इस्लाम पर आतंकवाद का दाग
दक्षिण एशिया में भारत और नेपाल हिन्दू बहुसंख्यक आबादी वाले देश हैं जबकि अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और मालदीव बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाले देश हैं. भूटान और म्यामांर में महायान पंथ के बौद्ध और चीन में बौद्धों, कन्फ्यूसियश और ताओवादियों का वर्चस्व है. भारत में 14 प्रतिशत मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं तो बांग्लादेश में 10 प्रतिशत हिन्दू अल्पसंख्यक हैं.
लेकिन दोनों जगहों पर अल्पसंख्यकों की स्थिति पर नजर डाले तो साफ दिखता है कि जहां एक ओर भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की संख्या लगातार बढ़ रही है वहीं दूसरी ओर बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यक कम हो रहे हैं. अगर इसे हम पूरे दक्षिण एशिया के स्तर पर देखें तो हिन्दुओं की आबादी लगातार कम हो रही है और मुसलमानों की आबादी लगातार बढ़ रही है. इस समय दक्षिण एशिया में 69 प्रतिशत हिन्दू और 28 प्रतिशत मुसलमान हैं. थोड़े समय पहले यह आंकड़ा 74.5 और 24.5 का था. दक्षिण एशिया में जिस तरह का जनसंख्या घनत्व है वैसा दुनिया के दूसरे किसी हिस्से में नहीं है. भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में कुल 45 करोड़ मुसलमान रह रहे हैं.कहने की जरूरत नहीं कि दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलमान दक्षिण एशिया और भारत परिक्षेत्र में निवास करते हैं फिर भी यहां के मुसलमान स्थानीय परंपरा और संस्कृति की बजाय अरब की परंपरा और संस्कृति पर विश्वास करते हैं और उसे ही इस्लाम का प्रतीक मानते हैं. यह बात थोड़ी अटपटी लगती है कि दक्षिण एशिया से आज तक कभी मुसलमानों ने इस तरह के प्रयास नहीं किये कि अगर वे आबादी में सबसे अधिक यहां हैं तो इस्लाम की वैश्विक मान्यताओं पर उनका प्रभाव होना चाहिए. इसके उलट दक्षिण एशिया का मुसलमान अरब देशों के बैनर तले सैनिक की की भूमिका में खुश नजर आता है. भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का मुसलमान राजनीतिक सीमा से उपर उठकर अहले इस्लाम के बैनर तले एक नजर आता है. दूसरी ओर हिन्दू समाज जाति, भाषा, प्रांत और क्षेत्रवाद की जटिल सीमाओं से अपने आप को कभी मुक्त ही नहीं कर पाया. सामाजिक आर्थिक विकास के मापदण्ड पर हिन्दुस्तान दो वर्गों में विभाजित हो रहा है.विकास के आधार पर देखें तो यह विभाजन प्रांतवार है. दक्षिण-पश्चिम के कुछ राज्यों को छोड़ दें तो जिन राज्यों की आबादी सालाना 4.5 से 5.2 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है और जहां की आबादी पूरे देश की आबादी का 40 प्रतिशत है. उत्तर के इन राज्यों में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य-प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य शामिल हैं. यहां एक चौंकानेवाला तथ्य और देखने को मिलता है कि जिन राज्यों में विकासदर कम है वहां जनसंख्या घनत्व के चलते लोकसभा में प्रतिनिधित्व ज्यादा है. इसी के कारण वाजपेयी के इस फैसले का करूणानिधि ने खुलकर विरोध किया था कि लोकसभा सीटों की पुनर्रचना नहीं होनी चाहिए. वाजपेयी सरकार ने करूणानिधि को आश्वासन दिया था कि केन्द्र सरकार 2020 तक ऐसी कोई पुनर्रचना नहीं करेगी.
सीआईआई की रिपोर्ट कहती है कि आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, पंजाब में सामाजिक आर्थिक विकास की गति तीव्र है. गुजरात और महाराष्ट्र विशेष रूप से विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर रहा है. जबकि उत्तर के जिन राज्यों की हालत खराब है वहां जिस तरह से जनसंख्या घनत्व बढ़ रहा है उससे 2012 तक ही औसत परिवार के पास मात्र 2.5 एकड़ से कम भूमिवाले किसानों की आबादी लगभग 87 फीसदी हो जाएगी. सूचना क्रांति की बात भी करें तो देश में कंप्यूटर खरीदनेवाले कुल उपभोक्ताओं में 53 फीसदी अकेले 4 बड़े महानगरों में रहते हैं. इसके बाद दूसरे दर्जे के शहरों में 12 फीसदी कंप्यूटर बिके. यानी पहले और दूसरे दर्जे के 12 शहरों में कुल 65 फीसदी कंप्यूटर बिके. अगर हम अपने गांवों की आबादी 70 फीसदी मानें तो भी उन तक 7 प्रतिशत कंप्यूटर भी नहीं पहुंचा.
आतंकवाद की चर्चा के बीच ये आंकड़ें अनायास नहीं हैं. अमरीकी खुफिया एजंसी सीआईए ने श्रीलंका के आतंकवाद का अध्ययन किया था और पाया कि वहां 1971 में जनता विमुक्ति पेरूमना और 1980 के दशक में लिट्टे के नेतृत्व में अलगाववादी आंदोलन तभी छिड़े जब बेरोजगार युवकों की आबादी 20 प्रतिशत से ज्यादा हो गयी थी. 15 से 25 वर्ष आयुवर्ग के युवकों की आबादी भारत में 35.4 करोड़ थी जो सन 2021 में 62.7 करोड़ और और 2031 में 69.2 करोड़ हो जाएगी. चूंकि आबादी गैर विकसित प्रदेशों में ज्यादा तेजी से बढ़ रही है इसलिए बेरोजगारी का खतरा भी इन्हीं इलाकों में सबसे ज्यादा होगा. इस पूरे मामले का एक और खतरनाक पहलू है कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे प्रांतो में आबादी तेजी से बढ़ रही है. इसमें भी मुस्लिम आबादी का विस्तार सबसे तेज है. जाहिर अशिक्षा और कुरीतियां उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने से रोकेंगी. ऐसे में जहां रोजगार नहीं होगा, शिक्षा नहीं होगी वैसे इलाकों में आतंकवादियों द्वारा अपनी पैठ बना लेना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा. फिर देश के 18 राज्य ऐसे हैं जिनकी सीमाएं अंतरराष्ट्रीय हैं. उन राज्यों में बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए जितने संजीदे प्रयास करने होंगे फिलहाल वे कहीं दिखाई नहीं देते.
Technorati ProfileTitle :
Body
- कांग्रेस अधिवेशन को सफल बनाने में जुटी अकाली भाजपा सरकार
- रामायण, महाभारत और हनुमान पर पाकिस्तान में प्रतिबंध
- भूख के पेट में समा गये मध्य प्रदेश के 28 आदिवासी बच्चे
- 24 सितंबर को आयेगा अयोध्या पर फैसला
- विश्व के 35 फीसदी निरक्षर भारत में
- मुण्डा बनेंगे मुख्यमंत्री, 10 सितंबर तक शपथ ग्रहण की संभावना
- जातिवाद, क्षेत्रवाद, धर्मवाद का शिकार माओवाद
- एक अनोखे किसान आंदोलन का अंत
- बिहार में राजनीतिक घमासान की घोषणा
- लद गये वामपंथ के दिन- राहुल गांधी



del.icio.us
Digg
You have very good knowledge but... :(
हिंदू कोन सा सुधरे हुवे हैं ??
Post your comment