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जन-जीवन

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सोनाली शुभम की सफल प्रेम कहानी

झारखंड की निरूपमा भले ही प्रेम में हार गई हो लेकिन बिहार की सोनाली शुभम अपने इम्तिहान में पास हो गयी . इन दोनों ने प्रेम किया था . लेकिन दोनों के परिणाम अलग अलग रहे. निरूपमा का प्रेम देश की राजधानी का प्रेम था. सोनाली की प्रेम कहानी राजस्थान की शैक्षणिक नगरी कोटा में परवान चढी. दोनों को देखा जाये तो सोनाली ने जो राह चुनी उसमें कांटे कहीं अधिक थे और आगे भी रहेगें . सोनाली की सफलता में उसके प्रेम की पवित्रता को सफल माने या फिर उसकी दृढता को. निरूपमा ने जो किया उसमें गलत क्या है? ये विश्लेषण का विषय हो सकता है.
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सूचना अधिकार पर नौकरशाही की नकेल

आजादी के बाद इस देश में तमाम तरीके के कायदे कानून बनाये गये जिनका उद्देश्य जनहित था । कौन सा कानून अपने उद्देश्य में कितना सफल है, उस पैमाने पर यदि सूचना के अधिकार अधिनियम का आंकलन किया जाये तो यह अधिनियम अच्छे के उद्देश्य के बाद भी अच्छे क्रियान्वयन की बाट जोह रहा है।
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दहेज के मुकदमों में बिक रहे हैं थाने

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भारतीय दण्ड संहिता (आई.पी.सी.) 1860 की कुल 511 धाराओं में से एक भी धारा ऐसी नहीं है जो किसी निरपराध व्यक्ति को सामाजिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करने या फिर दण्डित करने की पक्षधर हो, बावजूद इसके इन्हीं आपराधिक धाराओं की आड़ में हमारे देश के खाकी वर्दीधारी पुलिसिया रणबांकुरे जवानों ने ऐसे-ऐसे हथकंडों को अपना कर अपने जौहर का प्रदर्शन किया है कि आई.पी.सी. की इन्हीं आपराधिक धाराओं के तहत देश के लाखों निरपराध - बे-कसूर न सिर्फ सामाजिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं, बल्कि लाखों लोग सालों-साल से जेल के सीखचों के भीतर यातना का दंश भी झेल रहे हैं। कारण सिर्फ एक, इसी भारतीय दण्ड संहिता की आपराधिक धारा एवं पुलिसिया जौहर का नापाक प्रदर्शन!...
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प्यार की पंचायत पर कुर्बान हुआ परिवार

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रात के सन्नाटे को चीरती देहरादून एक्सप्रेस उसके ऊपर से गुजर गई. लेकिन दहशत के उन पलों में भी वो अपने परिवार की सलामती के बारे में ही सोचती रही. ऊपर से गाड़ी गुजर जाने के बाद उसने सबसे पहले अपने भाई रोहित को खोजा. उसके बाद मिले पिता, माँ बहिन और चाची के चिथड़ों ने उसे बदहवास कर दिया. सप्ताह भर बीत जाने के बाद भी उसके चेहरे पर अकेले रह जाने का खौफ साफ दिखाई दे रहा है. उसे चाची से कोई शिकायत नहीं. पंचों के फैसले को वो भले ही समझ नहीं पा रही है. लेकिन खुद के अकेले रह जाने के लिए वो उन्हें ही जिम्मेदार जरूर मान रही है. ...
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हर तरफ इंसान है, तबाही है

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इंसान जानवरों के साथ क्या क्या ज्यादतियां नहीं करता..मिसाल के तौर पर शरीर पर लगाये जाने वाले प्रसाधनों के लिए उनको पीड़ित करना या फिर बूचड़खाने में एक जानवर को दूसरे जानवर की आँखों के सामने बेदर्दी से मार देना, उसका चमड़ा निकालना, मुर्गों, सांप-नेवले की जानबूझकर ज़बरदस्ती लडाइयाँ करवाना- ऐसे खेलों पर शर्तें लगा पैसे ऐंठना, बन्दर-सांप-भालू के करतब दिखाना, तेल के लिए जीवित सांडे/छिपकली को उबलते पाने में जीवित डाल देना. इंसान अपने स्वार्थ, मनोरंजन या ज़रुरत के लिए पशुओं का ऐसी ही बेदर्दी और बेशर्मी से उत्पीडन आखिर कब तक करता रहेगा? वसुधा मेहता की अपील-...
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कारपोरेट युग में दिल्ली का जनपरिवहन

वह नब्बे के दशक का शुरूआती साल था जब मैंने पहली बार दिल्ली का जनपरिवहन देखा था. उन दिनों इक्का, तांगा, डग्गामार बसें और दिल्ली की विशेष पहचान फटफट सेवा को मिलाजुलाकर दिल्ली की परिवहन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाया जाता था. आलम यह था कि लालकिला से दरियागंज होते हुए अगर आप आईटीओ तक चले जाएं तो आपके तन पर अगर सफेद वस्त्र होता तो वह काला पड़ चुका होता था. लेकिन इस बात को अब दो दशक बीत चुके हैं.
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खाद्य सुरक्षा का छलावा कानून

‘कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ’ के नारे से सत्ता में आई कांग्रेस पार्टी प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक से आम आदमी का ही निवाला छीन रही है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार का बहुप्रतीक्षित खाद्य सुरक्षा विधेयक वर्तमान बजट सत्र में संसद में पेश होगा। इस विधेयक को संसद में पेश करके यूपीए सरकार आम आदमी को ‘भोजन का अधिकार’ उपलब्ध कराने का दावा कर रही है। वहीं पूरे देश में ‘राइट टू फूड’ के लिए संघर्ष करने वाले जनसंगठनों, बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बीच निराशा का माहौल है। वे लोग सरकार द्वारा तैयार प्रस्तावित विधेयक के मसौदे का विरोध कर रहे हैं। उन लोगों का मानना है कि यह विधेयक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय खाद्य असुरक्षा को ही बढ़ावा देगा।
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दिल्ली कमाते हैं और बिलट से भिजवाते हैं

जहाँ से निकले वहाँ दिक्कत ..... जिनके चमन में पहुंचे उन्हें तकलीफ। आखिरकार मन में आशंकाओं के उफान को थामे ही कोई घर-बार छोड़ता है। चित बेजान करने वाला शब्द - पलायन --यानी किसी जन-समूह की वो तस्वीर जिसके हर पिक्सेल में भयावह दर्द तो है लेकिन आज के दौर के राजनीतिक स्पेस में मुद्दा बनने की तपिश से महरूम ....यानी निरीह।
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न्याय न मिलने का अन्याय

भारत में न्याय प्रणाली पर आजादी के बाद से ही सवालिया निशान लगते रहे हैं. न्याय प्रणाली की परंपरागत पद्धतियों को गैर कानूनी घोषित करके खारिज तो कर दिया गया लेकिन ब्रिटिश उपनिवेश के आधार पर स्थापित की गयी न्याय प्रणाली को भी न्याय पाने के लिए ईमानदारी से लागू नहीं किया गया इसका परिणाम है कि देश में न्याय देनेवाली प्रणाली जनता को समय पर न्याय न देकर अन्याय कर रही है. सतीश सिंह का विश्लेषण-
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शिक्षा के अभेद्य किले में स्थाई सुरंग

माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अजमेर. यही नाम है राजस्थान में 10 वीं और 12 वीं की शिक्षा व्यवस्था का बोझ उढाने वाले संस्थान का. कहने को इसका अपना इतिहास है जिसकी शिक्षा और परीक्षा व्यवस्थाओं को विदेशों तक अपनाया गया है. लेकिन गत शिक्षा सत्र में बोर्ड के अभेद्य किले में सुरंग लग गई. लाख कोशिशों और अरोप प्रत्यारोपों के बीच बोर्ड अपने प्रश्न पत्रों को लीक होने से नहीं बचा पाया. ऐसे में सवाल है कि क्या इस बार बोर्ड अपने खेत को बाड़ के खाने से बचा पायेगा या नही?
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सुदर्शन का (कु) दर्शन
जबसे आरएसएस के लोगों की आतंकवादी घटनाओं में संलिप्तता सामने आयी है, तब से आरएसएस के नेता बौखला गए हैं। इस बौखलाहट में ही शायद संघ के इतिहास में पहली बार हुआ है कि इसके स्वयंसेवक विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। इसी बौखलाहट में आरएसएस के एक्स चीफ केएस सुदर्शन का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और सोनिया गांधी के बारे में ऐसे शब्द बोल दिए, जिन्हें एक विकृत मानसिकता का आदमी ही बोल सकता है।...
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सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक ने 10 नवंबर को सोनिया गांधी पर सीआईए एजंट होने का आरोप लगाकर सनसनी पैदा कर दिया है. पूरी की पूरी कांग्रेस उत्तेजित है और संघ भी बैकफुट पर चला गया है. सुदर्शन के आस पास के लोगों का कहना है कि सुदर्शन जी भुलक्कड़ हो गये हैं और उन्हें कुछ ठीक से याद नहीं रहता. शायद इसीलिए उन्होंने इतनी बड़ी चूक कर दी. ...
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सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
एक बार फिर लोकतंत्र पर आपातकाल मंडरा पड़ा है. राजमाता सोनिया गांधी के सिपहसालारों ने कांग्रेसी गुण्डों, माफियाओं और लोकतंत्र के हत्यारों का आह्वान किया है कि वह देशभर में संघ कार्यालयों पर धावा बोल दे. इसका तत्काल प्रभाव हुआ और कांग्रेसी गुण्डों ने संघ के दिल्ली मुख्यालय पर धावा भी बोल दिया. ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी की मौत के बाद सिखों को निशाना बनाया गया था. हिंसक और अलोकतातंत्रिक मानसिकता से ग्रस्त कांग्रेसी सोनिया का सच जानकर आखिर इस तरह बेकाबू क्यों हो रहे हैं?...
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नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
मुंबई। महाराष्ट्र के नए निजाम भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। कांग्रेस आलाकमान ने अशोक चव्हाण को फर्जीवाड़े से फ्लैट पाने के आरोप में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की गद्दी से हटा दिया। लेकिन नए मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण भी उसी तरह के फर्जीवाड़े में गले तक डूबे हुए हैं। उन्होंने जितने बड़े बड़े झूठ बोलकर सरकार से फ्लैट हथियाए हैं वे कांग्रेस के लिए ज्यादा दागदार हैं।...
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अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
बढ़ते पैमाने पर इसके साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) से जुड़े लोगों का आतंकवादी हमलों में हाथ रहा है। इन हालात में आर एस एस इस पुराने सूत्र पर चल रहा लगता है कि हमला ही सबसे अच्छा बचाव है। उसने 10 नवंबर को देशव्यापी विरोध कार्रवाइयों का आह्वान किया है। इन कार्रवाइयों में संघ के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की बात कही जा रही है। बहरहाल, इसकी चर्चा हम जरा बाद में करेंगे।...
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अपने होने पर ही हैरान
‘चुप्पी-चुप्पी नहीं नहीं, बोलेंगे अब सभी-सभी’ इन्हीं नारों से दाहोद (गुजरात) का सीनियर रेलवे संस्थान परिसर 31 अक्टूबर को पूरे दिन गूंजता रहा। यहां गुजरात के बड़ोदरा, पंचमहल, सुरत, भड़ूच, डांग, बालसाड और साबरकांठा जिले से लगभग तीन हजार के आस पास विमुक्त एवं घुमंतू समाज से ताल्लुक रखने वाले लोग इकट्ठे हुए थे। मौका था, अधिकार अभियान की घोषणा का। उस समाज के लिए जो इस लोकतांत्रिक देश में अधिकार का अर्थ अभी तक समझ नहीं पाएं हैं। ...
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गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?
यह एक ऐसा सवाल है जिस पर अब विवाद होने लगा है. 30 जनवरी 1948 को क्या जब महात्मा गांधी को नाथूराम गोडसे ने गोली मारी तो महात्मा गांधी ने अपने मुंह से हे! राम का संबोधन किया था? उस वक्त घटनास्थल पर मौजूद रहे एक प्रत्यक्षदर्शी के डी मदान का कहना है कि "मैंने नहीं सुना था कि उन्होंने हे राम कहा था या नहीं."...
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भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
स्कूल जाते बच्चों के भी हाथ में भगवा थमाकर भले ही संघ ने शक्ति प्रदर्शन की भरपूर कोशिश की हो लेकिन 10 नवम्बर का दिन उसके इतिहास में कोई बडी घटना के रूप में याद नहीं किया जायेगा। हॉ हम बात कर रहे है राजस्थान के भरतपुर जिला मुख्यालय की जहॉ देश भर की ही तरह हिन्दुवादी संघटनों ने अपने उपर लग रहे ‘भगवा आतंकवाद’ के आरोपों के विरोध में शक्ति प्रदर्शन किया था। भरतपुर जहॉ संघ प्रचारक क रूप में भाजपा के पीएमइन वेंटिग लालकृष्ण आडवानी ने अपनी सेवाऐं दी है संघ का ये विरोध प्रदर्शन एक दम भददा और हल्का रहा।...
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एनसीपी के 'दादा' का दांव
महाराष्ट्र में कांग्रेस में परिवर्तन हुआ तो राष्ट्रवादी कांग्रेस ने भी अपने पत्ते खोल दिये. राज्य में लंबे समय से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही सत्ता के दावेदारी पर एनसीपी ने आखिरकार प्रदेश की प्रशासनिक कमान अपनी ओर से शरद पवार के भतीजे अजीत पवार को सौंप दी है. अब गुरुवार को शाम साढ़े चार बजे पृथ्वीराज चव्हाण के साथ अजीत "दादा" पवार उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे....
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पीएमओ वाले पृथ्वीराज
महाराष्ट्र के नये मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण यूपीए सरकार पार्ट वन और पार्ट टू में बतौर पीएमओ मिनिस्टर जाने जाते हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय में रहते हुए भी उन्होंने कभी ताकतवर होने का दंभ नहीं पाला और चुपचाप काम करते रहे. बिट्स पिलानी से बीई और बर्कले विश्वविद्यालय से एमएस की डिग्री हासिल करनेवाले पृथ्वीराज की राजनीतिक कमेस्ट्री ने उनके सार्वजनिक जीवन में पहली बार इतना गाढ़ा रंग उड़ेला है....
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सुलग रहा है मेरठ 'हिन्दुस्तान'
एक ओर हिन्दुस्तान अखबार अपनी अलग कंपनी बनाकर अखबार को चमकाने और अखबार का विस्तार करने में लगा है वहीं दूसरी ओर हिन्दुस्तान के विभिन्न संस्करणों में हालात ठीक नहीं है. हिन्दुस्तान के मेरठ संस्करण में इन दिनों इस्तीफे दिये जा रहे हैं लेकिन प्रचारित किया जा रहा है कि जो आफिस नहीं आ रहे हैं वे छुट्टी पर चले गये हैं....
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आलोक तोमर के बगल में बसे किशोर मालवीय
सीएनईबी में पहले से एक सलाहकार संपादक थे- आलोक तोमर. अब दूसरे सलाहकार संपादक भी वहां नियुक्त हो गये हैं किशोर मालवीय. उन्होंने सीएनईबी चैनल के साथ बतौर कंसल्टिंग एडिटर अपनी नई पारी की शुरुआत की है। सीएनईबी से पहले वे ‘वायस ऑफ इंडिया’ न्यूज चैनल के साथ जुड़े हुए थे। उन्होंने करीब दो दशक के कॅरियर में देश के नामी-गिरामी मीडिया संस्थानों में कई जिम्मेदारियां निभाईं हैं।...
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सुरक्षा परिषद की छांव में खेती पर दांव
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संसद में दिये गये अपने भाषण में भारत से मिले प्यार की भूरि भूरि प्रशंसा जरूर की लेकिन अपनी व्यावसायिक मजबूरियों को छिपा नहीं सके. बराक ओबामा ने संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए जहां एक ओर भारत को महाशक्ति करार देकर उसके लिए संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता को अपना समर्थन दिया वहीं भारत और अमेरिका द्वारा मिलकर खेती के क्षेत्र में एक और हरित क्रांति के आगाज की घोषणा की....
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आतंक नहीं कश्मीर केन्द्रित हुई ओबामा यात्रा
रविवार की देर शाम भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित भोज में ओमर अब्दुल्ला के शामिल होने से जो आशंका पैदा हुई थी वह सोमवार को हैदराबाद हाउस में और प्रबल रूप में सामने आ गयी जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अमेरिकी राष्ट्रपति की उपस्थिति में स्वीकार किया कि वे पाकिस्तान से बात करते वक्त "के" शब्द पर बात करने से नहीं कतराते हैं....
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भारत से धंधा, पाक को चंदा
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपना तीन दिवसीय दौरा पूरा कर लिया. मुंबई उतरकर दिल्ली दरबार तक उनकी दस्तक भारत पर अमेरिका के मजबूत पकड़ की मिसाल बन गया. निश्चित रूप से उनका दौरा भारत के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना खुद अमेरिका के लिए है. मंदी के दौर से जूझ रहे अमेरिका को "कारपोरेट" जगत का धंधा दिलाने के लिए उन्होंने न केवल भारत को महाशक्ति करार दे दिया बल्कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थन भी कर दिया....
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