर्पित होगा.
महिलाओं के लिए विशिष्ठ रेडियो स्टेशन की बात बाजार में पैठ बनाने की बहुत अच्छी रणनीति है. रेडियो म्याऊं रेडियो टुडे ब्राडकास्टिंग की परियोजना है जो इस संभावना से पैदा हुआ है कि देश में रेडियो सुननेवालों का नया दौर आ चुका है. मेडिसन मीडिया रिसर्च का कहना है कि देश के 56 फीसदी आबादी के पास रेडियो पहुंच रहा है जिसमें मेल फीमेल दोनों लगबग समान रूप से स्रोता हैं. ऐसे में अगर महिलाओं के लिए समर्पित कोई कोई रेडियो स्टेशन हो तो न केवल फीमेल स्रोताओं का यह पसंदीदा रेडियो स्टेशन होगा बल्कि मेल स्रोता भी यहां खिंचे चले आयेंगे. मेडिसन रिसर्च यह भी बताता है कि सबसे ज्यादा 70 प्रतिशत रेडियो घर में सुना जाता है, जाहिर सी बात हैं घर का मतलब यही होना चाहिए कि महिलाएं रेडियों की सबसे बड़ी स्रोता हैं.
ऐसे ही कमाई की लबालब संभावनाओं से उपजे रेडियो म्याऊं पर 24 जून 2008 सायं 6 बजे एक बहस हुई जिसका विषय था- डबल इन्कम नो किड्स सिंड्रोम, म्याऊं. रेडियो जॉकी द्वारा बहस में महिलाओं को लगातार इस बात के लिए उत्तेजित किया जा रहा था कि आप बच्चे पैदा क्यों करती हैं? जिंदगी में फन (खुशी) के और भी बहुत सारे रास्ते हैं फिर बच्चा पैदा करना क्यों जरूरी है. जिस पहली महिला गीता ने फोन किया आखिर में वह इस बात को जस्टीफाई नहीं कर पायी कि उसने बच्चा पैदा ही क्यों किया? मसलन उस महिला ने कहा कि हमारे हसबैण्ड और परिवारवाले चाहते थे इसलिए हमने बच्चा पैदा किया तो तुरंत उस रेडियो जाकी ने सवाल किया अगर आपके हसबैण्ड और आपके परिवारवाले कल को कहेंगे कि आप नौकरी छोड़ दें तो आप छोड़ देंगी. उसने थोड़ा सहमते हुए कहा कि हां, मैं ऐसा ही करूगी. तुरंत जाकी ने अगला सवाल दागा तो क्या आपकी अपनी कोई मर्जी नहीं है? अब इस सवाल के जवाब में फोन से अलग होने के अलावा उसके पास कोई रास्ता नहीं था.
करीब घण्टेभर चली इस बहस में जाकी ने बार-बार लोगों से यही सवाल पूछा कि आप बच्चा चाहते ही क्यों हैं, लेकिन सच में किसी के पास भी संतोषजनक उत्तर नहीं था. आखिर में यह धारणा हावी हुई कि मंहगाई के इस जमाने में जब अच्छी शिक्षा और सुविधासंपन्न जीवन एक आदमी के लिए भी दुरूह होता जा रहा है तो ऐसे में बच्चे पैदा करना कहां की समझदारी है. इससे अच्छा है कि आप अपने कैरियर पर ध्यान दें, पैसे की आमद बढ़ाएं और अभी जितना कंज्यूम कर रहे हैं उससे ज्यादा कंज्यूम करने की आदत डालें. अभी खाते हैं तो ठूंस-ठूंस कर खाने की आदत डालिए. घर में सीमित साधनों से जीने की बजाय असीमित संसाधनों का ऐसा जंगल अपने आस-पास खड़ा करिए आप ही गायब हो जाएं. यह सब करने के लिए अगर आपके पास पैसा न हो तो लोन लीजिए और फिर लोन को चुकाते हुए मजे से जिंदगी गुजार दीजिए.
अगर यह मानसिकता लोगों की बनती है तो बाजार जीतता है. बाजार की ताकतें चाहती हैं कि लोग बाजार पर निर्भर ही न हों बल्कि बाजार के गुलाम हो जाएं. मसलन एक महिला ने बताया कि उसका "बेबी ब्वाय" डेढ़ साल का है इसलिए अब वह बहुत व्यस्त रहती है. वह इतनी व्यस्त रहती है कि दिसंबर 2006 से उसने थियेटर में जाकर कोई फिल्म नहीं देखी है. अब जब देश में 1 लाख करोड़ का मनोरंजन उद्योग की संभावनाएं देखी जा रही हैं तो ऐसे में बच्चे का घर में आना किसी महिला को थियेटर से दूर करता है. इंडस्ट्री को भला यह क्यों बर्दाश्त होगा. अगर बच्चा बाजार बढ़ाता है तो बच्चा चाहिए अगर वह बाजार के रास्ते में रोड़ा बनता है तो उसके होने पर पाबंदी होनी ही चाहिए.
सत्तर के दशक में घोषित नसबंदी के कारण बदनाम हुए संजय गांधी आज जिन्दा होते तो शायद खुश होते. क्योंकि उनका काम अघोषित रूप से बाजार ने अपने हाथ में ले लिया है. बाजार एक विकराल असुर की तरह फैल रहा है. आप सीधे तौर पर उसकी निशानदेही भले ही कहीं न कर सकें लेकिन हर कर्म में वह सूक्ष्म रूप से प्रविष्ट हो गया है. बाजार के भरोसे जीनेवाली पीढ़ी को फन चाहिए. मौज मस्ती मजा चाहिए. लेकिन वह उन जड़ों को काटकर मजा लूटना चाहता है जिसे संतति कहते हैं. अब बाजार और समाज नहीं बल्कि बाजार और परिवार आमने-सामने आ गये हैं. जिस न्यूक्लियस फेमिली की अवधारणा पर पूरा बाजार अपना बिजनेस संचालित करता है उसे देर-सबेर भारत में तो स्थापित होना ही है जिससे आप अपने सुख-दुख में परिवार और समाज के सहानुभूति के कंधे की बजाय बाजार के कीमतवाले कंधे की मांग शुरू कर दें.
अब आप बताईये, आप बच्चा क्यों चाहते हैं?
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उस रेडियो जाकी को यी जवाब देना था कि भाई अगर तुम्हारे माता-पिता भी यही सोंच लेते तो तुम ये सवाल पूंछने के लिये कहां से आते?
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