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कंधमाल में क्या हुआ?

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वह २३ अगस्त की शाम थी. स्वामी लक्ष्मणानंद अपने आश्रम के स्टोर रूम में थे. बगल वाले कमरे उन्हीं के वनवासी कन्या छात्रावास की छात्रा लक्ष्मी (बदला हुआ नाम) कुछ दैनिक कामों को निपटा रही थी. इतने में चार नकाबपोश लोग अंदर दाखिल होते हैं. चारों के सामने पहले लक्ष्मी आती है. चारों उसे चुप रहने का इशारा करते हुए वहां से जाने के लिए कहते हैं. कदमों की आहट और सन्नाटे से स्वामी लक्ष्मणानंद भी थोड़े चौकन्ने हो जाते हैं. लगता है उन्हें इस बात का अहसास हो गया था कि कुछ लोग अंदर आये हैं जिनके इरादे नेक नहीं हैं.

वे भागकर बाथरूम में छिप जाते हैं. चारों नकाबपोश उन्हें खोजते हुए बाथरूम के बाहर पहुंचते हैं. पहले दरवाजा पीटते हैं, जब दरवाजा नहीं खुलता तो बाहर से ही फायर शुरू कर देते हैं. बाथरूम के दरवाजे और दीवारों पर अब भी कोई २५-३० गोलियों के निशान साफ दिख रहे हैं.

यह वो घटना थी जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप कंधमाल अगले कुछ दिनों के लिए रणभूमि बनने जा रहा था. स्वामी लक्ष्मणानंद की उम्र ८४ साल थी और कोई चालीस साल से वे इस इलाके में आदिवासियों के बीच काम कर रहे थे. जाहिर है इलाके में हिन्दुओं के बीच उनका सम्मान था.  इसलिए उनकी हत्या के प्रतिक्रियास्वरूप हिंसक हिन्दू समाज ने पूरे कंधमाल को रणभूमि बना दिया. गावों में जो ईसाई प्रार्थना घर बनाये गये थे उनको भारी संख्या में नुकसान पहुंचाया गया. कोई २५ से ३० हजार ईसाई शरणार्थी शिविरों में पहुंच गये. जहां पुलिस के पहरे में वे सुरक्षित तो हैं लेकिन उनके सिर अनिश्चय का बादल मंडरा रहा है. गांवों में वापस लौटने पर एक तरह से अघोषित पाबंदी लगी हुई है. हिन्दू समूहों ने धमकी दे रखी है कि अगर वे गांव में वापस आते हैं तो उनकी खैर नहीं. इसलिए यहां से ये लोग अब धीरे-धीरे हैदराबाद, बंगलौर और दिल्ली की ओर जा रहे हैं. निश्चित रूप से बात बिगड़ चुकी है.

लेकिन कंधमाल में जो कुछ हो रहा है उसे समझने के लिए स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या को आधार बनाकर आप समस्या के मूल तक नहीं पहुंच सकते. समस्या के मूल में धार्मिक कारणों से ज्यादा सामाजिक और आर्थिक कारण हैं.यह इलाका आदिवासी बहुल है इसमें बताने लायक क्या है? बताने लायक नहीं लेकिन समझने लायक तथ्य यह है यहां पान वर्ग के अनुसूचित जाति के लोग बड़ी संख्या में धर्म परिवर्तन कर ईसाई हुए हैं. पान समाज के लोग ही आदिवासियों की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करते हैं. जाहिर सी बात है बिचौलिया हमेशा फायदे में रहना चाहता है. यही हाल यहां पान समाज के लोगों का है. वे आदिवासियों की कमाई पर जीने की कला सीख गये हैं. इसका सामाजिक संस्करण यह है कि पान समाज के ईसाई ही सबसे ज्यादा धर्म परिवर्तन के लिए लोगों को उकसाते हैं. राजनीतिक संस्करण यह है कि पान समाज के लोग दलित होने का दर्जा भी नहीं खोना चाहते और ईसाई हो जाने के बाद भी आरक्षण की कामना रखते हैं. इसके लिए वे हर तरह के नकली औजार इस्तेमाल करते हैं. जाहिर सी बात है जब एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के साथ इस तरह का व्यवहार लंबे समय तक हो तो अंदर एक चिंगारी सुलगने ही लगती है. स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या ने उस चिंगारी को भरपूर हवा दे दी.

कंधमाल की घटनाओं को समझने और वहां शांति की स्थिति कायम करने के लिए एक अध्ययन दल वहां गया था जिसमें कुछ गांधीवादी, लोहियावादी और स्थानीय बुद्धिजीवी शामिल थे. इन लोगों में शामिल एक गांधीवादी कार्यकर्ता (वे अपना नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहते) बताते हैं कि कंधमाल लंबे समय से सुलग रहा था. यहां के जितने स्कूल, अस्पताल यहां तक कि प्रार्थना घरों के सामने जो पानी के नल लगे हुए हैं वहां हिन्दुओं के लिए कोई खास जगह नहीं है. ईसाई समूहों सीधे तौर पर तो ऐसा कुछ स्वीकार नहीं करते लेकिन जमीनी हकीकत यही है. अगर ईसाई मिशनरियों द्वारा उपलब्ध करायी जा रही सुविधाओं का लाभ लेना है तो ईसाई बनना शायद पहली शर्त हो गयी है. इससे यहां के स्थानीय हिन्दू समाज में गुस्सा गहरा है. वे ईसाई मिशनरियों के कामों को वैसा नहीं देखते जैसा दूर बैठे लोग समझते हैं. लेकिन दूसरी ओर इतना सब कुछ होने के बावजूद हिन्दू समाज में जाति व्यवस्था की छूआछूत और बुराईयां भी जस की तस कायम हैं. यह तो सच है कि ईसाई मिशनरियां लोभ-लालच देकर आदिवासियों को ईसाई बनाती हैं लेकिन इसकी परिस्थितियां तो हिन्दू समाज ने ही तैयार की हैं. वे आगे बताते हैं कि यहां इस तरह घटनाएं अक्सर होती हैं कि कोई पादरी दो मूर्तियां लेकर गांवों में पहुंचता है. उसमें एक काठ की जगन्नाथ की मूर्ति होती है तो दूसरी धातु की ईसा मसीह की मूर्ति होती है. वह दोनों मूर्तियों को आग में डालता है तो स्वाभाविक है काठ की मूर्ति जल ही जाएगी और धातु की मूर्ति चमकने लगती है. ऐसी घटनाओं से सीधे-सादे आदिवासियों में यह विश्वास पैदा करने की कोशिश की जाती है कि ईसा मसीह भगवान जगन्नाथ से बड़े हैं.

कंधमाल में हिंसक घटनाओं में अब तक 35 लोग मारे जा चुके हैं जिसमें महिलाएं और किशोर भी शामिल हैं. हिंसाग्रस्त ईसाईयों के लिए सरकार बालीगुड़ा, रेकिया, उदयगिरी, फुलवानी और टिकावाली में शरणार्थी शिविर चला रही है. इन शिविरों में कोई 20-30 हजार लोगों ने शरण ले रखी है.

इन घटनाओं के कारण यहां हिन्दूवादी संगठनों की जमीन तैयार कर दी है. आज यहां विहिप और आरएसएस के दूसरे संगठन इन ईसाई संस्थाओं की कारगुजारियों को अपने विस्तार का आधार बना रहे हैं. लेकिन यह भी समझ लेना चाहिए कि एक आदिवासी अपने आप को उस तरह से हिन्दू नहीं मानता जैसी परिभाषा विहिप या राजनीतिक दल करते हैं. उसका धर्म ज्यादा श्रेष्ठ सद्गुणों पर आधारित है जो मन और जीवन को निर्मल बनाता है. हिन्दूवादी संगठनों ने यहां जिस हिन्दुत्व का बीजारोपण किया है उसकी फसल विधायक और सांसद के रूप में आती है. फिर चाहे ईसाईयत पनपे या हिन्दुत्व दोनों ही तरीकों से यहां का पारंपरिक आदिवासी समाज घाटे में रहता है. क्रिया और प्रतिक्रिया का सिद्धांत केवल हिंसा के स्तर पर ही नहीं है. ईसाई समाज के लोग क्रिया स्वरूप जिस नये तरह के स्कूल, चिकित्सा और मान्यता को यहां स्थापित कर रहे हैं वह पोप की लंबी अवधि की योजनाओं को भले ही कामयाब करता हो लेकिन आदिवासी समाज और उनके संस्कार धीरे-धीरे खत्म हो रहे है. ईसाई सेवा की प्रतिक्रिया हिन्दुवादी संगठन भी कोई आदिवासी समाज का संरक्षण नहीं कर रहे वे एक नये ही तरह की समाज रचना कर रहे हैं जो उनकी परिभाषा में हिन्दू है.

फिर भी कंधमाल में जो हिंसक घटनाएं हो रही हैं उसे संघ के लोग सिर माथे पर ले रहे हैं क्योंकि यह एक तरह से विजेता होने का गौरव भी है. लेकिन विरोध बहुत नीचे तक और ढेर सारे अनाम लोगों के द्वारा भी हो रहा है. इनमें ज्यादातर वे लोग हैं जो इस मौके को आर्थिक जवाब के रूप में स्थापित करना चाहते हैं जिससे आनेवाले समय में वे स्थानीय स्तर पर इसका आर्थिक स्वरूप निर्धारित कर सकें. आरएसएस और उसके समर्थक संगठनों को फायदा यह है कि उड़ीसा में आनेवाले चुनावों में सीधा फायदा भाजपा और बीजद को मिलेगा. कांग्रेस मूक है क्योंकि इस तरह की घटनाएं जितनी होंगी ईसाई मतों का कांग्रेस की ओर ध्रुवीकरण होगा.

इस पूरे मामले में एक नया माओवादी एंगल भी जुड़ गयी है. अब तक सुनील नाम से उड़िया भाषा में चार पत्र मीडिया को जारी किये गये हैं. लेटरहेड पर माओवादी निशान है. पहली चिट्ठी में दावा किया गया कि लक्ष्मणानंद को उन्होंने मारा है. दूसरी चिट्ठी में इसका खंडन किया गया. तीसरी चिट्ठी में फिर कहा गया कि हां उन्होंने ही मारा है और चौथी चिट्ठी में कुछ और नामों का उल्लेख किया गया है जिन्हें जान से मारने की धमकी दी गयी है. इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि इस लेटरहेड पर कोई पता-ठिकाना और फोन नंबर इत्यादि नहीं है. इसलिए इन चिट्ठियों पर कितना विश्वास करना चाहिए यह आप तय करिए. विहिप के महामंत्री अशोक सिंहल कहते हैं कि माओवादी इस तरह से धार्मिक हत्या आदि में कभी लिप्त नहीं रहे हैं. लेकिन संघ में ही एक दूसरा धड़ा है जो मानता है कि माओवादियों को ईसाईयों द्वारा किराये पर लेकर स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या करायी गयी.

कंधमाल की इन घटनाओं से स्थानीय लोग भले ही संकट में हों लेकिन इस संकट में भी सभी राजनीतिक दल, धार्मिक समूह और चरमपंथी संगठन अपने-अपने फायदे की जुगत लगाये हुए हैं, और दुर्भाग्य से वे सफल हैं. 

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suresh chiplunkar on 04 October, 2008 12:58;57
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सुघड़ और विस्तृत रिपोर्ट, उम्मीद तो नहीं है लेकिन शायद अब सेकुलरों की आँखें खुलें…
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sumo on 04 October, 2008 13:58;59
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yeh mamla mahila aur avaidh sambandho kabhi hai jiper hindu chashme se dekhna muskil hai.jara moke per jaye to pata chlega ki swami ji kya kya karte the.aap to delhi me baithker vichar dete rahte hai aur vichar lete rahte hai.29ad1e
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दीपक on 04 October, 2008 14:03;00
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सटीक विश्लेषण !! पर क्या कुछ सुधरेगा !!घोर हताशा है
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संजय तिवारी on 04 October, 2008 14:11;15
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यह रिपोर्ट डा रामजी सिंह की अध्यक्षता में कंधमाल गये एक अध्ययन दल के निष्कर्षों पर आधारित है. उत्कल शांति सद्भावना अभियान नामक इस अध्ययन दल की पूरी रिपोर्ट हम जल्द ही प्रकाशित करेंगे.
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Brijesh on 04 October, 2008 14:44;52
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Sumoji 84 saal ke vyakti ki avaidh sambandh ke karan hatya kya bakwaas hai aapki theory. Agar awaidh sambandh ke karan hatya honi hoti to unki hatya unke jawani ke dino mein hi ho gayi hoti. Aap apne chashme ka number check karwa le to acha hai.
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सुमो on 04 October, 2008 15:09;11
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ऊपर वाली सुमो के नाम से की गई टिप्पणी न जाने किस मूर्ख की है जो उसने सुमो नाम से की है
बृजेश जी, मैं आपकी बात से सहमत हूं
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munna jha on 04 October, 2008 19:09;00
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ज़रा देर तक यह समझ भी ले की स्वामी जी के हत्या का यह प्रतिक्रिया है, लेकिन संजय जी मैं कम से कम समझता हूँ के अभी इसाई समाज उतनी दबंग नहीं हुई है,की किसी के हत्या कर दे.इस सब में कहीं ना कहीं कोई तो पेंच है ही अब तय करना है के हम कौन सा माहौल बनाये जो समाज और मानवता के हितकर हो.
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sumo on 04 October, 2008 22:41;07
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yeh niche vala sumo farji hai half paint pahankar roj sakha jata hai aur din me bhapa mukhyalai per netao ki chaplusi karta hai.pahele orissa me dara ka samrthan kerta tha.naqqalo se savdhan rahe.
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Ratan singh on 05 October, 2008 13:48;32
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सेवा के नाम पर इसे व्यापर कहे या ठगी , खैर आपका लेख समस्या के मूल कारण को बताने के लिए प्रयाप्त है
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Brijesh on 06 October, 2008 14:48;26
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Pahle aap dono log decide kar lein ki kaun asli Sumo hai. Rahi bat BJP ya RSS ki to in sangathan se judna koi gairkanooni nahi hai, ye sangathan abhi pratibandhit nahi hain. Aur BJP to Loksabha mein doosri sabse badi party hai. Sumoji aap to aise nam ginwa rahe hain jaise ye sangathan Atankwaadi sangthan ho.
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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